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शूद्रों का इतिहास आखिर इतना एकतरफा क्यों बताया गया?


✍️दीपक कुमार द्विवेदी

भारतीय इतिहास की सनातन धारा का जब हम निष्पक्ष और तथ्यात्मक अनुसंधान करते हैं, तो अनेक ऐसी भ्रांतियाँ स्वतः निर्मूल हो जाती हैं जो औपनिवेशिक काल और संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों के कारण समाज में गहरी बैठाई गई हैं। यह एक अत्यंत भ्रामक विचार लंबे समय से प्रसारित किया जाता रहा है कि शूद्र वर्ण प्रारंभिक वैदिक काल से ही दास और शोषित स्थिति में था। यदि हम प्राचीन ग्रंथों, वेदों, महाकाव्यों और पुरातात्विक अभिलेखों का सूक्ष्म अध्ययन करें, तो यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन और मध्यकालीन भारत में शूद्रों की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति अत्यंत सुदृढ़ और बहुआयामी थी। वे इस सनातन समाज के उतने ही प्राणवान और अभिन्न अंग थे जितने अन्य वर्ग, और उन्होंने राष्ट्र के उत्थान में कभी किसी प्रकार की हीनता का अनुभव नहीं किया।

राजनीतिक और शासन सत्ता के सर्वोच्च शिखरों पर शूद्रों की सक्रिय सहभागिता इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। इतिहासकार डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने इस अकाट्य तथ्य पर बल दिया है कि शूद्र किसी बाहरी आक्रमणकारी प्रजाति द्वारा पराजित लोग नहीं, अपितु इसी भूमि के मूल निवासी थे। महाभारत में एक शूद्र राजा द्वारा यज्ञ किए जाने का वर्णन मिलता है, जिसकी पहचान अंबेडकर ने ऋग्वेद में वर्णित प्रतापी राजा सुदास के रूप में की है। इसके अतिरिक्त, चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में उत्तर भारत के महान नंद वंश के संस्थापक महापद्म नंद शूद्र थे। भारत के सबसे विशाल साम्राज्यों में से एक और प्रथम बार केंद्रीयकृत शासन स्थापित करने वाले मौर्य साम्राज्य के सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य भी इसी पृष्ठभूमि से आते थे। इसी प्रकार, बंगाल और पूर्वी भारत पर लगभग चार सौ वर्षों तक शासन करने वाले पाल वंश के संस्थापक गोपाल बौद्ध ग्रंथों के अनुसार शूद्र थे, और उनके ताम्रपत्र अभिलेख बुद्ध की स्तुति से प्रारंभ होते हैं। मध्यकालीन आंध्र प्रदेश में शासन करने वाले काकतीय वंश के राजाओं ने अपने अभिलेखों में स्वयं के शूद्र होने की गर्व के साथ घोषणा की थी। गुप्त काल के दौरान सौराष्ट्र, अवंती, अर्बुद और मालवा के प्रांतों में शूद्र राजा राज्य कर रहे थे, और 1329 में आंध्र प्रदेश में मुसलमानों से एक बड़े भूभाग को मुक्त कराने के लिए शूद्र जातियों के मुसुनूरी परिवार के नायक प्रोलय नायक के नेतृत्व में एक बड़ा आंदोलन हुआ था, जिन्होंने यवनों को पराजित कर वैदिक यज्ञों और परंपराओं का पुनरुद्धार किया था।

शासन-प्रशासन और सेना के साथ-साथ आर्थिक मोर्चे पर भी शूद्र वर्ण भारतीय अर्थव्यवस्था का वास्तविक मेरुदंड था। वे किसी के अधीन साधारण श्रमिक नहीं, बल्कि स्व-नियोजित उद्यमी और शिल्पकार थे। इतिहासकार पी.वी. काने के उल्लेख के अनुसार, चमड़े का कार्य, धातु कर्म और वस्त्र निर्माण सहित बासठ से अधिक प्रकार के महत्वपूर्ण उद्योग शूद्रों के स्वामित्व और नियंत्रण में थे। प्राचीन भारत में शूद्र कर्मकारों और शिल्पकारों के अपने शक्तिशाली संघ या गिल्ड थे जो राज्य तंत्र का प्रमुख अंग माने जाते थे। ये संघ बैंकों के रूप में भी कार्य करते थे, जहाँ जनता से धन जमा कराया जाता था, सूद पर ऋण दिया जाता था, और बड़े पैमाने पर परोपकार तथा सामाजिक कल्याण के कार्य किए जाते थे। चीनी यात्री ह्वेन सांग ने सातवीं शताब्दी में शूद्रों का वर्णन एक संपन्न कृषक वर्ग के रूप में किया है, और असंख्य शिलालेख इस बात के साक्षी हैं कि शूद्र समाज के धनाढ्य वर्ग का हिस्सा थे जो धार्मिक व सामाजिक कार्यों के लिए भारी मात्रा में दान देते थे। ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में भी उनकी भूमिका कम नहीं थी; मनुस्मृति के प्रसिद्ध भाष्यकार मेघातिथि के अनुसार शूद्र व्याकरण और अन्य उच्च विज्ञानों की शिक्षा देते थे, तथा आपस्तम्ब धर्मसूत्र में स्पष्ट किया गया है कि स्त्रियों और शूद्रों के पास जो परंपरागत ज्ञान और विद्या विद्यमान है, वह अथर्ववेद का पूरक है।

देश की रक्षा और वीरता के इतिहास में भी शूद्रों और तथाकथित अछूत जातियों का योगदान अत्यंत गौरवशाली रहा है। वैदिक काल में अश्वमेघ यज्ञ के दौरान शूद्र सशस्त्र रक्षक के रूप में उस अश्व की रक्षा करते थे जो विश्वव्यापी विजय के लिए भेजा जाता था। महाभारत में राजा के परामर्शदाता मंत्रियों के निकाय में शूद्रों को स्थान देने की संस्तुति की गई है। छत्रपति शिवाजी महाराज के शासनकाल से लेकर पेशवाओं के काल तक, सेना में रामोशी, महार और मांग जैसी जातियों के वीर सैनिक बड़ी संख्या में नियोजित थे जिन्होंने अपनी अदम्य निष्ठा और वीरता का परिचय दिया। पेशवाओं द्वारा राजपरिवार की स्त्रियों की सुरक्षा के लिए महारों को नियुक्त किया गया था, और औरंगजेब द्वारा संभाजी की हत्या के बाद संभाजी के पुत्र द्वारा सिधनाक महार को सम्मानित किया गया था जिसने मराठा राज्य की सेवा के लिए एक स्वतंत्र महार सैन्य दल तैयार किया था। ब्रिटिश काल से लेकर स्वतंत्र भारत तक भारतीय सेना में महार रेजिमेंट ने अपनी बहादुरी के बल पर अनगिनत युद्ध सम्मान जीते हैं और इसके सैनिकों को देश के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार 'परमवीर चक्र' से भी सम्मानित किया गया है।

अतः इतिहास के इन जीवंत और प्रामाणिक साक्ष्यों से यह स्पष्ट हो जाता है कि शूद्रों को सदैव असहाय और पीड़ित वर्ग के रूप में चित्रित करना एक तथ्यात्मक भूल और वैचारिक षड्यंत्र है। प्राचीन भारतीय समाज में योग्यता, पुरुषार्थ और कर्म के आधार पर प्रत्येक वर्ग को उन्नति करने और राष्ट्र निर्माण में योगदान देने का पूर्ण अवसर प्राप्त था। एक भ्रामक निदान हमेशा समाज में विसंगतियाँ ही उत्पन्न करता है, जबकि तथ्यात्मक अनुसंधान और प्रामाणिक दृष्टिकोण ही सच्चे सत्य और राष्ट्रीय एकता की सुदृढ़ आधारशिला रख सकता है।

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