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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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भारत की परंपरा मूलतः समाज-आधारित और स्वावलंबी रही है। गाँव, परिवार, गुरुकुल, मंदिर, शिल्पी और स्थानीय संस्थाएँ मिलकर शिक्षा, अर्थव्यवस्था, सेवा और सामाजिक जीवन को चलाते थे। समाज अपनी आवश्यकताओं के समाधान स्वयं खोजता था।
औपनिवेशिक शासन ने इस व्यवस्था को कमजोर किया और सत्ता को केंद्र में रखकर प्रशासन तथा शिक्षा की ऐसी व्यवस्था विकसित की, जिसमें समाज की भूमिका घटती गई। स्वतंत्रता के बाद भी हमने प्रशासनिक केंद्रीकरण और राज्य-निर्भर विकास की मानसिकता को पर्याप्त रूप से नहीं बदला। परिणाम यह हुआ कि शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, सहायता और सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए नागरिक धीरे-धीरे सरकार पर अधिक निर्भर होते गए।
इसका प्रभाव केवल अर्थव्यवस्था पर नहीं पड़ा, बल्कि सामाजिक जीवन पर भी पड़ा। जब संसाधनों और अवसरों का बड़ा हिस्सा सरकारी व्यवस्था से जुड़ जाता है, तो राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और सामाजिक पहचान की राजनीति भी बढ़ती है।
भारत के पुनर्निर्माण का रास्ता केवल सरकार को अधिक शक्तिशाली बनाने में नहीं, बल्कि समाज को अधिक सक्षम बनाने में है। स्थानीय संस्थाओं, समुदायों, परिवारों, स्वैच्छिक संगठनों और नागरिकों को अपनी जिम्मेदारी फिर से स्वीकार करनी होगी। दुनिया में सशक्त समाज एवं मजबूत राष्ट्र वही है जहाँ सरकार जिम्मेदार तो हो पर समाज भी स्वावलंबी होना चाहिए। बात बात पर रोने से स्वस्थ, निरोगी, निर्दोष और आत्मनिर्भर समाज कैसे बनेगा??
⛳ कैलाश चन्द्र 🌹🙏
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