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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
कितने मासूम हैं न वे यूरोपीय लोग जो आज के दिन विश्व indigenous दिवस मनाते हैं और कभी अपने पुराने पापों को याद नहीं करते। विश्व भर से
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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कितने मासूम हैं न वे यूरोपीय लोग जो आज के दिन विश्व indigenous दिवस मनाते हैं और कभी अपने पुराने पापों को याद नहीं करते। विश्व भर से indigenous लोगों को बड़ी हद तक साफ कर देने वाले आज के दिन को प्रायश्चित दिवस के रूप में भी मनाते तो कोई बात होती पर वे तो इन्हीं बचे खुचे रह गये समाजों के भीतर और घुसने और उनके आस्थामूलों को हताहत कर उन्हें ‘विश्वासी’ बनाने की जुगत भिड़ाने के लिए आज के दिन का निर्लज्ज उपयोग करते हैं।
आज के दिन का उपयोग श्रद्धांजलि दिवस के रूप में ही कर लेते तो पता चलता कि उनके वर्चस्व की क़ीमत प्राचीन सभ्यताओं ने कैसे कैसे चुकाई है।
मैं आपको एक अश्रु-पथ की कथा सुनाता हूँ। आप लोग भी आज के दिन इन्हीं अत्याचारों के एक एक प्रसंग को लेकर अपने अपने फ़ेसबुक पृष्ठ पर शेयर करें तो आज का दिन उन शुभचिंतकों के चेहरे फाश करने के लिए प्रयुक्त होगा जो भारत के वनवासी और शेष समाज के बीच फूट डालने के उद्यम में विश्वविद्यालयों से लेकर वनक्षेत्रों में लगे हुए हैं। इतिहास से सबक तो सीखें हम।
भारत का वैश्विक स्तर पर यह स्टैंड रहा है कि मूलनिवासी की अवधारणा उपनिवेशवाद की परिणति थी। सेटलर उपनिवेशवाद की। भारत ने अपने यहाँ सेटलर उपनिवेशवाद को विफल कर दिया क्योंकि यहाँ की सभ्यता और संस्कृति अत्यन्त उन्नत रही आई थी, इसलिए यहाँ ड्रेन उपनिवेशवाद रहा जब भारत को चूस चूस कर अंग्रेजों ने खोखला कर दिया।
बहरहाल हम अश्रु-पथ ( Trail of tears) पर आयें। हमारे उलटपंथी इतिहासकारों ने उपनिवेशवाद के अत्याचार नहीं पढ़ाये बल्कि उसके सिविलाइजिंग लाभ गिनाए। एक मुहम्मद बिन तुगलक को सनकी सुल्तान जरूर बताया जब उसने राजधानी दिल्ली से दौलताबाद शिफ़्ट की। पर उसमें उसने कोई नस्ली भेदभाव नहीं किया था। उसका कारण प्रशासनिक था। वह मंगोलों के आक्रमण से बचने का अपनी बचकाना समझ से यही उपाय ढूँढ रहा था और फिर दक्षिण में साम्राज्य की पकड़ को मजबूत करने का उसका विचार रहा। हालाँकि उस प्रक्रिया में उसने भी जबर्दस्ती की और वह भी मानव इतिहास के एक बड़े दुःखों में शामिल है पर अमेरिका को उपनिवेश बनाने के उत्सुक यूरोपीयों की कोशिश तो शुद्ध नस्ली थी।
ट्रेल ऑफ टियर्स अमेरिकी इतिहास की सबसे दुखद घटनाओं में से एक है। यह 1830 के दशक में संयुक्त राज्य अमेरिका सरकार द्वारा दक्षिण-पूर्वी क्षेत्रों की मूल अमेरिकी जनजातियों—विशेष रूप से चेरोकी (Cherokee)—को उनकी पैतृक भूमि से जबरन हटाकर मिसिसिपी नदी के पश्चिम में “इंडियन टेरिटरी” (वर्तमान ओक्लाहोमा) भेजने की प्रक्रिया थी। इस यात्रा को चेरोकी भाषा में “नुना दा उल त्सुन यी” (जहाँ वे रोए) या “ट्लो वा सा” कहा जाता है। यह केवल एक मार्च नहीं, बल्कि कई मार्गों, कई जनजातियों और हजारों मौतों का सामूहिक अनुभव था। अनुमानतः 1830 से 1850 के बीच लगभग एक लाख मूल अमेरिकी लोगों को उनकी भूमि से हटाया गया, जिनमें से लगभग 15,000 लोग रास्ते में या शिविरों में मारे गए। चेरोकी जनजाति की यात्रा सबसे प्रसिद्ध और प्रतीकात्मक बनी।
उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत में संयुक्त राज्य अमेरिका तेजी से पश्चिम की ओर बढ़ रहा था। सफेद बसने वाले किसानों, भूमि सट्टेबाजों और सोने की खोज करने वालों की संख्या बढ़ रही थी। दक्षिण-पूर्व में चेरोकी, चकटाव (Choctaw), चिकासॉ (Chickasaw), क्रीक (Muscogee) और सेमिनोल (Seminole) जनजातियाँ रहती थीं। इन्हें गोरे अमेरिकियों ने “फाइव सिविलाइज्ड ट्राइब्स” कहा क्योंकि इनमें से कई लोगों ने यूरोपीय शैली की खेती, लेखन, संविधान और ईसाई धर्म अपना लिया था। चेरोकी जनजातीय समुदाय विशेष रूप से संगठित था। उनके पास लिखित भाषा (सिक्वोया द्वारा विकसित), समाचार पत्र (चेरोकी फीनिक्स), और एक संविधान था।
फिर भी भूमि की मांग बढ़ती गई। 1828-29 में जॉर्जिया में सोना मिलने से स्थिति और बिगड़ गई। जॉर्जिया सरकार ने चेरोकी भूमि पर कानून लागू किए, उनके अधिकार सीमित किए और भूमि को सफेद लोगों के बीच लॉटरी से बाँटना शुरू कर दिया। राष्ट्रपति एंड्रयू जैक्सन, जो स्वयं पूर्व में भारतीय युद्धों में लड़ा था और भूमि विस्तार का प्रबल समर्थक था, इस प्रक्रिया के मुख्य शिल्पी बना। जैक्सन का मानना था कि मूल अमेरिकी और गोरे समाज एक साथ नहीं रह सकते, और आदिवासियों को पश्चिम में “सुरक्षित” जगह भेजना ही उनका संरक्षण है। यह तर्क उपनिवेशवादी विस्तार को नैतिक आवरण देता था।
28 मई 1830 को राष्ट्रपति जैक्सन ने इंडियन रिमूवल एक्ट पर हस्ताक्षर किए। इस कानून ने राष्ट्रपति को मिसिसिपी के पूर्व की जनजातीय भूमि के बदले पश्चिम में भूमि देने और स्थानांतरण की व्यवस्था करने का अधिकार दिया। कानून में “स्वैच्छिक” शब्द था, लेकिन व्यवहार में दबाव, धमकी और धोखाधड़ी का इस्तेमाल हुआ। चेरोकी जनजाति ने कानूनी लड़ाई लड़ी। प्रधान प्रमुख जॉन रॉस के नेतृत्व में उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में दो महत्वपूर्ण मामले दायर किए—चेरोकी नेशन बनाम जॉर्जिया (1831) और वॉरसेस्टर बनाम जॉर्जिया (1832)। मुख्य न्यायाधीश जॉन मार्शल ने फैसला दिया कि चेरोकी एक “domestic dependent nation” हैं और जॉर्जिया के कानून उन पर लागू नहीं हो सकते। लेकिन जैक्सन ने कथित रूप से कहा, “जॉन मार्शल ने अपना फैसला सुना दिया है, अब वे इसे लागू करें अगर वे कर सकें।” संघीय सरकार ने इस फैसले को लागू नहीं किया। यह घटना अमेरिकी लोकतंत्र में न्यायिक शक्ति की सीमा को उजागर करती है।
1838 तक केवल कुछ हजार चेरोकी पश्चिम जा चुके थे। राष्ट्रपति मार्टिन वैन ब्यूरन ने जनरल विनफील्ड स्कॉट को लगभग 7,000 सैनिकों के साथ भेजा। मई 1838 में सैनिकों ने चेरोकी घरों में घुसकर लोगों को बैयनेट की नोक पर स्टॉकेड्स (कैद शिविरों) में धकेल दिया। घर लूटे गए, परिवार बिछुड़ गए, और फसलें तथा संपत्ति छोड़नी पड़ीं। गर्मियों में सूखा पड़ा। शिविरों में भीड़, गंदगी और बीमारी फैल गई। कई लोग वहीं मर गए। यात्रा लगभग 800 से 1,200 मील लंबी थी और नौ वर्तमान राज्यों से होकर गुजरती थी—अलाबामा, आर्कान्सस, जॉर्जिया, इलिनॉय, केंटकी, मिसौरी, नॉर्थ कैरोलिना, ओक्लाहोमा और टेनेसी। कुल मार्ग नेटवर्क आज लगभग 5,045 मील का राष्ट्रीय ऐतिहासिक ट्रेल है।
शुरुआती दल गर्मी और सूखे में चले। पानी की कमी, भोजन की कमी और बीमारी ने उन्हें त्रस्त किया। पतझड़ और सर्दियों में स्थिति और खराब हो गई। भारी बारिश से सड़कें कीचड़ बन गईं, फिर बर्फबारी और ठंड पड़ी। लोग पैदल, घोड़े पर या बैलगाड़ियों में यात्रा कर रहे थे। पर्याप्त कपड़े, कंबल और भोजन नहीं थे। बच्चे, बुजुर्ग और बीमार सबसे अधिक प्रभावित हुए।
चेरोकी की कहानी सबसे प्रसिद्ध है, लेकिन अन्य जनजातियों का अनुभव भी उतना ही दर्दनाक था। चकटाव 1831 में सबसे पहले निकाले गए। उनके एक नेता ने इसे “ट्रेल ऑफ टियर्स एंड डेथ” कहा—यही वाक्यांश बाद में पूरे युग के लिए प्रचलित हो गया। क्रीक जनजाति में भी हजारों मौतें हुईं। सेमिनोल ने लंबे समय तक प्रतिरोध किया (सेमिनोल युद्ध), फिर भी कई लोगों को जबरन हटाया गया। चिकासॉ ने अपेक्षाकृत बेहतर शर्तों पर स्थानांतरण किया, लेकिन उन्हें भी कष्ट सहना पड़ा। उत्तर में भी कई जनजातियों को हटाया गया, हालाँकि उनकी कहानियाँ कम चर्चित हैं।
आइजैक मैककॉय Baptist missionary थे और लंबे समय से रेड इंडियन्स के निष्कासन के सक्रिय समर्थक थे। वे मानते थे कि पश्चिम में अलग क्षेत्र देकर ही आदिवासियों को बचाया जा सकता है। उन्होंने रिमूवल नीति को नैतिक और व्यावहारिक दोनों रूप में सही ठहराया।ABCFM की बाद की मि श न री लीडरशिप ने चेरोकी लोगों को सलाह दी कि वे अपरिहार्य को स्वीकार कर लें और आध्यात्मिक काम पर ध्यान दें। संघीय अनुदान कटने के डर और राजनीतिक हकीकत ने इस बदलाव में भूमिका निभाई। कुछ बैपटिस्ट मिशन बोर्ड – शुरुआती वर्षों में स्वैच्छिक निष्कासन के पक्ष में थे। वे मानते थे कि पूर्व में रहने से चेरोकी लोग नष्ट हो जाएँगे।मोरावियन और कुछ अन्य मिशन राजनीतिक रूप से तटस्थ रहे या निष्कासन को व्यवहारिक समाधान मान लिया। उन्होंने खुले विरोध से परहेज किया।
पर आज इन तथाकथित सभ्यों का नाटक देखिए। सभ्यता के ऐसे नाट्य हमारे पाठ्यक्रम में शामिल करने में उलटपंथियों का क्या जाता था?
या कि अत्याचार की कल्प-कथाएँ सुनाने में जितनी मौलिकता थी, उतनी सच्चाई की प्रस्तुति में नहीं थी।
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