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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️ कैलाश चन्द्र
सोशल मीडिया: हथियार नहीं, हमारी जिम्मेदारी
आज सोशल मीडिया हमारे जीवन का केवल संचार माध्यम नहीं रह गया है। यह विचारों के निर्माण, सूचना के प्रसार, जनमत के निर्माण और सामाजिक संवाद का एक प्रभावशाली मंच बन चुका है। एक मोबाइल फोन के माध्यम से व्यक्ति कुछ ही क्षणों में हजारों-लाखों लोगों तक अपनी बात पहुँचा सकता है। यह इसकी शक्ति है तो यही हमारी भी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
सोशल मीडिया को हथियार बनाना आसान है। एक उत्तेजक पोस्ट, अधूरी जानकारी, भ्रामक शीर्षक या बिना तथ्य जाँचे साझा की गई सामग्री कुछ ही समय में बड़ी संख्या में लोगों तक पहुँच सकती है। शब्दों में विस्फोटक शक्ति होती है। इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि सोशल मीडिया के पास कितनी शक्ति है, बल्कि यह है कि हम उस शक्ति का उपयोग किस उद्देश्य के लिए करते हैं।
एक पोस्ट किसी को भड़का सकती है, तो वही पोस्ट किसी को प्रेरित भी कर सकती है। एक वीडियो समाज में भ्रम पैदा कर सकता है, तो दूसरा वीडियो किसी युवा को अपने जीवन का सकारात्मक लक्ष्य चुनने के लिए प्रेरित कर सकता है। एक संदेश विभाजन बढ़ा सकता है, तो दूसरा संवाद का रास्ता खोल सकता है। चुनाव हमारे हाथ में है।
सोशल मीडिया की सबसे बड़ी शक्ति उसकी पहुँच मात्र नहीं, बल्कि उसके माध्यम से पैदा होने वाला विचार है। इसलिए सकारात्मक विचारों की उपस्थिति केवल अच्छी बात नहीं, बल्कि सामाजिक आवश्यकता है। यदि अफवाह की गति से तेज सत्य, तथ्य और सकारात्मक विचार चलने लगें, तो सोशल मीडिया समाज के लिए बड़ी शक्ति बन सकता है।
आज आवश्यकता है कि सोशल मीडिया को शोर का माध्यम नहीं, सार्थक संवाद का मंच बनाया जाए। प्रतिक्रिया देना आसान है, लेकिन विचारपूर्वक प्रतिक्रिया देना जिम्मेदारी है। हर शेयर केवल किसी सामग्री का प्रसार नहीं करता; वह हमारे विचार और हमारी जिम्मेदारी का भी प्रसार करता है।
विशेषकर युवाओं के संदर्भ में यह प्रश्न और महत्वपूर्ण हो जाता है—कौन तय कर रहा है कि युवा क्या सोचें? सोशल मीडिया युवाओं के हाथ में केवल मोबाइल नहीं रखता; वह उनके सामने विचारों की पूरी दुनिया खोल देता है। इसलिए चुनौती सोशल मीडिया को रोकने की नहीं, बल्कि उसे सकारात्मक विचारों, तथ्यपूर्ण जानकारी, रचनात्मक संवाद और राष्ट्र तथा समाज के प्रति जिम्मेदार दृष्टि से भरने की है।
जिस हाथ में मोबाइल है, उसी हाथ में डिजिटल समाज की दिशा को प्रभावित करने की शक्ति भी है। सोशल मीडिया फटने वाला बारूद न बने; वह विचारों को प्रकाशित करने वाला दीपक बने। हथियार की तरह इस्तेमाल होने वाली तकनीक अंततः विभाजन पैदा कर सकती है, लेकिन जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल किया गया वही माध्यम समाज को जोड़ने, जागरूक करने और परिवर्तन की दिशा देने की शक्ति बन सकता है।
सोशल मीडिया की असली शक्ति तकनीक में नहीं, उसके पीछे खड़े मनुष्य के विचार और विवेक में है।
जब हम अपने बच्चों के लिए संस्कार, संवेदनशीलता, विवेक और उज्ज्वल भविष्य चाहते हैं, तो फिर समाज में कुसंस्कार, अनैतिकता, निराशा और हताशा क्यों फैलाएँ?
अपने घर के बच्चों को जिस वातावरण से बचाना चाहते हैं, वही वातावरण समाज के बच्चों के लिए क्यों बनाएँ?
क्या हमारी कलम, हमारी वाणी और हमारी डिजिटल शक्ति का उद्देश्य लोगों को भड़काना, तोड़ना और निराश करना है?
क्या यही हमारी सामाजिक जिम्मेदारी है?
हम तो समाज के प्रति संवेदनशील हैं, आत्मीय हैं; फिर हमारी बातों से समाज में विश्वास बढ़ना चाहिए या अविश्वास? आशा जागनी चाहिए या निराशा?
सोचिए—हम सोशल मीडिया पर केवल सामग्री नहीं डाल रहे, हम समाज के मन पर अपना प्रभाव छोड़ रहे हैं। फिर हम आने वाली पीढ़ी के लिए कैसा समाज छोड़ना चाहते हैं?🌹🙏
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