सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

हिंदू होने का अर्थ क्या है? जब पहचान से बड़ा हो जाता है सनातन





✍️दीपक कुमार द्विवेद्वी 

आज जब हम आधुनिकता की अंधी दौड़ में अपनी ही शाश्वत जड़ों से कटते जा रहे हैं, तब ‘हिंदू’ शब्द को महज किसी भूगोल के नक्शे पर खींच दी गई रेखाओं या गिने-चुने रीति-रिवाजों तक सीमित कर देना इस विराट, सनातन और अनंत बहती धारा का गला घोटने जैसा है। वैचारिक कोलाहल के इस दौर में सबसे बड़ा संकट यह है कि हमने इस सार्वभौमिक दर्शन को एक संकुचित पहचान में कैद कर दिया है। परिणाम यह हुआ है कि जो दृष्टि कभी संपूर्ण चराचर ब्रह्मांड को एक सूत्र में पिरोती थी, उसे आज केवल कुछ पूजा-पाठात्मक खानों में बांट दिया गया है। इसी वैचारिक भूल के कारण आज सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उन आक्रामक और विध्वंसकारी ताकतों को भी 'हिंदू' मान लिया जाता है, जिनकी जड़ें और जिनका पूरा आचरण विशुद्ध रूप से असुरी, मजहबी और मानवता-विरोधी है।

इस भ्रांति ने आज समाज में एक ऐसा कोहरा पैदा कर दिया है जहाँ केवल भारत की भौगोलिक सीमा में जन्म ले लेने मात्र से हर किसी को सनातन परंपरा का हिस्सा मान लिया जाता है, चाहे उनके कर्म और विचार इस पूरी धरती और सभ्यताओं के लिए एक भयानक अभिशाप ही क्यों न हों। हमें यह पूरी स्पष्टता के साथ समझना होगा कि सनातन धर्म और इस्लाम या क्रिश्चियनिटी जैसे मजहबों में जमीन-आसमान का अंतर है। इस्लाम और क्रिश्चियनिटी विशुद्ध रूप से मजहब (Religion) हैं, जिनकी पूरी संरचना एक संकीर्ण ईश्वर या गॉड या अल्लाह के इर्द-गिर्द घूमती है, जो उनके सातवें आसमान पर बैठते हैं और जिनके पास पूरी दुनिया को नियंत्रित करने का एकमात्र अधिकार है। इनकी मूल दृष्टि ही यह मानती है कि जो व्यक्ति उनके उस एक विशेष गॉड या अल्लाह को नहीं मानता, उसे इस पृथ्वी पर जीने का कोई नैतिक हक नहीं है। इतिहास और वर्तमान इस बात के अकाट्य साक्षी हैं कि इन मजहबी विचारधाराओं ने कैसे इस धरती पर सैकड़ों प्राचीन सभ्यताओं को नेस्तनाबूद किया है, करोड़ों इंसानों का कत्लेआम किया है और पूरी प्रकृति को केवल अपने भोग की वस्तु समझकर नोंच डाला है। उनकी नजर में यह पूरी पृथ्वी और इसके जीव केवल उपभोग की वस्तुएं हैं, जिन्हें तलवार या वैचारिक छल के बल पर अपने अधीन करना ही उनका सबसे बड़ा कर्तव्य है। ऐसी संहारक, असुरी और मजहबी प्रवृत्तियों को आज हमारी उदारता के नाम पर सहना या उन्हें अपने ही परिवार का हिस्सा मान लेना हमारे अपने मूल तत्वज्ञान से बहुत बड़ा द्रोह है।

जब हम शास्त्रों के गहरे पानी में उतरते हैं, तो पाते हैं कि सनातन का अर्थ कभी कायरता या अंधी सहिष्णुता नहीं रहा है। हमारे यहाँ शांति और संवाद का सर्वोच्च आदर्श भी है। महाभारत के युद्ध से पहले भगवान श्री कृष्ण ने हस्तिनापुर की सभा में शांति बनाए रखने के लिए यहाँ तक कह दिया था कि मात्र पाँच गाँव दे दीजिए, युद्ध टाल दीजिए। त्रेतायुग में लंका जाने से पहले अंगद को शांतिदूत बनाकर रावण के दरबार में भेजा गया था ताकि विवेक लौट सके। लेकिन हमारे शास्त्र यह भी स्पष्ट सिखाते हैं कि जब संवाद के सारे दरवाजे बंद हो जाएं, जब कोई दुष्ट, असुर या दानवी मानसिकता वाला व्यक्ति या समूह समझौते की भाषा को लाचार समझकर स्त्रियों का अपहरण, हत्या, बलात्कार और पूरी समाज-व्यवस्था को तहस-नहस करने पर उतर आए, तब हाथ पर हाथ धरे बैठना कोई धर्म नहीं है।

ऐसी आसुरी और जिद्दी ताकतों को, जो पूरी पृथ्वी को केवल अपना शिकार बनाना चाहती हैं, संवाद से नहीं बल्कि उनके यथोचित दंड से ही रोका जा सकता है। अधर्म के उस तांडव को कुचलना, ऐसे आतताइयों और वधयोग्य ताकतों को समाप्त करना और इस धरा को उनसे मुक्त कराना सनातन धर्म का सबसे पहला और पवित्र कर्तव्य है। रावण, कंस या अन्य आक्रांताओं के साथ क्या हुआ था? उनका वध इसलिए किया गया था ताकि यह सृष्टि सांस ले सके। जो लोग आज भी उसी क्रूर, असुरी और सर्वनाशक मार्ग पर चलकर मानवता को रौंद रहे हैं, उनके प्रति किसी भी प्रकार की नरमी बरतना या उन्हें अपना मान लेना उस सत्य के साथ छल है जिसके लिए हमारे ऋषि-मुनि जिए हैं।

इसलिए, आज इस बात को बहुत स्पष्टता से समझने की जरूरत है कि हिंदू होना कोई कागजी या पैतृक ठप्पा नहीं है। हिंदू वह है जो आत्मा के अमरत्व को जानता है, कर्म के अकाट्य विधान को जीता है, प्रकृति को अपनी माँ मानकर उसकी रक्षा करता है और इस पूरी सृष्टि को पूर्णता की ओर यानी 'आर्यत्व' की ओर ले जाने की निरंतर साधना करता है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति या विचारधारा विविधता का गला घोंटकर सबको जबरन एक जैसा बनाने के कुत्सित षड्यंत्र में लगी है, जो प्रकृति का अंधाधुंध दोहन कर रही है और जो पूरी दुनिया को अपने मजहबी अहंकार में नेस्तनाबूद करने पर तुली है, वह दुनिया के किसी भी कोने में या भारत की किसी भी सीमा के भीतर क्यों न जन्मी हो, वह कभी हिंदू नहीं हो सकती।

सच्चा हिंदू वही है जो अपने भीतर के देवत्व को जागृत रखते हुए समाज में फैली उस हर असुरी और मजहबी प्रवृत्ति को पहचानता है, जो मानवता के लिए खतरा बनी हुई है। वह करुणा की मूरत भी है और आवश्यकता पड़ने पर धर्म की स्थापना के लिए अपने शौर्य और पराक्रम की तलवार उठाने से भी पीछे नहीं हटता। यही सनातन की वह शाश्वत और जीवंत शक्ति है, जो सदियों की आंधियों के बाद भी अपने सत्य पर अडिग खड़ी है और हर युग में नित्य नूतन होकर इस ब्रह्मांड को प्रकाश दे रही है।

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