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विंध्य की माटी पुकार रही है: रीवा के स्वर्णिम भविष्य को थामने चले हैं विकास के विरोधी

परमाणु ऊर्जा से समृद्धि की ओर: रीवा और विंध्य के भविष्य की नई संभावनाएँ


✍️ दीपक कुमार द्विवेदी


भारत के विकास की यात्रा में ऊर्जा का प्रश्न सदैव केंद्रीय रहा है। जिस राष्ट्र के पास पर्याप्त, सस्ती और निरंतर उपलब्ध होने वाली ऊर्जा होती है, वही बड़े उद्योग स्थापित कर सकता है, आधुनिक तकनीक विकसित कर सकता है और वैश्विक आर्थिक प्रतिस्पर्धा में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा सकता है। आज भारत जिस विकसित और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनने का स्वप्न देख रहा है, उसकी प्राप्ति के लिए ऊर्जा के पारंपरिक स्रोतों के साथ-साथ आधुनिक परमाणु ऊर्जा तकनीक का विस्तार भी आवश्यक होता जा रहा है। इसी व्यापक राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में मध्य प्रदेश के रीवा जिले के मनगवां क्षेत्र के रोझोही गांव के निकट प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा परियोजना को समझने की आवश्यकता है।


इस परियोजना को लेकर लगभग 28,000 करोड़ रुपये से अधिक के संभावित निवेश की चर्चा सामने आई है। टाटा पावर की ओर से 2×220 मेगावाट क्षमता वाली परमाणु ऊर्जा परियोजना के लिए प्रारंभिक गतिविधियाँ शुरू किए जाने की जानकारी सार्वजनिक हुई है। किंतु इस संबंध में सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि परियोजना अभी प्रारंभिक स्थल सर्वेक्षण, भूगर्भीय परीक्षण और व्यवहार्यता अध्ययन के चरण में है। न तो इसे निर्माणाधीन परमाणु संयंत्र कहना उचित है और न ही इसकी अंतिम स्थापना, लागत, तकनीकी स्वरूप तथा पर्यावरणीय स्वीकृतियों को सुनिश्चित मानना चाहिए। जिला प्रशासन ने भी स्पष्ट किया है कि अभी भूमि आवंटित नहीं हुई है और प्रारंभिक परीक्षण का उद्देश्य स्थल की उपयुक्तता का आकलन करना है। इसलिए इस परियोजना पर चर्चा करते समय तथ्यों और संभावनाओं के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है। 


लेकिन इस प्रारंभिक प्रक्रिया के सामने ही रोझोही, सरई कला और आसपास के गांवों में विरोध तथा असंतोष के स्वर सुनाई देने लगे हैं। ग्रामीणों की चिंताओं को केवल विकास-विरोधी मानसिकता कहकर खारिज कर देना उचित नहीं होगा। उनकी अपनी जमीन है, खेती है, घर हैं, जलस्रोत हैं और पीढ़ियों से जुड़ी हुई सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत है। उनके मन में यह स्वाभाविक प्रश्न है कि यदि भविष्य में इतनी बड़ी परियोजना स्थापित होती है तो उनके जीवन, आजीविका, स्वास्थ्य और पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा? क्या उन्हें अपनी भूमि छोड़नी पड़ेगी? पानी कहाँ से आएगा? क्या भूजल प्रभावित होगा? क्या आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा? ग्रामसभा की सहमति और कथित अनापत्ति प्रमाणपत्र की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रही है? इन प्रश्नों का उत्तर देना सरकार, प्रशासन और परियोजना से जुड़ी कंपनी की जिम्मेदारी है।



विकास की सबसे बड़ी विशेषता यही होनी चाहिए कि वह समाज के किसी वर्ग को पीछे छोड़कर आगे न बढ़े। किसी किसान के लिए उसकी भूमि केवल संपत्ति नहीं होती, वह उसके परिवार की आजीविका, सम्मान और भविष्य का आधार होती है। इसलिए ग्रामीणों की आशंकाओं को सुनना और उनका व्यावहारिक समाधान निकालना विकास की प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए। लेकिन इसके साथ ही यह भी समझना होगा कि किसी तकनीक के संबंध में अधूरी जानकारी, ऐतिहासिक दुर्घटनाओं का भय और अप्रमाणित दावे ही अंतिम सत्य नहीं हो सकते। हमें विज्ञान को समझना होगा, उसके लाभों और जोखिमों का मूल्यांकन करना होगा तथा फिर विवेकपूर्ण निर्णय लेना होगा।

सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि परमाणु ऊर्जा संयंत्र आखिर काम कैसे करता है। परमाणु ऊर्जा का नाम सुनते ही अनेक लोगों के मन में परमाणु बम, विस्फोट और रेडियोधर्मी विकिरण की तस्वीर उभर आती है, जबकि परमाणु बिजलीघर और परमाणु हथियार दो अलग-अलग उद्देश्य तथा तकनीकी व्यवस्थाओं पर आधारित होते हैं। परमाणु बिजलीघर में परमाणु ऊर्जा का उपयोग नियंत्रित तरीके से बिजली बनाने के लिए किया जाता है।

इसके लिए सामान्यतः यूरेनियम जैसे परमाणु ईंधन का उपयोग होता है। रिएक्टर के भीतर यूरेनियम के परमाणु के नाभिक का विखंडन किया जाता है। इस प्रक्रिया में अत्यधिक ऊष्मा उत्पन्न होती है। इस ऊष्मा से पानी गर्म होकर भाप बनाता है। भाप के दबाव से टरबाइन घूमती है और टरबाइन से जुड़े जनरेटर के माध्यम से बिजली पैदा होती है। इसके बाद भाप को ठंडा करके फिर पानी में बदला जाता है और प्रक्रिया दोबारा संचालित होती है। अर्थात् परमाणु ऊर्जा से ऊष्मा, ऊष्मा से यांत्रिक ऊर्जा और यांत्रिक ऊर्जा से विद्युत ऊर्जा प्राप्त होती है।
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि परमाणु विखंडन को नियंत्रित रखा जाता है। इसके लिए नियंत्रण छड़ें, शीतलन व्यवस्था, सुरक्षा आवरण और स्वचालित आपातकालीन प्रणालियाँ होती हैं। रिएक्टर के भीतर परमाणु अभिक्रिया और बाहर बनने वाली बिजली के बीच सुरक्षा की कई व्यवस्थाएँ काम करती हैं। आधुनिक परमाणु संयंत्रों में सुरक्षा की अनेक स्वतंत्र परतों को एक साथ विकसित किया जाता है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में 'डिफेन्स इन डेप्थ' कहा जाता है। इसका उद्देश्य यह है कि यदि एक सुरक्षा व्यवस्था विफल हो जाए तो दूसरी व्यवस्था दुर्घटना को आगे बढ़ने से रोक सके। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) इसी सिद्धांत को परमाणु सुरक्षा का मूल आधार मानती है। 


अब प्रश्न उठता है कि जब सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और जलविद्युत के विकल्प उपलब्ध हैं तो परमाणु ऊर्जा की आवश्यकता क्यों है? इसका उत्तर भारत की बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं में छिपा है। आज बिजली केवल घरों में प्रकाश और पंखे चलाने के लिए नहीं चाहिए। आधुनिक उद्योग, सेमीकंडक्टर निर्माण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विशाल डेटा सेंटर, रेलवे, इलेक्ट्रिक वाहन, रक्षा उत्पादन, अस्पताल, उर्वरक और इस्पात उद्योग—इन सभी को बड़ी मात्रा में निरंतर बिजली की आवश्यकता है। सौर ऊर्जा सूर्य के प्रकाश पर और पवन ऊर्जा हवा की गति पर निर्भर करती है। इनकी उपयोगिता असाधारण है, लेकिन इनके साथ ऊर्जा भंडारण, अतिरिक्त उत्पादन क्षमता और विद्युत ग्रिड के संतुलन की व्यवस्था भी आवश्यक होती है। परमाणु ऊर्जा का महत्त्व इसलिए है कि यह मौसम और दिन-रात के परिवर्तन से अपेक्षाकृत स्वतंत्र रहकर निरंतर बिजली उपलब्ध करा सकती है।
विश्व के अनेक देश इसी कारण परमाणु ऊर्जा का विस्तार कर रहे हैं। फ्रांस अपनी विद्युत व्यवस्था में परमाणु ऊर्जा का बड़ा हिस्सा रखता है। अमेरिका के पास विश्व की सबसे बड़ी संचालित परमाणु विद्युत क्षमताओं में से एक है। चीन बड़े पैमाने पर नए परमाणु संयंत्रों का निर्माण कर रहा है। रूस, दक्षिण कोरिया, जापान और कनाडा भी इस क्षेत्र में लंबे समय से तकनीकी विशेषज्ञता विकसित कर चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के सितंबर 2026 के उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार विश्व में 417 परमाणु रिएक्टर संचालित थे और 78 रिएक्टर निर्माणाधीन थे। यह बताता है कि परमाणु ऊर्जा आज भी वैश्विक ऊर्जा रणनीति का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। 


भारत के लिए यह प्रश्न और अधिक महत्त्वपूर्ण है। स्वतंत्रता के बाद डॉ. होमी जहाँगीर भाभा ने परमाणु विज्ञान को राष्ट्रीय विकास की रणनीति का हिस्सा बनाया था। आज भारत अपने स्वदेशी प्रेसराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (PHWR) विकसित और संचालित करने की क्षमता रखता है। काकरापार, रावतभाटा, तारापुर, कैगा, कलपक्कम, नरोरा और कुडनकुलम जैसे स्थानों पर परमाणु ऊर्जा संयंत्र संचालित हैं। भारत ने फास्ट ब्रीडर रिएक्टर और भविष्य में थोरियम के उपयोग की दिशा में भी महत्त्वपूर्ण अनुसंधान किया है। भारत सरकार ने वर्ष 2047 तक परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता को 100 गीगावाट तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा है। इससे स्पष्ट है कि परमाणु ऊर्जा भारत की दीर्घकालीन ऊर्जा नीति का महत्त्वपूर्ण आधार बनने जा रही है। 


लेकिन परमाणु ऊर्जा की उपयोगिता समझने के साथ इसके जोखिमों को भी समझना आवश्यक है। ग्रामीणों के मन में सबसे बड़ा भय कैंसर, थायरॉइड संबंधी बीमारियों, जन्मजात विकृतियों और आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य को लेकर है। इन आशंकाओं का उत्तर किसी राजनीतिक भाषण से नहीं, बल्कि चिकित्सा विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय शोध से देना चाहिए।


सबसे पहले विकिरण को समझिए। हमारे आसपास प्राकृतिक रूप से भी विकिरण मौजूद रहता है। पृथ्वी की मिट्टी, चट्टानों, अंतरिक्ष से आने वाली किरणों और कुछ प्राकृतिक तत्वों से मनुष्य को प्रतिवर्ष विकिरण मिलता है। चिकित्सा क्षेत्र में एक्स-रे और सीटी स्कैन जैसी जाँचों में भी आयनीकारी विकिरण का उपयोग होता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हर प्रकार का विकिरण हानिकारक है। इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि विकिरण किस प्रकार का है, उसकी मात्रा कितनी है, कितने समय तक संपर्क रहा और शरीर के किस अंग पर उसका प्रभाव पड़ा।


अधिक मात्रा में आयनीकारी विकिरण कोशिकाओं के डीएनए को नुकसान पहुँचा सकता है और कैंसर का जोखिम बढ़ा सकता है। लेकिन परमाणु संयंत्र के सामान्य संचालन और किसी गंभीर दुर्घटना के दौरान होने वाले विकिरण उत्सर्जन में बहुत बड़ा अंतर होता है। सामान्य संचालन में संयंत्र से होने वाले उत्सर्जन की निगरानी की जाती है और जनता को मिलने वाली अतिरिक्त विकिरण मात्रा को नियामकीय सीमा के भीतर रखना अनिवार्य होता है। भारत में सामान्य परिस्थितियों में जनता के लिए नियोजित परमाणु प्रतिष्ठानों से मिलने वाली अतिरिक्त प्रभावी विकिरण मात्रा की सीमा एक मिलीसीवर्ट प्रतिवर्ष है। यह प्राकृतिक पृष्ठभूमि विकिरण से अलग सीमा है। 


अब कैंसर के प्रश्न पर आते हैं। क्या परमाणु संयंत्र के आसपास रहने से कैंसर होना निश्चित है? इसका उत्तर है नहीं। सामान्य संचालन के दौरान निर्धारित विकिरण सीमाओं का पालन होने पर कैंसर होना अनिवार्य नहीं है। लेकिन यह कहना भी वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा कि किसी भी परिस्थिति में कोई जोखिम नहीं हो सकता। इस विषय पर विश्वभर में अनेक अध्ययन हुए हैं और उनके निष्कर्षों को समझना आवश्यक है।
वर्ष 2024 में 'एनवायरनमेंटल हेल्थ' नामक शोध पत्रिका में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-विश्लेषण में परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के आसपास रहने वाले लोगों में थायरॉइड कैंसर के जोखिम का अध्ययन किया गया। इसमें 11 अध्ययनों को शामिल किया गया। कुल मिलाकर आसपास रहने वाले लोगों में थायरॉइड कैंसर का जोखिम सांख्यिकीय रूप से निर्णायक ढंग से अधिक सिद्ध नहीं हुआ। शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि कुछ अध्ययनों में जोखिम के संकेत मिले हैं और बेहतर गुणवत्ता वाले दीर्घकालीन शोध की आवश्यकता है। वर्ष 2025 में प्रकाशित एक अन्य व्यवस्थित समीक्षा में भी आसपास रहने वाली आबादी में विभिन्न ठोस कैंसरों की दर के संबंध में कोई निर्णायक निष्कर्ष नहीं मिला। अध्ययनों के बीच काफी भिन्नता पाई गई। 


वहीं वर्ष 2026 में 'नेचर कम्युनिकेशंस' में प्रकाशित अमेरिका के एक राष्ट्रीय अध्ययन ने परमाणु संयंत्रों के निकट स्थित काउंटियों में कैंसर मृत्यु-दर अधिक होने का सांख्यिकीय संबंध दर्शाया। लेकिन शोधकर्ताओं ने स्वयं स्पष्ट किया कि इस अध्ययन से यह सिद्ध नहीं होता कि परमाणु संयंत्र से निकलने वाले विकिरण ने ही कैंसर पैदा किया। इसके लिए वास्तविक विकिरण संपर्क, अन्य पर्यावरणीय कारणों और व्यक्तिगत स्वास्थ्य संबंधी कारकों पर आगे शोध आवश्यक है। इस शोध को छिपाना भी गलत होगा और इसे परमाणु संयंत्र से कैंसर होने का अंतिम प्रमाण बताना भी गलत होगा। 
थायरॉइड के संबंध में भी एक आवश्यक अंतर समझना चाहिए। थायरॉइड ग्रंथि शरीर में चयापचय को नियंत्रित करने वाले हार्मोन बनाती है। थायरॉइड कैंसर और हाइपोथायरॉइडिज्म यानी थायरॉइड हार्मोन की कमी दो अलग-अलग चिकित्सकीय स्थितियाँ हैं। रेडियोधर्मी आयोडीन-131 के संपर्क से विशेषकर बच्चों में थायरॉइड कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है। यह जोखिम मुख्यतः गंभीर परमाणु दुर्घटना में रेडियोधर्मी आयोडीन के उत्सर्जन और उसके शरीर में प्रवेश से संबंधित है। सामान्य संचालन के दौरान संयंत्र के आसपास रहने मात्र से थायरॉइड की बीमारी या कैंसर होने का निष्कर्ष निकालना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है।


इसका सबसे स्पष्ट ऐतिहासिक उदाहरण चेर्नोबिल दुर्घटना है। वर्ष 1986 में तत्कालीन सोवियत संघ के यूक्रेन क्षेत्र में परमाणु रिएक्टर दुर्घटना के बाद बड़ी मात्रा में रेडियोधर्मी पदार्थ वातावरण में फैल गए थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रभावित क्षेत्रों में दूषित दूध और भोजन के माध्यम से रेडियोधर्मी आयोडीन शरीर में पहुँचने के कारण बच्चों और किशोरों में थायरॉइड कैंसर के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। वर्ष 2005 तक इस समूह में छह हजार से अधिक थायरॉइड कैंसर के मामले दर्ज किए जा चुके थे। यह दुर्घटना का वास्तविक और गंभीर स्वास्थ्य प्रभाव था। इससे हमें सीख मिलती है कि परमाणु सुरक्षा, खाद्य पदार्थों की निगरानी और आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था कितनी महत्त्वपूर्ण है। 


लेकिन वर्ष 2011 में जापान की फुकुशिमा दुर्घटना के बाद संयुक्त राष्ट्र की वैज्ञानिक समिति (UNSCEAR) ने जो अध्ययन प्रस्तुत किया, उसके निष्कर्ष अलग थे। समिति ने पाया कि वहाँ बच्चों में थायरॉइड कैंसर की जाँच से मिले मामलों में बड़ी वृद्धि का प्रमुख कारण अत्यधिक संवेदनशील अल्ट्रासाउंड जाँच द्वारा पहले से मौजूद छोटी असामान्यताओं का पता लगना था। उपलब्ध विकिरण मात्रा के आधार पर वहाँ भविष्य में विकिरण से संबंधित कैंसर में स्पष्ट वृद्धि दिखाई देने की संभावना कम आँकी गई। इस प्रकार चेर्नोबिल और फुकुशिमा दोनों के अनुभव बताते हैं कि दुर्घटना की प्रकृति, विकिरण की मात्रा, समय पर खाद्य निगरानी और आपातकालीन प्रबंधन स्वास्थ्य परिणामों को प्रभावित करते हैं। 


अब प्रश्न उठता है कि दुनिया में परमाणु संयंत्रों में आज तक कितनी बड़ी दुर्घटनाएँ हुई हैं और उनका वास्तविक जोखिम कितना है? व्यावसायिक परमाणु ऊर्जा के इतिहास में तीन प्रमुख रिएक्टर दुर्घटनाओं का उल्लेख किया जाता है—अमेरिका की थ्री माइल आइलैंड दुर्घटना (1979), चेर्नोबिल दुर्घटना (1986) और फुकुशिमा दाइची दुर्घटना (2011)। इनमें थ्री माइल आइलैंड में रिएक्टर को गंभीर क्षति पहुँची, लेकिन रेडियोधर्मी पदार्थों का उत्सर्जन सीमित रहा और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर गंभीर विकिरण प्रभाव स्थापित नहीं हुआ। चेर्नोबिल और फुकुशिमा में गंभीर रेडियोधर्मी उत्सर्जन हुआ।


विश्व परमाणु संघ के संकलित आँकड़ों के अनुसार व्यावसायिक परमाणु ऊर्जा उत्पादन के सात दशकों में 36 देशों में 20,000 से अधिक रिएक्टर-वर्षों का संचालन दर्ज किया गया है। इस अवधि में दो बड़ी ऐसी दुर्घटनाएँ हुईं जिनमें व्यापक स्तर पर रेडियोधर्मी उत्सर्जन हुआ। मोटे ऐतिहासिक अनुपात में देखें तो यह 10,000 रिएक्टर-वर्षों पर एक बड़ी दुर्घटना के बराबर बैठता है। लेकिन इसे किसी नए संयंत्र के दुर्घटनाग्रस्त होने की निश्चित संभावना या व्यक्तिगत जोखिम का प्रतिशत नहीं समझना चाहिए। रिएक्टर की तकनीक, उसकी आयु, स्थल की भौगोलिक परिस्थितियाँ, प्राकृतिक आपदाएँ और सुरक्षा व्यवस्था के आधार पर वास्तविक जोखिम बदलता है। 


इसलिए यह कहना कि परमाणु संयंत्र कभी दुर्घटनाग्रस्त नहीं हो सकते, गलत है। लेकिन यह कहना भी तथ्यात्मक नहीं कि हर परमाणु संयंत्र चेर्नोबिल या फुकुशिमा जैसी दुर्घटना का कारण बनेगा। आधुनिक तकनीक में स्वचालित रिएक्टर बंद करने की व्यवस्था, आपातकालीन शीतलन प्रणाली, मजबूत सुरक्षा आवरण, अतिरिक्त विद्युत आपूर्ति और स्वतंत्र सुरक्षा प्रणालियाँ विकसित की जाती हैं। फुकुशिमा से मिली सबसे बड़ी सीख यह थी कि केवल सामान्य परिस्थितियों के लिए नहीं, बल्कि असाधारण प्राकृतिक आपदाओं और बिजली आपूर्ति की पूर्ण विफलता जैसी स्थितियों के लिए भी सुरक्षा व्यवस्था तैयार होनी चाहिए।


अब रोझोही और आसपास के ग्रामीणों की पानी संबंधी चिंता को समझना भी आवश्यक है। परमाणु संयंत्र में पानी का उपयोग मुख्यतः शीतलन और भाप उत्पादन की प्रक्रिया से जुड़ा होता है। संयंत्र की तकनीक के अनुसार पानी की आवश्यकता और उसकी खपत बदलती है। क्लोज्ड-लूप कूलिंग प्रणाली में पानी को बार-बार परिसंचारित किया जाता है, लेकिन वाष्पीकरण के कारण कुछ पानी की खपत होती है। इसलिए यह कहना गलत होगा कि आधुनिक संयंत्रों में पानी का कोई नुकसान नहीं होता या जलस्रोतों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वास्तविक आवश्यकता संयंत्र की क्षमता, शीतलन तकनीक, मौसम और जलस्रोत पर निर्भर करती है।


रीवा के संदर्भ में यह प्रश्न और भी महत्त्वपूर्ण है। प्रस्तावित स्थल के लिए जल उपलब्धता और जल निकासी के अध्ययन में टमस नदी, बाणसागर जलाशय, टोंस बैराज और बीहर बैराज जैसे संभावित जलस्रोतों का उल्लेख सामने आया है। प्रारंभिक अध्ययन में ऐतिहासिक जल प्रवाह, गर्मियों के कम प्रवाह, अन्य उपयोगकर्ताओं की जरूरतों और पर्यावरणीय प्रवाह को भी परखने की बात है। इसका अर्थ है कि पानी की उपलब्धता का प्रश्न अभी अध्ययन का विषय है, उसका अंतिम उत्तर उपलब्ध नहीं है। 


इसलिए सरकार को चाहिए कि वह जल उपलब्धता संबंधी पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक करे। गर्मियों में जब नदी और जलाशयों में पानी कम होता है, उस समय संयंत्र को कितने पानी की आवश्यकता होगी, किसानों के सिंचाई अधिकारों पर क्या प्रभाव पड़ेगा और स्थानीय पेयजल की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी—इन सभी प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर दिए जाएँ। यदि जलस्रोतों पर प्रतिकूल दबाव पड़ने की आशंका है तो वैकल्पिक जल व्यवस्था और कम पानी उपयोग करने वाली शीतलन तकनीकों का मूल्यांकन किया जाए। गर्म पानी के निष्कासन की स्थिति में उसका तापमान निर्धारित मानकों के भीतर रखना और जलीय जीवों की रक्षा करना भी अनिवार्य होना चाहिए।


इसी प्रकार परमाणु कचरे को लेकर भी ग्रामीणों को सही जानकारी देना आवश्यक है। रिएक्टर में ईंधन के उपयोग के बाद रेडियोधर्मी पदार्थ उत्पन्न होते हैं। उन्हें सामान्य घरेलू या औद्योगिक कचरे की तरह खुले में नहीं फेंका जा सकता। भारत में प्रयुक्त परमाणु ईंधन के पुनर्प्रसंस्करण और रेडियोधर्मी अपशिष्ट के सुरक्षित प्रबंधन के लिए विशेष वैज्ञानिक व्यवस्थाएँ विकसित की गई हैं। कुछ अपशिष्टों को सुरक्षित रूप में स्थिर किया जाता है और उपयुक्त संरक्षित स्थानों पर रखा जाता है। उच्च स्तरीय रेडियोधर्मी अपशिष्ट के दीर्घकालीन प्रबंधन की चुनौती पूरी दुनिया के सामने है। अतः इसे लेकर न तो भय फैलाना चाहिए और न ही यह दावा करना चाहिए कि इस समस्या का कोई प्रश्न ही नहीं है। परियोजना के आरंभ से ही अपशिष्ट प्रबंधन की योजना, जिम्मेदार संस्था और निगरानी व्यवस्था स्पष्ट होनी चाहिए।


अब यह भी देखना चाहिए कि भारत में पहले से संचालित परमाणु संयंत्रों के आसपास पर्यावरणीय निगरानी के क्या परिणाम सामने आए हैं। भारत के परमाणु ऊर्जा विभाग ने वर्ष 2012 में संसद में जानकारी दी थी कि विभिन्न परमाणु संयंत्रों के आसपास विकिरण की अतिरिक्त मात्रा प्राकृतिक पृष्ठभूमि विकिरण की तुलना में बहुत कम पाई गई थी। तारापुर, रावतभाटा, नरोरा, काकरापार, कलपक्कम और कैगा जैसे स्थलों पर कर्मचारियों और उनके परिवारों के स्वास्थ्य संबंधी अध्ययन किए गए थे। बाद में कैगा परमाणु विद्युत केंद्र के आसपास वर्ष 2005 से 2020 तक पर्यावरणीय रेडियोधर्मिता की निगरानी पर आधारित शोध प्रकाशित हुआ, जिसमें जाँचे गए पर्यावरणीय नमूनों में ट्रिटियम और सीज़ियम-137 के केवल अति सूक्ष्म स्तरों का उल्लेख किया गया और अधिकांश मापों में गिरावट अथवा कोई स्पष्ट बढ़ती प्रवृत्ति नहीं मिली। ये अध्ययन उपयोगी प्रमाण हैं, लेकिन इन्हें रीवा की भविष्य की परियोजना के स्वास्थ्य परिणामों का स्वतः प्रमाण नहीं माना जा सकता। रोझोही में परियोजना शुरू होने से पहले स्थानीय आबादी का आधारभूत स्वास्थ्य सर्वेक्षण करना और बाद में नियमित रूप से उसकी तुलना करना अधिक उचित होगा। 


यहाँ विरोध करने वाले ग्रामीणों की एक और चिंता भूमि और विस्थापन की है। इसे केवल तकनीकी प्रश्न मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। यदि भविष्य में परियोजना के लिए भूमि की आवश्यकता पड़ती है तो प्रत्येक प्रभावित परिवार को यह स्पष्ट बताया जाना चाहिए कि कितनी भूमि की आवश्यकता है, किस प्रकार की भूमि ली जाएगी, किन परिवारों पर प्रभाव पड़ेगा और उनके पुनर्वास की क्या व्यवस्था होगी। उचित मुआवजा केवल एक बार दी जाने वाली धनराशि तक सीमित नहीं होना चाहिए। प्रभावित परिवारों के लिए दीर्घकालीन आजीविका, कौशल प्रशिक्षण, स्थानीय रोजगार, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की भी व्यवस्था होनी चाहिए। जिन किसानों की आजीविका भूमि पर निर्भर है, उनके लिए वैकल्पिक आजीविका और पुनर्वास की योजना पहले से तैयार होनी चाहिए।


ग्रामसभा की सहमति और कथित अनापत्ति प्रमाणपत्र का प्रश्न भी अत्यंत गंभीर है। उपलब्ध समाचारों के अनुसार 3 सितंबर 2026 को सरई कला में विशेष ग्रामसभा आयोजित हुई थी, जिसमें परियोजना को लेकर आपत्तियाँ दर्ज की गईं। ग्रामीणों की ओर से 5 सितंबर को जिला प्रशासन को भेजे गए पत्र में सहमति न दिए जाने की बात कही गई। दूसरी ओर जिला कलेक्टर का कहना है कि प्रशासन को इससे पहले ग्रामसभा की सहमति प्राप्त हुई थी और उसी आधार पर अनापत्ति संबंधी प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। इस प्रकार दोनों पक्षों के दावों में अंतर है। इसका समाधान आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि संबंधित ग्रामसभा की मूल कार्यवाही पुस्तिका, उपस्थिति पंजी, प्रस्ताव, हस्ताक्षर, वीडियो रिकॉर्डिंग और कथित NOC की सार्वजनिक जाँच से होना चाहिए। यदि किसी दस्तावेज में अनियमितता है तो उसकी निष्पक्ष जाँच हो और यदि प्रक्रिया विधिसम्मत है तो उसका प्रमाण भी सार्वजनिक किया जाए। 


यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात समझना आवश्यक है कि हर परिस्थिति में ग्रामसभा की सहमति का कानूनी स्वरूप एक जैसा नहीं होता। भूमि की प्रकृति, वन अधिकार, अनुसूचित क्षेत्र की स्थिति और लागू कानूनों के अनुसार आवश्यक प्रक्रिया निर्धारित होती है। इसलिए प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि इस परियोजना पर कौन-कौन से कानून लागू होते हैं और ग्रामीणों की सहमति अथवा परामर्श का क्या कानूनी आधार है। पर्यावरणीय प्रभाव आकलन और सार्वजनिक परामर्श की प्रक्रिया भी निर्धारित नियमों के अनुसार पूरी होनी चाहिए। परमाणु ऊर्जा निगम स्वयं अपनी पर्यावरणीय स्वीकृति प्रक्रिया में पर्यावरणीय प्रभाव आकलन, जनपरामर्श और परियोजना के बाद निगरानी को आवश्यक चरणों में शामिल करता है। 


विमला कोल की मृत्यु का प्रसंग भी इस पूरे विवाद में अत्यंत संवेदनशील है। कुछ समाचार रिपोर्टों और स्थानीय पक्षों की ओर से यह दावा सामने आया कि जल सत्याग्रह के दौरान उनकी तबीयत बिगड़ी और बाद में उनकी मृत्यु हुई। दूसरी ओर रीवा के जिला कलेक्टर ने 27 अक्टूबर को जारी अपने बयान में कहा कि विमला कोल आंदोलन या जल सत्याग्रह में शामिल नहीं थीं, वे पहले से अस्वस्थ थीं और सुबह गिरने के कारण उनकी मृत्यु हुई। इस प्रकार इस घटना के संबंध में परस्पर विरोधी दावे सार्वजनिक हुए हैं। जब तक सभी संबंधित तथ्य और चिकित्सकीय विवरण स्पष्ट न हों, तब तक किसी एक दावे को अंतिम सत्य मानना उचित नहीं होगा। एक संवेदनशील समाज का दायित्व है कि मृतका और उनके परिवार के प्रति सम्मान बनाए रखा जाए तथा किसी की मृत्यु को राजनीतिक प्रचार का साधन न बनाया जाए। 



अब प्रश्न यह है कि क्या इस परियोजना से रीवा और मध्य प्रदेश को वास्तविक लाभ हो सकता है? इसका उत्तर संभावनाओं के रूप में सकारात्मक है, बशर्ते परियोजना तकनीकी और आर्थिक रूप से व्यवहार्य सिद्ध हो तथा सभी आवश्यक स्वीकृतियाँ प्राप्त करे। किसी बड़े ऊर्जा प्रतिष्ठान की स्थापना से निर्माण कार्यों के दौरान इंजीनियरों, तकनीशियनों, वेल्डरों, बिजलीकर्मियों, निर्माण श्रमिकों और अन्य विशेषज्ञों की आवश्यकता होती है। संयंत्र के संचालन के दौरान परमाणु विज्ञान, विद्युत अभियांत्रिकी, यांत्रिकी, सुरक्षा, उपकरण रखरखाव और प्रशासन से जुड़े प्रशिक्षित कर्मचारियों की आवश्यकता रहती है। इसके अतिरिक्त परिवहन, आवास, खानपान, चिकित्सा, शिक्षा, उपकरण आपूर्ति और अन्य सहायक सेवाओं में भी आर्थिक गतिविधियाँ विकसित हो सकती हैं।


इससे रीवा के युवाओं के लिए तकनीकी शिक्षा और कौशल विकास के नए अवसर खुल सकते हैं। स्थानीय औद्योगिक क्षेत्र में छोटे और मध्यम उद्यमों को भी आपूर्ति तथा सेवा संबंधी अवसर मिल सकते हैं। मध्य प्रदेश को ऊर्जा क्षेत्र में निवेश, औद्योगिक गतिविधियों और कर राजस्व के माध्यम से लाभ मिल सकता है। लेकिन यह भी स्पष्ट रहना चाहिए कि 50 हजार या इससे अधिक रोजगार का कोई प्रमाणित आँकड़ा अभी उपलब्ध नहीं है। वास्तविक रोजगार की संख्या परियोजना की अंतिम क्षमता, निर्माण अवधि, तकनीकी स्वरूप और स्थानीय उद्योगों की भागीदारी पर निर्भर करेगी। इसलिए सरकार और कंपनी को रोजगार संबंधी अनुमान सार्वजनिक करने चाहिए तथा स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता देने की स्पष्ट नीति बनानी चाहिए।
 

इस परियोजना के विरोध में जो सबसे बड़ी आशंका व्यक्त की जा रही है, वह यह है कि परमाणु संयंत्र लगने से पूरा क्षेत्र कैंसर और अन्य बीमारियों की चपेट में आ जाएगा। इस दावे का वैज्ञानिक आधार तभी स्थापित हो सकता है जब वास्तविक विकिरण संपर्क, उसकी मात्रा और स्वास्थ्य परिणामों के बीच संबंध प्रमाणित हों। केवल परमाणु संयंत्र की उपस्थिति से कैंसर फैलने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि ग्रामीणों से कहा जाए कि वे बिना किसी प्रश्न के सरकार की बात मान लें। उन्हें यह अधिकार है कि वे वैज्ञानिकों से प्रश्न पूछें, स्वास्थ्य संबंधी अध्ययन देखें और पर्यावरणीय आँकड़ों की स्वतंत्र जाँच कराएँ।


इसीलिए रीवा में एक ऐसी व्यवस्था बननी चाहिए जिसमें परियोजना से पहले रोझोही, सरई कला और आसपास के गांवों की आबादी का स्वास्थ्य सर्वेक्षण कराया जाए। स्थानीय मेडिकल कॉलेज और स्वतंत्र चिकित्सा विशेषज्ञों की भागीदारी से कैंसर, थायरॉइड, जन्मजात विकृतियों और अन्य प्रमुख स्वास्थ्य स्थितियों का आधारभूत विवरण तैयार किया जाए। इसके बाद यदि परियोजना को स्वीकृति मिलती है तो नियमित अंतराल पर स्वास्थ्य सर्वेक्षण दोहराया जाए। हवा, मिट्टी, भूजल, नदी, कृषि उपज, दूध और अन्य खाद्य पदार्थों में रेडियोधर्मिता की निगरानी की जाए। इन सभी आँकड़ों को सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराया जाए ताकि ग्रामीण स्वयं भी स्थिति समझ सकें।


सरकार को चाहिए कि रोझोही में केवल अधिकारियों की बैठक आयोजित करने के बजाय वैज्ञानिकों, परमाणु विशेषज्ञों, चिकित्सकों, जल विशेषज्ञों, पर्यावरणविदों और ग्रामीण प्रतिनिधियों की खुली चौपाल आयोजित करे। वहाँ परमाणु संयंत्र का एक सरल नमूना और चित्रों के माध्यम से उसकी कार्यप्रणाली समझाई जाए। ग्रामीणों को बताया जाए कि रिएक्टर में परमाणु विखंडन कैसे नियंत्रित होता है, विकिरण की निगरानी कैसे की जाती है, दुर्घटना की स्थिति में क्या व्यवस्था होगी और पानी तथा कचरे का प्रबंधन किस प्रकार किया जाएगा। सवाल पूछने वाले ग्रामीणों को विरोधी समझने के बजाय उन्हें प्रक्रिया का सहभागी बनाया जाए।



कंपनी को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। वह केवल निवेश और औद्योगिक विकास की संभावनाएँ बताकर पीछे नहीं हट सकती। उसे परियोजना की प्रारंभिक तकनीकी जानकारी, संभावित भूमि आवश्यकता, जल उपयोग, पर्यावरणीय प्रभाव और रोजगार संबंधी अनुमान सार्वजनिक करने चाहिए। स्थानीय युवाओं के लिए प्रशिक्षण केंद्र, प्रभावित परिवारों के लिए पुनर्वास नीति और ग्रामीणों की शिकायतों के समाधान के लिए स्वतंत्र व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। एक स्थानीय निगरानी समिति का गठन किया जा सकता है, जिसमें ग्रामसभा के प्रतिनिधि, स्वतंत्र वैज्ञानिक, चिकित्सक और प्रशासन के अधिकारी शामिल हों। इस समिति को पर्यावरणीय निगरानी के आँकड़ों तक नियमित पहुँच मिलनी चाहिए।

यदि परियोजना के लिए स्थल उपयुक्त नहीं पाया जाता, जल उपलब्धता अपर्याप्त होती है या पर्यावरणीय और सुरक्षा संबंधी गंभीर आपत्तियाँ सामने आती हैं, तो उन तथ्यों के आधार पर परियोजना के स्वरूप में बदलाव अथवा उसे आगे न बढ़ाने का निर्णय भी स्वीकार करना चाहिए। लेकिन यदि वैज्ञानिक परीक्षण, पर्यावरणीय मूल्यांकन और सभी वैधानिक प्रक्रियाएँ संतोषजनक पाई जाती हैं, तो केवल अप्रमाणित आशंकाओं के आधार पर विकास की संभावनाओं को अनिश्चितकाल तक रोकना भी उचित नहीं होगा। विकास और सुरक्षा में से किसी एक को चुनने की आवश्यकता नहीं है। वास्तविक लक्ष्य दोनों को साथ लेकर चलना होना चाहिए।

भारत को आज ऐसी ऊर्जा व्यवस्था की आवश्यकता है जो भविष्य के उद्योगों, तकनीकी अनुसंधान और आर्थिक विस्तार को निरंतर शक्ति दे सके। परमाणु ऊर्जा इस आवश्यकता का एक महत्त्वपूर्ण विकल्प है। विश्व के अनेक विकसित देश इसका उपयोग कर रहे हैं और भारत भी अपनी स्वदेशी तकनीक के माध्यम से इस क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में विंध्य क्षेत्र के सामने यदि कोई बड़ी ऊर्जा परियोजना प्रस्तावित होती है तो उसका मूल्यांकन राष्ट्रीय विकास और स्थानीय जनहित दोनों के संदर्भ में होना चाहिए।


रीवा की माटी ने लंबे समय तक अपने युवाओं को रोजगार की तलाश में महानगरों की ओर जाते देखा है। यहाँ औद्योगिक निवेश, तकनीकी संस्थानों और रोजगार के व्यापक अवसरों की आवश्यकता है। यदि भविष्य में यह परमाणु ऊर्जा परियोजना सभी परीक्षणों और स्वीकृतियों के बाद स्थापित होती है तो यह क्षेत्र के औद्योगिक विकास में योगदान दे सकती है। लेकिन उसका वास्तविक लाभ तभी होगा जब स्थानीय लोगों को रोजगार मिले, किसानों की आजीविका सुरक्षित रहे, जलस्रोतों पर अनावश्यक दबाव न पड़े और पर्यावरणीय सुरक्षा के मानकों का कठोरता से पालन हो।

हमें यह भी समझना होगा कि किसी तकनीक का विरोध करने से पहले उसके वैज्ञानिक आधार को समझना आवश्यक है। चेर्नोबिल और फुकुशिमा जैसी दुर्घटनाएँ परमाणु ऊर्जा के इतिहास की गंभीर चेतावनियाँ हैं, लेकिन वे यह भी बताती हैं कि सुरक्षा में किसी भी प्रकार की लापरवाही स्वीकार नहीं की जा सकती। इसी प्रकार परमाणु ऊर्जा की उपयोगिता को स्वीकार करने का अर्थ यह नहीं है कि ग्रामीणों की चिंताओं को अनदेखा कर दिया जाए। विज्ञान का वास्तविक उद्देश्य समाज के जीवन को सुरक्षित और समृद्ध बनाना है, न कि समाज को किसी अनिश्चितता में डालना।


विंध्य के लोगों को यह अधिकार है कि वे अपने भविष्य के बारे में प्रश्न पूछें। उन्हें यह जानने का अधिकार है कि उनकी जमीन, पानी और स्वास्थ्य के साथ क्या होगा। लेकिन उन्हें यह अवसर भी मिलना चाहिए कि वे आधुनिक विज्ञान, परमाणु तकनीक और औद्योगिक विकास की संभावनाओं को समझ सकें। दूसरी ओर सरकार और कंपनी का दायित्व है कि वे विश्वास पैदा करें, पारदर्शिता अपनाएँ और प्रत्येक वैध प्रश्न का उत्तर दें।


किसी भी राष्ट्र की प्रगति केवल बड़े उद्योग स्थापित करने से नहीं होती, बल्कि उन उद्योगों के माध्यम से समाज के अंतिम व्यक्ति तक समृद्धि पहुँचाने से होती है। इसलिए रीवा की प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा परियोजना को भय और भ्रम के वातावरण से निकालकर वैज्ञानिक संवाद, पारदर्शिता और जनभागीदारी के आधार पर आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।

विंध्य की माटी को विकास चाहिए, लेकिन ऐसा विकास जो उसके किसानों की जमीन, उसके गांवों का पानी, उसके बच्चों का स्वास्थ्य और उसकी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित रखे। भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना है, मध्य प्रदेश को औद्योगिक रूप से आगे बढ़ना है और रीवा को राष्ट्रीय औद्योगिक मानचित्र पर अपनी पहचान स्थापित करनी है। इन लक्ष्यों की प्राप्ति विज्ञान, विवेक, विश्वास और उत्तरदायित्व के समन्वय से ही संभव है।


विकास का रास्ता भय फैलाकर बंद नहीं किया जाना चाहिए और न ही जनचिंताओं को दबाकर बनाया जाना चाहिए। विकास का वास्तविक अर्थ है—विज्ञान की शक्ति, जनता का विश्वास और राष्ट्रहित का समन्वय। यही वह मार्ग है जिस पर चलकर विंध्य की माटी अपने स्वर्णिम भविष्य की ओर बढ़ सकती है।


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