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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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1. आर्य अनार्य सिद्धांत
2. द्रविड़ भाषा परिवार सिद्धांत
3. दलित ब्राह्मण कॉन्फलिक्ट या ब्राह्मणवाद
4. वर्ग संघर्ष एवं सांस्कृतिक मार्क्सवाद
5. धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत
6. वैज्ञानिक चेतना का भ्रम
7. पाश्चात्य अकादमियों से आए अनूदित सिद्धांत
8. नारीवाद
9. आदिवासी या मूलनिवासी सिद्धांत
10. आधुनिक इतिहास दर्शन
उपर्युक्त लगभग सभी पाश्चात्य अकादमियों के सिद्धांत हैं। जिनमें कुछ इंडोलॉजी के नाम से चकते हैं। विलियम जोन्स का संस्कृत अध्ययन भाषा परिवार की अवधारणा प्रस्तुत करता है जो हड़प्पा उत्खनन के बाद स्थापित आर्य अनार्य सिद्धांत का प्रवर्धक सिद्ध होता है। इसके बाद काल्डवेल ने द्रविड़ भाषा परिवार का सिद्धांत दिया जिससे उत्तर और दक्षिण का भेद स्पष्ट हो गया। इसी सिद्धांत से मूलनिवासी का सिद्धांत का जन्म होता है जिससे शूद्र तथा वनवासी आदिवासी या मूलनिवासी कहलाए जो शोषित एवं पीड़ित सिद्ध हुए। मूलनिवासी सिद्धांत से सवर्ण-अवर्ण संघर्ष का बीज वपन होता है। मार्क्सवाद ने स्वयं को भारतीय परिदृश्य में फिट करने के लिए संघर्ष किया। अकादमिक रूप से चर्चा का विषय तो वह अपने आगमन से ही रहा परंतु उसका भारतीय समाज में पैठ तभी हो पाता है जब वो स्वयं को आर्य- द्रविड़ तथा दलित- ब्राह्मण संघर्ष में समायोजित करके नए समीकरण बनाता है। यद्यपि मार्क्सवाद के इस स्तर तक आते आते चुनावी राजनीति में उसका स्थान शून्य हो गया तथापि राजनीति के नवीन जातीय परिदृश्य में उसके पुराने सिद्धांत और विश्लेषण अमेरिकियों के धन का आश्रय पाकर भारतीय राजनीति के माध्यम से समाज के मानस में घुस गए। नारीवाद का जन्म भी पश्चिम में ही हुआ था जो स्त्री स्वतंत्रता या स्त्री मुक्ति या स्त्री चेतना तथा रूढ़िवादी से मुक्ति, आधुनिकता आदि के नाम पर भारत में प्रवेश करता है। यद्यपि भारत में यह आंदोलन या वैचारिकी उस रेडिकल स्तर को नहीं छू पा रही है जिसका स्तर अमेरिका या यूरोप में देखा गया है तथापि वर्तमान डिजिटल समय में भारत की बदल रही वैयक्तिक एवं सामाजिक मनोवृत्ति तथा आर्थिक कार्य-संस्कृति के परिणामस्वरूप विकृत होती पारिवारिक संस्था, विवाह संस्था के रूप में अपना असर दिखा रही है। यह परिदृश्य नारीवाद की प्रत्यक्ष उपज नहीं है लेकिन इसे बचाव के तर्क नारीवाद से ही मिलती है। हिंदी साहित्य के कथाकारों एवं कवियों की रचनाओं में आज से पचास साल पहले यदि जाकर देखें तो ठीक वही परिस्थिति उनकी रचनाओं में पाएंगे जो आज समाज में एक तरह से व्याप्त है जैसे विवाह संस्था की निरर्थकता, बच्चे जन्म देने से बचना, प्रेम, स्वतंत्र जीवन, आर्थिक स्वतंत्रता, सामाजिक दायित्व का अभाव, तथा सामाजिक सांस्कृतिक संरचना के प्रति नकारात्मक भाव। स्त्री पुरुष संबंधों, समाज के परस्पर संबंधों तथा व्यक्ति के स्वयं के विचार, सामाजिकी, सांस्कृतिक बुनावट, कर्तव्य अकर्तव्य, ज्ञान विज्ञान एवं संस्कृति अध्ययन आदि के निर्धारक एवं नियामक जो भी नवीन शोध एवं सिद्धांत समय समय पर पश्चिम में उपजते रहते हैं वह अनूदित होकर भरे पहुँचता रहता है जो विश्वविद्यालयों में विमर्श एवं अनुकरण का विषय बनता है जैसे उत्तराधुनिकतावाद, उत्तर संरचनावाद, पीढ़ियों के नाम जैसे जेन जी, मिलेनियल, अल्फ़ा। यही विचार पढ़ने वाले विद्यार्थियों शोधार्थियों का संस्कार निर्माण करता है अपने साथ अपने आस पड़ोस, हित मित्र को ट्रांसफर करते हैं।
व्यक्ति की सांस्कृतिक पक्षधरता बहुत कुछ इतिहास से भी निर्धारित होती है। अतः उस पक्षधरता को बदलने के लिए इतिहास को बदलना आवश्यक हो जाता है। गलत इतिहास पढ़ाकर, मिस्लेड सूचना के द्वारा, आंशिक सत्य के सहारे तथा नैरेटिव आधारित इतिहास के जरिए इतिहास अध्ययन को बरगलाया जाता है। ऐसे इतिहास को तर्कसम्मत सिद्ध करने के लिए नए नए इतिहास दर्शन आते रहे हैं। प्रारंभिक कुछ इतिहासकारों के तथ्य आधारित इतिहास दर्शन को यदि छोड़ दें तो बाकी के सभी इतिहासकारों ने तथ्यों को इतिहास के लिए लगभग अनावश्यक वस्तु मान लिया है। इतिहास अध्ययन में सत्य उसी को माना जाता है जिसे इतिहासकार लिख जाए न कि तथ्य। इसीलिए आजकल इतिहास दर्शन का पसंदीदा पंचलाइन है कि तथ्य नहीं अपितु इतिहासकार में निष्कर्ष महत्वपूर्ण हैं। भारत में इतिहास अध्ययन में जो मुसलमान को आक्रांता लिख दे रहा है वह सांप्रदायिक घोषित है, जो मुसलमानों को नगरीय सभ्यता का क्रांतिकारी अग्रदूत कह दे रहा है वह सेकुलर, जो भारत के इतिहास को तथा हड़प्पा के डेट्स को पीछे ले जाता है वह रोमांटिक कथाकार कहा जाता है। प्राचीन भारतीय इतिहास अध्ययन में जो ब्राह्मण बौद्ध संघर्ष में बौद्धों को पीड़ित दिखा दे, वैदिक को क्रूर वह वैज्ञानिक इतिहास चेतना का तथा जो समृद्धि को दिखाए, और प्रगति को दिखाए वह हिंदूवादी कहलाता है। आधुनिक इतिहास में इस्लामी सांप्रदायिकता तथा विभाजन का जिम्मेदार बताने वाले को सांप्रदायिक कहा जाता है। राष्ट्रवादी इतिहास दर्शन एक नकारात्मक इतिहास अध्ययन है ऐसा पूर्व निश्चित कर दिया गया है। परिणाम यह हुआ कि राष्ट्र से प्रेम करने वाले विद्यार्थी गँवार, मूर्ख तथा अवैज्ञानिक कहे जाने लगे। अपने ही देश में अराजकता फैलाने वाले लोग चिंतनशील कहलाए। जाति के विखंडन को लगातार पोषण देने वाले समाजशास्त्री कहलाते हैं। जिसने भी इतिहास अध्ययन की इन गलतियों पर उंगली रखा उसे दंगाई, फासीवादी, हिंसक आदि कहा जाता है।
इतिहास अध्ययन से ही समाजशास्त्र, राजनीति शास्त्र आदि के विषय नवीनता को प्राप्त होते हैं। अतः उपर्युक्त धांधली का कचरा इन विषयों में भी व्याप्त है। और ऐसा व्याप्त है कि जंग लगे ताले की तरह खोलना असंभव है। जिसका एकमात्र निदान ताला तथा कुंडी दोनों को एकसाथ तोड़ना ही दिख रहा है। परिणाम यह हुआ कि देश जिस समस्या से गुजर रहा है उसके मूल पर कोई जा ही नहीं रहा है। सब चाय दुकान की बहसों में ही अपने कर्तव्य की इति श्री समझ रहे हैं।
इन समस्याओं की डायग्नोसिस ही नहीं हो रही तो निराकरण के विषय में अभी सोचना लगभग असंभव है।
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