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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
एक मासूम के सिर से माता-पिता का साया उठ जाना: कानून, धर्म और मानवता के सामने खड़े कुछ असहज प्रश्न हैं- "कहाँ हैं शान्ति का मजहब कहने वाले और मानवतावादी संगठन
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
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✍️ कैलाश चन्द्र
कभी-कभी कोई समाचार केवल आँखों को नम नहीं करता, बल्कि मनुष्य होने के अर्थ पर ही प्रश्नचिह्न लगा देता है।
सऊदी अरब में दो बांग्लादेशी नागरिकों को मृत्युदंड दिए जाने की खबर ने मुझे भीतर तक विचलित कर दिया है। इस घटना से जुड़ी एक आठ वर्ष की बच्ची के अनाथ हो जाने की बात मन को विशेष रूप से उद्वेलित करती है। उसके जीवन में अब ऐसे अनेक क्षण आएँगे, जब उसे अपने माता-पिता की आवश्यकता होगी—विद्यालय के किसी कार्यक्रम में, बीमारी के समय, किसी उपलब्धि की खुशी में, किसी असफलता के बाद और जीवन की उन अनगिनत छोटी-बड़ी परिस्थितियों में, जब बच्चा सहज ही माँ या पिता की ओर देखता है।
उस समय वह किसे पुकारेगी?
यह प्रश्न मन को झकझोरता है। लेकिन इस घटना के बारे में उपलब्ध जानकारी अभी इतनी पूरी नहीं है कि बच्ची की पारिवारिक स्थिति सहित सोशल मीडिया पर प्रसारित प्रत्येक विवरण की स्वतंत्र पुष्टि की जा सके। इसलिए इस पीड़ा को व्यक्त करते हुए भी हमें अपुष्ट बातों को स्थापित तथ्य नहीं बनाना चाहिए।
फिर भी, मूल प्रश्न अपनी जगह खड़ा है—न्याय के नाम पर किसी मनुष्य का जीवन समाप्त करने की शक्ति राज्य को कहाँ तक होनी चाहिए? क्या किसी धार्मिक स्थल की पवित्रता की रक्षा के नाम पर मृत्युदंड जैसे अपरिवर्तनीय दंड को उचित ठहराया जा सकता है?
ये प्रश्न किसी एक देश, धर्म या समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि समस्त मानवता के पक्ष में उठाए जाने चाहिए।
- घटना का समाचार और उससे जुड़ा तथ्यात्मक प्रश्न
अक्तूबर 2026 में सऊदी अरब के मक्का क्षेत्र में दो बांग्लादेशी नागरिकों—नजरुल इस्लाम अब्दुल बासिर और सीती अख्तर—को मृत्युदंड दिए जाने की खबर सामने आई। सऊदी अधिकारियों के सार्वजनिक बयान में मस्जिद के भीतर किए गए एक कथित अनुचित कृत्य तथा धार्मिक स्थल की पवित्रता के उल्लंघन का उल्लेख किया गया। दंड ताज़ीर के अंतर्गत दिया गया बताया गया है, जिसमें न्यायाधीश को निर्धारित सीमाओं के भीतर दंड तय करने का विवेकाधिकार प्राप्त होता है।
बांग्लादेशी राजनयिक अधिकारियों ने मृत्युदंड दिए जाने से पहले सूचना न मिलने पर प्रश्न उठाए और सऊदी अधिकारियों से स्पष्टीकरण माँगा। इस मामले में आरोप के वास्तविक स्वरूप, न्यायिक कार्यवाही तथा संबंधित व्यक्तियों को उपलब्ध कानूनी सहायता के बारे में अनेक महत्त्वपूर्ण विवरण अभी स्पष्ट नहीं हैं।
इसलिए एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए: यह कहना कि दोनों को केवल पति द्वारा पत्नी के माथे को चूमने के कारण मृत्युदंड दिया गया, उपलब्ध आधिकारिक विवरणों से प्रमाणित नहीं है।
इस अंतर को समझना आवश्यक है। किसी घटना पर संवेदनशील प्रतिक्रिया देने के लिए न्यायिक पारदर्शिता, मृत्युदंड की आनुपातिकता और विदेश में काम करने वाले नागरिकों के अधिकारों को लेकर गंभीर प्रश्न उठाने के लिए उपलब्ध तथ्य ही पर्याप्त हैं।
- आठ वर्ष की बच्ची के भविष्य की कल्पना कीजिए
इस घटना का सबसे मार्मिक पक्ष किसी न्यायालय का आदेश या किसी सरकार का वक्तव्य नहीं, बल्कि उस बच्चे का भविष्य है, जो अपने माता-पिता के साथ जीवन बिताने की उम्मीद रखता है।
बचपन में माता-पिता केवल भोजन, कपड़े और शिक्षा की व्यवस्था करने वाले व्यक्ति नहीं होते। वे सुरक्षा की अनुभूति होते हैं। वे वह भरोसा होते हैं, जिसके कारण बच्चा दुनिया की कठिनाइयों से लड़ना सीखता है।
बच्ची को यदि वास्तव में माता-पिता दोनों को खोना पड़ा है, तो उसकी पीड़ा को किसी राजनीतिक बहस का उपकरण बनाकर समाप्त नहीं किया जा सकता। उसके सामने आर्थिक कठिनाइयाँ आ सकती हैं, भावनात्मक असुरक्षा पैदा हो सकती है और भविष्य को लेकर अनेक प्रश्न उठ सकते हैं।
हम उसकी पीड़ा की पूरी कल्पना भी नहीं कर सकते।
यहाँ एक आवश्यक बात और है। हर अपराध या दंड पर चर्चा में पीड़ित व्यक्ति, उसके परिजन और उससे प्रभावित बच्चे भी होते हैं। न्याय का मूल्यांकन करते समय केवल आरोपी के कृत्य और राज्य की शक्ति को देखना पर्याप्त नहीं है; यह भी देखना चाहिए कि किसी दंड का परिवार और समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है।
यदि कोई अपराध प्रमाणित होता है, तो उसके लिए न्यायसंगत दंड की व्यवस्था होनी चाहिए। लेकिन क्या हर अपराध के लिए सबसे कठोर दंड ही न्याय का सर्वोच्च रूप है? क्या न्याय का उद्देश्य केवल दंड देना है, या समाज में सुरक्षा, उत्तरदायित्व, सुधार और मानवीय गरिमा को बनाए रखना भी है?
एक संवेदनशील समाज इन प्रश्नों से बच नहीं सकता।
- धार्मिक स्थल की पवित्रता और मनुष्य के जीवन का मूल्य
मस्जिद मुसलमानों के लिए इबादत का पवित्र स्थल है। उसी प्रकार मंदिर, गुरुद्वारा, गिरजाघर, जैन मंदिर और अन्य धार्मिक स्थल अपने-अपने अनुयायियों के लिए विशेष आस्था रखते हैं।
लेकिन यहाँ एक मूलभूत प्रश्न है: क्या किसी स्थान की पवित्रता की रक्षा करने का अर्थ यह हो सकता है कि मनुष्य के जीवन का मूल्य उस स्थान की मर्यादा से कम मान लिया जाए?
धार्मिक अनुशासन का प्रश्न और जीवन समाप्त करने का प्रश्न समान नहीं हैं। किसी धार्मिक स्थल में अनुचित आचरण हुआ हो, तो उसकी प्रकृति, परिस्थितियों, प्रमाणों और लागू कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन दंड की गंभीरता उस कृत्य के अनुपात में होनी चाहिए।
किसी व्यक्ति के व्यवहार से धार्मिक अनुयायियों की भावनाएँ आहत हुई हों, तो उस स्थिति को भी कानून के अनुरूप देखा जा सकता है। फिर भी, किसी कृत्य से उत्पन्न आहत भावना अपने आप में यह सिद्ध नहीं करती कि उसके लिए मृत्युदंड आवश्यक या न्यायसंगत है।
धार्मिक आस्था की गरिमा और मनुष्य के जीवन की गरिमा को एक-दूसरे का विरोधी बना देना स्वयं एक गंभीर समस्या है।
धर्म का उद्देश्य मनुष्य को नैतिकता, संयम, करुणा और उत्तरदायित्व की ओर प्रेरित करना है। यदि धार्मिक मर्यादा की रक्षा के नाम पर दंड की आनुपातिकता और न्यायिक प्रक्रिया पर प्रश्न उठने लगें, तो उस व्यवस्था की समीक्षा आवश्यक हो जाती है।
- कानून की शक्ति और न्याय की मर्यादा
किसी भी राज्य को अपराध रोकने, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और नागरिकों की सुरक्षा करने के लिए कानून बनाने का अधिकार है। लेकिन राज्य की शक्ति असीमित नहीं होनी चाहिए। उसकी वैधता इस बात पर भी निर्भर करती है कि वह अपने अधिकारों का प्रयोग किस प्रकार करता है।
मृत्युदंड इस दृष्टि से विशेष रूप से गंभीर है, क्योंकि इसमें त्रुटि होने पर सुधार की कोई संभावना नहीं बचती। जेल की सजा में बाद में न्यायिक गलती सामने आने पर व्यक्ति को रिहा किया जा सकता है, क्षतिपूर्ति दी जा सकती है और उसके साथ हुई अन्यायपूर्ण कार्रवाई को स्वीकार किया जा सकता है। मृत्युदंड में ऐसा कोई वास्तविक सुधार संभव नहीं है।
इसीलिए मृत्युदंड के मामलों में निष्पक्ष सुनवाई, आरोपों की स्पष्ट जानकारी, प्रभावी कानूनी सहायता, साक्ष्यों की विश्वसनीयता, अपील का सार्थक अवसर और दंड की आनुपातिकता अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
मानवाधिकार संगठनों ने सऊदी अरब की न्याय व्यवस्था में निष्पक्ष सुनवाई, कानूनी सहायता और मृत्युदंड के व्यापक प्रयोग को लेकर गंभीर चिंताएँ व्यक्त की हैं।
यह आलोचना किसी देश के नागरिकों या किसी धर्म के अनुयायियों के प्रति शत्रुता नहीं है। किसी राज्य की न्याय व्यवस्था की समीक्षा करना और उसके नागरिकों का सम्मान करना एक साथ संभव है।
किसी देश की संप्रभुता का सम्मान करने का अर्थ यह नहीं है कि उसके प्रत्येक दंडात्मक निर्णय को प्रश्नों से परे मान लिया जाए।
- भारत में ऐसी स्थिति को किस प्रकार देखा जाएगा?
भारत में भी धार्मिक स्थलों की मर्यादा, सार्वजनिक शालीनता और धार्मिक भावनाओं के सम्मान से संबंधित कानून हैं। लेकिन किसी पति द्वारा पत्नी के माथे को चूमने मात्र से स्वतः कोई अपराध सिद्ध नहीं हो जाता और न ही इसके लिए मृत्युदंड का कोई प्रावधान है।
भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 296 सार्वजनिक स्थान पर दूसरों को क्षोभ पहुँचाने वाले अश्लील कृत्य तथा अश्लील गीतों या शब्दों से संबंधित है। इसमें अधिकतम तीन महीने के कारावास, एक हजार रुपये तक के जुर्माने या दोनों का प्रावधान है। लेकिन इस धारा का लागू होना कृत्य की प्रकृति और कानून में निर्धारित शर्तों पर निर्भर करता है। प्रत्येक स्नेहपूर्ण व्यवहार को अश्लील कृत्य नहीं माना जा सकता।
इसी संहिता की धारा 299 किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के उद्देश्य से किए गए जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कृत्यों से संबंधित है। इसे भी केवल किसी व्यक्ति के व्यवहार से किसी की भावना आहत होने के आधार पर स्वतः लागू नहीं किया जा सकता; इसके विशिष्ट कानूनी तत्वों का पूरा होना आवश्यक है।
इसलिए भारत और सऊदी अरब की न्याय व्यवस्था की तुलना करते समय सटीकता आवश्यक है। भारत में भी मृत्युदंड का प्रावधान है, लेकिन किसी पति द्वारा पत्नी के माथे को चूमने मात्र के लिए मृत्युदंड का प्रावधान नहीं है।
भारत की संवैधानिक व्यवस्था में जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, कानून के समक्ष समानता तथा धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इन अधिकारों के बीच संतुलन बनाना न्यायपालिका और विधायिका की जिम्मेदारी है।
यह तुलना हमें एक मूलभूत बात समझाती है: कानून की कठोरता ही न्याय की श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं है। न्याय की श्रेष्ठता उसकी निष्पक्षता, तर्कसंगतता, आनुपातिकता और मानवीय गरिमा के सम्मान से निर्धारित होती है।
- मानवता का प्रश्न किसी धर्म या देश की सीमा में बंद नहीं हो सकता
इस घटना से दुखी होकर सऊदी अरब की दंड व्यवस्था पर प्रश्न उठाना उचित है। लेकिन इस आलोचना को किसी धर्म के सभी अनुयायियों के विरुद्ध घृणा में बदल देना उचित नहीं होगा।
किसी सरकार की नीति और किसी धर्म के प्रत्येक अनुयायी की आस्था एक ही चीज नहीं हैं। जिस प्रकार किसी भारतीय नागरिक को अपने देश की प्रत्येक सरकारी कार्रवाई का समर्थक मान लेना गलत है, उसी प्रकार किसी मुस्लिम व्यक्ति को सऊदी अरब की प्रत्येक न्यायिक कार्रवाई के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता।
मानवता का पक्ष लेने का अर्थ है—व्यक्ति के जीवन, गरिमा और न्यायपूर्ण व्यवहार का समर्थन करना, चाहे वह किसी भी देश, धर्म, भाषा या समुदाय से संबंधित हो।
यदि हम किसी बांग्लादेशी नागरिक के साथ संभावित अन्याय पर दुख व्यक्त करते हैं, तो हमें दुनिया के किसी भी हिस्से में अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना चाहिए। यदि हम किसी बच्ची के अनाथ होने की पीड़ा को समझते हैं, तो युद्ध, आतंकवाद, हिंसा, अन्यायपूर्ण दंड और पारिवारिक विघटन से प्रभावित दूसरे बच्चों की पीड़ा को भी समझना चाहिए।
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क्या न्याय का अर्थ केवल प्रतिशोध है?
यह प्रश्न हमारे समय में बार-बार उठना चाहिए।
किसी अपराध के लिए दंड आवश्यक हो सकता है। पीड़ित व्यक्ति को न्याय मिलना चाहिए। समाज की सुरक्षा भी सुनिश्चित होनी चाहिए। लेकिन न्याय और प्रतिशोध के बीच अंतर है।
प्रतिशोध कहता है—अपराधी को अधिकतम पीड़ा दो।
न्याय पूछता है—अपराध क्या था, प्रमाण क्या हैं, उत्तरदायित्व किसका है, उचित दंड क्या है और भविष्य में ऐसे अपराधों को रोकने का सबसे प्रभावी उपाय क्या है?
न्याय केवल दंड की मात्रा से नहीं मापा जा सकता। उसकी कसौटी यह भी है कि कहीं निर्दोष को दंड तो नहीं मिला, किसी आरोपी को अपना पक्ष रखने से तो नहीं रोका गया, और राज्य ने अपनी शक्ति का उपयोग निर्धारित सीमाओं के भीतर किया या नहीं।
मृत्युदंड पर दुनिया भर में चल रही बहस का एक प्रमुख आधार यही है। अनेक मानवाधिकार संगठन सभी परिस्थितियों में मृत्युदंड का विरोध करते हैं, क्योंकि वह अपरिवर्तनीय है और न्यायिक त्रुटि की स्थिति में उसे सुधारा नहीं जा सकता।
इसका अर्थ यह नहीं कि अपराध को क्षमा कर दिया जाए या पीड़ित को भुला दिया जाए। इसका अर्थ है कि न्याय करते समय भी मनुष्य की गरिमा और राज्य की जवाबदेही को सर्वोपरि रखा जाए। -
हमारी संवेदना उस बच्ची के लिए क्या कर सकती है?
किसी घटना से भावुक हो जाना मानवीय है। लेकिन यदि हमारी भावुकता केवल एक दिन की चर्चा बनकर रह जाए, तो उससे उस बच्ची के जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आएगा।
इस मामले में सबसे पहले संबंधित तथ्यों की स्वतंत्र पुष्टि होनी चाहिए। बांग्लादेशी अधिकारियों को मृत्युदंड की परिस्थितियों, मुकदमे के दस्तावेजों और उपलब्ध कानूनी उपायों के संबंध में स्पष्ट जानकारी माँगनी चाहिए। यदि बच्ची वास्तव में अनाथ हुई है, तो उसके परिजनों की स्थिति, आर्थिक सुरक्षा, शिक्षा और भावनात्मक देखभाल की जरूरतों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसे मामलों में पारदर्शी न्यायिक प्रक्रिया, विदेश में काम करने वाले नागरिकों को प्रभावी राजनयिक सहायता तथा मृत्युदंड के प्रयोग की समीक्षा जैसे विषयों पर गंभीर विमर्श आवश्यक है।
और हम सबके लिए एक जिम्मेदारी है—बिना प्रमाण के आरोपों को प्रसारित न करना, असत्यापित वीडियो को घटना का प्रमाण न मानना और किसी समुदाय के प्रति घृणा फैलाने के बजाय न्याय के प्रश्नों को केंद्र में रखना।
मानवता के पक्ष में खड़े होने के लिए किसी के विरुद्ध घृणा फैलाना आवश्यक नहीं है। -
अंततः, मनुष्य के जीवन का मूल्य क्या है?
मेरे मन को इस घटना से जुड़ी बच्ची की कल्पना विचलित करती है। मैं सोचता हूँ कि उसके लिए दुनिया अब पहले जैसी नहीं रहेगी, यदि उसने सचमुच अपने माता-पिता दोनों को खो दिया है। उसके जीवन की अनेक स्मृतियाँ अधूरी रह जाएँगी। उसके मन में प्रश्न उठेंगे, जिनका उत्तर देना उसके परिजनों के लिए भी कठिन हो सकता है।
लेकिन इस पीड़ा को व्यक्त करते हुए मैं एक और बात कहना चाहता हूँ।
किसी भी राज्य, व्यवस्था, विचारधारा या धार्मिक संस्था की शक्ति का मूल्यांकन इस बात से भी होना चाहिए कि वह सबसे कमजोर व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा कितनी करती है। एक बच्चा, एक गरीब प्रवासी श्रमिक, एक आरोपी जिसे निष्पक्ष सुनवाई चाहिए, अथवा एक परिवार जो अपने प्रियजन के बारे में सच जानना चाहता है—ये सभी न्याय के वास्तविक परीक्षण हैं।
यदि न्याय की प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं है, तो प्रश्न उठेंगे। यदि दंड अपराध की तुलना में असंगत है, तो प्रश्न उठेंगे। यदि किसी परिवार को अपने प्रियजन के मुकदमे और अंतिम परिणाम के बारे में समय पर जानकारी नहीं मिलती, तो प्रश्न उठेंगे।
ये प्रश्न किसी धर्म को अपमानित करने के लिए नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन की गरिमा को सुरक्षित रखने के लिए हैं।
धर्म की मर्यादा हो, कानून का शासन हो या राज्य की संप्रभुता—इनमें से किसी का भी उद्देश्य मनुष्य को उसकी गरिमा से वंचित करना नहीं होना चाहिए। -
यदि हम वास्तव में मानवता के पक्ष में हैं, तो हमें सत्य के प्रति ईमानदार, न्याय के प्रति सजग और पीड़ितों के प्रति संवेदनशील होना होगा।
क्योंकि अंततः किसी मनुष्य की मृत्यु केवल एक समाचार नहीं होती। वह किसी परिवार के जीवन में एक स्थायी रिक्तता छोड़ जाती है। और किसी बच्चे के लिए माता-पिता की अनुपस्थिति ऐसी पीड़ा हो सकती है, जिसकी गहराई को शब्दों में पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता।
न्याय हो—लेकिन न्याय के नाम पर मानवता का मूल्य कम न हो। कानून हो—लेकिन कानून की शक्ति के साथ विवेक भी हो। धर्म की मर्यादा हो—लेकिन मनुष्य के जीवन की गरिमा भी सुरक्षित रहे।
यही वह मानवीय दृष्टि है, जिसकी आज दुनिया को सबसे अधिक आवश्यकता है।
एक संवेदनशील मन की ओर से उन सभी परिवारों के प्रति करुणा, जिन्होंने अन्याय, हिंसा या दंडात्मक व्यवस्था के कारण अपने प्रियजनों को खोया है।
- फिर बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठनों की प्रतिक्रिया कहाँ है?
20 अक्तूबर 2026 तक की मेरी खोज में इस विशिष्ट घटना पर एमनेस्टी इंटरनेशनल, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय और ह्यूमन राइट्स वॉच के अलग-अलग आधिकारिक वक्तव्य की पुष्टि नहीं हो सकी। उन्होंने निश्चित रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी; केवल इतना कि उपलब्ध खोज में वह नहीं मिली।
'Religion of Peace’ कहने वाले कहाँ रह गये और मानवतावादी संगठनो की असली कसौटी तो धरी रह गई है। यहाँ पर सब ढ़ोगी साबित हुये है। भेड़ कीमत खाल में, छुपे भेडियों कीमत तरह ही व्यवहार कर रहे है। सब एक साथ चूप!! आखिर क्यों?? किससे भयभीत है ये व्यवस्था?
यहाँ एक गंभीर नैतिक प्रश्न जरूर उठता है। यदि कोई संगठन धर्म, शांति, सहिष्णुता और मानवाधिकारों की रक्षा का दावा करता है, तो उसे धार्मिक पहचान देखकर अन्याय के प्रश्न पर अपना मानदंड नहीं बदलना चाहिए।
यदि धार्मिक भावनाओं के नाम पर किसी व्यक्ति को असंगत दंड दिया जाता है, तो प्रश्न उठना चाहिए।
यदि विदेश में काम करने वाले नागरिक को निष्पक्ष सुनवाई और प्रभावी कानूनी सहायता नहीं मिली, तो इसकी जाँच की माँग होनी चाहिए।
यदि किसी देश की न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव है, तो उस पर सवाल उठना चाहिए—चाहे वह देश मित्र हो या विरोधी।
और यदि किसी मानवतावादी संगठन ने समान परिस्थितियों में अन्य देशों पर कठोर टिप्पणी की है, लेकिन यहाँ प्रतिक्रिया नहीं दी, तो उसके सार्वजनिक वक्तव्यों की तुलना करके चयनात्मकता की जाँच की जानी चाहिए।
बहरहाल, निष्कर्ष यह है कि इस घटना में सबसे पहले सऊदी सरकार से आरोपों, साक्ष्यों, मुकदमे और अपील की प्रक्रिया का पूरा विवरण सार्वजनिक करने की माँग होनी चाहिए। उसके बाद अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों से स्पष्ट और समान मानदंडों पर आधारित प्रतिक्रिया अपेक्षित है।
मानवतावाद की परीक्षा उन मामलों में होती है, जहाँ पीड़ित के पक्ष में बोलना राजनीतिक या वैचारिक रूप से असुविधाजनक हो। यदि मानवाधिकार केवल सुविधाजनक मामलों में याद आएँ, तो उनकी सार्वभौमिकता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
✍️ कैलाश चन्द
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