सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

लोक की सिनेमाई वापसी: जब टिकट खिड़की ने ‘लोक बनाम शास्त्र’ का द्वंद्व नकार दिया

1995 के बाद से भारतीय परिदृश्य में एक चीज मैं लगातार नोट करता रहा हूँ। एक मि श न है जो लोक को शास्त्र से भिड़ा रहा है। गाँव गाँव में यह दुष्प्रचार चलाया जा रहा है, शहर की मलिन बस्तियों ने कि शास्त्र ने लोक का शोषण किया है, उस पर अत्याचार किया है। लोक को असुरों से समीकृत किया जा रहा है और शास्त्र को आर्यों से। लोक को दलित बताया जा रहा है और शास्त्र को ब्राह्मिनिकल। 

इस पृष्ठभूमि में आप कांतारा, लालो और हनुमान-अंश की सफलता को परखिये और देखिये कि स्वयं लोक इस भेदाचार का किस तरह प्रत्याख्यान कर रहा है। 

लोक की इस सिनेमाई वापसी पर ध्यान दें।
लालो – कृष्ण सदा सहायते का उदाहरण तो विशेष रूप से चौंकाने वाला है। लगभग ₹50 लाख के आसपास के बजट से बनी फिल्म ने बिना बड़े सितारों और भारी प्रचार के असाधारण कमाई की और गुजराती सिनेमा की सबसे बड़ी सफलताओं में पहुँच गई। उसकी गति भी ध्यान देने योग्य थी—आरंभिक प्रदर्शन के बाद तीसरे सप्ताह से दर्शकों में उछाल वैसे ही आया था जैसे हनुमान-अंश में।

फिर Kantara आती है। वहाँ कथा किसी पुराण के सीधे पुनर्कथन की नहीं, बल्कि तटीय कर्नाटक के भूत-कोला, स्थानीय देवविश्वास, भूमि, पूर्वज-स्मृति और लोक-अनुष्ठान की है। फिल्म ने इसी स्थानीय संसार को “पिछड़े हुए अंधविश्वास” की तरह नहीं, बल्कि अपने भीतर की जीवित दुनिया की तरह प्रस्तुत किया—और उसका व्यापक भारतीय दर्शक-वर्ग से संवाद हुआ।

और अब ‘हनुमान अंश’—नीम करोली बाबा के जीवन और आध्यात्मिक प्रभाव पर आधारित, लगभग ₹2 करोड़ के बजट की फिल्म, जिसने असाधारण व्यावसायिक सफलता प्राप्त की है। उपलब्ध हालिया रिपोर्टों में इसकी सकल कमाई ₹192 करोड़ से ऊपर पहुँचने की बात कही गई है।

इन तीनों के बीच एक शब्द वास्तव में साझा है—लोक।

लेकिन यहाँ “लोक” का अर्थ केवल ग्रामीण या अशिक्षित समाज नहीं है। यह distinction बहुत महत्वपूर्ण है। लोक वह ज्ञान-संसार है जो केवल पुस्तक में नहीं रहता; वह स्मृति, कथा, अनुष्ठान, गीत, विश्वास, परिवार, स्थान और सामुदायिक अनुभव में रहता है। शास्त्र उसका एक रूप है; लोक उसकी सामाजिक स्मृति का दूसरा रूप।

कुछ शहरीकृत, आत्मघोषित आधुनिक बुद्धिजीवियों ने पिछले कुछ दशकों में एक झूठा द्वंद्व खड़ा किया—लोक बनाम शास्त्र। मानो लोकविश्वास तभी तक स्वीकार्य है जब तक वह शास्त्रीय परंपरा से अलग, “subaltern” (हाशियाई) और “अंधविश्वासी” साबित किया जा सके। और जैसे ही यह दिखने लगे कि लोक और शास्त्र एक-दूसरे से संवाद करते हैं, लोक को “ब्राह्मणवादी”, शास्त्र को “दमनकारी” और श्रद्धा को “राजनीतिक चेतना की कमी” घोषित करने की बेचैनी शुरू हो जाती है।

यहाँ एक गहरी विडंबना है।

जिस लोक को वे शास्त्र से मुक्त कराना चाहते हैं, लोक स्वयं शास्त्र से अपना रिश्ता तोड़ना नहीं चाहता।

लोक को यह आधुनिक प्रमाणपत्र नहीं चाहिए कि वह अपनी कथा किससे जोड़े।

कृष्ण उसके लिए केवल महाभारत के संस्कृत श्लोकों में नहीं हैं। वे उसके संकट में हैं, उसकी बोली में हैं, उसकी दुकान के नाम में हैं, उसके भजन में हैं, उसकी दादी की कथा में हैं। नीम करोली बाबा केवल किसी आधिकारिक जीवनी के पन्नों में नहीं हैं; वे भक्तों की स्मृति, यात्राओं, आश्रमों और व्यक्तिगत अनुभवों में हैं। कांतारा का देवविश्वास किसी विश्वविद्यालय के लोक-संस्कृति विभाग की शोध-वस्तु मात्र नहीं है; वह उस भूगोल के लोगों के लिए जीवित संबंध है।

लोक को जिस दिन संग्रहालय में रख दिया जाता है, उसी दिन वह लोक रहना बंद कर देता है।

और सिनेमा ने शायद इसी भूल का उत्तर दिया है।

इन फिल्मों की सफलता में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने लोक को “समझाने” की कोशिश कम की और लोक को अनुभव कराने की कोशिश अधिक की।

यही कारण है कि इन्हें केवल “धार्मिक फिल्म” कह देना इनके सांस्कृतिक अर्थ को छोटा कर देता है।

‘लालो’ में कृष्ण हैं, लेकिन उसके भीतर संकटग्रस्त मनुष्य और उसकी सहायता की आकांक्षा भी है।

‘कांतारा’ में स्थानीय देवविश्वास है, लेकिन उसके भीतर भूमि, समुदाय, पूर्वज और मनुष्य-प्रकृति संबंध का प्रश्न भी है।

‘हनुमान अंश’ में नीम करोली बाबा हैं, लेकिन उसके भीतर आधुनिक मनुष्य की उस पुरानी खोज का प्रश्न भी है—क्या इस दिखाई देने वाली दुनिया के परे भी कोई ऐसी सत्ता, करुणा या व्यवस्था है जिस पर संकट की घड़ी में भरोसा किया जा सके?

इसलिए इन फिल्मों की सफलता को केवल धार्मिक भावुकता कहकर खारिज करना स्वयं एक प्रकार का बौद्धिक आलस्य होगा।

जितना अधिक लोक को शास्त्र से लड़ाने की कोशिश की जाएगी, उतना ही लोक अपनी कथा स्वयं लेकर परदे पर आएगा।

क्योंकि लोक को लड़ना नहीं है। उसे बस अपनी कहानी सुनानी है।

वह कहता है—तुम शास्त्र को मेरे विरुद्ध खड़ा कर रहे हो? ठीक है। मैं तुम्हें बताता हूँ कि मेरे घर में शास्त्र पहुँचा कैसे था।

कथा के द्वारा।
भजन के द्वारा।
त्योहार के द्वारा।
कथा-वाचक के द्वारा।
मंदिर के द्वारा।
दादी के द्वारा।
और अब—सिनेमा के द्वारा।

यहीं “कांतारा → लालो → हनुमान अंश” की श्रृंखला बहुत अर्थपूर्ण हो जाती है। तीन अलग भाषाएँ, तीन अलग भौगोलिक-सांस्कृतिक संसार, तीन अलग कथा-रूप—लेकिन एक साझा गहरी संरचना: लोक अपने अनुभव की प्रमाणिकता लेकर आया।

और इसमें एक और दिलचस्प बात है। इन फिल्मों ने लोक को “पुराना” रखकर नहीं बेचा। उन्होंने लोक को आधुनिक माध्यम में प्रस्तुत किया।

यही भारतीय परंपरा की असली जीवटता है।
लोक आधुनिक होने के लिए अपना लोक होना नहीं छोड़ता। वह अपने लोक को आधुनिक माध्यम में ले आता है।

यहीं वे लोग चूक जाते हैं जो आधुनिकता को परंपरा-विस्मृति का दूसरा नाम समझते हैं।
उन्हें लगता है—यदि युवा सिनेमा देख रहा है तो वह परंपरा से दूर जा रहा है।

लोक कहता है—ठीक है, तो मैं सिनेमा में आ जाता हूँ।

युवा बड़े परदे पर कांतारा देखता है।
वह ‘लालो’ देखता है।
वह ‘हनुमान अंश’ देखता है।

और अचानक जिसे कुछ लोग “मृत परंपरा” कह रहे थे, वह टिकट खिड़की पर जीवित दिखाई देने लगती है।

यहीं बाजार भी एक विचित्र दार्शनिक बन जाता है। वह किसी विचारधारा से बहस नहीं करता। वह बस पूछता है—
“दर्शक कहाँ जा रहा है?”
और दर्शक कभी-कभी वह उत्तर दे देता है जिसे बौद्धिक मंडलियाँ वर्षों से सुनना नहीं चाहतीं।

सबसे मजेदार बात यह है कि लोक के विरुद्ध जो तर्क दिया जाता है, वही इन फिल्मों की सफलता के बाद उलटा पढ़ा जा सकता है।
“यह तो केवल ग्रामीण भावुकता है।”
तो फिर शहरों में टिकट कौन खरीद रहा है?
“यह तो केवल धार्मिक विश्वास है।”
तो फिर कहानी के स्तर पर इससे जुड़ाव इतना व्यापक क्यों है?
“यह तो केवल प्रचार है।”
तो फिर बिना भारी प्रचार के मुँह-से-मुँह (word of mouth) से फिल्म क्यों फैल रही है?

पर यदि लोक इतना ही अप्रासंगिक है, तो उसकी फिल्मों को बार-बार अप्रत्याशित रूप से सफल होने के लिए किसी बड़े सितारे की आवश्यकता क्यों नहीं पड़ रही?

जिन्होंने लोक को शास्त्र से लड़ाना चाहा, उन्होंने यह नहीं देखा कि लोक के पास अपनी कथा है। और जिस दिन लोक को अपनी कथा मिल जाती है, उसे किसी आलोचक की अनुमति की आवश्यकता नहीं रहती।

और शायद इन तीन फिल्मों की सफलता का वास्तविक सांस्कृतिक संकेत यही है:

लोक को हराने के लिए पहले यह सिद्ध करना पड़ेगा कि वह लोक है ही नहीं।

क्योंकि जब तक वह लोक है—वह गाता रहेगा, कथा कहता रहेगा, अनुष्ठान करेगा, विश्वास करेगा, प्रश्न करेगा, बदलेगा, नए माध्यम अपनाएगा और अंततः टिकट लेकर सिनेमा हॉल भी पहुँच जाएगा।

जिसे कुछ सयाने लोग “पिछड़ापन” समझ रहे थे, वह शायद भारत की सांस्कृतिक स्मृति थी—और स्मृति ने इस बार टिकट लेकर अपना उत्तर दिया है।

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