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लक्ष्मी को सम्मान, उद्यम को अवसर : 10% विकास-दर के लिए भारत को क्या बदलना होगा?

लक्ष्मी को सम्मान, उद्यम को अवसर : 10% विकास-दर के लिए भारत को क्या बदलना होगा?

✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

भारत ने 2047 तक विकसित भारत बनने का लक्ष्य रखा है। यह लक्ष्य केवल GDP का आकार बढ़ाने से पूरा नहीं होगा। यदि भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र और उसके बाद 2060 के आसपास दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना है, तो उसे अपनी आर्थिक सोच के मूल में परिवर्तन करना होगा। सड़कें, बंदरगाह, डिजिटल भुगतान, AI, semiconductor और रक्षा उत्पादन आवश्यक हैं, लेकिन इन सबके पीछे जिस आर्थिक दर्शन की आवश्यकता है, उस पर भारत ने अभी तक पर्याप्त स्पष्टता नहीं दिखाई है। सात-आठ प्रतिशत की वृद्धि दर से भारत बड़ी अर्थव्यवस्था तो बन सकता है, लेकिन जिस गति से जनसांख्यिकीय परिवर्तन हो रहा है, जिस गति से दुनिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और robotics उत्पादन को बदल रहे हैं और जिस तेजी से चीन, अमेरिका, वियतनाम, इंडोनेशिया तथा भविष्य में अफ्रीका अपनी आर्थिक क्षमता बढ़ा रहे हैं, उसमें भारत को लंबे समय तक 10 प्रतिशत या उससे अधिक की वास्तविक वृद्धि की दिशा में बढ़ना होगा।

भारत की पहली आर्थिक भूल स्वतंत्रता के बाद की वह वैचारिक भूल थी जिसमें हमने अपनी सभ्यतागत आर्थिक स्मृति को पीछे रखकर सोवियत समाजवादी नियोजन, राज्य-नियंत्रित उद्योग और पश्चिमी समाजवादी विचारों का मिश्रण अपना लिया। संविधान की प्रस्तावना में 1976 में ‘समाजवादी’ शब्द जोड़ा गया। यह मूल संविधान की 1950 की प्रस्तावना का हिस्सा नहीं था। 42वें संविधान संशोधन द्वारा ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द जोड़े गए। संविधान में यह शब्द आज भी मौजूद है। इसलिए भारत की आर्थिक यात्रा को समझते समय यह याद रखना चाहिए कि समाजवादी शब्द संविधान की मूल प्रस्तावना में नहीं था, बल्कि आपातकाल के दौर में जोड़ा गया। यह तथ्य अपने आप में उस वैचारिक यात्रा का प्रतीक है जिसमें भारत ने अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका को अत्यधिक विस्तार दिया।

यहाँ एक स्पष्ट बात कहनी होगी। स्वतंत्र भारत में भारी उद्योग, वैज्ञानिक संस्थान, सार्वजनिक क्षेत्र, इस्पात संयंत्र, सिंचाई और आधारभूत ढाँचे के निर्माण की आवश्यकता थी। इसलिए सार्वजनिक क्षेत्र की स्थापना अपने आप में गलती नहीं थी। गलती तब हुई जब सार्वजनिक क्षेत्र को आर्थिक जीवन के लगभग हर क्षेत्र में राज्य के नियंत्रण का आधार बना दिया गया और निजी उद्यम, पूँजी, लाभ तथा बाजार को संदेह की दृष्टि से देखने की वैचारिक आदत विकसित हुई। उद्योग लगाने के लिए लाइसेंस, उत्पादन बढ़ाने के लिए अनुमति, आयात करने के लिए नियंत्रण, विदेशी पूँजी के लिए प्रतिबंध और व्यापार के लिए ऊँची बाधाएँ—यह व्यवस्था अंततः उस उद्यमशील भारत को रोकने लगी जिसने सदियों तक व्यापार और उत्पादन किया था।

जिसे बाद में ‘लाइसेंस-परमिट-कोटा राज’ कहा गया, वह केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं थी; वह एक आर्थिक दर्शन का परिणाम था। उसका मूल विश्वास यह था कि राज्य अधिक जानता है, राज्य बेहतर आवंटन कर सकता है और निजी लाभ की आकांक्षा सामाजिक रूप से संदिग्ध है। परिणाम सामने था—कम उत्पादकता, सीमित प्रतिस्पर्धा, कम निजी निवेश और धीमी आर्थिक वृद्धि। 1950 से 1980 के बीच भारत की वृद्धि को लंबे समय तक लगभग 3–4 प्रतिशत के आसपास रहने के कारण बाद में व्यंग्यपूर्वक ‘Hindu rate of growth’ कहा गया। यह शब्द भारतीय सभ्यता की आर्थिक परंपरा का वर्णन नहीं था; यह स्वतंत्र भारत की धीमी समाजवादी-नियंत्रित अर्थव्यवस्था पर टिप्पणी थी। विडंबना यह है कि बाद में इसी शब्द का उपयोग भारत की सभ्यतागत आर्थिक क्षमता पर व्यंग्य करने के लिए भी किया गया।

यहाँ इतिहास को सही करना आवश्यक है। भारत में कोई ‘हिंदू आर्थिक विकास-दर’ इसलिए कम नहीं थी कि हिंदू समाज स्वभावतः आर्थिक रूप से पिछड़ा था। उलटे, आधुनिक राष्ट्रीय आय के ऐतिहासिक पुनर्निर्माणों के अनुसार पूर्व-औपनिवेशिक काल में भारत विश्व अर्थव्यवस्था का अत्यंत बड़ा केंद्र था। Angus Maddison के अनुमानों में लगभग 1 ईस्वी के आसपास भारत का विश्व GDP में हिस्सा लगभग 32 प्रतिशत और 1700 के आसपास लगभग 24 प्रतिशत था। चीन और भारत मिलकर लंबे समय तक विश्व उत्पादन का बहुत बड़ा हिस्सा उत्पन्न करते थे। ये ऐतिहासिक अनुमान आधुनिक GDP आँकड़ों की तरह प्रत्यक्ष मापन नहीं हैं, लेकिन वे इस तथ्य को स्पष्ट करते हैं कि औद्योगिक क्रांति से पहले भारत विश्व अर्थव्यवस्था की परिधि पर नहीं, बल्कि उसके केंद्र में था। 

भारत में व्यापार की परंपरा भी केवल कल्पना नहीं थी। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राज्य, कृषि, खनन, व्यापार, उद्योग, कर, मुद्रा और राजकोष का विस्तृत विवेचन मिलता है। शुक्रनीति, बृहस्पति-स्मृति और अन्य भारतीय आर्थिक-राजनीतिक परंपराओं में धन, व्यापार, दंड, राजकोष और सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रश्न मिलते हैं। भारत के व्यापारी समुद्री और स्थल मार्गों से पश्चिम एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और अन्य क्षेत्रों से जुड़े हुए थे। दक्षिण भारत के चोलों से लेकर गुजरात, राजस्थान, बंगाल और पश्चिमी तट के व्यापारिक समुदायों तक भारतीय वाणिज्य की लंबी परंपरा रही है।

इसलिए यह कहना कि बाजार, लाभ, व्यापार या निजी संपत्ति भारत के लिए पश्चिम से आयातित विचार हैं, इतिहास के साथ अन्याय होगा। भारतीय परंपरा में ‘अर्थ’ स्वयं पुरुषार्थों में से एक है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को जीवन के चार पुरुषार्थ माना गया। इसका अर्थ यह नहीं था कि धन बुरा है। अर्थ आवश्यक है, लेकिन अर्थ धर्म से नियंत्रित हो और जीवन के व्यापक उद्देश्य से जुड़ा हो। यही भारतीय आर्थिक चिंतन का मूल बिंदु है।

लक्ष्मी की पूजा करने वाला समाज संपदा को अपवित्र कैसे मान सकता है? कुबेर धन के अधिष्ठाता माने जाते हैं। दीपावली में लक्ष्मी-कुबेर पूजन होता है। व्यापारी समाज में धन का अर्जन केवल व्यक्तिगत लालच का विषय नहीं रहा; दान, धर्मशाला, अन्नक्षेत्र, मंदिर, शिक्षा, जल-संरचना और सामाजिक सेवा की परंपरा में अर्जित संपदा का पुनर्वितरण भी रहा। अर्थात् भारतीय दृष्टि ने धन के अर्जन और धन के सामाजिक उपयोग को विरोधी नहीं माना।

यहीं पूँजीवाद और साम्यवाद के बीच भारतीय दृष्टि का अंतर समझना आवश्यक है। साम्यवाद निजी संपत्ति और पूँजी संचय को मूलतः संदेह की दृष्टि से देखता है और उत्पादन के साधनों पर सामूहिक अथवा राज्य नियंत्रण को प्राथमिकता देता है। दूसरी ओर अनियंत्रित पूँजीवाद में बाजार को ही अंतिम निर्णायक मानने का खतरा है। भारतीय दृष्टि में अर्थ का निर्माण निजी और सामाजिक दोनों स्तरों पर हो सकता है, लेकिन उसका नैतिक अनुशासन धर्म से होना चाहिए। राज्य का कार्य हर व्यक्ति की संपत्ति अपने हाथ में लेना नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण व्यवस्था, सुरक्षा, आधारभूत संरचना और अवसर उपलब्ध कराना है।

इसीलिए भारत की समस्या यह नहीं थी कि हमने ‘हिंदू आर्थिक मॉडल’ अपनाया और वह विफल हो गया। वास्तविक समस्या यह थी कि स्वतंत्रता के बाद हमने अपनी परंपरा के उद्यमशील, विकेंद्रित और व्यापार-समर्थक पक्ष को आर्थिक नीति का आधार नहीं बनाया और सोवियत शैली के नियोजन तथा समाजवादी नियंत्रण से प्रभावित मिश्रित अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक अपनाए रखा।

चीन का उदाहरण आज सबसे बड़ा प्रमाण है। चीन ने राजनीतिक रूप से साम्यवादी प्रशासन बनाए रखा, लेकिन 1978 के बाद आर्थिक क्षेत्र में बाजार, निजी उद्यम, विदेशी निवेश, निर्यात और प्रतिस्पर्धा को बड़े पैमाने पर स्थान दिया। विश्व बैंक के अनुसार 1978 से चीन की औसत वास्तविक GDP वृद्धि 9 प्रतिशत से अधिक रही और 1978–2010 के बीच उसकी वृद्धि लगभग 10 प्रतिशत प्रतिवर्ष रही। 
इससे एक बात निर्विवाद रूप से सामने आती है—साम्यवादी राजनीतिक प्रशासन और साम्यवादी आर्थिक व्यवस्था एक ही चीज नहीं हैं। चीन ने राजनीतिक व्यवस्था नहीं बदली, लेकिन आर्थिक व्यवस्था में बाजार और निजी पूँजी की भूमिका इतनी बढ़ाई कि वह विश्व का manufacturing powerhouse बन गया। आज चीन के भीतर निजी कंपनियाँ, विदेशी कंपनियाँ, शेयर बाजार, venture capital, विशाल export industries और प्रतिस्पर्धी उत्पादन मौजूद हैं। जिस आर्थिक व्यवस्था को चीन ने 1978 से धीरे-धीरे बदला, भारत ने उसके विपरीत लंबे समय तक समाजवादी नियंत्रणों को ढोया।

इसलिए भारत के ‘Hindu rate of growth’ पर मजाक करने वालों को यह प्रश्न पूछना चाहिए कि उस धीमी वृद्धि का कारण हिंदू सभ्यता थी या स्वतंत्र भारत की समाजवादी आर्थिक नीतियाँ। इतिहास का उत्तर स्पष्ट है। भारत की धीमी वृद्धि का संबंध उसके स्वतंत्रता-उत्तर आर्थिक नियंत्रणों से था, जबकि भारत की प्राचीन आर्थिक समृद्धि उससे बहुत पहले की कहानी है।

1991 ने इस दिशा को बदला। भुगतान संतुलन संकट के बीच भारत ने व्यापार, उद्योग, विनिमय दर, विदेशी निवेश और वित्तीय क्षेत्र में बड़े सुधार किए। लाइसेंसिंग कम हुई, आयात प्रतिबंध घटे और निजी क्षेत्र के लिए अवसर बढ़े। उसके बाद भारत ने 1990 के दशक और विशेषकर 2000 के दशक में तेज वृद्धि देखी। 2003–08 के दौरान भारत ने कई वर्षों में 8 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हासिल की। लेकिन हम लगातार 10 प्रतिशत की अर्थव्यवस्था नहीं बन पाए।

क्यों?

क्योंकि 1991 का सुधार अधूरा था। हमने बाजार खोला, लेकिन भूमि सुधार, श्रम सुधार, न्यायिक सुधार, कृषि बाजार सुधार, शिक्षा, कौशल, शहरीकरण और manufacturing scale को उसी गति से नहीं बदला। हमने services में असाधारण सफलता प्राप्त की, लेकिन चीन की तरह करोड़ों लोगों को बड़े पैमाने के विनिर्माण में नहीं ला पाए। आज भी भारत के रोजगार का बहुत बड़ा हिस्सा कृषि में है। विश्व बैंक के अनुसार लगभग 45 प्रतिशत रोजगार कृषि में है, जबकि देश को अधिक उत्पादक विनिर्माण और आधुनिक सेवाओं की ओर श्रम स्थानांतरित करने की आवश्यकता है। 

यही कारण है कि भारत की 7–8 प्रतिशत वृद्धि को 10 प्रतिशत की स्थायी वृद्धि में बदलना कठिन रहा है। 10 प्रतिशत growth केवल GDP की संख्या नहीं है। उसके पीछे निवेश दर, productivity, labour participation, manufacturing, exports और capital formation का एक साथ तेज होना आवश्यक है।

भारत की निवेश दर लगभग 33–34 प्रतिशत GDP के आसपास है। विश्व बैंक का आकलन है कि भारत को 2047 तक high-income economy बनने के लिए अगले दशकों में निवेश को और बढ़ाना होगा और 2035 तक लगभग 40 प्रतिशत GDP के निवेश स्तर की दिशा में जाना होगा। 

यहाँ एक सीधा आर्थिक सिद्धांत समझना होगा—पैसा पेड़ों पर नहीं उगता। सरकार के पास खर्च करने के लिए धन तभी आता है जब समाज उत्पादन करता है, उद्योग कमाता है, नागरिक आय अर्जित करते हैं और कंपनियाँ कर देती हैं। इसलिए जो व्यक्ति रोजगार पैदा करता है, जो उद्योग लगाता है, जो जोखिम लेकर पूँजी लगाता है, जो कर देता है और जो निर्यात करके विदेशी मुद्रा कमाता है, उसे शोषक या चोर मानने वाली मानसिकता किसी भी राष्ट्र को समृद्ध नहीं कर सकती।

भारत ने लंबे समय तक उद्यमी को संदेह की दृष्टि से देखा। उद्योगपति को ‘पूँजीपति’ कहकर सामाजिक रूप से संदिग्ध बनाया गया, लाभ को लालच से जोड़ा गया और संपत्ति को असमानता का प्रतीक मान लिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि भारत ने पूँजी निर्माण की संस्कृति विकसित करने में समय खोया।

यहाँ गांधी को भी केवल समाजवादी चश्मे से देखना गलत होगा। गांधीजी का ग्राम स्वराज, स्थानीय उत्पादन, स्वावलंबन और विकेंद्रीकरण का विचार राज्य के केंद्रीकृत आर्थिक नियंत्रण से अलग था। उनकी रामराज्य की अवधारणा का केंद्र नैतिक शासन, उत्तरदायित्व और लोककल्याण था। गांधीजी बड़े उद्योग के आलोचक हो सकते थे, लेकिन उनका आर्थिक चिंतन सोवियत साम्यवाद का भारतीय संस्करण नहीं था। भारतीय आर्थिक चिंतन को गांधी के ग्राम स्वराज, दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद और कौटिल्य के राज्य-समर्थित उत्पादन-वाणिज्य चिंतन के बीच संवाद से समझना अधिक उपयोगी होगा।

एकात्म मानववाद का मूल प्रश्न यह है कि विकास केवल GDP का प्रश्न नहीं है। समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को मुख्यधारा में कैसे लाया जाए? लेकिन यहाँ भी एक बुनियादी आर्थिक सत्य है—अंतिम व्यक्ति की सेवा के लिए संसाधन चाहिए और संसाधन उत्पादन से आते हैं। रोजगार पैदा किए बिना गरीबी दूर नहीं होगी। केवल गरीबी भत्ता देकर गरीब को स्थायी रूप से सक्षम नहीं बनाया जा सकता।

यही कारण है कि ‘दरिद्र नारायण’ की सेवा की भारतीय भावना को आधुनिक economic policy से जोड़ने का सही तरीका यह नहीं है कि गरीब को हमेशा सहायता मिलती रहे। सही तरीका यह है कि गरीब के हाथ में कौशल, पूँजी, बाजार और सम्मानजनक रोजगार पहुँचे। मंदिर में दान देना और सरकार द्वारा गरीब को सामाजिक सुरक्षा देना अपनी जगह आवश्यक हो सकता है, लेकिन राष्ट्रीय गरीबी का स्थायी समाधान उत्पादन और रोजगार है।

यदि सरकार उद्योग लगाए बिना रोजगार देना चाहती है, तो वह अंततः करदाताओं के धन से रोजगार का कृत्रिम ढाँचा बनाएगी। यदि उद्योग बढ़ेंगे, तो सरकार को कर मिलेगा; कर बढ़ेगा तो सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य, वृद्धावस्था और गरीब कल्याण पर अधिक खर्च कर सकेगी। इसलिए लोककल्याणकारी राज्य की पहली शर्त मजबूत अर्थव्यवस्था है।

गरीब कल्याण और उद्योग विरोधी राजनीति एक साथ लंबे समय तक नहीं चल सकती।

अमेरिका चीन से व्यापार और तकनीक के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा क्यों करता है? क्योंकि दोनों विशाल productive economies हैं। चीन का विनिर्माण इतना बड़ा है कि अमेरिका उसकी supply chains पर निर्भरता कम करना चाहता है। अमेरिका स्वयं manufacturing capacity, semiconductor, defence production और advanced technology में भारी निवेश कर रहा है। आज की भू-राजनीति में आर्थिक शक्ति ही राष्ट्रीय शक्ति है।

इसलिए भारत को यह भ्रम छोड़ना होगा कि उद्योग और गरीब विरोधी हैं। वास्तविकता इसके विपरीत है। एक नया कारखाना गरीब परिवार के लिए रोजगार पैदा करता है। एक logistics park स्थानीय छोटे व्यवसाय पैदा करता है। एक food-processing plant किसान की उपज का मूल्य बढ़ाता है। एक export company विदेशी मुद्रा लाती है। एक startup उच्च-कौशल रोजगार बनाता है। यही वास्तविक wealth creation है।

भारत को अब गांव और शहर के संबंध को भी बदलना होगा। 1991 के बाद आर्थिक अवसरों के केंद्रीकरण ने urbanisation को तेज किया, लेकिन यदि गांव में पर्याप्त productive employment नहीं होगा तो लोग मजबूरी में शहरों की ओर जाएँगे। परिणाम होगा—महँगा आवास, ट्रैफिक, प्रदूषण, झुग्गियाँ, शहरों पर infrastructure का दबाव और परिवारों का विखंडन।

इसका समाधान गांव को शहर बनने से रोकना नहीं है। समाधान है कि गांव को productive economic node बनाया जाए।

कृषि-प्रसंस्करण, textile clusters, handicrafts, food processing, rural tourism, renewable-energy manufacturing, warehousing, digital services, small engineering units और agro-logistics को जिला एवं ब्लॉक स्तर पर विकसित किया जा सकता है। यदि गांव में आय और रोजगार होगा तो migration अवसर के लिए होगा, मजबूरी के लिए नहीं।

चीन ने अपने ग्रामीण क्षेत्रों को भी औद्योगिक नेटवर्क से जोड़ा। भारत को भी ग्राम और नगर को संघर्ष के दो छोर के रूप में नहीं, बल्कि एक economic continuum के रूप में देखना होगा।

भारत में इसके विपरीत राजनीति ने लंबे समय तक समाज को अनेक binary categories में बाँटने का प्रयास किया—अमीर बनाम गरीब, पूँजीपति बनाम मजदूर, ग्रामीण बनाम शहरी, अगड़ा बनाम पिछड़ा, क्षेत्र बनाम केंद्र। सामाजिक वास्तविकताएँ इनसे अधिक जटिल हैं। आर्थिक विकास का सबसे बड़ा इंजन संघर्ष नहीं, सहयोग और productivity है।

इसका अर्थ सामाजिक अन्याय की अनदेखी करना नहीं है। जातिगत भेदभाव, अवसर की असमानता और गरीबी वास्तविक समस्याएँ हैं। लेकिन उनका समाधान स्थायी वर्ग-संघर्ष नहीं, बल्कि upward mobility है। गरीब को अमीर से लड़ाने के बजाय गरीब को अमीर बनने का अवसर देना होगा।

भारत की वर्तमान राजनीति में मुफ्त गारंटी और subsidy की बढ़ती प्रवृत्ति इसी कारण गंभीर आर्थिक प्रश्न बनती है। हर subsidy गलत नहीं है। किसान को उत्पादक निवेश के लिए सहायता, गरीब बच्चे को शिक्षा, बीमार नागरिक को स्वास्थ्य सहायता, वृद्ध को सामाजिक सुरक्षा—ये लोककल्याण के वैध उपकरण हैं। समस्या तब पैदा होती है जब सरकारें चुनावी प्रतिस्पर्धा में ऐसी स्थायी घोषणाएँ करने लगें जिनका कोई स्पष्ट fiscal sustainability framework न हो।

RBI लगातार राज्यों की fiscal स्थिति, guarantees, off-budget borrowings और contingent liabilities पर ध्यान आकर्षित करता रहा है। राज्यों का संयुक्त fiscal deficit हाल के वर्षों में लगभग 3 प्रतिशत GDP के आसपास रहा है और कई राज्यों पर ऋण तथा ब्याज का दबाव बढ़ा है। 

यहाँ सरकारों को एक कठोर नियम बनाना चाहिए—उधार लेकर ऐसी संपत्ति बनाओ जो भविष्य में आय और productivity बढ़ाए; केवल ऐसी स्थायी consumption liabilities मत बनाओ जिनका भुगतान आने वाली पीढ़ियाँ करें।

राज्य को ‘सोने का अंडा देने वाली मुर्गी’ की तरह नागरिक और उद्योग से कर निकालते रहना भी बंद करना होगा। यदि उद्योग पर लगातार कर, अनुमति, निरीक्षण और अनुपालन का बोझ बढ़ेगा तो उद्योग निवेश नहीं करेगा। यदि उद्योग निवेश नहीं करेगा तो रोजगार नहीं बनेगा। रोजगार नहीं बनेगा तो कर आधार नहीं बढ़ेगा। कर आधार नहीं बढ़ेगा तो सरकार की कल्याणकारी क्षमता भी सीमित रहेगी।

इसलिए उद्योगपति को सम्मान देना पूँजीवाद की पूजा नहीं है; यह economic realism है।

जो व्यक्ति एक हजार लोगों को रोजगार देता है, उसे केवल इसलिए संदेह की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए कि उसने लाभ कमाया है। लाभ आर्थिक व्यवस्था का signal है। जहाँ लाभ है, वहाँ संसाधन आकर्षित होते हैं; जहाँ लगातार नुकसान है, वहाँ संसाधन निकलते हैं। हाँ, बाजार में fraud, monopoly, labour exploitation और environmental damage को रोकना राज्य का दायित्व है। लेकिन उद्यमिता को ही अपराध मान लेना आर्थिक आत्महत्या है।

भारत की नई आर्थिक नीति का लक्ष्य इसलिए ‘धनी को गरीब बनाना’ नहीं होना चाहिए। लक्ष्य होना चाहिए—गरीब को उत्पादक बनाना, मध्यवर्ग को मजबूत करना और उद्यमी को निवेश करने योग्य वातावरण देना।

इसी को भारतीय दृष्टि में धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष के संतुलन से समझा जा सकता है। अर्थ के बिना काम और सामाजिक व्यवस्था कमजोर होती है; अर्थ यदि धर्म से मुक्त हो जाए तो लालच और शोषण पैदा कर सकता है; धर्म यदि अर्थ-विहीन हो जाए तो आदर्शवाद भूख नहीं मिटा सकता। इसलिए भारतीय दृष्टि अर्थ को स्वीकार करती है, लेकिन उसे जीवन के व्यापक नैतिक उद्देश्य से जोड़ती है।

भारत को इसी आर्थिक दर्शन को आधुनिक भाषा में पुनर्गठित करना चाहिए।

राज्य का धर्म है—न्याय, सुरक्षा, infrastructure, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून और अवसर।

समाज का धर्म है—उत्पादन, उद्यम, सहयोग, दान और सामाजिक उत्तरदायित्व।

उद्योग का धर्म है—पूँजी लगाना, रोजगार देना, innovation करना और प्रतिस्पर्धी उत्पादन करना।

नागरिक का धर्म है—श्रम, कौशल, कर भुगतान और जिम्मेदार उपभोग।

और सरकार का काम हर नागरिक को अपना आश्रित बनाना नहीं, बल्कि उसे सक्षम बनाना है।

अब भारत के सामने सबसे बड़ा प्रश्न demographic है। भारत की कुल प्रजनन दर replacement level 2.1 से नीचे आ चुकी है। World Bank के अनुसार 2024 में भारत की TFR लगभग 2.0 थी। 

 इसका अर्थ है कि आज का युवा भारत आने वाले दशकों में धीरे-धीरे वृद्ध भारत बनेगा। UNFPA के अनुसार 2050 तक भारत में 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या लगभग 346 मिलियन तक पहुँच सकती है। 


इसलिए भारत के पास demographic dividend को economic dividend में बदलने की एक सीमित खिड़की है। यदि अगले 15–20 वर्षों में युवा population को कौशल, रोजगार और पूँजी नहीं मिली तो वही जनसंख्या भविष्य में pension, healthcare और dependency का बोझ बढ़ाएगी।

इसलिए 10 प्रतिशत growth का लक्ष्य केवल GDP लक्ष्य नहीं है। यह demographic survival strategy भी है।

भारत को अब ऐसी शिक्षा चाहिए जो रोजगार और productivity से जुड़ी हो। ITI, polytechnic, engineering colleges और universities को उद्योगों के साथ जोड़ना होगा। प्रत्येक जिले को अपने आर्थिक specialization के अनुसार skill ecosystem बनाना होगा।

भारत को manufacturing में बड़े पैमाने पर जाना होगा—electronics, semiconductor, defence, automobiles, batteries, chemicals, pharmaceuticals, machinery, textiles, footwear, food processing और renewable-energy equipment। China+1 का अवसर केवल नारा नहीं, बल्कि production capacity बनाने का अवसर है।

भारत को महिलाओं की labour-force participation बढ़ानी होगी। World Bank भारत में महिला श्रम-भागीदारी को 50 प्रतिशत तक बढ़ाने को दीर्घकालीन growth strategy का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है। 
भारत को भूमि रिकॉर्ड, land pooling और industrial land banks बनाने होंगे। निवेशक को जमीन प्राप्त करने में वर्षों नहीं लगने चाहिए।

भारत को labour reforms लागू करने होंगे, लेकिन साथ में worker social security भी मजबूत करनी होगी। उद्योग के लिए flexibility और श्रमिक के लिए सुरक्षा—दोनों साथ चल सकते हैं।

भारत को commercial courts और contract enforcement को तेज करना होगा। जिस देश में ₹10,000 करोड़ लगाने वाला निवेशक यह नहीं जानता कि विवाद का समाधान कब होगा, वहाँ 10 प्रतिशत growth की कल्पना कठिन है।

भारत को R&D expenditure बढ़ाना होगा। AI, robotics, biotechnology, semiconductor और advanced manufacturing में भारत केवल consumer नहीं बन सकता। विश्व बैंक ने अक्टूबर 2026 के अपने नवीनतम आकलन में AI को भारत की 
productivity और export क्षमता बढ़ाने का बड़ा अवसर बताया है। 


AI और robotics को भारत रोजगार का दुश्मन मानकर नहीं चल सकता। यह सच है कि automation कुछ jobs को समाप्त करेगा। लेकिन इतिहास बताता है कि नई तकनीक नए उद्योग भी पैदा करती है। नीति का लक्ष्य technology को रोकना नहीं, बल्कि भारतीय श्रमिक को उस technology के साथ अधिक उत्पादक बनाना होना चाहिए।

भारत को export economy बनना होगा। दुनिया को भारत में बने उत्पाद चाहिए। भारत के लिए लक्ष्य होना चाहिए—‘Make in India for the World’। केवल घरेलू consumption पर निर्भर अर्थव्यवस्था 10 प्रतिशत की दीर्घकालीन growth के लिए पर्याप्त नहीं होगी।


राज्यों को भी अपने-अपने reform scorecard के आधार पर प्रतिस्पर्धा करनी होगी। जिस राज्य में अधिक private investment, अधिक exports, अधिक formal jobs, बेहतर school outcomes, बेहतर power supply और तेज approvals हों, उसे अधिक आर्थिक प्रोत्साहन मिलना चाहिए।
केंद्र सरकार को भी अपनी भूमिका बदलनी होगी। हर समस्या के लिए नई subsidy बनाना शासन नहीं है। शासन का अर्थ है ऐसा institutional framework बनाना जिसमें समाज स्वयं उत्पादन और समृद्धि पैदा करे।


यही कारण है कि भारत को 10 प्रतिशत growth के लिए ‘सरकार बड़ी हो’ नहीं, बल्कि सरकार सक्षम हो और समाज आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो—इस सिद्धांत की आवश्यकता है।


यदि राज्य हर आर्थिक गतिविधि का मालिक बनेगा तो पूँजी निर्माण सीमित होगा। यदि राज्य पूरी तरह पीछे हट जाएगा तो सार्वजनिक वस्तुएँ और सामाजिक सुरक्षा कमजोर होंगी। भारतीय मॉडल का सही रास्ता दोनों अतियों के बीच है—मजबूत राज्य, स्वतंत्र उद्यम, जिम्मेदार बाजार और सामाजिक दायित्व।
यही एक आधुनिक भारतीय आर्थिक मॉडल हो सकता है।


इस मॉडल में पूँजीपति शत्रु नहीं है; शोषण शत्रु है।
लाभ शत्रु नहीं है; धोखाधड़ी शत्रु है।
बाजार शत्रु नहीं है; बाजार में अन्याय और एकाधिकार शत्रु हैं।


धन शत्रु नहीं है; धन का अनैतिक उपयोग शत्रु है।
सरकार शत्रु नहीं है; असीमित और अनुत्तरदायी राज्य शक्ति समस्या है।


गरीब समस्या नहीं है; गरीबी समस्या है।
और गरीब को स्थायी रूप से गरीब रखकर राजनीति करना सबसे बड़ी समस्या है।


भारत को अब इसी वैचारिक स्पष्टता की आवश्यकता है।
यदि 2047 तक विकसित भारत बनना है और 2060 के आसपास अमेरिका को पीछे छोड़कर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की महत्वाकांक्षा रखनी है, तो केवल जनसंख्या, धार्मिक भावना, राष्ट्रवाद या राजनीतिक नारे पर्याप्त नहीं होंगे। उसके लिए प्रति व्यक्ति उत्पादकता बढ़ानी होगी। पूँजी निर्माण बढ़ाना होगा। निजी निवेश बढ़ाना होगा। उद्योग बढ़ाना होगा। गांवों में रोजगार पैदा करना होगा। कृषि को value chain से जोड़ना होगा। महिलाओं को आर्थिक शक्ति बनाना होगा। शिक्षा को रोजगार से जोड़ना होगा। AI और robotics में अग्रणी बनना होगा। राज्यों को आर्थिक प्रतिस्पर्धा में उतारना होगा। राजकोषीय अनुशासन रखना होगा। और सबसे बढ़कर—धन पैदा करने वाले नागरिक और उद्यमी के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण बदलना होगा।



भारत की सबसे बड़ी विडंबना यह रही है कि जिस सभ्यता ने लक्ष्मी और कुबेर की पूजा की, व्यापारियों को सामाजिक प्रतिष्ठा दी, समुद्री व्यापार किया, अर्थ को पुरुषार्थ माना और राजकोष को राज्य की शक्ति का आधार समझा, उसी भारत ने स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक पूँजी और उद्यम को संदेह की दृष्टि से देखने वाली आर्थिक व्यवस्था अपना ली।
1991 ने उस गलती को सुधारा, लेकिन पूरी तरह नहीं।
अब 2026 में भारत के सामने दूसरी आर्थिक स्वतंत्रता का समय है।



पहली स्वतंत्रता राजनीतिक थी।
1991 का सुधार आर्थिक नियंत्रणों से मुक्ति की शुरुआत था।
अब तीसरे चरण में भारत को उत्पादकता, उद्यमिता और पूँजी निर्माण की पूर्ण स्वतंत्रता चाहिए।
यह स्वतंत्रता अराजक बाजार नहीं होगी। यह धर्म से नियंत्रित, कानून से संरक्षित और समाज के प्रति उत्तरदायी बाजार व्यवस्था होगी।


भारत को ऐसा राज्य चाहिए जो उद्योग से डरे नहीं, उद्योग पर निर्भर भी न हो; जो गरीब की सहायता करे, लेकिन गरीबी को स्थायी राजनीतिक पहचान न बनाए; जो किसान को subsidy से आगे बढ़ाकर value creator बनाए; जो युवा को नौकरी माँगने वाला नहीं, रोजगार पैदा करने वाला बनाए; और जो धन को पाप नहीं, राष्ट्र की productive शक्ति माने।
क्योंकि अंततः सरकार गरीबों को पैसा तभी दे सकती है जब समाज पैसा पैदा करे।

सरकार स्कूल तभी बना सकती है जब अर्थव्यवस्था कर दे।
सरकार अस्पताल तभी चला सकती है जब उत्पादन हो।
सरकार pension तभी दे सकती है जब भविष्य की पीढ़ी पर्याप्त आय पैदा करे।


और सरकार कल्याण तभी बढ़ा सकती है जब आज उद्योग, किसान, श्रमिक और उद्यमी मिलकर राष्ट्रीय संपदा बढ़ाएँ।


इसलिए भारत के लिए 10 प्रतिशत की स्थायी वृद्धि का मूल मंत्र किसी एक योजना में नहीं है। वह एक आर्थिक संस्कृति में है—उत्पादन को सम्मान, उद्यम को प्रोत्साहन, पूँजी को सुरक्षा, श्रम को कौशल, बाजार को स्वतंत्रता, राज्य को मर्यादा और संपदा को सामाजिक उत्तरदायित्व।


यही धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष के संतुलन से निकलने वाली आधुनिक भारतीय आर्थिक दृष्टि हो सकती है।
भारत यदि इसे अपनाता है तो 10 प्रतिशत की वृद्धि केवल एक आर्थिक लक्ष्य नहीं रहेगी; वह उस सभ्यता की आधुनिक पुनर्स्थापना होगी जिसने कभी विश्व अर्थव्यवस्था में असाधारण योगदान दिया था।
और यदि भारत फिर उसी पुराने रास्ते पर लौटता है—अत्यधिक सरकारी नियंत्रण, स्थायी subsidy, वर्ग-संघर्ष, पहचान की राजनीति, उद्यमी के प्रति अविश्वास, कमजोर राजकोष और अधूरे सुधार—तो 2047 का विकसित भारत केवल एक राजनीतिक नारा बनकर रह सकता है।



अगले बीस वर्ष इसलिए निर्णायक हैं। भारत के पास युवा जनसंख्या है, विशाल बाजार है, तकनीकी क्षमता है, लोकतांत्रिक संस्थाएँ हैं, डिजिटल आधारभूत ढाँचा है और विश्व अर्थव्यवस्था में बढ़ती भूमिका है। लेकिन ये सभी संभावनाएँ तभी राष्ट्रीय संपदा बनेंगी जब भारत अपनी आर्थिक नीति का केंद्रीय प्रश्न बदल देगा—
सरकार लोगों को कितना बाँट सकती है, यह नहीं; भारत कितनी नई संपदा पैदा कर सकता है, यह।
यहीं से भारत की अगली आर्थिक यात्रा शुरू होगी।

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