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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
भारतीय राजनीति, वैचारिक पाखंड और बौद्धिक छद्मवेश के इस दौर में कुछ कथाएँ केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि वे एक राष्ट्र और उसके समाज की आत्मा पर लगे गहरे आघातों और उनसे उपजे पुनर्जागरण की जीवंत गाथा बन जाती हैं। उत्तर प्रदेश की इस पावन, उर्वर और मनीषियों की भूमि ने पिछले एक दशक में जिस अभूतपूर्व, कल्पनातीत और ऐतिहासिक कायाकल्प को जिया है, वह किसी साधारण राजनीतिक बदलाव का परिणाम नहीं है, बल्कि यह उस दृढ़ इच्छाशक्ति, कठोर पुरुषार्थ और राष्ट्रोन्मुखी संकल्प का जीवंत दस्तावेज है जिसने वर्षों से सिसकती, कराहती और माफियाओं के चंगुल में फँसी हुई व्यवस्था को एक नया जीवन दिया है। वह काला कालखंड आज भी जनसामान्य की नम आँखों, सहमी हुई स्मृतियों और सिहरते अनुभवों में पूरी तरह जीवित है, जब उत्तर प्रदेश का नाम लेते ही जेहन में सरेआम घूमते दुर्दांत बाहुबली, अपहरण को एक उद्योग के रूप में चलाने वाले गिरोह, सामूहिक नकल के काले कारखाने और चौबीस घंटे सुलगने वाले दंगों की वह खौफनाक आग तैर जाती थी, जिसने सूबे के अवाम का जीना मुहाल कर दिया था।
पूर्वांचल से लेकर पश्चिम तक, बुंदेलखंड से लेकर रोहिलखंड तक का युवा जब दो जून की रोटी की खातिर, अपनी अस्मिता को दाँव पर लगाकर अन्य महानगरों की पटरियों और कारखानों में अपमान सहने को विवश होता था, तब व्यवस्था की नीयत पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक था। शिक्षा के पवित्र मंदिरों पर नकल माफियाओं और अपराधियों का ऐसा काला और खौफनाक साया था जहाँ मेधा का सरेआम गला घोंटा जाता था और सरकारी नियुक्तियों की सूचियाँ केवल जातिगत संकीर्णता, भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार के तराजू पर तौली जाती थीं। तब उत्तर प्रदेश का आम नागरिक अपनी ही धरती पर घुट-घुटकर जीने को मजबूर था और देश के किसी भी कोने में उत्तर प्रदेश का नाम लेते ही लोग एक गहरी असुरक्षा और उपेक्षा के भाव से भर जाते थे। सड़कों के नाम पर केवल बड़े-बड़े गड्ढे हुआ करते थे, बिजली की लुकाछिपी आम बात थी, और कानून-व्यवस्था का पूरी तरह से जनाजा निकल चुका था।
किंतु, जब नाथ परंपरा के महान पीठाधीश्वर, तपस्वी और जन-जन के प्रिय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस दिशाहीन और पतन की ओर अग्रसर प्रदेश की बागडोर अपने हाथों में संभाली, तब इतिहास का एक नया, स्वर्णिम और अकाट्य अध्याय लिखा गया। एक ऐसा दौर शुरू हुआ जहाँ अपराधियों और माफियाओं के साम्राज्य को नेस्तनाबूद करना शासन की सर्वोच्च प्राथमिकता बना। और तभी, इस बदलते हुए, उभरते हुए और सशक्त होते उत्तर प्रदेश की प्रगति को देखकर वे लोग बौखला उठे जो हमेशा से इस देश की अस्थिरता और वैचारिक अराजकता पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकते आए हैं।
अभी हाल ही में, गोरखपुर की उस पावन और आध्यात्मिक धरती पर जहाँ के कण-कण में साधना, लोक-कल्याण और सनातन चेतना की फुहार रमी है कम्युनिस्ट छात्र संगठन 'आईसा' (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और वैचारिक दिवालियापन की प्रतीक उस मादा कम्युनिस्ट कॉकरोच नेहा बोरा ने आकर अमर्यादित और अत्यंत अभद्र टिप्पणियों की सारी हदें पार कर दीं। पाँच बार के सांसद, गोरक्षपीठ के महंत और दो बार जनता के भारी-भरकम जनसमर्थन से मुख्यमंत्री के रूप में चुने गए एक ओजस्वी संत के प्रति इस प्रकार की घटिया और कुत्सित भाषा का प्रयोग करना इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि इन कम्युनिस्ट कॉकरोच के पास जब तर्कों, तथ्यों और सत्यों का पूर्ण अभाव हो जाता है, तब वे केवल और केवल गाली-गलौज और अभद्रता को अपना मुख्य हथियार बना लेते हैं। यह इन मादा कम्युनिस्ट कॉकरोच की जन्मजात फितरत है जो विश्वविद्यालयों के वातानुकूलित परिसरों में बैठकर, लालकिले के सपनों की झूठी दुनिया में जीने वाली डफली बजाकर यह हिमाकत करती हैं कि वे देश के जन-प्रिय नेतृत्व को चुनौती दें।
लेकिन इन परजीवियों की औकात क्या है और इनका वैचारिक धरातल कितना खोखला है, इसे समझने के लिए उत्तर प्रदेश के इतिहास और वर्तमान के उन अकाट्य आंकड़ों और तथ्यों को देखना होगा जो हर आम नागरिक की खुली आँखों के सामने घटित हुए हैं। जरा इतिहास के उन काले पन्नों को पलटकर देखिए जब प्रदेश में बेटियों और महिलाओं का जीवन कितना असुरक्षित था। अभिभावकों की मानसिकता ऐसी हो चुकी थी कि जब बच्चियां स्कूल या कॉलेज की देहरी लांघकर बाहर जाती थीं, तो उन्हें घर से निकलते वक्त केवल एक ही ताकीद दी जाती थी बेटी! रास्ते में कोई कुछ भी कहे, कोई कुछ भी करे, तुम किसी से उलझना मत, चुपचाप सिर झुकाकर सीधे घर आ जाना।" सड़कों पर उनके दुपट्टे खींच लिए जाते थे, उनके साथ सरेआम अभद्रता होती थी और मनचलों द्वारा छेड़खानी तो एक आम सामाजिक विकृति बन चुकी थी। छेड़छाड़ और सुरक्षा की बात तो दूर, उस समय की पूर्ववर्ती सरकारों के मुखियाओं और सरपरस्तों का रवैया ऐसा शर्मनाक था कि वे बलात्कारियों और अपराधियों के प्रति खुली सहानुभूति रखते थे, और उनके मुँह से सार्वजनिक रूप से यह कालजयी और लज्जाजनक वाक्य निकल जाता था कि "लड़कों से गलती हो जाती है!"
इसके विपरीत, जब योगी आदित्यनाथ ने शासन संभाला, तो उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था की परिभाषा ही बदल गई। मुख्यमंत्री ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी कि यदि किसी ने चौराहे पर प्रदेश की बेटियों और बहनों की तरफ बुरी नजर उठाने या छेड़ने की जुर्रत की, तो अगले चौराहे तक पहुँचते-पहुँचते उसका बचना नामुमकिन हो जाएगा। 'ऑपरेशन मजनू' जैसे सख्त और निर्णायक अभियानों के माध्यम से न जाने कितने शोहदों, मनचलों और अपराधियों के हौसले पस्त किए गए। आज स्थिति यह है कि कुछेक अपवादों को यदि छोड़ दिया जाए, तो छोटे-छोटे कस्बों, दूर-दराज के गाँवों से लेकर महानगरों की चौपालों तक हमारी बेटियां, बहनें और माताएं पूरी तरह सुरक्षित माहौल में सांस ले रही हैं।
नेहा बोरा! जरा अपनी वैचारिक सुई को थोड़ा पीछे घुमाकर उत्तर प्रदेश की पूर्ववर्ती राजनीति के उन अध्यायों को भी पढ़ लेना। जाकर बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती से पूछना कि उनके साथ सत्ता के गलियारों में उस समय क्या हुआ था, जब समर्थन वापसी के बाद उनके साथ कैसी अमानवीय घटनाएँ घटी थीं और उनके वस्त्र तक फाड़ डाले गए थे। यदि ताकत, राजनीतिक हैसियत और जनसमर्थन की बात की जाए, तो तुम उस इतिहास और वर्तमान के सामने कहीं दूर-दूर तक नहीं टिकतीं। तुम गोरखपुर की पावन धरती पर खड़े होकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को इतने अभद्र और अमर्यादित शब्द बोलकर भी यदि आज सुरक्षित अपने ठिकाने पर वापस लौट पाई हो, तो उसका एकमात्र और अकाट्य कारण यह है कि वहाँ सचमुच 'योगीराज' है, जहाँ कानून का राज सर्वोपरि है और एक महिला होने के नाते तुम्हारी सुरक्षा की गारंटी वही व्यवस्था देती है जिसकी तुम आलोचना करती हो। यदि पिछली सरकारों का वह अराजक और खौफनाक दौर होता, तो इस प्रकार की अनर्गल बयानबाजी और अमर्यादित प्रलाप करने वालों का क्या हस्र होता, इसकी कल्पना भी तुम्हारा यह छोटा दिमाग नहीं कर सकता।
केवल विश्वविद्यालयों के कमरों में बैठकर या सड़कों पर लाल झंडे लेकर क्रांति के खोखले नारे लगाने से समाज का भला नहीं होता। यदि शिक्षा के क्षेत्र में हुए वास्तविक और धरातलीय परिवर्तन को देखना है, तो उत्तर प्रदेश के उन परिषदीय विद्यालयों की ओर देखना होगा जहाँ 'ऑपरेशन कायाकल्प' के माध्यम से एक अभूतपूर्व कायाकल्प हुआ है। आज प्रदेश के सरकारी स्कूलों की सूरत पूरी तरह बदल चुकी है। एक करोड़ इक्यानवे लाख (1,91,00,000) से अधिक नौनिहालों के जीवन में शिक्षा का एक नया और उज्ज्वल सवेरा आया है। जिन गरीब बच्चों के पास कभी तन ढंकने के लिए ढंग की यूनिफॉर्म, पहनने के लिए जूते-मोजे या हाथों में बस्ते और किताबें तक नसीब नहीं होती थीं, वे आज अत्याधुनिक स्मार्ट क्लास, डिजिटल पुस्तकालय और आधुनिक कंप्यूटर कक्षों में बैठकर वैश्विक स्तर की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री श्री योजना के अंतर्गत 1,565 सरकारी विद्यालयों को पूरी तरह हाई-टेक बनाया गया है, 6,481 स्कूलों का नए सिरे से निर्माण हुआ है, और 57 कंपोजिट विद्यालयों का सृजन किया गया है जहाँ प्री-प्राइमरी से लेकर 12वीं तक की शिक्षा एक ही छत के नीचे मिल रही है। इसके साथ ही, कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों को 8वीं से बढ़ाकर 12वीं कक्षा तक अपग्रेड किया गया है ताकि बालिकाओं की शिक्षा में कोई रुकावट न आए। वंटागिया बस्तियों और गाँवों में नए प्राथमिक व उच्च प्राथमिक विद्यालय खोले गए हैं, तथा अटल आवासीय विद्यालयों के माध्यम से गरीब और श्रमिक वर्ग के मेधावी बच्चों को पूरी तरह मुफ्त आवासीय एवं उच्चस्तरीय शिक्षा उपलब्ध कराई जा रही है। तकनीकी शिक्षा के मोर्चे पर सहारनपुर, अलीगढ़, आजमगढ़, मिर्जापुर, देवीपाटन और मुरादाबाद में नए विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई है। प्रदेश के 150 से अधिक औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (ITI) में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), 3D प्रिंटिंग, ड्रोन टेक्नोलॉजी और रोबोटिक्स जैसे अत्याधुनिक कोर्स शुरू किए गए हैं ताकि आज का युवा भविष्य की हर वैश्विक चुनौती के लिए पूरी तरह तैयार हो सके। संस्कृत शिक्षा को पुनर्जीवित करने के लिए विशेष छात्रवृत्ति योजनाएँ शुरू की गईं, और डिजिटल क्रांति के तहत 50 लाख से अधिक युवाओं को स्मार्टफोन तथा टैबलेट वितरित किए जा चुके हैं, तथा इसे दो करोड़ तक पहुँचाने का वृहद लक्ष्य तय किया गया है।
प्रयागराज जैसे ऐतिहासिक, धार्मिक और शैक्षिक केंद्र की बात करें तो संगम नगरी में आधारभूत संरचनाओं के विकास, उच्च शिक्षण संस्थानों के सुदृढ़ीकरण और महाकुंभ जैसे भव्य व अलौकिक आयोजनों ने उत्तर प्रदेश की बौद्धिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक गरिमा को विश्व पटल पर सर्वोच्च शिखर पर पहुँचा दिया है। आज प्रयागराज केवल शिक्षा का गढ़ नहीं, बल्कि वैश्विक सनातन संस्कृति का केंद्र बन चुका है।
रोजगार और स्वरोजगार के मोर्चे पर जो आंकड़े और तथ्य सामने आए हैं, वे इन कम्युनिस्ट कॉकरोच के हर झूठ को करारा जवाब देने के लिए पर्याप्त हैं। प्रामाणिक सरकारी एवं निजी क्षेत्र के सर्वेक्षणों और आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले नौ वर्षों में उत्तर प्रदेश में नौ लाख तीस हजार से अधिक योग्य युवाओं को पूरी पारदर्शिता, शुचिता और निष्पक्षता के साथ सरकारी नौकरियां प्रदान की गई हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस बल में सिपाही और उप-निरीक्षक स्तर की ऐतिहासिक भर्तियां हुईं, बेसिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा विभागों में लाखों शिक्षकों का चयन हुआ, तथा उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) एवं अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के माध्यम से प्रशासनिक और तकनीकी पदों पर बिना किसी सिफारिश या भाई-भतीजावाद के युवाओं को नियुक्तियां मिलीं।
इसके अतिरिक्त, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) सेक्टर के माध्यम से राज्य में 96 लाख से अधिक इकाइयां सक्रिय रूप से स्थापित और संचालित हो चुकी हैं। 'एक जिला, एक उत्पाद' (ODOP) जैसी क्रांतिकारी योजनाओं ने पारंपरिक कारीगरों, बुनकरों और स्थानीय उद्योगों को वैश्विक बाजार से जोड़ा है, जिसके परिणामस्वरूप प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से चार करोड़ से अधिक युवाओं और कामगारों को रोजगार और स्वरोजगार के अभूतपूर्व अवसर प्राप्त हुए हैं। राज्य सरकार को बीते वर्षों में लगभग 50 लाख करोड़ रुपये के भारी-भरकम निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं, और विभिन्न ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी (GBC) के माध्यम से धरातल पर उतरे लगभग 15 लाख करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट्स ने सूबे की अर्थव्यवस्था का नक्शा बदल दिया है। इसके साथ ही, 18,000 से अधिक बड़े नए उद्योग और फैक्टरियां स्थापित हुई हैं, जिनमें अकेले पंजीकृत फैक्टरियों के माध्यम से 16.5 लाख से अधिक लोगों को सीधे रोजगार मिला है।
बुनियादी ढांचे और आधारभूत संरचनाओं का जाल पूरे प्रदेश में विकास की नई कहानी कह रहा है। पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे, गंगा एक्सप्रेसवे, आधुनिक हवाई अड्डों और सुदृढ़ राजमार्गों के निर्माण ने दूरियों को समेट कर रख दिया है। डिफेंस कॉरिडोर के माध्यम से उत्तर प्रदेश अब भारत की रक्षा और एयरोस्पेस विनिर्माण का एक अत्यंत मजबूत और आत्मनिर्भर स्तंभ बन चुका है, और गोरखपुर सहित अन्य जनपदों में स्थापित एम्स (AIIMS) तथा आधुनिक चिकित्सा संस्थानों ने गरीबों के जीवन में स्वास्थ्य सेवाओं की एक नई किरण जगाई है। इसके साथ ही, अयोध्या, काशी, मथुरा, प्रयागराज और विंध्यवासिनी धाम से लेकर राज्य के कोने-कोने में स्थित सांस्कृतिक व धार्मिक केंद्रों का ऐसा भव्य और अलौकिक कायाकल्प हुआ है, जिसने हमारी प्राचीन सनातन विरासत को उसका चिर-प्रतीक्षित और खोया हुआ गौरव वापस लौटाया है।
तो फिर वे कौन लोग हैं जो इस महापरिवर्तन से आँखें चुराते हैं? वे यही मादा कम्युनिस्ट कॉकरोच हैं जो अपनी वैचारिक कुंठा और राजनीतिक हताशा में डूबी रहती हैं। जो कम्युनिस्ट कॉकरोच आज गोरखपुर की पवित्र धरती पर खड़े होकर यह बेबुनियाद सवाल उठाती हैं कि उत्तर प्रदेश को क्या मिला और "योगी क्या शिक्षा देंगे," वे वास्तव में विकास के इस सूर्य को देखकर अपनी आँखें पूरी तरह मूँद चुकी हैं। वे यह भूल जाती हैं कि क्रांति कभी विश्वविद्यालयों के कमरों में बैठकर डफली बजाने या देशविरोधी नारे लगाने से नहीं आती; सच्ची क्रांति तो चौबीस घंटे के उस अटूट पुरुषार्थ, निरंतर परिश्रम और देश-समर्पण से आती है जो एक संन्यासी मुख्यमंत्री अपने राज्य के कण-कण को संवारने के लिए कर रहा है।
उत्तर प्रदेश अब पूरी तरह बदल चुका है, और आम जनता की खुली आँखों ने इस ऐतिहासिक बदलाव को जिया है, अपनी पलकों पर बैठाया है। इन मादा कम्युनिस्ट कॉकरोच की ओछी गालियाँ और कुत्सित बयानबाजी इस विकास रथ के चक्कों को एक इंच भी पीछे नहीं खींच सकतीं, क्योंकि आज उत्तर प्रदेश की अवाम सच्चाई, सुरक्षा, सम्मान और विकास के इस मार्ग पर पूरी दृढ़ता, विश्वास और अटूट संकल्प के साथ खड़ी है। विकास अब किसी कागजी नारे का मोहताज नहीं रहा, बल्कि वह हर नागरिक के जीवन की एक प्रत्यक्ष और जीवंत वास्तविकता बन चुका है, जिसे कोई भी षड्यंत्रकारी ताकत झुठला नहीं सकती।
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