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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️दीपक कुमार द्विवेद्वी
उत्तर प्रदेश की राजनीति और सार्वजनिक जीवन में पिछले एक दशक से जिस प्रकार एक विशेष राजनीतिक दल और उसके नेतृत्व को लेकर एक कृत्रिम और महिमामंडित नैरेटिव गढ़ा गया है, उसने लोकतंत्र के बुनियादी तर्कों और ऐतिहासिक सत्यों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और उसके समर्थकों द्वारा यह दावा बार-बार और जोर-शोर से किया जाता रहा है कि 2012 से 2017 के बीच सत्ता में रहे अखिलेश यादव देश के सबसे पहले ऐसे मुख्यमंत्री थे जिन्होंने महिलाओं की सुरक्षा के लिए वर्ष 2012 में '1090' महिला पावर लाइन जैसी अनूठी और देश की पहली हेल्पलाइन शुरू की थी। इस राजनीतिक प्रचार का मुख्य उद्देश्य यह दिखाना होता है कि अखिलेश यादव एक अत्यधिक 'विजनरी' और आधुनिक सोच वाले नेता हैं, जो विदेशों से पढ़कर आए थे और महिलाओं की सुरक्षा के प्रति अत्यंत संवेदनशील थे। इस झूठे और गढ़े गए नैरेटिव का दूसरा और सबसे बड़ा राजनीतिक उपयोग यह है कि जब कोई आम नागरिक, पत्रकार या विश्लेषक उनके पाँच साल के कार्यकाल के दौरान कानून-व्यवस्था की बदहाली और महिलाओं के विरुद्ध रिकॉर्ड तोड़ अपराधों पर सवाल उठाता है, तो उनके समर्थक तुरंत '1090' का ढाल बनकर सामने आ जाते हैं और हर सवाल को इस एक प्रशासनिक उपलब्धि के पीछे दफना देने का प्रयास करते हैं। यह वैसी ही बौद्धिक और वैचारिक चाटुकारिता है जैसी कांग्रेस समर्थकों और गांधी परिवार के दरबारी इकोसिस्टम द्वारा दशकों तक चलाई जाती रही है, जिसमें यह झूठ फैलाया गया कि देश में कंप्यूटर लाने का श्रेय अकेले राजीव गांधी को जाता है, ताकि कोई यह सवाल न पूछ सके कि भारत में कंप्यूटर उस तकनीक से कई दशक पहले आ सकता था यदि नेहरूवादी समाजवाद, लाइसेंस-कोटा राज और सोवियत संघ से प्रेरित सख्त राज्य नियंत्रण ने देश की अर्थव्यवस्था को दशकों पीछे न धकेल दिया होता।
जब हम इस कथित महिला सुरक्षा वाले दावे की ऐतिहासिक और अभिलेखीय सत्यता की गहराई से जाँच करते हैं, तो दूध का दूध और पानी का पानी अलग हो जाता है। सरकारी अभिलेखों और तथ्यात्मक स्रोतों के अनुसार, उत्तर प्रदेश से बहुत पहले देश के अन्य राज्यों में महिलाओं की सुरक्षा के लिए समर्पित हेल्पलाइन शुरू हो चुकी थीं। ऐतिहासिक साक्ष्यों के पन्नों को पलटें तो 10 जून 2008 को मंगलवार के दिन महाराष्ट्र के नागपुर में पुलिस द्वारा महिलाओं की शिकायतों के लिए '1091' नंबर की चौबीस घंटे की हेल्पलाइन शुरू की जा चुकी थी, जिसकी पुष्टि उस दिन के प्रतिष्ठित समाचार पत्र 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' की रिपोर्ट करती है। इसके पश्चात, 9 अगस्त 2012 को महाराष्ट्र सरकार द्वारा इसी '1091' हेल्पलाइन को केवल मुंबई और ठाणे तक सीमित न रखकर पूरे राज्य में यानी राज्यव्यापी स्तर पर उपलब्ध करा दिया गया था। इसके बाद, हरियाणा पुलिस ने भी 26 अक्टूबर 2012 को महिलाओं की सहायता के लिए '1091' हेल्पलाइन का शुभारंभ किया, जिसकी औपचारिक घोषणा और चौबीसों घंटे संचालन की सूचनाएं 29 अक्टूबर 2012 को समाचार पत्रों में प्रमुखता से प्रकाशित हुईं। इन सभी अकाट्य तिथियों और पुष्ट दस्तावेजों के बीच, उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा लखनऊ में '1090' महिला पावर लाइन का उद्घाटन 15 नवंबर 2012 को किया गया था। उत्तर प्रदेश सरकार के महिला एवं बाल सुरक्षा संगठन के आधिकारिक अभिलेख भी इसी प्रारंभ तिथि की पुष्टि करते हैं। इन स्पष्ट आंकड़ों से यह पूरी तरह सिद्ध हो जाता है कि उत्तर प्रदेश में 2012 में शुरू की गई हेल्पलाइन देश की पहली हेल्पलाइन नहीं थी और न ही यह कोई अभूतपूर्व या मौलिक नवाचार था, बल्कि यह पहले से अन्य राज्यों में चल रही व्यवस्था का ही एक प्रशासनिक अनुकरण मात्र था। इस ऐतिहासिक झूठ का पर्दाफाश होना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि इसके सहारे एक ऐसे शासनकाल के काले अध्यायों को छिपाने का कुत्सित प्रयास किया जाता है, जिसके दौरान उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था की स्थिति रसातल में चली गई थी।
यदि हम अखिलेश यादव के पूरे कार्यकाल (15 मार्च 2012 से 19 मार्च 2017) के दौरान महिलाओं के विरुद्ध हुए अपराधों के सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें, तो स्थिति बेहद भयावह और चिंताजनक दिखाई देती है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) और राज्य के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2012 से 2016 के बीच उत्तर प्रदेश में महिलाओं के विरुद्ध दर्ज मामलों का कुल आंकड़ा लगभग 1.80 लाख तक पहुँच जाता है। वर्षवार संख्याओं का विश्लेषण करें तो वर्ष 2012 में महिलाओं के विरुद्ध अपराध के 23,569 मामले दर्ज किए गए, जो 2013 में बढ़कर 32,546 हो गए, 2014 में यह संख्या छलांग लगाकर 38,918 पर पहुँच गई, 2015 में 35,908 मामले दर्ज हुए और वर्ष 2016 के आते-आते यह आँकड़ा भयावह रूप से बढ़कर 49,262 मामलों तक जा पहुँचा। पाँच वर्षों के इन आंकड़ों के सामने यह सवाल स्वतः खड़ा हो जाता है कि जिस शासनकाल में महिलाओं के खिलाफ दर्ज होने वाले अपराधों का ग्राफ दोगुने से भी अधिक बढ़ गया हो, उस सरकार को महिलाओं का संरक्षक कैसे माना जा सकता है? इस शासनकाल में घटी वे जघन्य और हृदयविदारक घटनाएँ आज भी देश के सामूहिक अंतःकरण में एक नासूर की तरह दर्ज हैं, जिन्होंने उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था को पूरी तरह से तार-तार कर दिया था। मई 2014 का बदायूँ प्रकरण इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है, जहाँ दो नाबालिग चचेरी बहनों के शव एक पेड़ से लटके मिले थे और उनके साथ सामूहिक बलात्कार के बाद हत्या के गंभीर आरोप लगे थे। इस घटना ने पूरे देश में अभूतपूर्व आक्रोश पैदा किया था और जून 2014 में इसकी जाँच सीबीआई को सौंपी गई थी। हालाँकि सीबीआई ने बाद में फोरेंसिक साक्ष्यों के अभाव में समापन रिपोर्ट दी, जिसे अक्टूबर 2015 में विशेष पोक्सो अदालत ने अस्वीकार कर दिया था, लेकिन यह घटना उस दौर की लचर प्रशासनिक व्यवस्था और असुरक्षित माहौल की दास्तान कहने के लिए पर्याप्त थी। इसी अराजक दौर में मेरठ के मदरसे से जुड़ा मामला, महिलाओं के अपहरण और यौन उत्पीड़न की अनगिनत घटनाएँ और विशेष रूप से जुलाई 2016 का बुलंदशहर राजमार्ग सामूहिक दुष्कर्म प्रकरण सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में आए, जहाँ एक परिवार को बंधक बनाकर हाईवे पर महिलाओं के साथ अमानवीय कृत्य किया गया, जिससे संपूर्ण राष्ट्र में हड़कंप मच गया था।
इन तमाम आपराधिक घटनाओं और बेलगाम होती अराजकता के बीच राजनीतिक नेतृत्व का संवेदनहीन और गैर-जिम्मेदाराना रवैया इस बात को पुख्ता करता है कि उस समय अपराधियों के हौसले बुलंद क्यों थे। अगस्त 2013 में मुजफ्फरनगर जिले के कवाल गाँव में एक युवती से छेड़छाड़ को लेकर हुए मामूली विवाद ने जिस विकराल रूप को जन्म दिया, उसने उत्तर प्रदेश के इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक मुजफ्फरनगर दंगे को जन्म दे दिया। छेड़छाड़ का विरोध करने वाले दो हिंदू युवकों (गौरव और सचिन) की हत्या और उसके प्रतिशोध में शाहनवाज नामक मुस्लिम युवक की हत्या ने पहले से सुलग रहे सामुदायिक तनाव को भड़का दिया। उस दौर के शक्तिशाली राजनीतिक संरक्षक और 'सुपर सीएम' कहे जाने वाले आज़म खान और तत्कालीन सत्ता के संरक्षण में आरोपियों को बचाने के कुत्सित प्रयासों ने आग में घी का काम किया। 7 सितंबर 2013 को नगला मंदौड़ की महापंचायत और उसके बाद फैली भीषण हिंसा में 60 से अधिक निर्दोष लोगों की जान चली गई और हजारों लोगों को अपना घर-द्वार छोड़कर पलायन करना पड़ा। न्यायमूर्ति विष्णु सहाय जाँच आयोग ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से खुफिया तंत्र की विफलता, प्रशासनिक लापरवाही, भड़काऊ भाषणों और महापंचायत को नियंत्रित करने में पूर्ण असमर्थता को इन दंगों का कारण बताया था। इस पूरी अराजकता के शीर्ष पर समाजवादी पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष और अखिलेश यादव के पिता मुलायम सिंह यादव का वह कुख्यात बयान था जो उन्होंने मुंबई के शक्ति मिल्स सामूहिक दुष्कर्म मामले में दोषियों को मृत्युदंड दिए जाने के संदर्भ में दिया था, जिसमें उन्होंने बेहद असंवेदनशील टिप्पणी करते हुए कहा था, "लड़के हैं, लड़कों से गलती हो जाती है।" यह बयान इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण था कि उस समय की राजनीतिक व्यवस्था महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा के प्रति कितनी उदासीन और लापरवाह थी।
इसके विपरीत, जब हम 2017 से 2026 तक के उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक और राजनीतिक परिदृश्य का तुलनात्मक अध्ययन करते हैं, तो एक आमूल-चूल और सकारात्मक परिवर्तन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। योगी आदित्यनाथ सरकार ने सत्ता संभालते ही अपराध और अपराधियों के विरुद्ध 'जीरो टॉलरेंस' की नीति को कड़ाई से लागू किया। महिला सुरक्षा को केवल कागजी विज्ञापनों तक सीमित न रखकर इसे धरातल पर उतारने के लिए एंटी रोमियो स्क्वॉड, मिशन शक्ति के विभिन्न चरण, महिला पुलिस बीट व्यवस्था, हर थाने में महिला हेल्प डेस्क और आपातकालीन सेवा 112 जैसी पुख्ता और तकनीकी रूप से उन्नत प्रणालियों का एक मजबूत ताना-बाना बुना गया। उत्तर प्रदेश पुलिस का महिला एवं बाल सुरक्षा संगठन आज '1090' महिला पावर लाइन और 'मिशन शक्ति' के समन्वय के साथ यौन अपराधों की त्वरित मॉनिटरिंग और पीड़ितों को तुरंत कानूनी सहायता उपलब्ध कराने का एक सशक्त माध्यम बन चुका है। सरकार की इस कठोर इच्छाशक्ति का प्रत्यक्ष परिणाम न्यायिक आंकड़ों और अपराध नियंत्रण के ग्राफ में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। उदाहरण के लिए, वर्ष 2024 के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, बलात्कार के दर्ज मामलों में 8.7 प्रतिशत और दहेज मृत्यु के मामलों में 50.7 प्रतिशत की उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई, और उसी वर्ष महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के मामलों में दोषसिद्धि दर (Conviction Rate) बढ़कर 76.6 प्रतिशत तक पहुँच गई, जो यह साबित करती है कि अब अपराधियों को केवल पकड़ा नहीं जाता, बल्कि अदालतों में उन्हें तेजी से सजा भी दिलाई जा रही है। यद्यपि कुल दर्ज अपराधों के आंकड़ों में पूरी तरह शून्य की स्थिति का दावा नहीं किया जा सकता क्योंकि पुलिस द्वारा स्वतंत्र रूप से एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया और जनता में जागरूकता बढ़ने से पंजीकरण का दायरा बढ़ा है, फिर भी गंभीर अपराधों की श्रेणियों में आई गिरावट और न्याय मिलने की दर में हुआ क्रांतिकारी सुधार इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि नीयत और नीति साफ हो तो बदलाव संभव है।
अक्टूबर 2026 तक की इस पूरी यात्रा का मूल्यांकन करते समय हमें यह भली-भांति समझ लेना चाहिए कि किसी भी लोकतांत्रिक सरकार में महिला सुरक्षा का पैमाना केवल खोखले दावों, राजनीतिक विज्ञापनों या एकल हेल्पलाइन के उद्घाटन से तय नहीं होता। अखिलेश यादव के पाँच साल के कार्यकाल में जहाँ एक ओर अपराधों का ग्राफ रॉकेट की तरह ऊपर चढ़ा, बदायूँ और बुलंदशहर जैसी अमानवीय घटनाएँ घटीं, मुजफ्फरनगर दंगे जैसे प्रशासनिक कलंक लगे और 'लड़के हैं, गलती हो जाती है' जैसी मानसिकता को खुला संरक्षण मिला, वहीं दूसरी ओर उस विफलता को ढंकने के लिए '1090' को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताने का एक झूठा और प्रायोजित नैरेटिव गढ़ा गया। इसके विपरीत, योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में कानून के राज को सर्वोपरि रखते हुए जिस प्रकार अपराधियों के मन में खौफ पैदा किया गया, पुलिस तंत्र को जवाबदेह बनाया गया, त्वरित न्याय की व्यवस्था को मजबूत किया गया और साल-दर-साल दोषसिद्धि दरों में ऐतिहासिक सुधार लाया गया, उसने उत्तर प्रदेश की छवि को एक बीमारू और अराजक राज्य से निकालकर देश के सबसे सुरक्षित और कानून-सम्मत राज्यों में स्थापित कर दिया है। इतिहास और आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि झूठे और गढ़े हुए नैरेटिव कितनी भी ताकत से फैलाए जाएं, वे धरातल की कड़वी सच्चाइयों और प्रशासनिक कसौटी पर खरा उतरने वाले ठोस परिणामों के सामने टिक नहीं सकते। न्याय, सुरक्षा और सुशासन का वास्तविक मानक केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि पीड़ित को समय पर मिला न्याय और समाज में स्थापित भयमुक्त वातावरण है, जिस पर आज उत्तर प्रदेश की जनता पूरी तरह मुहर लगाती है।
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