सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

पृथ्वी केवल गोल ग्रह नहीं : पुराणों के पद्माकार भू-मण्डल और उसके आधिदैविक स्वरूप को समझने की आवश्यकता



मनुष्य जिस संसार में जन्म लेता है, उसी को अपनी आँखों से देखकर उसके बारे में निष्कर्ष बनाने लगता है। आँखों से पृथ्वी दिखाई देती है, सूर्य दिखाई देता है, समुद्र दिखाई देता है, पर्वत दिखाई देते हैं और मनुष्य का शरीर भी दिखाई देता है। आधुनिक विज्ञान ने इन दृश्यमान वस्तुओं के स्थूल स्वरूप को समझने में अद्भुत प्रगति की है। पृथ्वी का आकार, उसका गुरुत्व, उसकी गति, उसका वायुमण्डल, उसकी आंतरिक संरचना और सूर्य के साथ उसका संबंध—इन सबका विस्तृत अध्ययन हुआ है। यह ज्ञान अपने स्थान पर महत्वपूर्ण है। परंतु सनातन वैदिक दृष्टि यहीं रुक नहीं जाती। वह प्रश्न करती है—क्या जो कुछ आँखों से दिखाई देता है, वही उस वस्तु का सम्पूर्ण स्वरूप है?

यही प्रश्न पृथ्वी के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। पृथ्वी का भौतिक स्वरूप गोल है—इसमें कोई विवाद नहीं होना चाहिए। हम उसी भौतिक पृथ्वी पर रहते हैं, उसका गुरुत्व अनुभव करते हैं और उसके चारों ओर अंतरिक्ष में उपग्रहों की गति को देखते हैं। लेकिन यदि पुराणों में पृथ्वी और भू-मण्डल का वर्णन कमल, द्वीप, समुद्र, मेरु, वर्ष और लोकों की व्यवस्था के साथ किया गया है, तो क्या यह आवश्यक है कि उसे उसी भौतिक पृथ्वी की ज्यामितीय आकृति मानकर ही पढ़ा जाए? मेरा मानना है कि नहीं। यही वह बिंदु है जहाँ आधुनिक मनुष्य को अपनी दृष्टि का विस्तार करना होगा।

सनातन वैदिक दर्शन में किसी वस्तु का केवल स्थूल रूप ही उसका सम्पूर्ण सत्य नहीं माना गया। मनुष्य स्वयं इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। बाहर से दिखाई देने वाला मनुष्य पंचमहाभूतों से निर्मित स्थूल शरीर है। लेकिन क्या मनुष्य केवल शरीर है? शरीर में प्राण है, मन है, बुद्धि है, अहंकार है और आत्मतत्त्व का प्रश्न है। मृत्यु के बाद वही पंचमहाभूत तत्काल समाप्त नहीं हो जाते। शरीर के अधिकांश भौतिक घटक वहीं रहते हैं, लेकिन जीवित मनुष्य और मृत शरीर में जो मूल अंतर उत्पन्न होता है, वह केवल आँख से देखकर नहीं समझा जा सकता। इसीलिए उपनिषद् बार-बार उस तत्त्व की खोज करते हैं जिसके कारण मन सोचता है, प्राण कार्य करता है और इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों को ग्रहण करती हैं।

केनोपनिषद् पूछता है—“केनेषितं पतति प्रेषितं मनः?” अर्थात् मन किसके द्वारा प्रेरित होकर अपने विषय की ओर जाता है? आगे वही उपनिषद् कहता है—“श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनः” अर्थात् वह कान का कान और मन का मन है (केनोपनिषद् 1.1–1.2)। यह किसी शरीर के भीतर बैठे हुए दूसरे भौतिक अंग का वर्णन नहीं है। यह आत्मतत्त्व की ओर संकेत है।

यदि मनुष्य को केवल उसके स्थूल शरीर से समझना अधूरा है, तो पृथ्वी को केवल उसके भौतिक ग्रह-स्वरूप तक सीमित करना भी उसी प्रकार अधूरा हो सकता है। यही वैदिक और पौराणिक दृष्टि का मूल महत्व है।

हमारे यहाँ प्रकृति को केवल निर्जीव पदार्थों का ढेर नहीं माना गया। सांख्य दर्शन प्रकृति के विकास को पच्चीस तत्त्वों की व्यवस्था से समझाता है। प्रकृति, महत्, अहंकार, मन, इन्द्रियाँ, तन्मात्राएँ, पंचमहाभूत और पुरुष—इन सबके माध्यम से अस्तित्व की संरचना का विवेचन किया जाता है। पंचमहाभूत स्थूल जगत् के आधार हैं, लेकिन मनुष्य की सम्पूर्ण सत्ता को केवल पंचमहाभूतों में समाप्त नहीं कर दिया जाता। पुरुष को चेतन साक्षी के रूप में स्वीकार किया जाता है। यही कारण है कि भारतीय तत्त्वज्ञान स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से आत्मतत्त्व तक जाने का मार्ग खोलता है।

प्राण का भी इसी संदर्भ में अपना महत्व है। प्राण को सांख्य के पच्चीस तत्त्वों में अलग से छब्बीसवाँ तत्त्व नहीं कहा जा सकता, लेकिन उपनिषद् और योग परंपरा में प्राण जीवन-व्यवस्था का अत्यंत महत्वपूर्ण आधार है। कठोपनिषद् कहता है—“न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन। इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ॥” (2.2.5)। मनुष्य केवल प्राण और अपान के कारण नहीं जीता; जिस तत्त्व पर ये आश्रित हैं, जीवन का मूल प्रश्न उससे जुड़ा है।

यही दृष्टि पृथ्वी के संदर्भ में भी लागू होती है। पृथ्वी का स्थूल शरीर है, जिसे आधुनिक विज्ञान माप सकता है। लेकिन उसके आधिदैविक और आध्यात्मिक स्वरूप का प्रश्न अलग है। इसे समझने के लिए पुराणों की भाषा को उसी के संदर्भ में पढ़ना होगा।

भगवान विष्णु के वराहावतार का प्रसंग इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। श्रीमद्भागवत महापुराण के तृतीय स्कन्ध में हिरण्याक्ष द्वारा पृथ्वी को जल में निमग्न किए जाने और भगवान वराह द्वारा उसे ऊपर उठाए जाने का विस्तृत वर्णन मिलता है। उसी वर्णन में पृथ्वी की तुलना कमल से की गई है। यहाँ यदि कोई व्यक्ति केवल आधुनिक पृथ्वी की तस्वीर सामने रखकर पूछे कि “पृथ्वी तो गोल है, फिर कमल कहाँ से आ गया?”, तो वह पुराणीय वर्णन के स्तर को ही नहीं समझ रहा है।

प्रश्न यह नहीं कि पृथ्वी गोल है या कमल। प्रश्न यह है कि पुराण जिस “भू-मण्डल” का वर्णन कर रहा है, वह क्या केवल उसी भौतिक ग्रह की ज्यामितीय आकृति का वर्णन है? पुराणों के पाँचवें स्कन्ध में भू-मण्डल के साथ जम्बूद्वीप, विभिन्न द्वीप, समुद्र, वर्ष और मेरु की जो विस्तृत व्यवस्था आती है, वह साधारण आधुनिक भूगोल की भाषा नहीं है। वह एक व्यापक ब्रह्माण्डीय विन्यास है।

इसीलिए मेरे विचार में पृथ्वी के तीन स्तरों को अलग-अलग समझना आवश्यक है। उसका आधिभौतिक स्वरूप वह है जिसे हम भौतिक इन्द्रियों और वैज्ञानिक उपकरणों से जानते हैं—गोल ग्रह, जिसमें पर्वत, समुद्र, वायुमण्डल और जीवन है। उसका आधिदैविक स्वरूप पुराणों में भू-मण्डल, मेरु, द्वीप, समुद्र, वर्ष और लोकों की व्यवस्था के रूप में सामने आता है। और उसका आध्यात्मिक स्वरूप भूदेवी के रूप में प्रकट होता है—वह पृथ्वी जिसे अथर्ववेद कहता है, “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” (अथर्ववेद 12.1.12)। अर्थात् पृथ्वी मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ।

यहाँ पृथ्वी केवल मिट्टी, पत्थर, जल और गैसों का समूह नहीं रह जाती। वह माता बनती है। यह परिवर्तन केवल भाषा का परिवर्तन नहीं है; यह दृष्टि का परिवर्तन है।

इसी प्रकार सूर्य को केवल गैसों से बना एक तारा मानकर उसकी पूरी वैदिक सत्ता समाप्त नहीं की जा सकती। आधुनिक विज्ञान सूर्य के भौतिक स्वरूप का अध्ययन करता है। लेकिन ऋग्वेद सूर्य को देवता के रूप में सम्बोधित करता है। ऋग्वेद 1.50.8 में “सप्त त्वा हरितो रथे वहन्ति देव सूर्य” आता है। सूर्य के रथ और उसके सात अश्वों का वैदिक वर्णन किसी आधुनिक खगोलीय रिपोर्ट का विकल्प नहीं है, लेकिन इसे केवल इसलिए निरर्थक भी नहीं कहा जा सकता कि सूर्य आज हमें एक तारे के रूप में ज्ञात है। वैदिक वर्णन का आधिदैविक और प्रतीकात्मक स्तर है।

इसी प्रकार गंगा भौतिक रूप से जलधारा है। उसका उद्गम, प्रवाह, जल की रासायनिक संरचना, जलग्रहण क्षेत्र और पारिस्थितिकी विज्ञान के विषय हैं। लेकिन महाभारत में वही गंगा स्त्रीरूप में आती है, शांतनु से विवाह करती है और देवव्रत भीष्म की माता बनती है। यदि गंगा केवल जल है तो उसका स्त्रीरूप कैसे समझेंगे? और यदि वह देवी है तो क्या उसके जलरूप का अस्तित्व समाप्त हो जाता है? दोनों में कोई विरोध नहीं है। एक भौतिक स्वरूप है, दूसरा आधिदैविक।

समुद्र के साथ भी यही बात है। समुद्र भौतिक रूप से जलराशि है, लेकिन समुद्रदेव का वर्णन वैदिक-पौराणिक परंपरा में मिलता है। समुद्रमंथन में समुद्र केवल पानी का विस्तार नहीं रह जाता। उसमें देव और असुर, मन्दराचल, वासुकि, हलाहल, लक्ष्मी, अमृत और धन्वन्तरि की विशाल कथा घटित होती है। यदि कोई व्यक्ति इस कथा को केवल आधुनिक रासायनिक प्रयोग की भाषा में समझना चाहेगा तो वह उसके वास्तविक अर्थ को खो देगा।

सनातन वैदिक दृष्टि में एक ही सत्ता के अनेक स्तर हो सकते हैं। मनुष्य का स्थूल शरीर है, सूक्ष्म व्यवस्था है और आत्मतत्त्व है। पृथ्वी का भौतिक स्वरूप है, आधिदैविक भू-मण्डल है और भूदेवी का आध्यात्मिक आयाम है। सूर्य का भौतिक रूप है और सूर्यदेव का आधिदैविक स्वरूप है। गंगा जलधारा है और गंगा देवी भी है। यह विरोध नहीं, अस्तित्व की बहुस्तरीय समझ है।

यही बात पुराणों के चौदह लोकों के वर्णन में भी दिखाई देती है। भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्य—ऊर्ध्व लोकों की व्यवस्था तथा अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल—अधोलोकों की व्यवस्था पुराणीय साहित्य में विभिन्न रूपों में आती है। इन्हें आधुनिक भौतिक विज्ञान के सात ग्रह ऊपर और सात ग्रह नीचे रखकर समझना उचित नहीं है। लोक की संकल्पना इससे कहीं व्यापक है। यह जीवों, देवताओं, कर्म और अस्तित्व के विभिन्न स्तरों से संबंधित है।

आधुनिक मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह अपनी आँखों की सीमा को अस्तित्व की सीमा समझ बैठता है। जो दिखाई नहीं देता, उसे असत्य मान लेना ज्ञान का सिद्धान्त नहीं हो सकता। आत्मा दिखाई नहीं देती, फिर भी आत्मतत्त्व का प्रश्न समाप्त नहीं होता। वायु दिखाई नहीं देती, लेकिन उसका अस्तित्व है। सूक्ष्म जीव सामान्य आँखों से दिखाई नहीं देते, लेकिन उपकरणों से उनके अस्तित्व का ज्ञान होता है। गुरुत्वाकर्षण को आँख से नहीं देखा जाता, उसके प्रभाव को देखा जाता है। इसलिए प्रत्यक्ष ज्ञान महत्वपूर्ण है, लेकिन प्रत्यक्ष ही सम्पूर्ण प्रमाण नहीं है।

भारतीय प्रमाणशास्त्र ने ज्ञान के लिए प्रत्यक्ष से आगे अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति और अनुपलब्धि जैसे प्रमाणों की भी व्यवस्था की। विशेषतः मीमांसा और वेदान्त की परंपरा में छह प्रमाणों का विवेचन मिलता है। इसका मूल संदेश स्पष्ट है—हर वस्तु का ज्ञान एक ही प्रमाण से प्राप्त नहीं होता।

आत्मतत्त्व को आँख से न देख पाने के कारण उसे असत्य नहीं कहा जा सकता। उसी प्रकार किसी आधिदैविक सत्ता को सामान्य इन्द्रिय से न देख पाने के कारण उसके विषय में शास्त्रीय प्रमाण की चर्चा समाप्त नहीं हो जाती। लेकिन इसका उलटा भी सही है—केवल अदृश्य होने से कोई भी कल्पना सत्य नहीं हो जाती। इसलिए प्रमाण आवश्यक है। यही हमारी प्रमाण-परंपरा की विशेषता है।

मुण्डकोपनिषद् ने ज्ञान को परा और अपरा विद्या में विभाजित करके इसी बात को और ऊँचाई दी। “द्वे विद्ये वेदितव्ये” (1.1.4)—जानने योग्य दो विद्याएँ हैं, परा और अपरा। अपरा विद्या प्रकृति और जगत् के विभिन्न ज्ञान-क्षेत्रों से संबंधित है, जबकि परा विद्या वह है जिसके द्वारा अक्षर ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त होता है। आधुनिक विज्ञान प्रकृति के नियमों को जानने में जितनी भी प्रगति करे, ब्रह्म का प्रश्न उससे अलग और अधिक गहरा प्रश्न है।

इसलिए विज्ञान और धर्म के बीच संघर्ष खड़ा करना भी उचित नहीं है। आधुनिक विज्ञान प्रकृति के भौतिक नियमों को जानता है; वैदिक दर्शन प्रकृति के साथ जीव, प्राण, आत्मतत्त्व, देवता और ब्रह्म के संबंध को समझने का प्रयास करता है। विज्ञान को धर्म का शत्रु बनाना पश्चिमी विचारधाराओं से आया हुआ एक कृत्रिम विभाजन हो सकता है, लेकिन सनातन वैदिक दृष्टि में ऐसा विभाजन मूल नहीं है। हमारे यहाँ ज्ञान का उद्देश्य सत्य की खोज है।

हाँ, आधुनिक विज्ञान को उसकी सीमा में स्वीकार करना चाहिए और उसके द्वारा प्राप्त सत्य को नकारना नहीं चाहिए। पृथ्वी गोल है—इस भौतिक तथ्य को स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए। लेकिन पृथ्वी का गोल होना यह सिद्ध नहीं करता कि उसके अस्तित्व का केवल यही एक स्वरूप है। इसी प्रकार पुराणों में कमलाकार भू-मण्डल का वर्णन मिलने से यह निष्कर्ष भी नहीं निकालना चाहिए कि आधुनिक खगोल विज्ञान द्वारा ज्ञात पृथ्वी गोल नहीं है। दोनों को एक ही स्तर का वर्णन मानना ही मूल भूल है।

हमारे ऋषियों ने प्रकृति को एक ही आँख से नहीं देखा। उन्होंने अग्नि में केवल ताप नहीं देखा, सूर्य में केवल प्रकाश नहीं देखा, जल में केवल रासायनिक यौगिक नहीं देखा और पृथ्वी में केवल मिट्टी-पत्थर नहीं देखा। उन्होंने प्रकृति के पीछे व्यवस्था देखी, व्यवस्था के पीछे शक्ति देखी और शक्ति के पीछे परम तत्त्व का प्रश्न उठाया। यही वैदिक दर्शन की व्यापकता है।

धर्म का संबंध भी इसी “धारण” से है। पतञ्जलि के अष्टांग योग में धारणा छठे क्रम पर आती है—“देशबन्धश्चित्तस्य धारणा” (योगसूत्र 3.1)। चित्त को किसी निश्चित विषय में बाँधना धारणा है। इसके बाद ध्यान और समाधि की अवस्था आती है। इसका अर्थ किसी बात को आँख मूँदकर मान लेना नहीं है। ऋषि-दृष्टि के लिए चित्त की स्थिरता आवश्यक है। जिस व्यक्ति का मन प्रत्येक क्षण एक विषय से दूसरे विषय में भाग रहा हो, वह स्थूल वस्तु को भी पूरी तरह नहीं देख सकता, फिर सूक्ष्म सत्य को कैसे देखेगा?

इसीलिए वैदिक ज्ञान-पद्धति में ज्ञेय के साथ ज्ञाता का भी परिष्कार आवश्यक माना गया। संसार को देखने वाले उपकरण केवल बाहर नहीं हैं; मनुष्य स्वयं भी एक उपकरण है। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और अंततः आत्मतत्त्व—इन सबका विचार किए बिना ज्ञान की यात्रा अधूरी रह जाती है।

आज का मनुष्य अपनी सभ्यता को आधुनिक कहकर गर्व करता है। इसमें कोई आपत्ति नहीं कि उसने महान उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। लेकिन यह मान लेना कि वर्तमान सभ्यता मानव इतिहास की अंतिम और सर्वोच्च अवस्था है, स्वयं एक प्रकार का अहंकार है। मानव इतिहास में अनेक सभ्यताएँ उठीं और समाप्त हुईं। पुराणीय समय-दृष्टि तो इससे भी आगे जाकर युग, मन्वन्तर और कल्प की विशाल काल-व्यवस्था प्रस्तुत करती है। इसलिए आज की सभ्यता का अस्तित्व सम्पूर्ण सृष्टि की अंतिम उपलब्धि नहीं माना जा सकता।

भविष्य में विज्ञान आज की अनेक धारणाओं को संशोधित कर सकता है। नई खोजें वर्तमान सिद्धान्तों को और व्यापक बना सकती हैं। इसका अर्थ विज्ञान का अपमान नहीं, बल्कि ज्ञान की स्वाभाविक यात्रा है। विज्ञान की शक्ति ही यह है कि वह प्रमाण के आधार पर अपने निष्कर्षों को सुधार सकता है। लेकिन विज्ञान की इस परिवर्तनशीलता को समझे बिना उसके वर्तमान निष्कर्षों को सृष्टि का अंतिम सत्य घोषित कर देना उचित नहीं है।

सनातन वैदिक दर्शन इससे कहीं आगे का प्रश्न करता है—जो मनुष्य संसार को देख रहा है, वह स्वयं कौन है? जिस मन से हम प्रकृति को समझते हैं, उसका आधार क्या है? जिस प्राण से शरीर चलता है, उसका मूल क्या है? जिस आत्मतत्त्व के कारण जीवित और मृत शरीर में इतना बड़ा अंतर उत्पन्न होता है, वह क्या है? और जिस ब्रह्म से यह सम्पूर्ण सृष्टि उत्पन्न, स्थित और लीन होती है, उसका स्वरूप क्या है?

यही कारण है कि वेदों को केवल प्राचीन ग्रंथों का संग्रह मान लेना उनके महत्व को सीमित करना है। वेद अपौरुषेय कहे गए हैं क्योंकि ऋषियों को उनका मन्त्रद्रष्टा माना गया है। ऋषियों ने कोई नया दर्शन बनाकर संसार पर आरोपित नहीं किया; उन्होंने सृष्टि के सनातन तत्त्वों का साक्षात्कार किया और उन्हें श्रुति-परंपरा में सुरक्षित रखा। बाद की स्मृति, दर्शन और पुराण परंपराओं ने उन्हीं व्यापक तत्त्वों को विभिन्न रूपों में समझाया।

इसलिए आज आवश्यकता किसी नए दर्शन का नाम देने की नहीं है। आवश्यकता उस सनातन वैदिक दर्शन को उसकी मूल व्यापकता में समझने की है। पृथ्वी को केवल ग्रह मानकर रुक जाना अधूरा है, जैसे मनुष्य को केवल शरीर मानकर रुक जाना अधूरा है। भौतिक पृथ्वी का गोल स्वरूप सत्य है; उसके आधिदैविक भू-मण्डल और आध्यात्मिक भूदेवी के स्वरूप पर शास्त्र के आधार पर विचार करना भी आवश्यक है।

अंततः प्रश्न यह नहीं है कि आधुनिक मनुष्य ने पृथ्वी की तस्वीर अंतरिक्ष से देख ली, इसलिए अब पृथ्वी के बारे में कहने के लिए कुछ बचा नहीं। प्रश्न यह है कि अंतरिक्ष से दिखाई देने वाली पृथ्वी क्या पृथ्वी का सम्पूर्ण स्वरूप है?

यदि मनुष्य का शरीर दिखाई देने वाला पंचमहाभूतात्मक शरीर होने के बावजूद केवल शरीर नहीं है, यदि गंगा दिखाई देने वाली जलधारा होने के बावजूद गंगा देवी के रूप में भी पूजित है, यदि सूर्य भौतिक तारा होने के साथ सूर्यदेव के रूप में भी वैदिक वाङ्मय में प्रतिष्ठित है, तो पृथ्वी को केवल उसके भौतिक गोलाकार स्वरूप तक सीमित कर देना भी वैदिक दृष्टि की व्यापकता को स्वीकार न करना होगा।

सनातन वैदिक दर्शन हमें दृश्य का निषेध नहीं सिखाता। वह दृश्य के पार देखने की दृष्टि देता है। वह कहता है—स्थूल को जानो, सूक्ष्म को खोजो, आधिदैविक व्यवस्था को समझो और अंततः आत्मतत्त्व तथा ब्रह्म की ओर जाओ। पृथ्वी गोल है—यह उसके भौतिक स्वरूप का ज्ञान है। पुराणों का पद्माकार भू-मण्डल—उसके आधिदैविक स्वरूप की ओर संकेत करने वाला वर्णन हो सकता है। भूदेवी—उसके आध्यात्मिक आयाम का व्यक्त रूप है।

यही पिण्ड और ब्रह्माण्ड को एक-दूसरे से जोड़ने वाली दृष्टि है। यही परा और अपरा विद्या का अंतर है। यही प्रत्यक्ष से आगे अनुमान और शब्द-प्रमाण तक जाने की आवश्यकता है। यही धारणा से ध्यान और समाधि तक जाने वाली साधना है। और यही वह वैदिक दृष्टि है जो मनुष्य को यह समझाती है कि जो कुछ आँख से दिखाई देता है, वह सत्य का एक स्तर हो सकता है; सम्पूर्ण सत्य आवश्यक रूप से केवल वही नहीं होता।

संदर्भ: ऋग्वेद 1.50.8; अथर्ववेद 12.1.12; केनोपनिषद् 1.1–1.2; कठोपनिषद् 2.2.5; तैत्तिरीयोपनिषद् 2.1, 2.6; छान्दोग्य उपनिषद् 6.2.1; मुण्डकोपनिषद् 1.1.4–5; श्वेताश्वतरोपनिषद् 4.10; भगवद्गीता 8.1–4, 14.5; पतञ्जलि योगसूत्र 1.7, 2.29, 3.1–3.3; सांख्य परंपरा के पच्चीस तत्त्व; श्रीमद्भागवत महापुराण, तृतीय स्कन्ध अध्याय 13 तथा पंचम स्कन्ध; विष्णु पुराण, द्वितीय अंश; महाभारत, आदिपर्व—गंगा एवं शांतनु प्रसंग।

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