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जाति की राजनीति में कब तक उलझेगा भारत? आरक्षण के चक्रव्यूह से मुक्ति का मार्ग



✍️दीपक कुमार द्विवेदी

आरक्षण की राजनीति आज भारतीय लोकतंत्र के सामने एक ऐसा ज्वलनशील चक्रव्यूह बन चुकी है, जिससे बाहर निकलने का मार्ग केवल नारों से नहीं, बल्कि कठोर संवैधानिक और आर्थिक सुधारों से ही प्रशस्त हो सकता है।

आज 9 अक्टूबर 2026 को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का निर्णय इसी बहस को एक नया संदर्भ देता है। न्यायालय ने कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार द्वारा वर्ष 2019 में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने वाले कानून को असंवैधानिक ठहराते हुए निरस्त कर दिया। न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति विनय सराफ की खंडपीठ ने सरकारी नियुक्तियों तथा उच्च शिक्षा में ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत तक सीमित रखने का निर्णय दिया और विवादित 13 प्रतिशत पदों को तीन महीने के भीतर अनारक्षित श्रेणी से भरने का निर्देश दिया। इस निर्णय ने सात वर्षों से चले आ रहे विवाद और उन अभ्यर्थियों की प्रतीक्षा को फिर से राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया, जिनकी नियुक्तियाँ आरक्षण संबंधी मुकदमेबाजी के कारण प्रभावित हुई थीं। बिहार, महाराष्ट्र और तेलंगाना से लेकर देश के अन्य राज्यों में भी जब-जब सरकारों ने राजनीतिक दबाव या तुष्टिकरण के तहत आरक्षण की सीमाओं को अनियंत्रित रूप से बढ़ाने का प्रयास किया है, न्यायपालिका ने हर बार उन पर विधिक रोक लगाई है। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि चुनावी लाभ की दृष्टि से रातों-रात लिए गए अदूरदर्शी निर्णय संविधान की कसौटी पर टिक नहीं पाते।

इस पूरी विसंगति की शुरुआत और इसके विस्तार की जड़ें भारतीय राजनीति की उस प्रवृत्ति में निहित हैं, जहाँ स्वतंत्रता के बाद से ही कांग्रेस पार्टी ने सत्ता में बने रहने के लिए जाति को स्थायी राजनीतिक पहचान और चुनावी लामबंदी का मुख्य हथियार बना दिया। कांग्रेस ने भारतीय राजनीति में ऐसी राजनीतिक 'लैंडमाइन' बिछा रखी है, जो हमेशा से उसकी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा रही है। यह कांग्रेस का पुराना इतिहास रहा है कि जब भी वह सत्ता से बाहर होने वाली होती है या उसे अपनी राजनीतिक जमीन खिसकती हुई दिखाई देती है, वह भाषा, क्षेत्र और जाति के नाम पर समाज में ऐसा तीव्र अलगाव और विभाजन खड़ा कर देती है, जिससे आने वाली नई सरकारों के रास्ते में बड़े संकट और कानूनी अड़चनें खड़ी हो जाएं।

इसका सबसे स्पष्ट उद्देश्य यह होता है कि जो दूसरी पार्टी सत्ता में आए, वह इन बुनी हुई 'लैंडमाइन' और प्रशासनिक-विधिक फंदों में उलझकर रह जाए और अपने मूल प्रशासनिक तथा विकास कार्यों को ठीक से पूरा न कर सके। मध्य प्रदेश का वर्ष 2019 का यह निर्णय इसी गंदी राजनीति का सबसे ताजा और सटीक उदाहरण है, जहाँ तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने बिना किसी ठोस और पारदर्शी आधार के ओबीसी आरक्षण को 14 से बढ़ाकर 27 प्रतिशत कर दिया, जबकि राज्य में अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के लिए पहले से ही 36 प्रतिशत आरक्षण निर्धारित था इस तरह कुल आरक्षण सीधे 63 प्रतिशत पर पहुँच जाता। यह जानते हुए भी कि यह संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन है, सिर्फ चुनावी स्वार्थ के लिए इस प्रकार के विस्फोटक निर्णय थोप दिए गए, जो आज मध्य प्रदेश की आने वाली सरकारों और प्रशासन के गले की फांस बन चुके हैं।

मध्य प्रदेश का समाज दशकों से अपनी शांति, स्थिरता और सहज सामाजिक सह-अस्तित्व के लिए जाना जाता रहा है। वहाँ का समाज कभी भी हिंसक या कटु जातिगत संघर्षों की भूमि नहीं रहा है। ऐसे शांत प्रदेश के सामाजिक ताने-बाने को केवल कुछ सीटों और राजनीतिक लाभ के लिए जबरन जातिगत आग में झोंकना कहाँ तक न्यायसंगत था? जब 1990 के दशक में इस विषय पर एक संतुलित और विधिक सहमति बन चुकी थी, तब हर चुनाव से पहले इस प्रकार के विभाजनकारी हथकंडे अपनाकर समाज को बांटना उस पुरानी राजनीतिक संस्कृति का परिचायक है, जिसने देश को जातिगत खाइयों में धकेला है। आज राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेता जिस प्रकार लगातार जातिगत जनगणना और आबादी के अनुपात में आरक्षण देने की बात कर रहे हैं, वह इसी विभाजनकारी राजनीति का अगला चरण है।
इस पूरी बहस को एक बेहद भ्रामक और खतरनाक नैरेटिव पर खड़ा किया गया है, जिसे '85 बनाम 15' की शब्दावली कहा जाता है। इसके तहत समाज को दो स्थायी और विरोधी खेमों में बांट दिया जाता है एक तरफ कथित रूप से 85 प्रतिशत शोषित और दूसरी तरफ 15 प्रतिशत सवर्ण या सामान्य वर्ग, जिन्हें पूरी तरह विशेषाधिकार प्राप्त और शोषक घोषित कर दिया जाता है।

लेकिन जब हम इन आंकड़ों की वैज्ञानिक और तथ्यात्मक गहराई में उतरते हैं, तो यह पूरा ढांचा ढह जाता है। 15 प्रतिशत सामान्य वर्ग की आबादी का यह आंकड़ा औपनिवेशिक काल की 1931 की जनगणना पर आधारित है, जिसे आज के समय का सत्य मानना एक कोरा झूठ है। इसके विपरीत, कई निजी सर्वेक्षण एजेंसियों और ईसाई मिशनरियों के आंकड़ों के अनुसार सामान्य वर्ग की वास्तविक आबादी 30 प्रतिशत या उससे अधिक है। आज भारत की कुल जनसंख्या 150 करोड़ से अधिक है। यदि इसमें से लगभग 20 करोड़ (14 प्रतिशत से अधिक) मुस्लिम आबादी, तथा एससी और एसटी की कुल आबादी को अलग कर दिया जाए, तो हिंदू सामान्य वर्ग की आबादी 25 से 30 प्रतिशत यानी लगभग 40 से 50 करोड़ के आसपास बैठती है।

अब प्रश्न यह उठता है कि 40 से 50 करोड़ की इतनी विशाल आबादी को सामूहिक रूप से "शोषक" का झूठा तमगा कैसे पहनाया जा सकता है? क्या इस देश में सामान्य वर्ग के भीतर रहने वाले वे करोड़ों गरीब, जिनके पास दो वक्त की रोटी और छत का ठिकाना नहीं है, वे सभी पैदाइशी अमीर और शोषक हैं? केवल इसलिए कि ब्राह्मण समुदाय की आबादी छह से सात करोड़ (लगभग 6 प्रतिशत) है, उसे सदियों के कथित ऐतिहासिक अन्याय का इकलौता दोषी मान लिया जाए?
यहाँ यह स्पष्ट करना अनिवार्य है कि भारत के आंतरिक संदर्भ में "ऐतिहासिक अन्याय" जैसे शब्दों का प्रयोग पूरी तरह अनैतिक और तथ्यात्मक रूप से गलत है। भारत के लोगों पर अत्याचार करने वाले, यहाँ की सभ्यताओं को नेस्तनाबूद करने वाले और करोड़ों लोगों का संहार करने वाले बाहरी आक्रांता—इस्लामिक आक्रमणकारी और ब्रिटिश हुक्मरान थे। यदि लूट और जुल्म की किसी को भरपाई करनी चाहिए थी, तो वे बाहरी ताकतें थीं, न कि इस देश की मिट्टी में सदियों से एक-साथ जीने वाले स्थानीय समुदाय। हमारे देश में एससी और एसटी जातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान सदियों से चली आ रही अमानवीय छुआछूत और मानवीय गरिमा के हनन जैसी गंभीर परिस्थितियों के आधार पर मानवता के दृष्टिकोण से बहुत पहले सुनिश्चित किया जा चुका है। वहीं, ओबीसी आरक्षण का आधार कोई जातिगत नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन है यह एक वर्ग-आधारित अवधारणा है।

किंतु आज राजनीतिक दल अपनी नाकामी और कुशासन को छिपाने के लिए सामान्य वर्ग को निरंतर प्रताड़ित कर रहे हैं। पिछले 100 वर्षों में देश की हर जनसांख्यिकीय आबादी में वृद्धि हुई है; उदाहरण के लिए, जो मुस्लिम आबादी कभी 9 प्रतिशत हुआ करती थी, वह आज बढ़कर 14 से 17 प्रतिशत तक पहुँच चुकी है। तो फिर यह कैसे संभव है कि सामान्य वर्ग की आबादी सिमटकर मात्र 15 प्रतिशत रह जाए? यह अकादमिक विमर्श और पश्चिमी विचारकों के उस षड्यंत्र का हिस्सा है जिसके तहत सामान्य वर्ग के युवाओं को यह समझाने का प्रयास किया गया है कि इस देश में उनके जन्म लेने और आगे बढ़ने का कोई अधिकार ही नहीं है।

यदि आरक्षण की सीमा इसी तरह हवा में बढ़ाई जाती रही और हर समुदाय को केवल संख्या के आधार पर सब कुछ देने की जिद पकड़ ली गई, तो वह दिन दूर नहीं जब यह देश एक भयंकर गृहयुद्ध और सामाजिक अस्थिरता की आग में जल उठेगा। कल्पना कीजिए कि यदि सामान्य वर्ग के करोड़ों युवा अपने साथ हो रहे इस अन्यायी और सुनियोजित उपहास के खिलाफ सड़कों पर उतर आएं, तो क्या राज्य उन्हें यह कहकर अरब सागर में फेंक देगा कि तुम्हारी आबादी कम है, इसलिए तुम्हें जीने या न्याय पाने का कोई अधिकार नहीं है?
इस देश को आरक्षण और जाति की इस अंतहीन राजनीति से बाहर निकालने का केवल एक ही अचूक मार्ग है—देश को सरकारी नियंत्रण, लाइसेंस राज और बापूशाही के चंगुल से पूरी तरह मुक्त कराना। जब तक देश का युवा यह सोचता रहेगा कि उसकी जीविका और सुरक्षा का इकलौता साधन केवल सरकारी नौकरी है, तब तक हर गली, हर चौराहे और हर चुनाव में आरक्षण की नई आग सुलगती रहेगी।

इसका ठोस समाधान यह है कि एक शक्तिशाली और नियंत्रणकारी 'वेलफेयर स्टेट' की मानसिकता को त्यागकर एक ऐसी स्वतंत्र आर्थिक व्यवस्था बनाई जाए जहाँ बाजार खुला हो, निजी उद्यमों को प्रोत्साहन मिले, कृषि की उत्पादकता में वृद्धि हो, तकनीक और उद्योगों का विशाल जाल बिछे तथा रोजगार के अवसर केवल सरकारी दफ्तरों तक सीमित न रहकर पूरे देश में फलें-फूलें। जब सरकार का काम अर्थव्यवस्था पर जबरन अंकुश रखना बंद होकर हर नागरिक को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, मजबूत स्वास्थ्य सेवा और बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराना बन जाएगा, तब किसी भी युवा को अपनी योग्यता साबित करने के लिए जाति की बैसाखी की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

अब समय आ गया है कि हम जातिगत आंकड़ों के इस अंतहीन राजनीतिक खेल से बाहर निकलकर मेधा, परिश्रम, कौशल और आर्थिक अवसरों की निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा को अपनाएं। जब तक राजनीतिक दल जातियों को आपस में लड़ाकर सत्ता की मलाई खाते रहेंगे, देश वास्तविक प्रगति नहीं कर सकता। राष्ट्र का भविष्य इस बात से तय नहीं होता कि उसने अपने नागरिकों को कितने जातिगत बाड़ों या पिंजरों में कैद कर रखा है; राष्ट्र का वास्तविक भविष्य इस बात से तय होता है कि वह अपने हर नागरिक को बिना किसी भेदभाव के आगे बढ़ने, कमाने और सम्मान के साथ जीने का कितना अवसर देता है। यही वह एकमात्र मार्ग है जो भारत को इस अंतहीन राजनीतिक दलदल और वर्ग संघर्ष से सदा के लिए बाहर निकाल सकता है।

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