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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
आज रात गूगल मीट पर हुई भारतीय मेधा परिषद की साप्ताहिक विचार गोष्ठी में जब यह गंभीर चर्चा छिड़ी कि आज के समाज में क्या चल रहा है और इसके पीछे की जमीनी और वैचारिक वास्तविकताएं क्या हैं, तो इसने हम सबको सोचने पर मजबूर कर दिया। आज हमारे समाज के सामने सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वैचारिक धरातल पर दो अतिवादी छोर खड़े हो चुके हैं। एक तरफ एक ऐसा समूह है जो पूरी तरह अज्ञानता या जानबूझकर यह दावा करता है कि समाज में कभी जातिवाद था ही नहीं और आज इसका कोई अस्तित्व नहीं है। वहीं दूसरी तरफ, दूसरा अतिवादी छोर पूरी आक्रामकता के साथ यह घोषित करता है कि हिंदू धर्म ही जातिवाद और छुआछूत की एकमात्र जड़ है, इसलिए इस सनातन धर्म को ही पूरी तरह समाप्त कर दिया जाना चाहिए। लेकिन वास्तविकता इन दोनों अतिवादों के ठीक विपरीत है। जमीनी सच यह है कि समाज के भीतर विरोधाभासों का एक ऐसा चक्रव्यूह चल रहा है जहां कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अंतर है। जिस ब्राह्मण वर्ग पर आज भी एकतरफा रूप से ऐतिहासिक शोषण और अत्याचार का पूरा ठीकरा फोड़ा जाता है, उसी समाज के भीतर अनगिनत ऐसे संपन्न और संभ्रांत लोग भी मिल जाएंगे जो अपने ही बीच के कमजोर व्यक्ति के साथ अमानवीय और अपमानजनक व्यवहार करते हैं। इसके साथ ही, समाज का विडंबनापूर्ण पहलू यह भी है कि जो जातियां और राजनीतिक दल बड़े-बड़े मंचों से सोशल जस्टिस, ऐतिहासिक अन्याय और छुआछूत के खिलाफ सबसे मुखर और क्रांतिकारी आवाज उठाते हैं, वे अपने दैनिक जीवन में उसी जातिगत अहंकार को सबसे कड़ाई से निभाते हैं। स्थिति यह है कि वही जातियां जमीनी स्तर पर एक-दूसरे के घर का पानी तक पीने को तैयार नहीं होती हैं। इस प्रकार, समाज में पाखंड और बड़े-बड़े दावों की भरमार है, लेकिन संतुलन की बात कोई नहीं करता।
यदि हम भारतीय राजनीति के इतिहास पर नजर डालें, तो स्वतंत्रता के तुरंत बाद से ही हमने एक अतिवादी मार्ग चुन लिया था। चाहे वह आर्थिक मोर्चे पर अपनाई गई समाजवादी नीतियां रही हों, जिनके चलते 1990 तक आते-आते देश लगभग दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गया था, या फिर सामाजिक समस्याओं को सुलझाने के लिए अपनाई गई आरक्षण जैसी व्यवस्थाएं, हर जगह अतिवाद ने अपनी जड़ें जमा लीं। संविधान सभा ने देश में सदियों से चली आ रही असमानता को पाटने के लिए बड़े ही मानवीय और पवित्र भाव से सर्वसम्मति से आरक्षण की व्यवस्था दी थी। यह एक अत्यंत आवश्यक कदम था। परंतु जब इस कल्याणकारी और संबल देने वाली व्यवस्था के साथ हेगल का वह 'दंडात्मक सिद्धांत' जुड़ गया, तो इस व्यवस्था ने समाज को जोड़ने के बजाय उसे आपस में बांटने और लड़ाने का काम शुरू कर दिया। वर्ष 1979 में मंडल आयोग का गठन हुआ और जब 1989 के दौर में इसे लागू किया गया, तो देखते-देखते इस देश की कुल हिंदू आबादी का 70 प्रतिशत हिस्सा और उसमें मुस्लिम समाज की जातियों को मिलाकर लगभग 75 से 80 प्रतिशत आबादी आरक्षण के दायरे में आ गई। इसके परिणामस्वरूप, देश की केवल 20 से 30 प्रतिशत आबादी ही इस विराट दायरे से बाहर रह गई।
हालांकि, इसी दौर में यानी 1991 के ऐतिहासिक आर्थिक उदारीकरण ने देश के परिदृश्य को एक नया मोड़ दिया। उदारीकरण के कारण निजी क्षेत्र में रोजगार और विकास के भारी अवसर सृजित हुए, जिसके चलते आरक्षण को लेकर जो विकराल सामाजिक संघर्ष आसन्न दिख रहा था, वह कुछ हद तक टल गया। लेकिन इसके बावजूद समाज की मूल मानसिक और सामाजिक समस्याएं उसी रूप में बनी रहीं। वैचारिक और सांस्कृतिक मोर्चे पर यह देखना बेहद चिंताजनक है कि किस प्रकार वैश्विक शक्तियां और देश के भीतर सक्रिय ईसाई मिशनरियां लगातार इस ताने-बाने को कमजोर करने में जुटी रही हैं। उनके प्रायोजित एजेंडे और एजेंटों के मन में हमेशा यह टीस बनी रहती है कि कैसे इस देश का बहुसंख्यक समाज अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान के साथ एकजुट खड़ा है। 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद देश का जो वर्ग तब तक गरीब या अत्यंत निम्न-मध्यम वर्गीय था, उसने शिक्षा और मेहनत के बल पर आगे बढ़ना शुरू किया। समाज के इन निम्न-मध्यम वर्गीय और मध्यम वर्गीय परिवारों में संपन्नता की एक नई लहर दौड़ पड़ी। हमारे सनातन शास्त्रों का यह शाश्वत नियम है कि जब समाज आर्थिक रूप से संपन्न होता है, तो उसका झुकाव धर्म, संस्कृति और आत्मिक चेतना की ओर स्वाभाविक रूप से बढ़ता है। समाज जितना संपन्न होता है, उसकी धार्मिक और आध्यात्मिक निष्ठा उतनी ही प्रगाढ़ होती है, और साथ ही राष्ट्र निर्माण को लेकर उसकी अपेक्षाएं भी उसी अनुपात में बढ़ जाती हैं।
यही वह आंतरिक सामाजिक परिवर्तन था, जिसने वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी के दशकों पुराने, सड़े-गले और यथास्थितिवादी शासन, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजेवाद और तुष्टीकरण की राजनीति को सिरे से खारिज कर दिया। देश की जनता ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक अभूतपूर्व और प्रचंड विजय दर्ज कराई। 2014 का यह चुनाव परिणाम केवल एक राजनीतिक सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि यह भारतीय समाज के मानस में आए एक गहरे क्रांतिकारी बदलाव का परिणाम था। इस चुनाव ने भारतीय राजनीति की उस पुरानी फॉल्ट लाइन को पूरी तरह हिला कर रख दिया जिसके सहारे दशकों तक जातियों को आपस में लड़ाकर राजनीतिक रोटियां सेकी जाती थीं। उत्तर प्रदेश जैसे सबसे बड़े राज्य में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) जैसी राजनीति का सूपड़ा साफ हो गया। बसपा की ताकत का मुख्य आधार उसका वह जमीनी नेटवर्क था जो 'वामसेफ' जैसे संगठनों के माध्यम से विशेषकर सरकारी कर्मचारियों और मध्यम वर्ग के बीच गहराई से काम करता था। जब जनता का एक बहुत बड़ा और जागरूक धड़ा इस संकीर्ण घेरे से बाहर निकलकर भाजपा के राष्ट्रीय और सांस्कृतिक नेविगेशन के साथ जुड़ा, तो राजनीति का समीकरण ही बदल गया।
परंतु इस बदलाव को पचा पाना उन ताकतों के लिए असंभव था जिनकी पूरी राजनीति ही जातियों के ध्रुवीकरण और नफरत की बुनियाद पर टिकी थी। आज भी समाज का एक ऐसा धड़ा है जो इस मुख्यधारा के साथ नहीं जुड़ पाया और कुंठा में भरकर 'जय भीम, जय मीम' जैसे नारों की आड़ में देश के विभाजनकारी एजेंडे को आगे बढ़ाने लगा। इस देश की बहुसंख्यक आबादी अपनी मूल प्रवृत्ति से अत्यंत धर्मनिष्ठ और सांस्कृतिक रूप से जुड़ी हुई है। इसका सबसे ताजा और जीवंत प्रमाण वर्ष 2025 के महाकुंभ में देखने को मिला, जहां जाति, पंथ, वर्ण और ऊंच-नीच के सारे भेदों को गंगा के पवित्र जल में विसर्जित करके 67 करोड़ से अधिक की विशाल आबादी ने एक साथ स्नान किया। उस महासागर जैसी भीड़ में किसी को यह पूछने की आवश्यकता नहीं पड़ी कि कौन किस जाति से है। लेकिन विडंबना यह है कि इस प्रकार की आत्मिक और सामाजिक समरसता को देखकर वामपंथी, बसपा समर्थक, तथाकथित पिछड़वादी, समाजवादी, कम्युनिस्ट, इस्लामिक जिहादी और ग्लोबल मार्केट फोर्सेस के सिंडिकेट बौखलाए हुए हैं। ये सभी ताकतें इस महाकुंभ के मंडपों के बाहर बैठी हैं और सनातन हिंदू धर्म के सैकड़ों टुकड़े करने के लिए देश-विदेश से पानी की तरह लाखों-करोड़ों रुपए बहा रही हैं।
जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की इस सड़ी-गली यथास्थितिवादी राजनीति और भाई-भतीजेवाद को एक के बाद एक चोट देना शुरू किया, तो इन निहित स्वार्थ वाली ताकतों से सहन नहीं हुआ। वे तुरंत समाज को तोड़ने के लिए 'नवबौद्धवाद' का एक नया राजनीतिक और वैचारिक हथियार ले आए। जो लोग 2014 के बाद से लगातार हर चुनाव में पराजित हो रहे हैं, जिन्हें अपनी राजनीतिक जमीन खिसकती हुई साफ दिखाई दे रही है, उन्हें आज 'हिंदू राष्ट्र' के नारों से या सनातन संस्कृति की एकता से घृणा होने लगी है। उनका उद्देश्य बौद्ध धर्म के मूल आध्यात्मिक दर्शन को आगे बढ़ाना कतई नहीं है, बल्कि वे तथाकथित 'नवबौद्ध' पहचान के जरिए हिंदू समाज के भीतर एक स्थायी दरार और विद्वेष पैदा करना चाहते हैं।
इस पूरी साजिश में एक बहुत बड़ा और सुनियोजित मोड़ तब आया जब माननीय उच्चतम न्यायालय ने एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के दुरुपयोग को रोकने के लिए एक संतुलित फैसला देते हुए यह व्यवस्था दी थी कि इस कानून के तहत मामलों में बिना प्राथमिक जांच के तुरंत गिरफ्तारियां नहीं की जानी चाहिए। यह न्यायसंगत और वैधानिक निर्णय था ताकि निर्दोष लोगों को झूठे मामलों में न फंसाया जा सके। लेकिन इसके विरुद्ध अप्रैल 2018 में एक सुनियोजित राजनीतिक दबाव के तहत बड़े पैमाने पर प्रदर्शन कराए गए और इस देश की सरकार पर प्रचंड दबाव बनाकर सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले को पलट दिया गया। उस समय बहुजन राजनीति करने वाले नेताओं और दलों को लगा कि उन्होंने बहुत बड़ा तीर मार लिया है, और उन्होंने इस कानून के डर का इस्तेमाल करके अपनी राजनीतिक रोटियां खूब सेंकी। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ा और अपूरणीय नुकसान यदि किसी का हुआ, तो वह स्वयं एससी (अनुसूचित जाति) समुदाय का हुआ।
इतिहास गवाह है कि वर्ष 2007 में उत्तर प्रदेश में जब दलित समुदाय के साथ सवर्ण (विशेषकर ब्राह्मण) समाज ने वैचारिक और सामाजिक तालमेल बिठाया था, तब बसपा ने अपने दम पर पूर्ण बहुमत की एक ऐतिहासिक सरकार बनाई थी। समाज में एक अभूतपूर्व सद्भाव और भाईचारे का वातावरण बन रहा था, जहां दूरियां मिट रही थीं। लेकिन एससी-एसटी एक्ट के अति-उपयोग और राजनीतिक रूप से फैलाए गए भय के उस वातावरण ने इस पूरे सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया। इस कानून की तलवार लटकाकर उस शांत और सहज रहने वाले बड़े एससी समुदाय को राजनीतिक और सामाजिक रूप से एक प्रकार से 'अछूत' या संदेहास्पद बना दिया गया। बहुजन राजनीति की दुकान चलाने वाले नेताओं ने इस वर्ग की भावनात्मक सरलता और भोलेपन का सबसे अधिक शोषण किया। उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक, आज स्थिति यह है कि दलितों की भीड़ को सड़कों पर लाकर उनका इस्तेमाल करने वाले अधिकांश नेता वे लोग हैं जो खुद संपन्न, लठैत और साधनसंपन्न जातियों से ताल्लुक रखते हैं। इन नेताओं के पास अपनी जाति के नाम पर कोई स्थायी जनसमर्थन या वैचारिक दृष्टि नहीं होती, लेकिन वे एससी वर्ग की भावनात्मक भीड़ को सड़क पर खड़ा करना बहुत अच्छे से जानते हैं। ये नेता अपनी खुद की राजनीतिक दुकानें और भ्रष्टाचार के साम्राज्य को बचाने के लिए ब्राह्मणों और हिंदू धर्म के खिलाफ रोज नए प्रपंच रचते हैं।
यही कारण है कि आज की राजनीति में 'नवबौद्धवाद' का जो राजनीतिकरण किया जा रहा है, उसका मूल बौद्ध दर्शन से कोई लेना-देना नहीं है। यह केवल और केवल कुछ लोगों की राजनीतिक दुकान चलाने का जरिया है। ऐसा इसलिए क्योंकि जब भी कोई परिवारवादी या जातिवादी राजनीतिक दल का नेता भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों में घिरता है, जब उसके घोटाले और काले कारनामे उजागर होते हैं, तो वह तुरंत अपनी जाति या अपनी पहचान को ढाल बनाकर जनता की सहानुभूति बटोरने की कोशिश करता है। इसे इस एक उदाहरण से और अधिक स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। जिस प्रकार एक समय में प्रसिद्ध क्रिकेटर मोहम्मद अजहरुद्दीन जब मैच फिक्सिंग के संगीन आरोपों में फंसे थे, तो उन्होंने तुरंत यह बयान दे दिया था कि "चूंकि मैं एक मुस्लिम हूं, इसलिए मुझे इस मामले में फंसाया जा रहा है," ठीक उसी तर्ज पर आज देश का कोई भी परिवारवादी या जातिवादी नेता जब भ्रष्टाचार में जेल जाता है या जांच के दायरे में आता है, तो वह तुरंत यह ढोल पीटने लगता है कि "चूंकि हम दलित, पिछड़े या आदिवासी हैं, इसलिए हमारे आरक्षण को खत्म करने की साजिश रची जा रही है।" यही उनकी राजनीति का एकमात्र और घिसा-पिटा फॉर्मूला बन चुका है। होना इसमें से कुछ नहीं है, लेकिन जनता की भावनाओं का एक बड़ा गुबार खड़ा करके अपने परिवार और अपनी तिजोरी को बचाना इनका मुख्य उद्देश्य होता है।
अगर हम कांग्रेस और कम्युनिस्टों के इतिहास को देखें, तो 1990 तक उनकी सीधी और निर्लज्ज नीति यही रही थी कि देश के गरीबों को और अधिक गरीब बनाए रखो, उन्हें मुफ्त की खैरात के नाम पर आश्रित रखो ताकि वे कभी अपने पैरों पर खड़े न हो सकें। गांधी परिवार के बाहर का एक व्यक्ति, नरसिम्हा राव, जब देश के प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने पहली बार इस फिक्स व्यवस्था को तोड़ने का दुस्साहस किया। उन्होंने "गरीबी हटाओ" के झूठे नारों के बजाय, उदारीकरण का दरवाजा खोलकर "गरीबी घटाने" और देश को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए। जब कांग्रेस की वह पुरानी गरीबों को पाले रखने की योजना बंद हो गई, तो कांग्रेस पार्टी के पैरों तले जमीन खिसक गई। और जब 2014 के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नरसिम्हा राव द्वारा छोड़े गए उस अधूरे काम को अपने मजबूत कंधों पर उठाकर कांग्रेस की उस भ्रष्ट और यथास्थितिवादी राजनीति को जड़ से उखाड़ना शुरू किया, तो इन सभी दलों के पेट में चूहे दौड़ने लगे। आज यही कारण है कि ये सारे नकारात्मक तत्व मिलकर समाज में नई और खतरनाक फॉल्ट लाइन्स पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। वे कभी नवबौद्धवाद के नाम पर, कभी एससी-ओबीसी के नाम पर और कभी जातियों के बीच कृत्रिम दीवारें खड़ी करके समाज को बांटना चाहते हैं।
इस पूरी चर्चा में सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि आज के दौर में जिस 'सामाजिक न्याय' का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, वह असल में न्याय के मूल सिद्धांतों और हमारी सांस्कृतिक प्रकृति के ठीक विरुद्ध एक खुला फ्रॉड है। सामाजिक न्याय का यह सिद्धांत न कभी इस धरातल पर संभव हो सकता है और न ही यह न्यायसंगत है। सनातन न्याय सिद्धांत कभी भी बदला लेने या थोपे गए अपराध बोध की बात नहीं करता, वह हमेशा 'प्रकृति न्याय' (Natural Justice) की बात करता है। प्रकृति न्याय का यह शाश्वत नियम है कि यदि इतिहास के किसी कालखंड में किसी समूह या व्यक्ति ने कोई गलती या अन्याय किया था, तो उसके लिए आज की वर्तमान पीढ़ी को किसी भी स्थिति में दोषी नहीं ठहराया जा सकता। जिस प्रकार यह एक शाश्वत सत्य है कि यदि कोई माता-पिता कोई अपराध करते हैं, तो उसके लिए उनका पुत्र दोषी नहीं माना जाता, ठीक उसी प्रकार इतिहास के पन्नों में हुई किसी घटना या कालखंड के आधार पर आज की युवा पीढ़ी को अपराधी, शोषक या वैमनस्य का पात्र बताना पूरी तरह अन्यायपूर्ण है। जो लोग ऐतिहासिक अन्यायों का भय दिखाकर आज की पीढ़ी से 'बदला' लेने की बात करते हैं, वे आंबेडकरवादी और ओबीसी अतिवादी समूह असल में समाज में स्थायी अलगाव और जहर पैदा करके केवल अपनी राजनीतिक और वैचारिक दुकानें चलाना चाहते हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसे दशकों तक गरीबों को गरीब बनाए रखकर राजनीतिक रोटियां सेकी जाती रहीं।
इन तमाम गहरी और गंभीर सामाजिक समस्याओं का एकमात्र और अकाट्य समाधान केवल एक ही है वह है सनातन धर्म की 'समावेशी और समदर्शी दृष्टि'। आज हमें किसी नए विभाजनकारी सिद्धांत की आवश्यकता नहीं है, बल्कि अपनी उस प्राचीन और महान दार्शनिक थाती को पुनर्जीवित करने की जरूरत है जो सबको साथ लेकर चलती है। आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व जब इस महान देश में अस्सी से अधिक विभिन्न मत, संप्रदाय और विचार हुआ करते थे, तब आदि शंकराचार्य ने अपनी अद्वैत वेदांत की विराट और समावेशी दृष्टि के आधार पर उन सबको सनातन हिंदू धर्म के एक ही सूत्र में पिरोकर विलीन कर लिया था। आज समय की सबसे बड़ी मांग यही है कि हमें उसी प्राचीन सनातन दृष्टि को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पूरी दृढ़ता के साथ लागू करना होगा। समाज के किसी भी वर्ग को, चाहे वह एससी हो, एसटी हो या ओबीसी हो, यह कभी महसूस नहीं होना चाहिए कि वह इस संस्कृति से कटा हुआ है या उसके साथ अन्याय हो रहा है। हमें संवाद के दरवाजे खोलने होंगे, सभी जातियों और समूहों को अपने भीतर पूरी आत्मीयता के साथ समाहित करना होगा और समय के साथ आने वाले वैचारिक मलयुद्धों का सामना अपनी सांस्कृतिक और वैचारिक उदारता से करना होगा। जब हम समाज के हर व्यक्ति को उसका वास्तविक सम्मान, अपनापन और समदर्शी आत्मीयता देंगे, तब ये सारी विभाजनकारी ताकतें, नवबौद्धवाद के नाम पर जहर घोलने वाले लोग और एट्रोसिटी लिटरेचर के सहारे दुकानें चलाने वाले षड्यंत्रकारी अपने आप बेनकाब होकर हाशिए पर चले जाएंगे।
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