सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

जब समाज को बाँटने लगें आख्यान हमें तलवार नहीं, विवेक चाहिए

जब समाज को बाँटने लगें आख्यान  हमें तलवार नहीं, विवेक चाहिए

✍️दीपक कुमार द्विवेद्वी

पिछले कुछ दशकों से हमारे सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक पटल पर जिस प्रकार तनाव, वैमनस्य और विभाजनकारी आख्यानों को हवा दी जा रही है, वह गंभीर आत्ममंथन की मांग करता है। इस देश का इतिहास केवल सत्ता और संघर्ष का इतिहास नहीं है, बल्कि यह निरंतर चलने वाले वैचारिक मंथन, सामाजिक समन्वय और विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी मूल पहचान को बचाए रखने की जीवंत गाथा है। आज जब जाति, पहचान और वैचारिक अतिवाद के नाम पर समाज को खंड-खंड करने के प्रयास हो रहे हैं, तब यह गहराई से समझना आवश्यक है कि इन बवंडरों की प्रकृति क्या है, इनके पीछे कौन सी शक्तियां सक्रिय हैं और इनसे निपटने का हमारा सनातन, लोक-सम्मत और विवेकपूर्ण मार्ग क्या होना चाहिए।

हमारे समाज और संस्कृति की मूल संरचना कभी भी अमूर्त या केवल भौतिक संबंधों पर आधारित नहीं रही है। यह वर्ण, जाति, कुल, वंश, गोत्र, कुल देवता, ग्राम देवता, नगर देवता और लोक देवताओं जैसे शाश्वत और गहरे आधार स्तंभों पर टिकी रही है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि इन व्यवस्थाओं से पूरी तरह मुक्त होना न तो कभी संभव रहा है और न ही हमारे सामाजिक स्वास्थ्य के लिए हितकर है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इन पारंपरिक व्यवस्थाओं को और अधिक सुदृढ़ करें, न कि इन्हें आधुनिकता या पश्चिमी सिद्धांतों की अंधी दौड़ में नेस्तनाबूत होने दें।

यदि हम अपने प्राचीन पारिवारिक और सामाजिक ढांचे को देखें, तो जिस प्रकार एक संयुक्त परिवार में एक मुखिया के होने से पूरा घर अनुशासन, प्रेम और मर्यादा के साथ चलता था, ठीक उसी प्रकार अतीत में हर जाति के भीतर अपनी एक स्थानीय पंचायत और उसका मुखिया हुआ करता था। वह मुखिया अपनी जाति के लोगों के दायित्वों, कर्तव्यों और सामाजिक मर्यादाओं की बात करता था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि उस व्यवस्था में अनुशासन का ऐसा दायरा था कि कोई भी जाति दूसरी जाति के आंतरिक मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करती थी। इसी विकेंद्रीकृत सामाजिक नियंत्रण के कारण समाज में कभी बड़े टकराव या अराजकता की स्थिति पैदा नहीं होती थी।

लेकिन पिछले कुछ दशकों में 'समानता' और 'समरूपता' के नाम पर, यूरोपीय और अमेरिकी समाजशास्त्रियों तथा बाहरी वैचारिक प्रवृत्तियों के प्रभाव में आकर, हमने अपनी इस सदियों पुरानी और बेहद कारगर व्यवस्था को अपने हाथों से ध्वस्त कर दिया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की खाप पंचायतों के रूप में आज उस प्राचीन व्यवस्था के केवल कुछ अवशेष ही शेष बचे हैं। जब समाज को नियंत्रित करने वाली यह विकेंद्रीकृत और स्वाभाविक व्यवस्था समाप्त हो जाती है, तो सामाजिक अनुशासन भी छिन्न-भिन्न हो जाता है।

परिणामस्वरूप, आज स्थिति यह हो गई है कि लोगों ने राज्य को 'सोने का अंडा देने वाली मुर्गी' मान लिया है। हर कोई राज्य से सब कुछ निचोड़ लेना चाहता है और अपने कर्तव्यों को भूलकर केवल अधिकारों की एकतरफा मांग कर रहा है। इस अंधाधुंध अधिकारवाद के नाम पर आज समाज में भयंकर अराजकता फैल रही है। लोग एक-दूसरे पर अनर्गल टिप्पणियां कर रहे हैं, और यहां तक कि हिंदू देवी-देवताओं पर भी अभद्र और अपमानजनक टिप्पणियां करने से बाज नहीं आ रहे हैं। यह स्पष्ट है कि अतीत के उस ढांचे को आज के आधुनिक दौर में ज्यों का त्यों खड़ा नहीं किया जा सकता, क्योंकि समय और परिस्थितियां बदल चुकी हैं।

वर्तमान समय में अल्ट्रा-अंबेडकरवाद और इसी तरह की अन्य विभाजनकारी प्रवृत्तियों के नाम पर जिस प्रकार की कटुता फैलाई जा रही है, उसने हमारी साझी छांव को कमजोर करने का प्रयास किया है। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र का उदाहरण हमारे सामने है, जहां मोहन साहनी की हत्या जैसी घटनाओं और चुनाव के समय रची जाने वाली राजनीतिक चालों को यदि हम ध्यान से देखें, तो यह समझना कठिन नहीं है कि इसके पीछे का असली खेल क्या है। कुछ कुंठित समूह और तथाकथित नेता जाति के नाम पर समाज को आमने-सामने खड़ा कर देना चाहते हैं। उनका लक्ष्य केवल यह है कि बहुसंख्यक समाज आपस में उलझकर अपनी सारी ऊर्जा और शक्ति नष्ट कर बैठे, ताकि वे लोग अपनी राजनीतिक रोटियां सेक सकें और बाहर की वे ताकतें जो इस देश की संस्कृति को समाप्त करना चाहती हैं, अपने मंसूबों में कामयाब हो सकें। जब कोई साधारण व्यक्ति आवेश में आकर तलवार या बंदूक थामकर सड़कों पर उतरता है, तो वह यह भूल जाता है कि इस स्वार्थी खेल में बर्बाद होने वाला उसका अपना घर, उसकी अपनी संतान और उसकी अपनी गृहस्थी होती है।

इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो वर्ष 1947 के विभाजन के समय जोगेंद्र नाथ मंडल जैसे नेताओं के प्रसंग और उनके राजनीतिक मोहभंग का कड़वा सच हमारे सामने है। तब भी कुछ लोग तात्कालिक राजनीतिक बहकावे में आकर उन ताकतों के साथ चले गए थे जो भारत के मूल भाव के विरोधी थे। जोगेंद्र नाथ मंडल तो किसी तरह अपनी जान बचाकर वहां से निकल आए, लेकिन उनके साथ बहकर जाने वाले साधारण लोग और उनके परिवारों को पीढ़ियों तक जो नर्क जैसी जिंदगी जीने के लिए मजबूर होना पड़ा, वह एक चेतावनी है। आज भी वही चक्रव्यूह दोहराया जा रहा है। जाति के नाम पर संगठन और तथाकथित नेता राजनीतिक दलों और बाहरी विध्वंसकारी शक्तियों के साथ मिलकर समाज की दलाली कर रहे हैं। वे अपना राजनीतिक लाभ या स्वार्थ सिद्ध कर लेते हैं, लेकिन जब संकट की घड़ी आती है, तो मैदान में केवल साधारण जनता और उसका परिवार अकेला खड़ा रह जाता है।

हमें यह समझना होगा कि इस प्रकार की उत्तेजनाओं के पीछे बहुत गहरे भू-राजनीतिक और वैचारिक षड्यंत्र काम कर रहे हैं। आज जिस प्रकार 'एट्रोसिटी लिटरेचर' के नाम पर एकतरफा, द्वेषपूर्ण और भ्रामक साहित्य परोसा जा रहा है, उसका उद्देश्य समाज के भीतर स्थायी बैर और घृणा का भाव पैदा करना है। यदि हम इस उकसावे में आकर प्रतिक्रियास्वरूप हिंसा या प्रतिशोध का मार्ग अपनाएंगे, तो हम अनजाने में उन विदेशी और बाहरी वैचारिक एजेंडों के मददगार बन जाएंगे जो भारत की सामाजिक अखंडता को तोड़ना चाहते हैं।

इस भयावह संकट से बाहर निकलने का रास्ता तलवार की धार पर चलने से नहीं, बल्कि विवेक और असीम धैर्य के मार्ग से होकर गुजरता है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि समाज कोई प्रयोगशाला नहीं है जहां हर व्यक्ति को एक सा ढाला जा सके। कलयुग के इस यथार्थ को समझना होगा कि इस दुनिया में न तो कोई शत-प्रतिशत देवता है और न ही हर कोई दानव है। मनुष्य के भीतर ही राम और रावण दोनों निवास करते हैं। जब हम समाज से हर बुराई को रातों-रात या बलपूर्वक मिटाने का दुराग्रह पाल लेते हैं, तो अनजाने में हम उस संघर्ष को आमंत्रण दे बैठते हैं जो अंततः पूरे समाज को ही लील जाता है। इसलिए, वर्तमान चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए सबसे बड़ा अस्त्र 'धैर्य' है। जब-जब ऐसा बवंडर उठे, हमें अपने घरों में शांत भाव से रहकर, अपने विवेक का दीप जलाए रखना चाहिए और इस तूफान को अपने स्वाभाविक वेग से गुजर जाने देना चाहिए।

इसके साथ ही, हमें वैचारिक और अकादमिक मोर्चे पर अपनी स्थिति को अत्यंत मजबूत करना होगा। आज जिस प्रकार एकतरफा साहित्य के जरिए हमारी पीढ़ियों के मन में विष घोला जा रहा है, उसका मुकाबला करने के लिए हमें सड़कों पर उतरने की नहीं, बल्कि बौद्धिक और तथ्यात्मक अकादमिक लेखन की आवश्यकता है। हमें अपने युवाओं को यह समझाना होगा कि वैचारिक युद्ध केवल शोरगुल से नहीं, बल्कि सत्य, शोध और अकादमिक दृढ़ता से जीते जाते हैं। बीस से पच्चीस स्पष्ट लक्ष्यों को सामने रखकर अकादमिक स्तर पर काम करना होगा, अन्यथा पैर के नीचे से जमीन खिसकने में समय नहीं लगेगा।

ऐसी संवेदनशील और जटिल स्थिति में हिंदू समाज के भीतर गहरी सजगता की आवश्यकता है। हमें आज के समकालीन संदर्भों को ध्यान में रखते हुए एक ऐसी व्यावहारिक और सकारात्मक व्यवस्था तैयार करनी होगी जो सर्वसमाज को एक साथ लेकर चल सके। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि जाति के नाम पर होने वाले किसी भी प्रकार के संघर्ष को पूरी तरह रोका जाए, हर वर्ग और हर जाति का आदर किया जाए और समाज में वास्तविक समरसता स्थापित हो। अपने गांवों, अपनी कुल-परंपराओं और अपनी माटी से जुड़कर एक ऐसा सौहार्दपूर्ण वातावरण बनाना होगा जहां हर व्यक्ति दूसरे के आत्मसम्मान का ख्याल रखे। इस बवंडर को वैचारिक परिपक्वता, अडिग धैर्य और अगाध अपनापन के साथ पार करना ही आज का सबसे बड़ा पुरुषार्थ है।

टिप्पणियाँ