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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
भ्रष्टाचार, केंद्रीकरण और सनातन आर्थिक दृष्टि: भारत को चाहिए सत्ता का विकेंद्रीकरण और समाज का सशक्तीकरण
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
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भारत में भ्रष्टाचार को केवल कुछ बेईमान अधिकारियों, कमजोर कानूनों या नैतिकता के अभाव की समस्या मानकर नहीं समझा जा सकता। यह व्याख्या बहुत सतही होगी। भारत जैसी सभ्यता, जिसने आधुनिक नौकरशाही राज्य के अस्तित्व में आने से बहुत पहले अर्थव्यवस्था, राजसत्ता, कर्तव्य, संपत्ति और सामाजिक उत्तरदायित्व के विषय में एक विस्तृत चिंतन विकसित किया था, वहाँ भ्रष्टाचार की समस्या को केवल व्यक्तिगत चरित्र के आधार पर समझना पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे एक गहरी संरचनात्मक समस्या है—आर्थिक, प्रशासनिक और राजनीतिक शक्ति का अत्यधिक केंद्रीकरण। जब धन, संसाधन, अनुमति, ठेके, भूमि, कर, निर्माण और सार्वजनिक व्यय से संबंधित निर्णय कुछ दूरस्थ संस्थाओं में केंद्रित हो जाते हैं, तब नागरिक और उसके आर्थिक जीवन को नियंत्रित करने वाली सत्ता के बीच दूरी बढ़ जाती है। यही दूरी प्रशासनिक विवेकाधिकार को बढ़ाती है और जहाँ सार्वजनिक संसाधनों पर विवेकाधिकार अत्यधिक बढ़ जाता है, वहाँ भ्रष्टाचार और आर्थिक स्वार्थ के लिए अवसर भी बढ़ते जाते हैं।
भारत में भ्रष्टाचार की गंभीरता का एक कारण यह भी है कि वह केवल कभी-कभार होने वाला अपराध नहीं रह गया है, बल्कि शासन-व्यवस्था के अनेक स्तरों में प्रवेश कर चुका है। एक सामान्य नागरिक को लाइसेंस लेने, संपत्ति का पंजीकरण कराने, नगर निकाय से अनुमति लेने, निर्माण कराने, सरकारी सेवा प्राप्त करने अथवा किसी प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरने के दौरान अनेक स्तरों से होकर गुजरना पड़ता है। एक उद्यमी को व्यवसाय स्थापित करने और चलाने के लिए विभिन्न प्रकार की स्वीकृतियों और नियमों का सामना करना पड़ता है। एक ठेकेदार को काम मिलने से लेकर भुगतान प्राप्त करने तक कई प्रशासनिक स्तरों से गुजरना पड़ सकता है। समस्या केवल यह नहीं है कि कुछ लोग भ्रष्ट हैं; समस्या यह है कि व्यवस्था स्वयं कई स्थानों पर ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करती है, जहाँ दूसरे व्यक्ति की आर्थिक गतिविधि पर निर्णय लेने वाला अधिकारी अत्यधिक विवेकाधिकार रखता है।
यही समस्या बड़े सार्वजनिक निर्माण कार्यों में और अधिक स्पष्ट दिखाई देती है। उदाहरण के लिए, किसी फ्लाईओवर का निर्माण वास्तव में आवश्यक हो सकता है और अनेक स्थानों पर वह यातायात की समस्या का उचित समाधान भी हो सकता है। प्रश्न फ्लाईओवर के विरुद्ध नहीं है। वास्तविक प्रश्न यह है कि यह तय कौन करता है कि फ्लाईओवर कहाँ बनेगा, उसकी आवश्यकता का निर्धारण कैसे होगा, उसकी लागत कितनी होगी, ठेका किसे मिलेगा, निविदा प्रक्रिया कितनी पारदर्शी होगी, निर्माण के दौरान लागत में परिवर्तन कैसे स्वीकृत होगा और अंततः उस परियोजना का स्वतंत्र मूल्यांकन कौन करेगा।
जब इन सभी निर्णयों पर कुछ सीमित लोगों का अत्यधिक नियंत्रण हो जाता है, तब सार्वजनिक परियोजना का उद्देश्य पीछे छूट सकता है और ठेका स्वयं आर्थिक हित का केंद्र बन सकता है। तब प्रश्न यह नहीं रह जाता कि “समाज को वास्तव में किस चीज की आवश्यकता है?”, बल्कि यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि “कौन-सी परियोजना स्वीकृत हो सकती है, किसे ठेका मिल सकता है और उससे कितना आर्थिक लाभ उत्पन्न किया जा सकता है?” यही वह बिंदु है जहाँ सार्वजनिक धन निजी आर्थिक लाभ का माध्यम बनने लगता है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक फ्लाईओवर अनावश्यक है या प्रत्येक सरकारी निर्माण कार्य में भ्रष्टाचार होता है। ऐसा निष्कर्ष तथ्यहीन और अनुचित होगा। वास्तविक समस्या उस व्यवस्था की है जिसमें सार्वजनिक धन की बड़ी मात्रा प्रशासनिक विवेकाधिकार, ठेकों और स्वीकृतियों की लंबी श्रृंखला से होकर गुजरती है। ऐसी व्यवस्था में अनावश्यक परियोजनाओं, लागत बढ़ाने, ठेकेदारों की मिलीभगत, पक्षपात और कमीशन-आधारित तंत्र के लिए अवसर पैदा हो सकते हैं। परियोजना जितनी बड़ी होगी और निर्णय लेने वाला व्यक्ति जनता से जितना दूर होगा, प्रत्यक्ष सामाजिक उत्तरदायित्व उतना ही कठिन होता जाएगा।
यहीं भारतीय सभ्यता की आर्थिक दृष्टि हमारे लिए महत्वपूर्ण हो जाती है। हिंदू परंपरा में अर्थ को कभी अपने आप में अनैतिक नहीं माना गया। पुरुषार्थ की भारतीय अवधारणा में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों को मानव जीवन के महत्वपूर्ण आयाम माना गया। धन आवश्यक है। परिवार, समाज, दान, शिक्षा, धार्मिक संस्थाएँ, राजनीतिक व्यवस्था और सामाजिक स्थिरता—इन सभी के लिए अर्थ की आवश्यकता है। प्रश्न यह नहीं था कि धन होना चाहिए या नहीं; प्रश्न यह था कि धन किस प्रकार अर्जित किया जाए और उसका उपयोग किस मर्यादा के भीतर किया जाए। यहाँ अर्थ को धर्म से अलग नहीं किया गया।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र इस दृष्टि से विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। वह मानव स्वभाव को लेकर किसी आदर्शवादी भ्रम में नहीं रहता। वह यह मानकर नहीं चलता कि राजकीय पद पर बैठा प्रत्येक व्यक्ति स्वतः ईमानदार रहेगा। वह राजकीय धन के दुरुपयोग, गबन, हेरफेर और अधिकारियों द्वारा सत्ता के दुरुपयोग की संभावनाओं को स्वीकार करता है। इसलिए वह लेखांकन, निरीक्षण, निगरानी, दंड और प्रशासनिक उत्तरदायित्व पर विशेष बल देता है। इसका अर्थ यह है कि भारतीय परंपरा भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए केवल नैतिक उपदेश पर निर्भर नहीं थी। वह संस्थागत नियंत्रण की आवश्यकता को भी समझती थी।
भारतीय सामाजिक व्यवस्था की एक दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि समाज केवल व्यक्ति और केंद्रीय राज्य के बीच संबंध का नाम नहीं था। परिवार, ग्राम, समुदाय, श्रेणियाँ, व्यापारिक संगठन, धार्मिक संस्थाएँ, स्थानीय निकाय और अनेक प्रकार की सामाजिक संस्थाएँ आर्थिक एवं सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं। गाँव केवल प्रशासनिक नक्शे पर बना एक क्षेत्र नहीं था; वह अपने भीतर सामाजिक और आर्थिक जीवन की एक इकाई था। विभिन्न व्यवसायों और आर्थिक गतिविधियों के संगठन भी अपनी भूमिका निभाते थे। आधुनिक काल में राज्य ने धीरे-धीरे ऐसे अनेक कार्य अपने हाथ में ले लिए, जो पहले समाज की विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से संचालित होते थे।
यह अंतर समझना अत्यंत आवश्यक है। आधुनिक भारतीय राज्य ने समय के साथ इतनी बड़ी संख्या में आर्थिक और सामाजिक जिम्मेदारियाँ अपने ऊपर ले ली हैं कि उन्हें एक केंद्रीकृत प्रशासनिक ढाँचे के माध्यम से प्रभावी ढंग से संचालित करना अत्यंत कठिन है। केंद्र सरकार प्रत्येक गाँव की स्थानीय आवश्यकता को नहीं समझ सकती। राज्य सरकार प्रत्येक नगर की प्रत्येक समस्या को प्रत्यक्ष रूप से नहीं जान सकती। इसके बावजूद अनेक निर्णय आज भी ऊपर से नीचे की ओर आने वाली योजनाओं, नियमों, स्वीकृतियों और वित्तीय हस्तांतरणों के माध्यम से संचालित होते हैं। परिणाम यह है कि सरकार का आकार बढ़ सकता है, लेकिन शासन आवश्यक रूप से अधिक उत्तरदायी नहीं बनता।
इसलिए सनातन आर्थिक दृष्टि का अर्थ अतीत की किसी व्यवस्था को ज्यों का त्यों वापस लाना नहीं होना चाहिए। इसका अर्थ उन मूल सिद्धांतों को आधुनिक परिस्थितियों में पुनर्स्थापित करना होना चाहिए, जो भारतीय चिंतन की अपनी विशेषता रहे हैं—आर्थिक जीवन में धर्म, अर्थ की वैधता, उद्यम और संपत्ति-सृजन का सम्मान, सत्ता का विकेंद्रीकरण, समाज की उत्तरदायित्वपूर्ण भूमिका, शासक और अधिकारी की जवाबदेही तथा आर्थिक शक्ति का सामाजिक दायित्व।
ऐसी भारतीय आर्थिक दृष्टि न तो पश्चिमी पूँजीवाद की नकल होनी चाहिए और न ही पश्चिमी समाजवाद की। भारतीय दृष्टि का आधार कुछ अलग हो सकता है। राज्य की अपनी भूमिका हो, बाजार की अपनी भूमिका हो और इनके बीच समाज की अपनी स्वतंत्र संस्थागत शक्ति हो। परिवार, समुदाय, सहकारी संस्थाएँ, स्थानीय निकाय, धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाएँ, व्यवसायिक संगठन और स्वैच्छिक संस्थाएँ—इन सभी को केवल राज्य की शाखा मानने के बजाय समाज की स्वतंत्र शक्ति के रूप में विकसित करना होगा।
इसका भ्रष्टाचार से सीधा संबंध है। यदि प्रत्येक आर्थिक गतिविधि के लिए अंततः किसी सरकारी कार्यालय की अनुमति आवश्यक हो जाती है, तो आर्थिक शक्ति उस व्यक्ति के हाथ में केंद्रित हो जाती है जो अनुमति देने की स्थिति में है। व्यवसायी, निर्माणकर्ता, ठेकेदार या सामान्य नागरिक—सभी उस विवेकाधिकार के प्रति असुरक्षित हो जाते हैं। भ्रष्टाचार को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका हर विभाग के ऊपर एक नया विभाग खड़ा करना नहीं है। बेहतर उपाय है—अनावश्यक विवेकाधिकार समाप्त करना, नियमों को सरल बनाना, प्रक्रियाओं को डिजिटल करना, सूचनाओं को सार्वजनिक करना और जहाँ संभव हो, निर्णय लेने की शक्ति को नागरिकों के निकट ले जाना।
भारत के संविधान ने स्वयं विकेंद्रीकरण के इस सिद्धांत को स्वीकार किया है। 73वें और 74वें संविधान संशोधनों के माध्यम से पंचायतों और नगर निकायों को संवैधानिक मान्यता दी गई। पंचायती राज व्यवस्था को स्थानीय स्वशासन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना गया और संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची में पंचायतों से संबंधित 29 विषयों का उल्लेख किया गया। लेकिन संवैधानिक मान्यता और वास्तविक आर्थिक स्वायत्तता दो अलग-अलग बातें हैं। यदि कोई पंचायत जनता द्वारा निर्वाचित तो है, लेकिन उसके पास पर्याप्त वित्तीय संसाधन, प्रशासनिक अधिकार और आवश्यक कर्मचारी नहीं हैं, तो उसकी स्वायत्तता अधूरी ही रहेगी।
वास्तविक विकेंद्रीकरण के लिए तीन चीजें अनिवार्य हैं—कार्य, धन और कर्मचारी। जिस कार्य की जिम्मेदारी स्थानीय निकाय को दी जाए, उसे पूरा करने के लिए उसके पास पर्याप्त वित्तीय संसाधन और प्रशासनिक क्षमता भी होनी चाहिए। यदि किसी नगर निकाय को सड़क, जल निकासी, कचरा प्रबंधन और स्थानीय आधारभूत संरचना की जिम्मेदारी दी जाती है, तो उसे इन कार्यों के लिए स्थायी और पर्याप्त वित्तीय स्रोत भी मिलने चाहिए। हर छोटी परियोजना के लिए उसे राज्य सरकार या केंद्र सरकार की ओर देखना पड़े, तो स्थानीय स्वशासन केवल नाम का स्वशासन रह जाएगा।
कल्पना कीजिए कि किसी गाँव के पास एक पारदर्शी स्थानीय राजस्व व्यवस्था हो। नागरिकों को पता हो कि पंचायत ने कितना राजस्व एकत्र किया, सरकार से कितना धन मिला, किस काम पर कितना खर्च हुआ, किस ठेकेदार को काम मिला, अनुमानित लागत कितनी थी और वास्तविक लागत कितनी रही। तब गाँव का नागरिक सीधे पूछ सकता है कि सड़क क्यों नहीं बनी, नाली का निर्माण अधूरा क्यों है या जिस जल संरचना पर पैसा खर्च हुआ, वह वास्तव में काम क्यों नहीं कर रही है। यहाँ जवाबदेही तत्काल हो जाती है क्योंकि निर्णय लेने वाला व्यक्ति उसी सामाजिक और भौगोलिक समुदाय के बीच मौजूद है।
इसके विपरीत, यदि धन केंद्र से राज्य, राज्य से विभाग, विभाग से जिला और जिला से स्थानीय स्तर तक कई प्रशासनिक स्तरों से होकर आता है, तो प्रत्येक स्तर पर नियम, स्वीकृति, दस्तावेज और विवेकाधिकार जुड़ सकते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि केंद्र या राज्य से मिलने वाला प्रत्येक धन भ्रष्टाचार का माध्यम है। इसका अर्थ केवल इतना है कि वित्तीय निर्णय और नागरिक के बीच दूरी जितनी अधिक होगी, प्रत्यक्ष जवाबदेही उतनी ही कठिन होगी।
यही सिद्धांत शहरों पर भी लागू होता है। किसी नगर को यह तय करने का पर्याप्त अधिकार होना चाहिए कि उसके लिए कौन-सी सड़क सबसे महत्वपूर्ण है, किस क्षेत्र में जल निकासी की आवश्यकता है, किस मोहल्ले में सार्वजनिक परिवहन बेहतर करना है और कहाँ निवेश की आवश्यकता है। स्थानीय नागरिकों को अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों से सीधे प्रश्न पूछने का अधिकार होना चाहिए। जब शहर अपनी आय का एक सार्थक हिस्सा स्वयं जुटाता है, तो कर और जवाबदेही के बीच संबंध भी मजबूत होता है। नागरिक पूछ सकता है—हमसे कितना लिया गया और बदले में हमें क्या मिला?
यहाँ धर्म की भारतीय अवधारणा अर्थव्यवस्था को एक महत्वपूर्ण नैतिक आधार देती है। धर्म केवल पूजा-पद्धति या धार्मिक अनुष्ठान का नाम नहीं है। व्यापक भारतीय अर्थ में धर्म कर्तव्य, उत्तरदायित्व, व्यवस्था और अपने दायित्व के अनुरूप आचरण की अवधारणा है। सार्वजनिक अधिकारी का भी धर्म है कि वह जनता के प्रति ईमानदार रहे। व्यापारी का भी धर्म है कि वह अपने कर्मचारियों, ग्राहकों और समाज के प्रति उत्तरदायी रहे। नागरिक का भी समाज के प्रति दायित्व है। शासक का धर्म है कि वह व्यवस्था और न्याय की रक्षा करे। इसलिए आर्थिक स्वतंत्रता यदि उत्तरदायित्व से अलग हो जाए तो अधूरी है, और सरकारी सत्ता यदि जवाबदेही से मुक्त हो जाए तो वह भी खतरनाक है।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र हमें यह भी सिखाता है कि केवल नैतिक उपदेश पर्याप्त नहीं हैं। यदि हम अधिकारियों से यह कहें कि वे धर्म का पालन करें, तो यह अच्छी बात है; लेकिन संस्थाओं को इस प्रकार बनाना भी आवश्यक है कि सार्वजनिक धन की चोरी करना कठिन हो, उसका पता लगने की संभावना अधिक हो और अपराध सिद्ध होने पर दंड निश्चित हो। यही आधुनिक संस्थागत शासन का मूल सिद्धांत भी है।
तकनीक इस परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। सरकारी खरीद, भुगतान, परियोजना की प्रगति, भूमि अभिलेख और सार्वजनिक व्यय को अधिक से अधिक पारदर्शी डिजिटल प्रणालियों में लाया जा सकता है। नागरिकों को यह जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए कि किसे ठेका मिला, कितनी राशि स्वीकृत हुई, कितना भुगतान हुआ और परियोजना की वर्तमान स्थिति क्या है। लेकिन केवल कागजी प्रक्रिया को कंप्यूटर पर डाल देना डिजिटल सुधार नहीं है। वास्तविक सुधार तब होगा जब तकनीक मानवीय विवेकाधिकार को कम करे और पारदर्शिता बढ़ाए।
सामाजिक लेखा-परीक्षण भी इसी कारण महत्वपूर्ण है। किसी सार्वजनिक परियोजना के आसपास रहने वाले लोग अक्सर यह सबसे अच्छी तरह जानते हैं कि वह परियोजना वास्तव में बनी है या नहीं। गाँव की सड़क को गाँव के लोग रोज देखते हैं। पानी की टंकी का उपयोग करने वाले लोग जानते हैं कि वह काम कर रही है या नहीं। शहर के नागरिक जानते हैं कि उनके मोहल्ले की नाली वास्तव में बनी है या केवल कागज पर। स्थानीय समाज को निगरानी की शक्ति देना इसलिए केवल लोकतांत्रिक सिद्धांत नहीं, बल्कि व्यावहारिक भ्रष्टाचार-रोधी उपाय भी है।
लेकिन विकेंद्रीकरण का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि भ्रष्टाचार को केंद्र और राज्य से हटाकर पंचायत और नगर स्तर तक पहुँचा दिया जाए। यदि स्थानीय स्तर पर भी सत्ता बिना पारदर्शिता और जवाबदेही के केंद्रित हो गई, तो भ्रष्टाचार के छोटे-छोटे केंद्र पैदा हो जाएंगे। इसलिए स्थानीय स्वायत्तता के साथ सार्वजनिक लेखा, स्वतंत्र ऑडिट, ई-टेंडरिंग, खुले ठेके, नागरिक निगरानी और स्पष्ट उत्तरदायित्व अनिवार्य हैं। उद्देश्य एक बड़ी नौकरशाही को हजारों छोटी नौकरशाहियों में बदलना नहीं है। उद्देश्य ऐसी संस्थाएँ बनाना है जिनमें निर्णय लेने की शक्ति हो, लेकिन वह शक्ति समाज के प्रति जवाबदेह भी हो।
भारत में भ्रष्टाचार की समस्या का एक बड़ा आर्थिक पक्ष अनावश्यक नियमन से भी जुड़ा हुआ है। जब राज्य किसी आर्थिक गतिविधि में प्रवेश को सीमित करता है, लाइसेंस नियंत्रित करता है, संसाधनों तक पहुँच निर्धारित करता है या अनेक प्रकार की विवेकाधीन स्वीकृतियाँ आवश्यक बनाता है, तब अनुमति देने वाले अधिकारी के हाथ में आर्थिक मूल्य पैदा हो जाता है। यही आर्थिक रेंट का आधार बन सकता है। ऐसे मामलों में भ्रष्टाचार रोकने का सबसे प्रभावी उपाय हमेशा एक नई निगरानी एजेंसी बनाना नहीं होता; कई बार सबसे प्रभावी सुधार यह होता है कि अनावश्यक अनुमति और जटिल नियम ही समाप्त कर दिए जाएँ।
जिस सरकार को सामान्य व्यवसाय चलाने के लिए कम स्वीकृतियों की आवश्यकता होगी, वहाँ रिश्वत के अवसर भी कम होंगे। जहाँ प्राकृतिक संसाधनों या सरकारी ठेकों का आवंटन पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया से होगा, वहाँ पक्षपात की गुंजाइश घटेगी। जहाँ सरकारी खरीद का पूरा डेटा सार्वजनिक होगा, वहाँ मिलीभगत को छिपाना कठिन होगा। जहाँ स्थानीय निर्णय स्थानीय और जवाबदेह संस्थाओं को दिए जाएंगे, वहाँ नागरिक और सत्ता के बीच की दूरी कम होगी।
इसलिए भारत में भ्रष्टाचार पर होने वाली बहस को केवल छापे, निलंबन और गिरफ्तारी तक सीमित नहीं किया जा सकता। अपराध होने के बाद कार्रवाई आवश्यक है, लेकिन केवल कार्रवाई से ऐसी संस्थागत व्यवस्था नहीं बदलती जो लगातार भ्रष्टाचार के अवसर पैदा करती रहती है। भारत को राज्य, समाज और अर्थव्यवस्था के संबंधों में अधिक गहरा सुधार करना होगा।
दिशा स्पष्ट होनी चाहिए। केंद्र सरकार उन विषयों पर ध्यान केंद्रित करे जिनमें राष्ट्रीय स्तर के समन्वय की आवश्यकता है। राज्य सरकारें उन विषयों को संभालें जिनके लिए राज्य-स्तरीय समन्वय आवश्यक है। स्थानीय सरकारों को वास्तविक स्थानीय विषयों पर पर्याप्त अधिकार मिलें। जिन निर्णयों का सीधा संबंध गाँव, नगर या समुदाय के जीवन से है, उनमें स्थानीय समाज की निर्णायक भूमिका हो। उद्यमियों को समाज के लिए संपत्ति और रोजगार पैदा करने वाले वर्ग के रूप में देखा जाए, न कि ऐसे लोगों के रूप में जिन्हें लगातार अपनी निर्दोषता साबित करनी पड़े। धन-सृजन को प्रोत्साहित किया जाए, लेकिन वह धर्म, कानून और सामाजिक उत्तरदायित्व की मर्यादा में हो।
यहीं एक वास्तविक भारतीय आर्थिक मॉडल की आवश्यकता सामने आती है। यह मॉडल पश्चिमी पूँजीवाद की नकल मात्र नहीं होना चाहिए और न ही पश्चिमी समाजवाद का पुनरावर्तन। इसकी बुनियाद भारतीय चिंतन से निकलनी चाहिए—धर्म, अर्थ, लोकसंग्रह, कर्तव्य, सामाजिक उत्तरदायित्व, उद्यम, संपत्ति-सृजन और उत्तरदायी सत्ता।
इस व्यवस्था में राज्य आवश्यक कार्य करेगा, बाजार संपत्ति और समृद्धि का निर्माण करेगा, समाज अपनी संस्थागत शक्ति बनाए रखेगा, स्थानीय सरकारें वास्तविक स्वायत्तता प्राप्त करेंगी और व्यक्ति को आर्थिक गतिविधि की स्वतंत्रता मिलेगी। लेकिन स्वतंत्रता के साथ उत्तरदायित्व भी होगा।
भ्रष्टाचार वहाँ पनपता है जहाँ सत्ता अत्यधिक केंद्रित हो, विवेकाधिकार बहुत अधिक हो, सूचना छिपी हो और जवाबदेही नागरिक से दूर हो। इसके विपरीत, जब सत्ता का वितरण होता है, सूचना सार्वजनिक होती है, निर्णय पारदर्शी होते हैं और नागरिक अपने निर्णयकर्ताओं से सीधे प्रश्न पूछ सकता है, तब भ्रष्टाचार के लिए स्थान कम होता है।
इसलिए भारत को केवल भ्रष्ट व्यक्तियों के विरुद्ध अभियान की आवश्यकता नहीं है। भारत को उस व्यवस्था का पुनर्गठन करना होगा जो कुछ व्यक्तियों को सार्वजनिक शक्ति के दुरुपयोग के इतने अवसर देती है।
हमें कम शासन नहीं चाहिए; हमें बेहतर, निकट और अधिक जवाबदेह शासन चाहिए। हमें अत्यधिक केंद्रीकरण से वास्तविक विकेंद्रीकरण की ओर बढ़ना होगा। नौकरशाही के नियंत्रण से संस्थागत जवाबदेही की ओर बढ़ना होगा। वित्तीय निर्भरता से स्थानीय वित्तीय उत्तरदायित्व की ओर बढ़ना होगा। और उद्यम तथा संपत्ति-सृजन को संदेह की दृष्टि से देखने के बजाय उसे धर्म और सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ते हुए सम्मान देना होगा।
भ्रष्टाचार-मुक्त भारत केवल कानूनों की संख्या बढ़ाने या सरकारी एजेंसियों की संख्या बढ़ाने से नहीं बनेगा। वह तब बनेगा जब शासन की संरचना स्वयं इस प्रकार बदलने लगे कि भ्रष्टाचार करना कठिन हो, भ्रष्टाचार छिपाना कठिन हो और सार्वजनिक शक्ति का निजी लाभ के लिए उपयोग करना लगातार महँगा होता जाए।
यह केवल प्रशासनिक सुधार का विषय नहीं है। यह भारत की आर्थिक और सभ्यतागत दिशा का प्रश्न है। यदि भारत को अपनी परंपरा पर आधारित आर्थिक मॉडल विकसित करना है, तो उसके उत्तर पूरी तरह आयातित वैचारिक श्रेणियों से नहीं मिलेंगे। उसे अपनी ही बौद्धिक परंपरा में निहित धर्म, अर्थ, लोकसंग्रह, विकेंद्रित सामाजिक उत्तरदायित्व और जवाबदेह सत्ता जैसे सिद्धांतों को आधुनिक संस्थाओं और इक्कीसवीं सदी की आर्थिक वास्तविकताओं के साथ जोड़ना होगा।
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