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संवैधानिक संस्थाओं की वैधता, माओवादी जन-अदालत की अवधारणा और भारत के लोकतंत्र के सामने उभरती चुनौतियाँ



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✍️ कैलाश चन्द्र

लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना, संवैधानिक संस्थाओं से सवाल पूछना और उनके निर्णयों का विरोध करना नागरिकों तथा राजनीतिक दलों का अधिकार है। लेकिन जब राजनीतिक विरोध संवैधानिक संस्थाओं की वैधता को ही चुनौती देने लगे और संवैधानिक प्रक्रिया के समानांतर किसी राजनीतिक मंच पर आरोपों का फैसला सुनाया जाने लगे, तब इस प्रवृत्ति पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक हो जाता है।

हाल के दिनों में कांग्रेस और इंडी गठबंधन की राजनीतिक गतिविधियों में इस विषय को लेकर एक नई बहस सामने आई है। पहले जिस आयोजन को 'मॉक पार्लियामेंट' कहा गया, बाद में उसे 'जन महाभियोग' का नाम दिया गया। 31 अक्टूबर 2026 को मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर आयोजित इस कार्यक्रम में 19 राजनीतिक दलों के 215 सांसदों की भागीदारी का दावा किया गया। इसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निशाना बनाते हुए एक प्रतीकात्मक प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया।

यहाँ मूल प्रश्न केवल किसी राजनीतिक आयोजन के नाम या स्वरूप का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या किसी संवैधानिक पदाधिकारी के विरुद्ध राजनीतिक दल स्वयं जन-अदालत की तरह सुनवाई और निर्णय की प्रक्रिया चला सकते हैं? क्या ऐसे आयोजन संवैधानिक जवाबदेही की माँग हैं अथवा संस्थाओं की वैधता को प्रभावित करने वाला राजनीतिक विमर्श तैयार करने का माध्यम बन सकते हैं?

माओवादी जन-अदालत और राजनीतिक जन-अदालत का प्रश्न

इस संदर्भ में माओवादी संगठनों द्वारा संचालित जन-अदालतों की अवधारणा को समझना उपयोगी होगा। माओवादी प्रभाव वाले क्षेत्रों में लंबे समय तक समानांतर न्याय व्यवस्था और 'जनताना सरकार' जैसी संरचनाएँ संचालित की जाती रही हैं। इनका उद्देश्य केवल स्थानीय विवादों का निपटारा करना नहीं था, बल्कि राज्य की प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था के समानांतर अपनी सत्ता स्थापित करना भी था।

इन जन-अदालतों की कार्यप्रणाली में कई बार आरोप लगाने वाला, सुनवाई करने वाला और फैसला सुनाने वाला संगठन स्वयं ही होता था। किसी व्यक्ति को पुलिस का मुखबिर, संगठन विरोधी अथवा जनविरोधी घोषित कर दिया जाता था। स्थानीय लोगों की उपस्थिति को निर्णय की सामाजिक स्वीकृति के रूप में प्रस्तुत किया जाता था। कई मामलों में भय, दबाव और हिंसा के माध्यम से फैसले लागू किए जाते थे।

यह व्यवस्था भारतीय संविधान और न्यायिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं थी। इसका मूल संकट यह था कि न्याय करने वाली संस्था, आरोप लगाने वाले पक्ष और निर्णय सुनाने वाले पक्ष के बीच कोई स्वतंत्रता नहीं थी।

'जन महाभियोग' की तुलना माओवादी जन-अदालत से करते समय दोनों के स्वरूप और परिस्थितियों में अंतर को समझना भी आवश्यक है। राजनीतिक आयोजन अपने आप में माओवादी गतिविधि नहीं है। लेकिन यदि कोई राजनीतिक मंच संवैधानिक प्रक्रिया के समानांतर स्वयं को निर्णयकर्ता के रूप में प्रस्तुत करता है, तो उसकी कार्यप्रणाली और लोकतांत्रिक औचित्य पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

संवैधानिक प्रक्रिया और राजनीतिक आयोजन में अंतर

भारत का संविधान मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की एक विशेष प्रक्रिया निर्धारित करता है। अनुच्छेद 324(5) के अनुसार मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसी प्रक्रिया और उन्हीं आधारों पर पद से हटाया जा सकता है, जिन पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में निर्धारित विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना आवश्यक है।

अर्थात किसी राजनीतिक दल, गठबंधन अथवा जनसमूह द्वारा आयोजित कार्यक्रम संवैधानिक महाभियोग का विकल्प नहीं हो सकता। किसी पदाधिकारी के विरुद्ध आरोप हैं तो उनकी जाँच, प्रमाणों की समीक्षा और निर्णय निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के अंतर्गत ही होना चाहिए।

निर्वाचन आयोग और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से संबंधित विषय सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन हैं। ऐसे मामलों में निर्वाचन आयोग ने अपना पक्ष हलफनामे के माध्यम से रखा है और दूसरे पक्ष को भी जवाब देने का अवसर मिला है। न्यायिक प्रक्रिया जारी रहते हुए राजनीतिक मंचों पर सार्वजनिक बहस करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन उस बहस को न्यायिक निर्णय का विकल्प बनाना उचित नहीं होगा।

निर्वाचन आयोग, न्यायपालिका और संसद के प्रति अविश्वास

वर्तमान राजनीतिक विमर्श में तीन प्रमुख संवैधानिक संस्थाएँ लगातार चर्चा के केंद्र में हैं।

पहली, निर्वाचन आयोग। चुनावों में गड़बड़ी, वोट चोरी और पक्षपात के आरोप लगाकर उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

दूसरी, न्यायपालिका। न्यायालय से अपेक्षित निर्णय नहीं मिलने पर उसकी भूमिका और निष्पक्षता को लेकर सार्वजनिक टिप्पणियाँ की जाती हैं। 12 अक्टूबर को विपक्षी नेताओं के सर्वोच्च न्यायालय की ओर मार्च और 15 अक्टूबर को राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे तथा अन्य नेताओं को नोटिस जारी होने की घटनाओं का भी इसी संदर्भ में उल्लेख किया गया है।

तीसरी, संसद। संसद की कार्यप्रणाली, निर्णयों और राजनीतिक वैधता को लेकर भी लगातार प्रश्न उठाए जा रहे हैं।

इन संस्थाओं की आलोचना करना अपने आप में लोकतंत्र विरोधी नहीं है। संस्थाओं की जवाबदेही लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त है। लेकिन जवाबदेही की माँग और संस्था की वैधता को ही नकार देने के बीच स्पष्ट अंतर है। यदि नागरिकों के मन में यह धारणा स्थापित होने लगे कि चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं, न्यायपालिका स्वतंत्र नहीं और संसद वास्तविक जनप्रतिनिधित्व नहीं करती, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति विश्वास कमजोर पड़ सकता है।

सड़क आधारित राजनीति और 'रिजीम चेंज' का विमर्श

इस पूरे घटनाक्रम को कुछ अलग-अलग राजनीतिक गतिविधियों के क्रम में भी देखा जा रहा है। NEET के विरोध प्रदर्शन, शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की माँग, निर्वाचन आयोग के विरुद्ध आंदोलन, SIR पर विरोध, सर्वोच्च न्यायालय की ओर मार्च और अब 'जन महाभियोग' जैसे आयोजन इस विमर्श के प्रमुख उदाहरण हैं।

इस संदर्भ में योगेन्द्र यादव के 'सड़क से देश चलेगा' संबंधी कथन और प्रशांत भूषण के 15 अक्टूबर 2026 के 'रिजीम चेंज' संबंधी बयान पर भी चर्चा आवश्यक है।

लोकतंत्र में सड़क पर उतरकर विरोध करना नागरिक अधिकार है। अनेक ऐतिहासिक आंदोलनों ने सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन सड़क का आंदोलन संवैधानिक संस्थाओं और निर्वाचित प्रतिनिधियों का स्थान नहीं ले सकता। जनता की आवाज का सम्मान होना चाहिए, परंतु जनता की आवाज का निर्धारण किसी एक राजनीतिक संगठन या आंदोलन के मंच से नहीं किया जा सकता।

'रिजीम चेंज' का अर्थ भी संदर्भ के अनुसार समझना होगा। सामान्य लोकतांत्रिक चुनाव में सरकार बदलना और पूरी शासन व्यवस्था अथवा संवैधानिक संरचना को बदलने का प्रयास करना दो अलग बातें हैं। लोकतांत्रिक सत्ता परिवर्तन चुनाव, जनादेश और संविधान के माध्यम से होता है। इसके विपरीत क्रांतिकारी व्यवस्था परिवर्तन में मौजूदा संस्थागत संरचना को चुनौती देने और उसके स्थान पर नई व्यवस्था स्थापित करने का लक्ष्य हो सकता है। प्रत्येक रिजीम चेंज हिंसक नहीं होता, लेकिन जब यह संवैधानिक प्रक्रिया को दरकिनार करने का माध्यम बनता है, तब गंभीर प्रश्न उत्पन्न होते हैं।

बांग्लादेश का जेन-जी आंदोलन और अंतरराष्ट्रीय संदर्भ

बांग्लादेश में जेन-जी आंदोलन के बाद शेख हसीना सरकार का पतन और उसके बाद उत्पन्न राजनीतिक परिस्थितियाँ भी इस बहस से जुड़ती हैं। भारत में AISA की नेता नेहा बोरा द्वारा बांग्लादेश के आंदोलन से प्रेरणा लेने की बात का उल्लेख किया गया है।

दुनिया के अनेक देशों में छात्र आंदोलनों, जन-प्रदर्शनों और राजनीतिक लामबंदी के माध्यम से सत्ता परिवर्तन हुए हैं। नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश के अनुभव बताते हैं कि जन-असंतोष राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित करने की बड़ी शक्ति रखता है। लेकिन प्रत्येक देश की परिस्थितियाँ अलग होती हैं। किसी देश के आंदोलन को दूसरे देश में उसी रूप में लागू करना न तो सरल है और न ही आवश्यक रूप से उचित।

इसलिए यह समझना महत्त्वपूर्ण है कि ट्रेड यूनियन, छात्र संगठन, सामाजिक संगठन, नागरिक समूह और सोशल मीडिया किस प्रकार जनमत निर्माण तथा राजनीतिक लामबंदी में भूमिका निभाते हैं। इनका लोकतांत्रिक उपयोग सामाजिक परिवर्तन का माध्यम हो सकता है, जबकि अप्रमाणित सूचनाओं, संगठित दुष्प्रचार और संस्थाओं के प्रति अविश्वास के माध्यम से इनका दुरुपयोग भी संभव है।

भारत के लोकतंत्र के सामने मूल चुनौती

भारत का लोकतंत्र केवल चुनाव कराने की व्यवस्था नहीं है। इसकी शक्ति संविधान, स्वतंत्र न्यायपालिका, निष्पक्ष निर्वाचन प्रक्रिया, संसद, संघीय व्यवस्था और जागरूक नागरिक समाज में निहित है। भारत की सभ्यतागत चेतना और लोकतांत्रिक परंपरा में संवाद, असहमति और समन्वय का विशेष महत्त्व रहा है।

इसलिए राजनीतिक विरोध को लोकतंत्र का शत्रु मानना गलत होगा, लेकिन राजनीतिक विरोध के नाम पर संवैधानिक व्यवस्था के समानांतर निर्णयकारी संरचनाएँ खड़ी करने की प्रवृत्ति पर प्रश्न उठाना भी उतना ही आवश्यक है।

आज भारत के सामने कुछ बुनियादी प्रश्न हैं। क्या राजनीतिक आरोप संवैधानिक जाँच का विकल्प बन सकते हैं? क्या न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने से पहले राजनीतिक मंचों पर किसी को दोषी घोषित करना उचित है? क्या चुनाव आयोग, न्यायपालिका और संसद के प्रति असहमति व्यक्त करते-करते उनकी वैधता को ही नकार देना लोकतंत्र को मजबूत करेगा? और क्या भारत में सत्ता परिवर्तन का मार्ग संविधान और मतदाता का जनादेश होगा अथवा सड़क आधारित लामबंदी?

इन प्रश्नों पर गंभीर राष्ट्रीय विमर्श होना चाहिए।

लोकतंत्र में असहमति का अधिकार सुरक्षित रहना चाहिए, संस्थाओं की जवाबदेही भी सुनिश्चित होनी चाहिए और सत्ता परिवर्तन का रास्ता भी खुला रहना चाहिए। लेकिन इन सबका आधार संविधान ही होना चाहिए। किसी भी राजनीतिक दल, गठबंधन अथवा आंदोलन को संविधान से ऊपर स्वयं को स्थापित करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता।

लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल सरकार बदलने में नहीं, बल्कि ऐसी संस्थाओं और परंपराओं को मजबूत बनाए रखने में है, जिनके माध्यम से असहमति भी व्यक्त हो सके, जवाबदेही भी तय हो और व्यवस्था की निरंतरता भी बनी रहे।
✍️ कैलाश चन्द्र

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