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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
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लेखक: सुमित गर्ग
भारत ने सदियों तक जाति, धर्म और भाषा के नाम पर विभाजन की त्रासदी झेली है। अब एक नया, उतना ही खतरनाक विभाजन क्षितिज पर उभर चुका है — आयु के आधार पर समाज को बाँटने का प्रयास। जून-जुलाई 2026 में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए तथाकथित "जेन ज़ी" आंदोलन ने आयु के आधार पर वर्ग संघर्ष की इस प्रवृत्ति को राष्ट्रीय पटल पर ला खड़ा किया। यह आवश्यक है कि इस घटनाक्रम का विश्लेषण भावुकता से नहीं, बल्कि तथ्यों और दूरदर्शिता से किया जाए। पूरे समाज को एक विशेष आयु वर्ग के विरुद्ध खड़े करने के प्रयास को असफल करने के लिए ये अत्यंत आवश्यक है।
घटनाक्रम की पृष्ठभूमि
मई 2026 में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की एक टिप्पणी को आधार बनाकर विवाद खड़ा किया गया। इस टिप्पणी का लाभ उठाते हुए एक व्यक्ति ने, अमेरिका से लौट कर जून की शुरुआत में जंतर-मंतर पर एक आंदोलन का आह्वान किया। इसे "कॉकरोच जनता पार्टी" नाम दिया गया। धीरे-धीरे यह आंदोलन टिप्पणी से हटकर शिक्षा व्यवस्था, विशेषकर नीट परीक्षा से जुड़ी अनियमितताओं के विरुद्ध असंतोष से जुड़ गया। नीट की परीक्षा को मुद्दा बनाने के कारण इसे एक विशेष आयु वर्ग से जोड़ दिया गया। आंदोलन आगे बढ़ने के साथ साथ यह आयु वर्ग स्वयं को देश का सबसे बड़ा पीड़ित, शोषित, वंचित वर्ग दिखाने लगा। एक ऐसा वातावरण बना दिया गया जैसे राष्ट्र में इस वर्ग की पीड़ा के अतिरिक्त और कोई समस्या ही नहीं है।
आंदोलन का अपहरण: कौन बोल रहा है, किसके लिए?
ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि इस आंदोलन के अधिकांश प्रमुख चेहरे न तो विशुद्ध रूप से "जेन ज़ी" प्रतिनिधि हैं, न ही राजनीतिक महत्वाकांक्षा से मुक्त। नेतृत्वकर्ता स्वयं राजनीतिक संचार पृष्ठभूमि से आया, और आंदोलन के दौरान अनेक राजनीतिक दलों — चाहे वे सत्तापक्ष के प्रतिद्वंद्वी हों या क्षेत्रीय दल — ने इसे अपने-अपने ढंग से भुनाने का प्रयास किया। दक्षिण भारत के क्षेत्रीय दल के एक नेता ने खुले तौर पर नेपाल और श्रीलंका के आंदोलनों की तर्ज़ पर "जेन ज़ी विद्रोह" का आह्वान कर विवाद खड़ा किया, जिस पर सत्तारूढ़ दल ने हिंसा भड़काने का आरोप लगाया। यह स्पष्ट करता है कि "जेन ज़ी" शब्द अब एक जनसांख्यिकीय वर्णन मात्र नहीं रहा — यह एक राजनीतिक हथियार बन चुका है, जिसे विभिन्न स्वार्थी शक्तियाँ अपनी सुविधा अनुसार प्रयोग कर रही हैं।
यह भी उल्लेखनीय है कि आंदोलन के पश्चात सत्तारूढ़ दल सहित लगभग सभी राजनीतिक दलों ने "युवाओं से जुड़ने" के नाम पर रील्स, स्लैंग और सोशल मीडिया रणनीतियों में भारी परिवर्तन किया। यह दृश्य अत्यंत विचित्र है — एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में नीति और शासन के गंभीर प्रश्नों को "कूल" दिखने की प्रतिस्पर्धा में बदल दिया गया, मानो सरकार चलाना किसी सोशल मीडिया ट्रेंड को पकड़ने की कवायद हो।
आयु के आधार पर अधिकार-वंचना: एक खतरनाक तर्क
इस पूरे प्रकरण में सबसे चिंताजनक पहलू यह उभरा है कि किसी विशेष आयु-वर्ग से बाहर के नागरिकों — अगर वे तीस - चालीस वर्ष से अधिक आयु के हों — को मानो राष्ट्रीय संसाधनों, निर्णय-प्रक्रिया और सार्वजनिक विमर्श में भाग लेने के अधिकार से वंचित करने का भाव प्रकट किया जा रहा है। "बूमर", "आउटडेटेड", "इनका ज़माना गया" जैसी शब्दावली का प्रयोग एक सुनियोजित रणनीति प्रतीत होती है, जिसका उद्देश्य अनुभव, ज्ञान और दीर्घकालिक दायित्व-बोध रखने वाली पीढ़ियों की वैधता को चुनौती देना है।
यह ठीक वही मानसिक संरचना है जो ऐतिहासिक रूप से जाति और वर्ण-आधारित भेदभाव में देखी गई — किसी समूह की योग्यता, विचार अथवा अधिकार का निर्धारण उसके जन्म की परिस्थिति (चाहे वह कुल हो या जन्म-वर्ष) के आधार पर करना, न कि उसके योगदान, चरित्र या तर्क के आधार पर। जिस प्रकार जाति-व्यवस्था ने व्यक्ति को उसके गुण-कर्म से पृथक कर जन्म से बाँधा, उसी प्रकार यह नवीन "आयुवाद" (एजिज़्म) किसी व्यक्ति के मत का मूल्य उसकी जन्मतिथि से तय करना चाहता है। यह प्रवृत्ति भारतीय समाज के लिए उतनी ही विषाक्त है जितनी कोई भी अन्य भेदभावकारी संरचना।
वोट-बैंक बनाम ब्लैकमेल: एक संवैधानिक प्रश्न
लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक-समूह को अपनी माँगें रखने और विरोध प्रदर्शन करने का पूर्ण अधिकार है — यह संविधान की मूल भावना है। परंतु किसी समूह की संख्यात्मक शक्ति अथवा चुनावी महत्व उसे यह अधिकार नहीं देता कि वह संपूर्ण राष्ट्रीय व्यवस्था को बंधक बना ले या अनुचित माँगों को स्वीकार कराने हेतु सड़कों पर उपद्रव को नीति-निर्माण का माध्यम बना दे। जब आंदोलन के दौरान संसद मार्ग पर पुलिस बल प्रयोग, टकराव और अराजकता की स्थिति निर्मित हुई, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है — क्या यह वास्तव में विद्यार्थियों का शांतिपूर्ण असंतोष था, या इसे किसी सुनियोजित उद्देश्य से एक निश्चित बिंदु तक उग्र बनाया गया?
लोकतंत्र में सरकार को जनदबाव के आगे झुकना और न झुकना, दोनों ही परिस्थिति-सापेक्ष निर्णय होने चाहिए — तर्क, तथ्य और दीर्घकालिक राष्ट्रहित के आधार पर, न कि इस भय से कि कोई समूह विशेष "वोट बैंक" है। जिस दिन नीति-निर्माण सड़क के शोर से तय होने लगेगा, उस दिन संस्थागत लोकतंत्र की नींव ही कमज़ोर हो जाएगी।
असली युवा शक्ति बनाम राजनीतिक अपहरणकर्ता
यह रेखांकित करना अनिवार्य है कि भारत के करोड़ों वास्तविक युवा — जो प्रयोगशालाओं में, खेतों में, कार्यालयों में, खेल के मैदान में, स्टार्टअप्स में और सेना में दिन-रात परिश्रम कर रहे हैं — इस शोरगुल का हिस्सा नहीं हैं। उनकी पहचान को कुछ मुट्ठी भर राजनीतिक महत्वाकांक्षी व्यक्तियों, अपरिपक्व किशोरों और संभवतः बाहरी हितों से प्रेरित तत्वों द्वारा अपहृत नहीं किया जाना चाहिए। भारत की जनसंख्या का लगभग पैंसठ प्रतिशत भाग पैंतीस वर्ष से कम आयु का है — यह विशाल जनसांख्यिकीय पूँजी राष्ट्र-निर्माण के लिए है, विध्वंस के लिए नहीं।
समय की माँग है कि भारत का वास्तविक, परिश्रमी युवा वर्ग संगठित हो और स्पष्ट स्वर में यह कहे कि उसका प्रतिनिधित्व वे तत्व नहीं करते जो अराजकता, अनुशासनहीनता और राजनीतिक स्वार्थ को "जेन ज़ी अस्मिता" के नाम पर बेच रहे हैं। वास्तविक युवा शक्ति वह है जो संस्थाओं के भीतर सुधार करती है, जो तर्क और परिश्रम से आगे बढ़ती है, जो अपनी पीढ़ी को अगली पीढ़ी और पिछली पीढ़ी दोनों से जोड़ती है — विभाजित नहीं करती।
निष्कर्ष: पीढ़ी नहीं, चरित्र होना चाहिए मापदंड
भारतीय समाज ने जाति और धर्म के नाम पर विभाजन झेला है; अब उसे आयु के नाम पर एक नए विभाजन की अनुमति नहीं देनी चाहिए। किसी विचार, माँग अथवा नेतृत्व का मूल्यांकन उसकी सत्यता, तर्कसंगतता और राष्ट्रहित के आधार पर होना चाहिए — इस आधार पर नहीं कि वह किस जन्म-वर्ष के मुख से निकला है। भारत को एक ऐसे विमर्श की आवश्यकता है जो पीढ़ियों को जोड़े, न कि तोड़े — जहाँ अनुभव और ऊर्जा, दोनों को समान सम्मान मिले। यही सच्चे राष्ट्र-निर्माण का मार्ग है।
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