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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
यह अकल्पनीय मन्दिर 100 वर्ष नहीं, 200 वर्ष नहीं, और 500 वर्ष भी नहीं, ये मन्दिर पूरे 1000 वर्ष प्राचीन है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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यह अकल्पनीय मन्दिर 100 वर्ष नहीं, 200 वर्ष नहीं, और 500 वर्ष भी नहीं, ये मन्दिर पूरे 1000 वर्ष प्राचीन है।
देखिए और कल्पना करिए,1000 वर्ष पहले ये मन्दिर चन्देल राजाओ ने कैसे बनाया होगा....
और आज 1000 वर्ष बाद भी धर्म को लेकर खड़ा है...
"कंदारिया_महादेव" मंदिर मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले में खजुराहो ग्राम के समीप 6 किलोमीटर के परिसर का परास लिए ये मंदिर शिव जी के मध्यकालीन मंदिरों में कुछ सबसे भव्य मंदिरों में से एक है।
कहा जाता है कि गुफानुमा आकृति के कारण इसे कंदारिया महादेव मंदिर कहा गया।
सन 1019 में गजनी से एक बर्बर लुटेरा भारत की संपत्ति से प्रलोभित हो और दीन के विस्तार के लिए काफिरों की हत्या करने के उद्देश्य से पश्चिमोत्तर प्रान्तों को आक्रांत करते हुए जेजाकभुक्ति तक आ पहुँचा। उस समय जेजाकभुक्ति (वर्तमान महोबा, छतरपुर, पन्ना आदि जिले) पर चंदेल राजपूतों की यश-पताका लहरा रही थी। हूणों को पराजित करने वाले यशोवर्मन के कुल के महाराज विद्याधर जेजाकभुक्ति के सरंक्षक थे। भयंकर युद्ध हुआ जिसमें महमूद गजनवी को विवश होकर संधि करना पड़ा।
3 वर्ष पश्चात 1022 ईस्वी में वो बर्बर लुटेरा महमूद गजनवी पुनः जेजाकभुक्ति पर आक्रमण के लिए आया और इस बार भी उसे मुँह की खानी पड़ी। चन्देलों से पराजित हो उसने पुनः संधि कर लिया।
महाराज विद्याधर ने इस विजय की स्मृति में कंदारिया महादेव मंदिर का निर्माण कराया। जिसके बाह्य भित्तियों पर मैथुनरत मूर्तियाँ हैं तो अंदर त्रिदेव की मूर्तियाँ।
कहा जाता है कि इस मंदिर को मुस्लिम आक्रमणकारियों से बचाने के लिए खजुराहो ग्राम के वासियों ने ग्राम ही छोड़ दिया जिससे मुस्लिम आक्रमणकारियों की दृष्टि इन मंदिरों पर न पड़े।
अँग्रेजों ने स्थानीय लोगों की सहायता से इस मंदिर को ढूँढ निकाला। उसके पहले यहाँ मात्र नाथ सम्प्रदाय के योगी ही आते थे। वर्षों तक निर्जन रहने के कारण यह मंदिर जंगलों से आच्छादित हो गया था।
हम सबका ये जानकर गर्व से सिर ऊँचा हो जाएगा कि औरंगजेब सर्वप्रथम इसी शिवलिंग पर तोप चलाने का आदेश दिया था। परन्तु उसके सारे प्रयत्न के पश्चात भी इस पर खरोंच तक नहीं आया। तभी वह देवता के प्रकोप से डर कर भाग गया।
मंदिर में बलुआ पत्थर लगे हैं जिनकी चमक आज भी विस्मित करती है। पत्थरों को चमकाने के लिए इस पर चमड़े की भारी घिसाई की गई है।
महमूद गजनवी को पराजित करने वाले महाराज विद्याधर और उस जीत की स्मृति में बने इस मंदिर को कदाचित ही अधिक लोग जानते हों।
किसी को अधिक जानकारी हो तो कमेंट बॉक्स में लिख सकते हैं।
लालकिला और ताजमहल के बारे में कितना बताया जाता है किंतु खजुराहो के मंदिरों की नग्न मूर्तियों के अतिरिक्त उसके शिल्प पर कभी बात नहीं होती। समय हो तो कभी यहाँ घूमने के लिए जायें।
(साभार/संशोधित)
जय सनातन धर्म🙏🚩
जय महाकाल🙏🔱🚩
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