सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

उठाने का साहस नहीं करता, वह गीता सुनने की पात्रता भी प्राप्त नहीं करता। यही "धनुरुद्यम्य" का अनन्त संदेश है।

गीता: प्रथम अध्याय श्लोक २०(८)

धनुरुद्यम्य"—यह एक शब्द है, किन्तु उसके भीतर सम्पूर्ण गीता की नैतिक संरचना छिपी हुई है। व्यास यदि चाहते तो लिख सकते थे—"हृषीकेशमुवाच"—अर्जुन ने कृष्ण से कहा। किन्तु उन्होंने उसके पहले एक छोटा-सा, लगभग अनदेखा रह जाने वाला पद जोड़ा—"धनुरुद्यम्य"। अर्थात् अर्जुन ने पहले धनुष उठाया, उसके बाद कृष्ण से बात की। यह क्रम आकस्मिक नहीं है; यही गीता का धर्म है।
पहली दृष्टि में यह एक साधारण क्रिया लगती है—युद्ध प्रारम्भ होने वाला है, अतः योद्धा ने धनुष उठा लिया। किन्तु व्यास की दृष्टि में यह केवल शारीरिक क्रिया नहीं, एक अस्तित्वगत घोषणा (existential declaration) है। अर्जुन प्रश्न उस मनःस्थिति से नहीं पूछ रहे जिसमें व्यक्ति अपने दायित्व से भागना चाहता है। वे उस मनःस्थिति से पूछ रहे हैं जिसमें व्यक्ति अपने दायित्व को स्वीकार कर चुका है, किन्तु उसके नैतिक अर्थ को समझना चाहता है। यही अन्तर गीता को पलायन का ग्रन्थ बनने से बचाता है।

ध्यान दीजिए कि यदि अर्जुन पहले धनुष रख देते और फिर प्रश्न पूछते, तो पूरी गीता का स्वर बदल जाता। तब यह युद्ध से बचने का औचित्य सिद्ध करने वाली वार्ता बन सकती थी। किन्तु अर्जुन पहले ही धनुष उठा चुके हैं। इसका अर्थ है कि उनकी मूल वृत्ति कर्म की है, अकर्म की नहीं। उनका संकट कर्म छोड़ने का नहीं, कर्म को धर्म के साथ कैसे जोड़ा जाए—इसका है।

भारतीय दर्शन में यह अत्यन्त सूक्ष्म भेद है। वैराग्य और पलायन एक नहीं हैं। गीता बार-बार कहती है कि कर्म का त्याग नहीं, कर्म में आसक्ति का त्याग आवश्यक है। "धनुरुद्यम्य" उसी सिद्धान्त का पहला दृश्य-रूप है। अर्जुन का हाथ अभी भी धनुष पर है; केवल उनका मन प्रश्न में है। शरीर युद्ध के लिए तैयार है; आत्मा सत्य की खोज में है। यही संतुलन गीता का जन्मस्थान है।

यहाँ एक और सूक्ष्म बात ध्यान देने योग्य है। संस्कृत में "उद्यम" शब्द केवल उठाने का अर्थ नहीं देता। "उद्" का अर्थ है ऊपर, और "यम्" धारण करना, नियंत्रित करना। इसलिए "उद्यम" का अर्थ है—अपने को ऊर्ध्व दिशा में लगाना, अपनी सम्पूर्ण शक्ति को एक उद्देश्य की ओर केन्द्रित करना। "धनुरुद्यम्य" का अर्थ केवल धनुष उठा लेना नहीं, बल्कि अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को युद्ध के लिए संयोजित कर लेना है। अर्जुन शारीरिक रूप से विचलित नहीं हैं। उनका संकट शारीरिक नहीं, नैतिक है।
यही कारण है कि भारतीय परम्परा में अर्जुन की विषादावस्था को कभी कायरता नहीं कहा गया। कायर व्यक्ति धनुष नहीं उठाता। वह रणभूमि में आता ही नहीं। अर्जुन रणभूमि में हैं, धनुष हाथ में है, शंख बज चुका है, शस्त्र-सम्पात आरम्भ हो चुका है। अब जो प्रश्न उठ रहा है, वह केवल एक ऐसे मनुष्य का प्रश्न हो सकता है जो युद्ध करने में समर्थ है, किन्तु यह जानना चाहता है कि युद्ध करना उचित भी है या नहीं।

आधुनिक अस्तित्ववादी दर्शन में Søren Kierkegaard ने एक महत्त्वपूर्ण बात कही थी कि नैतिक निर्णय वही कर सकता है जो निर्णय लेने की स्थिति में हो। जो निर्णय लेने की शक्ति ही नहीं रखता, उसका नैतिक संकट वास्तविक नहीं होता। अर्जुन का संकट वास्तविक है क्योंकि वे युद्ध कर सकते हैं। यदि वे दुर्बल होते, तो उनका युद्ध-विमुख होना नैतिकता नहीं, विवशता होता। उनकी शक्ति ही उनके प्रश्न को विश्वसनीय बनाती है।

इसी प्रकार Viktor Frankl ने लिखा कि मनुष्य से सब कुछ छीना जा सकता है, किन्तु एक चीज़ नहीं—परिस्थिति के प्रति अपना दृष्टिकोण चुनने की स्वतंत्रता। अर्जुन के सामने भी परिस्थिति निश्चित है। युद्ध उपस्थित है। किन्तु वे यह चुनना चाहते हैं कि इस युद्ध में उनका भीतरी भाव क्या होगा। "धनुरुद्यम्य" बाहरी तैयारी है; गीता भीतरी तैयारी।

ज़ेन बौद्ध परम्परा में भी एक प्रसिद्ध सिद्धान्त है—"Action first, ego later disappears." पहले अपने कर्म में पूर्णतः उपस्थित हो जाओ, फिर अहंकार स्वयं गलने लगेगा। अर्जुन का धनुष उठाना भी इसी दिशा का संकेत है। वे पहले कर्म के क्षेत्र में उपस्थित होते हैं; फिर उस कर्म की आत्मा की खोज करते हैं। वे पहले रणभूमि में आते हैं; फिर उसे योगभूमि बनाते हैं।

इस शब्द का एक अत्यन्त काव्यात्मक अर्थ भी है। धनुष केवल अस्त्र नहीं है; वह मनुष्य की प्रतिबद्धता (commitment) का दृश्य प्रतीक है। जिस क्षण अर्जुन ने धनुष उठाया, उसी क्षण उन्होंने यह स्वीकार कर लिया कि अब उन्हें जीवन के सबसे कठिन प्रश्न से भागना नहीं है। वे उत्तर खोजेंगे, चाहे वह उत्तर उन्हें युद्ध की ओर ले जाए या आत्म-परिवर्तन की ओर। धनुष यहाँ बाहरी हथियार नहीं, भीतर के साहस का रूपक बन जाता है।

ऋषि-दृष्टि से देखें तो "धनुरुद्यम्य" एक और गहरे संकेत की ओर ले जाता है। उपनिषद् कहते हैं—
प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते।
(मुण्डकोपनिषद् २.२.४)
यहाँ प्रणव (ॐ) धनुष है, आत्मा बाण है और ब्रह्म लक्ष्य है। इस उपनिषद्-वाक्य की पृष्ठभूमि में "धनुरुद्यम्य" का अर्थ और विस्तृत हो जाता है। अर्जुन केवल लौकिक धनुष नहीं उठा रहे; वे अनजाने में उस आध्यात्मिक यात्रा का भी धनुष उठा रहे हैं जो उन्हें आत्मा से ब्रह्म तक ले जाएगी। युद्ध तो केवल बहाना है; वास्तविक लक्ष्य आत्मबोध है। गांडीव बाह्य युद्ध के लिए उठा है, किन्तु उसी के उठते ही अन्तःकरण का धनुष भी तन गया है।

इसीलिए "धनुरुद्यम्य" गीता का केवल क्रियापद नहीं है; वह मनुष्य के परिपक्व होने का क्षण है। जीवन में प्रश्न पूछने का अधिकार उसी को है जिसने अपना गांडीव उठाया हो—जो अपने उत्तरदायित्व से भाग नहीं रहा, जो कर्म से विमुख नहीं, बल्कि कर्म को सत्य के आलोक में देखना चाहता है। व्यास की दृष्टि में दर्शन उन्हीं के पास आता है जो पहले जीवन का भार उठाते हैं। जो धनुष उठाने का साहस नहीं करता, वह गीता सुनने की पात्रता भी प्राप्त नहीं करता। यही "धनुरुद्यम्य" का अनन्त संदेश है।

धनुरुद्यम्य" का सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि यहाँ शरीर और चेतना दो अलग दिशाओं में गतिशील दिखाई देते हैं, फिर भी उनमें कोई विरोध नहीं है। अर्जुन का हाथ धनुष उठा रहा है, किन्तु उसी क्षण उनका मन प्रश्न पूछने लगा है। बाहर कर्म का उत्कर्ष है, भीतर विवेक का उदय। यही भारतीय संस्कृति की एक अद्वितीय विशेषता है—यह कर्म और चिन्तन को कभी विरोधी नहीं मानती।

विश्व की अनेक परम्पराओं में विचारक और योद्धा अलग-अलग वर्गों में विभक्त रहे हैं। यूनानी परम्परा में दार्शनिक नगर के बाहर अकादमी में बैठा है और सैनिक रणभूमि में। मध्यकालीन यूरोप में मठ (Monastery) और युद्धभूमि (Battlefield) दो अलग संसार हैं। किन्तु महाभारत में यह विभाजन नहीं है। यहाँ वही व्यक्ति जो संसार का महानतम धनुर्धर है, वही संसार के महानतम दार्शनिक संवाद का श्रोता भी बनता है। व्यास मानो कह रहे हैं कि जिसके हाथ में शस्त्र है, उसी के भीतर शास्त्र की आवश्यकता सबसे अधिक है।

यही कारण है कि गीता किसी आश्रम में नहीं कही गई। यदि कृष्ण केवल दर्शन सिखाना चाहते, तो वे द्वारका में, बदरिकाश्रम में या हिमालय की किसी गुफा में भी कह सकते थे। किन्तु उन्होंने गीता वहीं कही जहाँ गांडीव तना हुआ था। इससे बड़ा सांस्कृतिक उद्घोष क्या हो सकता है कि भारतीय दर्शन जीवन से भागकर नहीं, जीवन के मध्य में जन्म लेता है।
Hannah Arendt ने मानव-जीवन को vita contemplativa (चिन्तनशील जीवन) और vita activa (सक्रिय जीवन) में विभाजित करते हुए लिखा कि आधुनिक सभ्यता इन दोनों को अलग-अलग कर बैठी है। महाभारत इस विभाजन को स्वीकार नहीं करता। अर्जुन में दोनों एक साथ हैं। वे vita activa के चरम पर हैं—युद्ध के लिए तैयार। और उसी क्षण vita contemplativa का भी चरम प्रारम्भ होता है—आत्मा, धर्म, मृत्यु, कर्म और ब्रह्म पर प्रश्न।

यही "धनुरुद्यम्य" का सभ्यतागत अर्थ है। भारतीय दृष्टि में कर्म और ज्ञान दो नदियाँ नहीं हैं; वे एक ही गंगा की दो धाराएँ हैं।
यहाँ एक अत्यन्त सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक तथ्य भी छिपा है। आधुनिक तंत्रिका-विज्ञान (Neuroscience) बताता है कि संकट के समय अधिकांश मनुष्य दो अवस्थाओं में चले जाते हैं—Fight या Flight। या तो वे बिना सोचे लड़ते हैं, या बिना सोचे भागते हैं। अर्जुन न तो इन दोनों में हैं। वे तीसरी अवस्था का उद्घाटन करते हैं—Reflect। वे लड़ने को तैयार हैं, भाग नहीं रहे, किन्तु लड़ने से पहले समझना चाहते हैं।

आज के मनोविज्ञान में इसे Response over Reaction कहा जाता है। प्रतिक्रिया (Reaction) आवेग से होती है; उत्तर (Response) चेतना से। "धनुरुद्यम्य" और उसके बाद का संवाद यही शिक्षा देता है कि धर्मयुक्त कर्म कभी प्रतिक्रिया नहीं होता; वह सदैव जागरूक उत्तर होता है।

ऋषि-दृष्टि से देखें तो धनुष उठाना केवल युद्ध की तैयारी नहीं, स्वधर्म को स्वीकार करना भी है। अर्जुन धनुष उठाकर अपने क्षत्रियत्व को अस्वीकार नहीं कर रहे। वे केवल यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनका क्षत्रियत्व धर्म के अधीन रहे, अहंकार के अधीन नहीं। यही कारण है कि गीता में आगे कृष्ण उन्हें बार-बार युद्ध करने को कहते हैं, किन्तु कभी क्रोध से युद्ध करने को नहीं कहते। युद्ध करो—किन्तु द्वेष से नहीं। युद्ध करो—किन्तु फल की आसक्ति से नहीं। युद्ध करो—किन्तु 'मैं मार रहा हूँ' इस अहंकार से नहीं।

ध्यान दीजिए कि यदि अर्जुन पहले प्रश्न पूछते और बाद में धनुष उठाते, तो गीता का निष्कर्ष भी बदल सकता था। तब यह सम्भव था कि वे अन्ततः धनुष उठा लें। किन्तु व्यास ने क्रम उलट दिया। उन्होंने पहले धनुष उठवाया। इसका अर्थ है कि अर्जुन की पात्रता पहले से सिद्ध है। गीता उन्हें वीर बनाने के लिए नहीं आई; गीता वीर को योगी बनाने आई है।
यही इस शब्द का सबसे गहरा आध्यात्मिक रहस्य है।

भारतीय परम्परा में दो प्रकार के त्याग बताए गए हैं। एक है कर्तव्य का त्याग, दूसरा है कर्तृत्व का त्याग। पहला गीता अस्वीकार करती है, दूसरा स्वीकार करती है। 

"धनुरुद्यम्य" बताता है कि अर्जुन कर्तव्य नहीं छोड़ रहे; आगे कृष्ण उन्हें कर्तृत्व छोड़ना सिखाएँगे। यही कर्मयोग का जन्म है।
इसलिए "धनुरुद्यम्य" केवल युद्ध का दृश्य नहीं है; यह मनुष्य की आध्यात्मिक परिपक्वता का दृश्य है। परिपक्व मनुष्य वही है जो अपने उत्तरदायित्व को उठाने का साहस भी रखता हो और उसी उत्तरदायित्व के नैतिक औचित्य पर प्रश्न उठाने का विनय भी। साहस और विनम्रता का यह अद्भुत संयोग ही अर्जुन को अर्जुन बनाता है।

और शायद इसी कारण व्यास ने "धनुरुद्यम्य" को गीता के प्रारम्भ से ठीक पहले रखा। क्योंकि गीता का ज्ञान उस व्यक्ति के लिए नहीं है जिसके हाथ खाली हैं; गीता उस व्यक्ति के लिए है जिसके हाथ कर्म से भरे हैं, किन्तु जिसका हृदय अभी भी सत्य की खोज में खुला हुआ है। यही भारतीय मनुष्य का आदर्श है—हाथ में गांडीव, हृदय में प्रश्न, और सामने कृष्ण।

धनुरुद्यम्य" का अर्थ केवल यह नहीं है कि अर्जुन ने गांडीव हाथ में लिया। धनुष केवल एक हथियार नहीं है; वह मनुष्य के भीतर की एक विशेष चेतना-अवस्था का भी प्रतीक है। संसार के लगभग सभी प्राचीन संस्कृतियों में धनुष का सम्बन्ध केवल युद्ध से नहीं, एकाग्रता, संयम और दूरदृष्टि से रहा है। तलवार निकट के शत्रु के लिए है; धनुष दूर के लक्ष्य के लिए। तलवार आवेग का अस्त्र बन सकती है; धनुष धैर्य का अस्त्र है। धनुष चलाने से पहले श्वास स्थिर करनी पड़ती है, दृष्टि स्थिर करनी पड़ती है, हाथ स्थिर करना पड़ता है, और सबसे बढ़कर मन स्थिर करना पड़ता है। इसलिए धनुष वास्तव में शरीर से अधिक मन का अस्त्र है।

यही कारण है कि व्यास अर्जुन के हाथ में तलवार नहीं देते, गदा नहीं देते, भाला नहीं देते—वे उन्हें गांडीव देते हैं। क्योंकि गीता का श्रोता वही हो सकता है जिसका अस्त्र भी एकाग्रता का प्रतीक हो। धनुष उठाने का अर्थ है—अपने भीतर बिखरी हुई समस्त ऊर्जाओं को एक केन्द्र पर ले आना।

आधुनिक मनोविज्ञान में Mihaly Csikszentmihalyi ने Flow की अवधारणा दी। उनका कहना था कि मनुष्य की सर्वोच्च कार्यक्षमता तब प्रकट होती है जब उसकी चेतना की सारी शक्तियाँ एक ही कर्म में एकाग्र हो जाती हैं। उस अवस्था में व्यक्ति और कर्म के बीच का भेद लगभग समाप्त हो जाता है। "धनुरुद्यम्य" उसी Flow की बाह्य अभिव्यक्ति है। अर्जुन का शरीर युद्ध के लिए पूर्णतः तैयार है; उनका कौशल अपने चरम पर है। किन्तु उसी चरम पर उनका अन्तःकरण एक और प्रश्न पूछता है—क्या यह कर्म धर्म है? यह वही बिन्दु है जहाँ कौशल और चेतना एक-दूसरे से मिलते हैं।

ऋषियों ने इस अवस्था को बहुत पहले पहचान लिया था। मुण्डकोपनिषद् का प्रसिद्ध मन्त्र है : 

प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत् तन्मयो भवेत्॥

यहाँ प्रणव धनुष है, आत्मा बाण है और ब्रह्म लक्ष्य है। यह केवल उपमा नहीं है; यह भारतीय आध्यात्मिक मनोविज्ञान है। जब तक धनुष तना नहीं, बाण लक्ष्य तक नहीं पहुँचता। जब तक मन संयत नहीं, आत्मा ब्रह्म तक नहीं पहुँचती।

अब "धनुरुद्यम्य" को इस मन्त्र के आलोक में पढ़िए। अर्जुन बाहर गांडीव उठा रहे हैं, किन्तु भीतर उनकी आत्मा भी ब्रह्म की ओर तनी जा रही है। उन्हें अभी इसका ज्ञान नहीं है। वे सोच रहे हैं कि वे युद्ध के लिए धनुष उठा रहे हैं; किन्तु व्यास जानते हैं कि यह धनुष उन्हें आत्मज्ञान तक ले जाएगा। इसलिए "धनुरुद्यम्य" केवल युद्ध का आरम्भ नहीं; ब्रह्मविद्या का भी आरम्भ है।

रहस्यवादी परम्पराओं में धनुष का एक और अर्थ मिलता है। ज़ेन तीरंदाजी (Zen Archery) में गुरु कहते हैं कि तीर लक्ष्य को नहीं भेदता; यदि साधक स्वयं लक्ष्य बन जाए, तो तीर अपने आप पहुँच जाता है। Eugen Herrigel ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Zen in the Art of Archery में लिखा कि श्रेष्ठ तीरंदाज वह नहीं जो लक्ष्य पर अधिकार करता है; श्रेष्ठ तीरंदाज वह है जिसने अपने भीतर के तनाव को छोड़ दिया है। तब धनुष स्वयं चलने लगता है।

गीता का कर्मयोग भी यही कहेगा—"तुम कर्ता मत बनो।" अर्जुन अभी धनुष उठा रहे हैं; कुछ अध्याय बाद कृष्ण उन्हें बताएँगे कि वास्तव में धनुष चलाने वाला भी तुम नहीं हो। निमित्तमात्रं भव।

यही भारतीय अध्यात्म की विलक्षणता है। वह धनुष छीनता नहीं; धनुष का अर्थ बदल देता है।
Martin Buber ने "I–Thou" सम्बन्ध की चर्चा करते हुए कहा था कि मनुष्य का संकट यह है कि वह संसार को वस्तु (It) बना देता है। आध्यात्मिकता तब आती है जब वही सम्बन्ध "मैं–तुम" में बदल जाता है। अर्जुन के हाथ में अभी तक धनुष एक युद्ध-उपकरण था। गीता के बाद वही धनुष कृष्ण के साथ संवाद का माध्यम बन जाएगा। वही गांडीव अब केवल हिंसा का साधन नहीं रहेगा; वह धर्म का उपकरण बन जाएगा।

धनुष का एक काव्यात्मक अर्थ भी है। धनुष सीधा नहीं होता; वह वक्र होता है। परन्तु उसी वक्रता से सीधा बाण निकलता है। कितना अद्भुत प्रतीक है! जीवन भी सीधा नहीं है। उसमें मोड़ हैं, वक्रताएँ हैं, असफलताएँ हैं, पीड़ाएँ हैं। किन्तु यदि मनुष्य उन वक्रताओं को स्वीकार कर ले, तो उसी से उसका जीवन लक्ष्य की ओर जा सकता है। धनुष की वक्रता दोष नहीं है; वही उसकी शक्ति है।

क्या यह अर्जुन के जीवन का भी रूपक नहीं? वनवास, अज्ञातवास, अपमान, द्यूत, विछोह—जीवन सीधा नहीं रहा। परन्तु इन्हीं वक्रताओं ने उन्हें उस बिन्दु तक पहुँचाया जहाँ गीता सम्भव हुई। सीधा बाँस धनुष नहीं बनता; तपकर, झुककर, तनकर ही धनुष बनता है। वैसे ही तपे बिना मनुष्य भी गीता का पात्र नहीं बनता।
अन्ततः "धनुरुद्यम्य" का सबसे गहरा रहस्य यही है कि मनुष्य जब अपने जीवन का धनुष उठाता है, तब वह केवल संसार से नहीं, स्वयं से भी युद्ध करने निकलता है। बाहरी युद्ध तो कुछ ही दिनों में समाप्त हो जाता है; भीतर का युद्ध जीवन भर चलता है। गांडीव वास्तव में कौरवों के लिए नहीं, अर्जुन के मोह के लिए उठा था। कौरवों को हराने से पहले अर्जुन को अपने भीतर के संशय, करुणा, आसक्ति, अहंकार और भ्रम को पहचानना था।

इस प्रकार "धनुरुद्यम्य" गीता का पहला योग-सूत्र है। यह कहता है—पहले अपने अस्तित्व को तानो, फिर प्रश्न पूछो; पहले अपने को एकाग्र करो, फिर सत्य की खोज करो; पहले अपने जीवन का धनुष उठाओ, तब कृष्ण बोलेंगे। क्योंकि बिखरे हुए मनुष्य को ज्ञान नहीं मिलता; ज्ञान उसी पर उतरता है जो अपने भीतर धनुष की प्रत्यंचा की तरह तन चुका हो, किन्तु टूटने के स्थान पर जागने को तैयार हो।

व्यास का शब्द-चयन यहाँ भी उतना ही अद्भुत है जितना "दृष्ट्वा" और "प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते" में था। उन्होंने यह नहीं लिखा कि अर्जुन ने बाण चढ़ाया, प्रत्यंचा खींची, या शत्रु पर लक्ष्य साधा। उन्होंने केवल इतना कहा—"धनुरुद्यम्य"। अर्थात् धनुष उठाया।यह छोटा-सा अन्तर वास्तव में पूरी गीता का अन्तर है।धनुष उठाना संकल्प है।धनुष चलाना कर्म है। इन दोनों के बीच जो रिक्ति है—उसी रिक्ति का नाम गीता है। यदि अर्जुन ने उसी क्षण बाण छोड़ दिया होता, तो गीता कभी न होती। यदि उन्होंने धनुष उठाया ही न होता, तब भी गीता न होती। गीता इसलिए सम्भव हुई कि मनुष्य ने कर्म का संकल्प तो कर लिया, किन्तु कर्म के पहले स्वयं से एक प्रश्न पूछ लिया।यही भारतीय दर्शन का सबसे बड़ा चमत्कार है।
पाश्चात्य नैतिक चिन्तन में प्रायः नैतिकता का विचार कर्म के बाद आता है—क्या यह कर्म उचित था? क्या इसका परिणाम उचित हुआ? किन्तु गीता कर्म से पहले पूछती है—क्या मैं इस कर्म के योग्य मानसिक अवस्था में हूँ?

यह अत्यन्त मौलिक प्रश्न है।धर्म केवल सही कर्म नहीं है।धर्म सही चेतना से किया गया कर्म है। अर्जुन का धनुष अभी उठा है। उसमें अभी तक एक भी बाण नहीं निकला। अर्थात् अभी तक संसार में कोई हिंसा नहीं हुई। सारी हिंसा अभी केवल सम्भावना है। और कृष्ण उसी सम्भावना के भीतर प्रवेश करते हैं।वे परिणाम को नहीं बदलते।वे कर्ता को बदलते हैं।
यहीं से आधुनिक Phenomenology की एक अत्यन्त रोचक समानता दिखाई देती है।
Edmund Husserl कहते हैं कि प्रत्येक कर्म के पहले एक Intentionality होती है—चेतना की दिशा।मनुष्य पहले भीतर किसी ओर उन्मुख होता है। फिर बाहर कर्म करता है।अतः कर्म का मूल बाहरी क्रिया नहीं, भीतरी अभिप्राय (intention) है।

"धनुरुद्यम्य" उसी intention का दृश्य रूप है।
धनुष उठा है। अभी कर्म नहीं हुआ।अर्थात् अभी intention दिखाई दे रही है।गीता उसी intention को शुद्ध करने आती है।भारतीय दर्शन में यही बात और भी गहराई से कही गई है।योगवासिष्ठ में एक अत्यन्त सुन्दर विचार है कि—मन एव कर्म।कर्म पहले मन में होता है।
शरीर तो केवल उसका विस्तार है।यदि मन शुद्ध हो गया तो कर्म भी शुद्ध हो जाएगा।इस दृष्टि से देखें तो अर्जुन का वास्तविक युद्ध अभी प्रारम्भ ही नहीं हुआ। बाहर का युद्ध बाद में होगा।पहले भीतर का युद्ध होगा।यही कारण है कि गीता की पूरी वार्ता धनुष उठाने और बाण छोड़ने के बीच घटती है।यह केवल काल का अन्तराल नहीं। यह चेतना का अन्तराल है।इतिहास की दृष्टि से यह कुछ मिनट होंगे।
अध्यात्म की दृष्टि से यही कुछ मिनट मानव-इतिहास के सबसे लम्बे क्षण बन गए।आधुनिक मनोविज्ञान में इसे The Sacred Pause कहा जाता है।

Viktor Frankl का प्रसिद्ध वाक्य है—
"Between stimulus and response there is a space." उद्दीपन (stimulus) और प्रतिक्रिया (response) के बीच एक रिक्ति होती है।उसी रिक्ति में मनुष्य की स्वतंत्रता रहती है।उसी रिक्ति में उसका विकास रहता है। उसी रिक्ति में उसकी सम्पूर्ण मनुष्यता रहती है। इस वाक्य को महाभारत की भाषा में कहें। Stimulus क्या है? कौरव-सेना। Response क्या है? युद्ध।और इनके बीच जो Space है, वही गीता है।”धनुरुद्यम्य" उस Space का उद्घोष है। ऋषि-दृष्टि से यह और भी अद्भुत है।उपनिषद् बार-बार कहते हैं—
सृष्टि भी एक क्षण के विराम से उत्पन्न हुई।
ओंकार के बाद जो मौन है, उसी से शब्द निकलते हैं। श्वास के भीतर जाने और बाहर आने के बीच जो सूक्ष्म विराम है— उसी में समाधि सम्भव है। दिन और रात के बीच संध्या। जागरण और निद्रा के बीच तन्द्रा।जीवन और मृत्यु के बीच अन्तिम श्वास।भारतीय अध्यात्म सदा बीच के क्षण (in-between moment) को पवित्र मानता है।
"धनुरुद्यम्य" भी ऐसा ही एक संध्या-क्षण है।
धनुष उठ चुका है। बाण अभी नहीं निकला।
युद्ध प्रारम्भ होने वाला है। शान्ति अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। इसी संध्या में कृष्ण बोलते हैं। यही कारण है कि गीता किसी युद्ध-विजय का ग्रन्थ नहीं है। वह निर्णय लेने से पहले की चेतना का ग्रन्थ है। वह हमें यह नहीं सिखाती कि शत्रु को कैसे हराएँ। वह यह सिखाती है कि बाण छोड़ने से पहले अपने भीतर किसे जीतना है। इसलिए "धनुरुद्यम्य" केवल एक क्रियावाचक अव्यय नहीं है।यह मनुष्य की सम्पूर्ण आध्यात्मिक परिपक्वता का प्रतीक है।जिस मनुष्य ने अपने जीवन का गांडीव उठा लिया है, किन्तु अभी भी अपने हृदय को कृष्ण के लिए खुला रखा है—वास्तव में वही गीता का अधिकारी है।और शायद यही व्यास का सबसे सूक्ष्म संकेत है, धर्म का आरम्भ शस्त्र उठाने से नहीं होता; शस्त्र उठाकर भी प्रश्न पूछने की विनम्रता से होता है।

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