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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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कुसुमलता केडिया जी का आदेश हुआ कि मैं यूरोपीय अस्पृश्यता पर व्यवस्थित और प्रामाणिक तरह से लिखूँ। किसी इतिहास के लिए भारत का विधान और व्यवस्थाएँ भारत के वर्तमान जेन-जी़ को जिस तरह दंडित करती हैं, उसी इतिहास के लिए यूरोप ने वैसी वृत्ति और प्रवृत्ति नहीं अपनाई। इसलिए यह अध्ययन और भी आवश्यक हो जाता है।
पर इस अध्ययन में मैं कुछ सावधानी रखूँगा। इसे मैं यूरोपीय शोधों के हवाले से ही कहना चाहूँगा।
कभी आपने कागोत का नाम सुना?
फ्रांस और स्पेन के पाइरेनीज़ पर्वतों के बीच सदियों तक एक ऐसी मानव-समुदाय की उपस्थिति बनी रही, जिसके बारे में सबसे विचित्र बात यह थी कि उसके सदस्यों को देखकर सामान्य व्यक्ति यह पहचान ही नहीं सकता था कि वह “कागोत” है। उनके शरीर पर कोई ऐसा चिह्न नहीं था, भाषा कोई अलग नहीं थी, धर्म मूलतः वही ईसाई था, और वे उसी भूमि पर रहते थे जिस पर उनके पड़ोसी रहते थे। फिर भी जन्म के साथ एक सामाजिक पहचान उनका पीछा करती थी—कागोत, अगोत, गाएत, क्रेस्तियां अथवा अन्य स्थानीय नामों से।
यह इतिहास इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि यहाँ बहिष्कार किसी दृश्य शारीरिक भिन्नता से नहीं, बल्कि वंशगत सामाजिक स्मृति से संचालित होता था। एक परिवार कागोत है तो उसकी संतान भी कागोत मानी जाएगी।व्यक्ति बदल सकता था, उसका व्यवसाय बदल सकता था, उसकी आर्थिक स्थिति बदल सकती थी, पर समुदाय की स्मृति उसके जन्म को नहीं भूलती थी।
फ्रांसिस्क मिशेल ने 1847 में प्रकाशित अपनी दो-खंडीय कृति Histoire des races maudites de la France et de l’Espagne में इस पूरे प्रश्न को बड़े पैमाने पर दस्तावेज़ों, स्थानीय परंपराओं, अभिलेखों और मुकदमों के आधार पर एकत्र किया। पुस्तक का महत्त्व इसी में है कि वह केवल “कागोत कौन थे?” पूछकर नहीं रुकती; वह उनके निवास-क्षेत्र, सामाजिक स्थिति, अधिकारों और निषेधों, चर्च-संबंधी व्यवस्थाओं, कानूनों और समानता के लिए उनके संघर्षों को सामने रखती है। दूसरे खंड में तो अनेक स्थानीय अभिलेख और न्यायिक दस्तावेज भी संकलित हैं।
मिशेल की 1847 की पुस्तक की सामग्री अनेक पुराने अभिलेखों, स्थानीय परंपराओं और पहले के इतिहासकारों से आती है। इसलिए आज का इतिहासकार मिशेल को आधार बनाकर, उसके प्रमाणों को बाद के अभिलेखीय अध्ययनों से मिलाकर कालक्रम तैयार करता है। विशेष रूप से फ्राँस्वाज़ बेरियाक और रेजिस द सैं-जुआँ जैसे शोधकर्ताओं ने स्थानीय अभिलेखों और दस्तावेजों के आधार पर कागोतों की सामाजिक स्थिति को अधिक स्पष्ट किया है।
ग्यारहवीं शताब्दी : आरंभ कहाँ था?
कागोतों की उत्पत्ति का प्रश्न स्वयं उनके इतिहास का सबसे विवादित भाग है। बाद की सदियों में उन्हें गोथों, सारासेनों, कैथरों, यहूदियों, मुसलमानों, कुष्ठरोगियों अथवा प्राचीन ईसाइयों के वंशज बताने वाली अनेक धारणाएँ पैदा हुईं। यही तथ्य अपने आप में महत्त्वपूर्ण है—समाज पहले किसी समूह को अलग करता है और बाद में उस अलगाव को समझाने के लिए उसकी कोई “दूषित उत्पत्ति” खोजता है।
ग्यारहवीं शताब्दी के संबंध में कुछ बाद के लेखकों ने बेआर्न के लुक़ (Lucq-de-Béarn) के अभिलेखों में “chrestian” जैसे नामों को कागोतों के प्रारंभिक उल्लेख से जोड़ा है। किंतु इस आधार पर यह कहना कि ग्यारहवीं शताब्दी में कागोतों की वही पूर्ण विकसित सामाजिक व्यवस्था अस्तित्व में थी जो पंद्रहवीं या सोलहवीं शताब्दी में दिखाई देती है, ऐतिहासिक रूप से अधिक दावा करना होगा। हमारे पास उस समय के लिए पर्याप्त निरंतर दस्तावेज नहीं हैं।
इसलिए अधिक सुरक्षित निष्कर्ष यह है कि ग्यारहवीं–तेरहवीं शताब्दियों के बीच ऐसी सामाजिक श्रेणियों के बनने की प्रक्रिया चल रही थी, पर उसका पूर्ण संस्थागत रूप बाद के अभिलेखों में अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।
और यही इतिहास की पहली शिक्षा है—किसी समुदाय की उत्पत्ति और किसी समुदाय के बहिष्कार की उत्पत्ति एक ही घटना नहीं होती।
चौदहवीं शताब्दी : अब बहिष्कार दस्तावेज़ों में दिखाई देता है
चौदहवीं शताब्दी आते-आते कागोतों की सामाजिक उपस्थिति अधिक स्पष्ट हो जाती है। आधुनिक इतिहासकार फ्राँस्वाज़ बेरियाक का निष्कर्ष है कि कम-से-कम चौदहवीं शताब्दी के अंत तक दक्षिण-पश्चिमी फ्रांस और पर्वतीय नवारे में एक छोटी, अंतर्विवाही और सामाजिक रूप से पृथक अल्पसंख्या मौजूद थी, जिसे कुष्ठरोग से जुड़ी हुई माना जाता था। वे बहुत गरीब थे, थोड़ी-सी भूमि रखते थे और विशेष रूप से लकड़ी के कारीगरों के रूप में दिखाई देते हैं।
यहाँ “अंतर्विवाही” शब्द अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। बहिष्कार का अर्थ केवल यह नहीं था कि दूसरा व्यक्ति उनके पास बैठना नहीं चाहता। समय के साथ बहिष्कार ने विवाह-संबंधों और समुदाय के पुनरुत्पादन को भी प्रभावित किया। इस प्रकार सामाजिक पहचान स्वयं अगली पीढ़ी में स्थानांतरित होती रही।1385 के बेआर्न के Dénombrement में अनेक स्थानों पर कागोतों की उपस्थिति दर्ज है। रेजिस द सैं-जुआँ ने डॉ. फे के अध्ययन के आधार पर उन स्थानों का उल्लेख किया है और बताया है कि चौदहवीं शताब्दी के अंत में बेआर्न के अनेक गाँवों में कागोत परिवारों की पहचान की जा सकती है। उसी स्रोत-संपदा में 1320 में सौवतेर (Sauveterre) की “crestianaria”—अर्थात् कागोत/क्रेस्तियां बस्ती या प्रतिष्ठान—के जलाए जाने का भी अभिलेख मिलता है।
यह घटना विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
“अलग बस्ती” केवल सामाजिक कल्पना नहीं थी; वह स्थानिक रूप ले चुकी थी। समाज ने मनुष्य को केवल “दूसरा” नहीं बनाया, उसके लिए दूसरी जगह भी बनाई।
पंद्रहवीं शताब्दी : जन्म सामाजिक कानून बन जाता है
पंद्रहवीं शताब्दी में इस बहिष्कार की प्रकृति और स्पष्ट होती है। 1471 में मूमूर (Moumour) के एक कागोत पर लगाए गए निषेधों का दस्तावेजी प्रमाण मिलता है। यह अभिलेख बेआर्न के प्रशासनिक अभिलेखों से आता है और बाद में पॉल रेमों तथा डॉ. एच.-एम. फे ने प्रकाशित किया।
यहीं से एक महत्त्वपूर्ण बात सामने आती है।
कागोतों की स्थिति केवल “लोक-पूर्वाग्रह” नहीं थी। कहीं-कहीं पूर्वाग्रह को स्थानीय नियम, प्रशासनिक व्यवहार और सामुदायिक प्रथा का समर्थन प्राप्त था।
जिस समुदाय को सामाजिक रूप से अपवित्र माना जाता था, उसकी आर्थिक उपयोगिता समाप्त नहीं हुई थी।
कागोतों को लकड़ी का काम आता था। वे घर बनाते थे, छतों और निर्माण-कामों में उपयोगी थे। अर्थात् सामाजिक सम्मान और आर्थिक उपयोगिता अलग-अलग दिशाओं में चल सकते थे।
जिस हाथ को समाज सार्वजनिक रूप से अस्वीकार करता है, उसी हाथ के कौशल की उसे निजी आवश्यकता हो सकती है।
सोलहवीं शताब्दी : बहिष्कार के विरुद्ध मुकदमे
सोलहवीं शताब्दी में कागोतों की संख्या और भौगोलिक गतिशीलता के संबंध में भी परिवर्तन दिखाई देता है। बेरियाक के अध्ययन के अनुसार बेआर्न में उनकी संख्या इस शताब्दी में उल्लेखनीय रूप से बढ़ती है और उनके समूह गारोन तथा एब्रो की दिशाओं तक फैलते हैं; दूसरी ओर कुछ स्थानों पर उनकी पृथक सामाजिक संरचना धीरे-धीरे कमजोर भी पड़ती दिखाई देती है।
यही वह समय है जब कागोत प्रश्न केवल गाँव की सामाजिक प्रथा नहीं रहता, बल्कि न्याय और अधिकार का प्रश्न बनता जाता है। मिशेल की पुस्तक में सोलहवीं शताब्दी के अनेक दस्तावेज हैं; दूसरे खंड की विषय-सूची में 19 जून 1582 और 31 जनवरी 1587 के निर्णय भी दर्ज हैं।
यहाँ एक बड़ी ऐतिहासिक रेखा दिखाई देती है : बहिष्कृत समुदाय जब अदालत तक पहुँचता है तो उसका अस्तित्व केवल सामाजिक पहचान नहीं रह जाता; वह अधिकार का दावा बन जाता है।
सोलहवीं शताब्दी में कागोतों के पक्ष में धार्मिक और राजकीय हस्तक्षेप के उदाहरण भी मिलते हैं। किंतु स्थानीय समाज में परिवर्तन की गति बहुत धीमी रही। कानून ऊपर से बदल सकता था; गाँव की स्मृति नीचे से बदलने में सदियाँ लगा सकती थी।
चर्च : एक ही धर्म, लेकिन अलग दरवाज़ा
कागोतों का उदाहरण यूरोपीय धार्मिक संस्थाओं की एक विचित्र द्वैधता भी दिखाता है। वे ईसाई थे; पर कई स्थानों पर उन्हें सामान्य ईसाइयों के समान धार्मिक स्थान नहीं दिया जाता था।
मिशेल ने ओसाँ (Ossun) का वर्णन करते हुए लिखा कि कागोतों का चर्च में अलग स्थान था, वे एक छोटी अलग द्वार से प्रवेश करते थे और उनके लिए अलग पवित्र जल-पात्र रखा गया था। कुछ स्थानों पर उनके विवाह और दफन की भी पृथक व्यवस्थाएँ थीं।
धार्मिक समुदाय का सदस्य होना और धार्मिक समुदाय में समान सामाजिक सदस्य होना दो अलग बातें हो सकती हैं।
एक ही ईश्वर, एक ही धर्म, एक ही संस्कार—लेकिन प्रवेश का द्वार अलग।
और सामाजिक बहिष्कार की सबसे गहरी शक्ति शायद यहीं है : वह व्यक्ति को समुदाय से पूरी तरह बाहर नहीं करता; वह उसे समुदाय के भीतर निम्नतर सदस्य बनाकर रखता है।
सत्रहवीं शताब्दी : राज्य और न्यायपालिका बनाम सामाजिक आदत
सत्रहवीं शताब्दी में कागोतों की उत्पत्ति को लेकर अजीब-अजीब सिद्धांत भी बनने लगे। डॉ. फे ने बाद में इस इतिहास को देखते हुए लिखा कि 1640 में पियरे द मार्का ने उन्हें सारासेन मूल का माना। सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में गोथ, सारासेन, कैथर, प्राचीन ईसाई आदि अनेक मूल-सिद्धांत सामने आते रहे।
यहाँ इतिहास का एक मनोवैज्ञानिक सिद्धांत उभरता है : जब समाज किसी वर्तमान भेद को तर्कसंगत बनाना चाहता है, तो वह उसके लिए अतीत में कोई दोष खोज लेता है।
किसी समूह को अलग रखने के लिए यह पर्याप्त नहीं था कि “वे अलग हैं”; प्रश्न उठता था—“क्यों?” और तब उत्तर गढ़े गए : वे कुष्ठरोगियों की संतान हैं, वे गोथ हैं, वे सारासेन हैं, वे विधर्मी हैं।
अर्थात् सामाजिक बहिष्कार ने धीरे-धीरे अपनी “वंशावली” बना ली।
मिशेल की अपनी प्रस्तावना में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण बात आती है। उनके अनुसार सोलहवीं से उन्नीसवीं शताब्दी तक कागोत अपने साथ होने वाले दुर्व्यवहार के विरुद्ध लगातार शिकायत करते रहे। वे लिखते हैं कि सत्रहवीं शताब्दी में न्यायपालिका उनके पक्ष में आने लगी, पर कानून और सामाजिक आदत के बीच संघर्ष बना रहा।
कानून बदल गया; आदत नहीं बदली।
अठारहवीं शताब्दी : अधिकार मिलते हैं, लेकिन स्मृति नहीं मरती
अठारहवीं शताब्दी में कागोतों के पक्ष में न्यायिक निर्णयों की श्रृंखला दिखाई देती है। उपलब्ध ऐतिहासिक सामग्री में 1718 और 1722 के मुकदमों, 1724 के निर्णय, 1738 के बोर्डो संसद के आदेश और 1746 के तुलूज़ संसद के आदेश का उल्लेख मिलता है; इनमें कागोतों को चर्च, सार्वजनिक सभाओं और स्थानीय पदों में अन्य निवासियों के समान व्यवहार देने की दिशा दिखाई देती है।लेकिन इन निर्णयों का अस्तित्व ही बताता है कि समस्या अभी समाप्त नहीं हुई थी।
यदि समानता सामाजिक जीवन में पहले से स्थापित होती, तो समानता के लिए बार-बार मुकदमे क्यों होते?
यही वह जगह है जहाँ “कानूनी अधिकार” और “सामाजिक स्वीकृति” के बीच का अंतर दिखाई देता है।
किसी व्यक्ति को यह कह देना कि अब वह चर्च में सबके साथ बैठ सकता है, आसान है। गाँव के मन में सदियों से बैठी हुई यह धारणा मिटाना कि “वह कागोत है”—कहीं कठिन।
मिशेल की प्रस्तावना में 1789 को निर्णायक मोड़ के रूप में देखा गया है। फ्रांसीसी क्रांति के दौरान कागोतों ने उन भौतिक चिह्नों को नष्ट करना शुरू किया जिनसे उनकी पृथक पहचान की जाती थी। किंतु मिशेल स्वयं सावधान करते हैं कि जहाँ लिखित चिह्न मिट गए, वहाँ स्थानीय परंपरा परिवारों को अभी भी कागोत के रूप में पहचानती रही।
यानी क्रांति ने व्यवस्था को तोड़ा; स्मृति को नहीं।
1789 : कानून का अंत, सामाजिक स्मृति का नहीं
फ्रांसीसी क्रांति ने जन्माधारित विशेषाधिकारों और पुराने सामुदायिक विभाजनों की वैधानिक संरचना पर निर्णायक प्रहार किया। कागोतों के लिए इसका अर्थ था कि वे औपचारिक रूप से सामान्य नागरिकों की श्रेणी में आ सकते थे।
मिशेल ने स्वयं कई गाँवों का विवरण देते हुए लिखा कि 1789 के बाद अलग चर्च-द्वार, अलग पवित्र जल-पात्र, अलग दफन-स्थल जैसी व्यवस्थाएँ समाप्त हुईं और कागोतों का सामान्य जनसंख्या में सम्मिश्रण हुआ। ओसाँ, ज्यूलियाँ और लामार्क के उदाहरण में वे स्पष्टतः 1789 के बाद की स्थिति का उल्लेख करते हैं।
लेकिन इतिहास यहीं समाप्त नहीं होता।
मिशेल की अपनी प्रस्तावना कहती है कि उन्नीसवीं शताब्दी तक भी कुछ क्षेत्रों में पुराना पूर्वाग्रह बचा रहा। वे लिखते हैं कि कुछ स्थानों पर वह पूरी तरह समाप्त हुआ, जबकि अन्य स्थानों पर केवल उसकी तीव्रता कम हुई।
और स्वयं मिशेल की 1847 की खोज इस बात का प्रमाण है कि कागोत प्रश्न तब भी ऐतिहासिक और सामाजिक स्मृति का जीवित विषय था। उदाहरण के लिए, वे फेरियेर में 68 व्यक्तियों को उस समय भी “कागोत” के रूप में दर्ज करते हैं और बताते हैं कि 1789 से पहले वहाँ उनका अलग पवित्र जल-पात्र और अलग कब्रिस्तान था।
उन्नीसवीं शताब्दी : बहिष्कार से मानव-विज्ञान तक
उन्नीसवीं शताब्दी में कागोत इतिहास का एक नया अध्याय शुरू होता है। अब प्रश्न केवल यह नहीं रहा कि “क्या इन्हें अलग रखना चाहिए?” प्रश्न यह बनने लगा कि “ये लोग मूलतः हैं कौन?”
यह परिवर्तन देखने में ज्ञान की प्रगति जैसा लगता है, लेकिन इसके भीतर एक विचित्र खतरा भी था। सामाजिक पूर्वाग्रह अब “वैज्ञानिक” भाषा में स्वयं को समझाने की कोशिश करने लगा।
कभी कहा गया कि वे गोथों के वंशज हैं। कभी सारासेन। कभी कुष्ठरोगियों की संतान। कभी किसी प्राचीन पराजित जाति के अवशेष। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में नस्ल-विज्ञान और मानव-मापविज्ञान (anthropology) ने भी कागोतों को अपने अध्ययन का विषय बनाया। बाद के इतिहासकारों ने इस बात का अध्ययन किया है कि 1860–1910 के बीच कागोतों की व्याख्या किस प्रकार “वंश” और “कुष्ठ” के बीच बदलती रही।
यहाँ फ्रांसिस्क मिशेल का 1847 का काम एक ऐतिहासिक मोड़ है। उन्होंने कागोतों को किसी पौराणिक “शापित जाति” के रूप में स्वीकार करके बात समाप्त नहीं की; उन्होंने उनके निवास-क्षेत्र, सामाजिक स्थिति, अधिकार, निषेध, मुकदमों और स्थानीय परंपराओं को एक विशाल सामग्री के रूप में संकलित किया।
विडंबना यह है कि जिस समुदाय को सदियों तक समाज ने “दूसरा” बनाया, उन्नीसवीं शताब्दी का विद्वान समाज उसी “दूसरे” को अब प्रयोगशाला और अभिलेखागार में खोजने लगा।पर दूसरापन खत्म नहीं हुआ।
आपने देखा कि अस्पृश्यता के ऐतिहासिक प्रमाण यूरोप में क्रमशः और लगातार मिलते चलते हैं। किन्तु भारत में प्रमाण की जगह पोलेमिक्स से काम चलाया जाता है। फुले की पुस्तक कोई प्रमाण नहीं देती। कहानी गढ़ती है। मंडल आयोग की रिपोर्ट प्रमाण नहीं देती। मिथकों का सहारा लेती है।
पर छोड़िये, अभी तो हम भारत को उपनिवेशित कर भारतीय समाज में ग्लानि-ग्रंथि भरने वालों की गिरेबान में झाँकें।
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