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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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पूरी दुनिया में एक पैटर्न है कि जहाँ जहाँ डेमोक्रेसी है वहाँ डेमोक्रेसी से मिली हुई आजादी का उपयोग उसी डेमोक्रेसी को पलटने और उसपर अपना तंत्र स्थापित करने में करो..
भारत में भी सरकार ने यह आजादी सबसे अधिक उन्हीं लोगों को दे रखी है जो स्वयं डेमोक्रेटिक व्यवस्था में असफल हैं और जिनकी इस प्रॉसेस पर बिल्कुल आस्था नहीं है.
विरोध प्रदर्शन और अपनी आवाज रखना एक बात है, लेकिन भीड़ जुटा कर हिंसक प्रक्रिया से पूरी डेमोक्रेसी को बंधक बनाना और डेमोक्रेटिक मैंडेट को हाईजैक कर लेना एक अपराधिक हरकत है. सरकार का प्रबलतम समर्थक होने के बावजूद मुझे यह देखकर दुख होता है कि बार बार सरकार इसी हिंसक आपराधिक हरकत के आगे घुटने टेक देती दिखाई देती है. कुछ देशविरोधी लोगों और उनके विदेशी हैंडलर्स को समझ में आ गया है कि सरकार को इसी प्रक्रिया से झुकाया जा सकता है, या कम से कम उसकी साख गिराई जा सकती है और शायद बिल्कुल पलटा भी जा सकता है.
दूसरी ओर यह तर्क भी है कि हमारा देश इमोशनल मूर्खो का देश है और अगर अधिक कड़ाई की गई तो सचमुच जनमत सहानुभूति में उन्हीं देशविरोधी लोगों के साथ खड़ा हो जाएगा. इस तर्क में कितनी सच्चाई है इसे अभी तक परखा नहीं गया है, लेकिन अगर यह सच है तो यह अधिक बड़ी समस्या है और इससे शिक्षा और संस्कृति के स्तर पर निबटने के वृहद प्रयास किए जाने चाहिए. एक संस्कृति को मूर्खता में विचरण करने के लिए छोड़ देना उनपर शासन करने का आसान शार्टकट हो सकता है लेकिन यह बुद्धिमत्तापूर्ण नेतृत्व नहीं कहा जा सकता. यह भी सही है कि सामाजिक मार्गदर्शन देना राजनीतिक नेतृत्व की कंपीटेंसी नहीं है, लेकिन उस स्थिति में भी आपको समाज की उन क्षमताओं का प्रयोग करने की दिशा में अधिक अर्जेंसी दिखाने की जरूरत है जो इस दिशा में प्रभावी हो सकते हैं.
सरकार की कोर कंपीटेंसी है शासन व्यवस्था का मेंटेनेंस, जनता को सुरक्षा देना और विश्वास दिलाना कि कोई शक्तिशाली किसी दुर्बल पर अत्याचार नहीं करेगा, उसकी स्वतंत्रता का हनन नहीं करेगा. एक सभ्य स्वतंत्र समाज में किसी को भी सरकार से अधिक शक्ति रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती, हिंसा पर नियंत्रण और प्रतिहिंसा पर एकाधिकार ही सरकार नाम की संस्था का एकमात्र जस्टिफिकेशन है. सरकारें लोगों को मुफ्त का चावल और सस्ता चीनी उपलब्ध कराने का तंत्र नहीं है, सामाजिक समीकरणों से हिंसा को एलिमिनेट करने और हिंसक प्रवृतियों को दंडित करने का तंत्र है. सरकार द्वारा प्रतिहिंसा का प्रयोग आवश्यक है और उसकी तीव्रता हिंसक तत्वों की हिंसा से इतनी अधिक होनी ही चाहिए कि यह आगे किसी को भी हिंसा करने का साहस न दे.
मैं सरकार से आग्रह करता हूँ कि जिस अर्जेंसी और डिटरमिनेशन से आपने जंगलों में नक्सलियों को खत्म किया है उसी अर्जेंसी से, और उन्हीं साधनों से शहरों में भी इनसे निबटें. आपमें शक्ति है, क्षमता है यह हम देख चुके हैं... बस हम यह भरोसा दिलाना चाहते हैं कि जनता अब आपसे यही अपेक्षा रखती है.
और जिनका दिल अधिक नाजुक नरम है और जो कल को रोने वाले हैं कि आखिर ये भी तो हमारे ही बच्चे हैं, उनको सलाह है कि अपने बच्चों को संभाल कर रखें ...इंसान बनाएं और उन्हें तिलचट्टे बनने से बचाएँ. पूरी दुनिया में एक तंत्र का इंटरेस्ट आपके बच्चों को तिलचट्टे बनाने में है.
यात्री अपने सामान की रक्षा स्वयं करें...
डॉ राजीव मिश्रा जी
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