सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

रक्षाबंधन

रक्षाबंधन (१)
हमारे कुछ सबसे काव्यात्मक पर्वों में से एक राखी आने वाली है। आज से कुछ दिनों तक इस पर्व की अवधारणा को विकृत करने वाले उलटपंथियों के दिमाग की गंदगी की परीक्षा करेंगे। यह एक उदाहरण ही पर्याप्त होगा कि कैसे ये घिनौने लोग अपने मन की मलिनता को हमारे पवित्रतम अनुष्ठानों पर आरोपित करते रहे हैं।  

एक उलटपंथी नारीवादी कार्यकर्ता हैं। उनका तर्क है कि महिलाओं से कहा जाता है कि सुरक्षा के लिए उनकी स्वतंत्रता, आवाजाही और चुनाव सीमित किए जाएँ। अपनी रक्षा के लिए तुम्हें बंधन में रहना होगा।यह व्यवस्था स्त्री को नहीं, पितृसत्ता और जाति-पदानुक्रम को सुरक्षित रखती है। भाई को बहन का “कीपर” माना जाता है। (Rape and Rakhi – Patriarchal-Communal Narratives (Kafila / Liberation, 2014); TOI साक्षात्कार (2019)।

Gendering Caste में यही मोहतरमा बताती हैं कि राखी के साथ यह भाव जुड़ जाता है कि भाई बहन को “गलत” जाति/समुदाय के प्रेम से रोके, उसकी पवित्रता की निगरानी करे। स्वतंत्र यौन/वैवाहिक चुनाव को सामाजिक व्यवस्था का विघटन माना जाता है।
अब इन मोहतरमा( हाँ मैं नाम नहीं ले रहा) को कौन समझाये कि रक्षा’ और ‘बंधन’ को एक-दूसरे का पर्याय बना देना भाषाशास्त्रीय रूप से भी संदिग्ध है। ‘रक्षाबन्धन’ एक समासिक पद है—रक्षा + बन्धन।रक्षा का अर्थ संरक्षण, safeguarding, preservation, सुरक्षा आदि से जुड़ा है।बन्धन का अर्थ केवल imprisonment या restriction नहीं है। संस्कृत-हिन्दी में बन्धन का अर्थ जोड़ना, बाँधना, सम्बन्धित करना, प्रतिबद्ध करना, संलग्न करना भी है। अर्थात् “बंधन” का semantic field केवल कारागार नहीं है।विवाह -बंधन में विवाह को जेल नहीं कहा जाता।स्नेह-बंधन में स्नेह को कैद नहीं कहा जाता।कर्तव्य-बन्धन में कर्तव्य को कारावास नहीं कहा जाता।मातृभूमि से बंधे होने का अर्थ नागरिक का कैदी होना नहीं।ऋणानुबंध का अर्थ debtor's prison नहीं।बंधन का एक अर्थ restraint है; दूसरा relation है।और रक्षाबंधन का cultural meaning इसी ambiguity की उत्पादकता में है।वास्तव में अनुष्ठान का सूत्र दोनों को एक साथ रखता है—रक्षा के लिए बाँधना और सम्बन्ध के लिए बाँधना।

इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि रक्षा स्वयं किसे बाँधती है? मोहतरमा की व्याख्या में मुख्यतः बहन बंधती हुई दिखाई देती है। लेकिन अनुष्ठान की  यह रीडिंग वे क्यों नहीं करतीं कि यहां बहन राखी बाँधती है।किसकी कलाई पर? भाई की। और कौन वचन देता है?भाई। यदि इसे शक्ति-सम्बन्ध के रूप में पढ़ना ही है, तो एक विचित्र उलटाव सामने आता है। राखी बहन को नहीं, पहले भाई को obligation में बाँधती है।भाई की कलाई पर धागा है।वचन उसका है।कर्तव्य उसका है।संकट में उत्तरदायित्व उसका है।यदि इसे केवल patriarchy कहना है तो पहले यह समझाना होगा कि किसी पुरुष को किसी स्त्री के प्रति सार्वजनिक नैतिक दायित्व में बाँधना किस अर्थ में पुरुष की सत्ता को बढ़ाता है?यह सत्ता तभी बनती है जब “रक्षा” को “अधिकार” में बदल दिया जाए। लेकिन मूल अनुष्ठान बहन भाई को अधिकार नहीं देती; उससे उत्तरदायित्व लेती है।

और भारतीय रक्षासूत्र की पुरानी कल्पना तो इससे भी व्यापक है।यहाँ रक्षाबंधन को केवल आधुनिक भाई-बहन के रूप में पढ़ना इतिहास को छोटा करना होगा।रक्षासूत्र की परम्परा में सुरक्षा का सम्बन्ध केवल स्त्री से नहीं रहा।एक प्रसिद्ध पारम्परिक मन्त्र है—

येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥

इसमें रक्षासूत्र बाँधने का सूत्र राजा बलि के प्रसंग से जोड़ा जाता है। और रक्षासूत्र की परम्पराओं में इन्द्राणी द्वारा इन्द्र को रक्षा-सूत्र बाँधने की कथा भी मिलती है। अर्थात् यहाँ एक अत्यन्त शक्तिशाली पुरुष—इन्द्र—को एक स्त्री द्वारा रक्षा-सूत्र बाँधा जाता है। यहाँ मोहतरमा की आधुनिक binary थोड़ी असहज हो जाती है।यदि स्त्री द्वारा पुरुष को बाँधा गया रक्षा-सूत्र भी ‘रक्षा’ है, तो ‘रक्षा = पुरुष द्वारा स्त्री का संरक्षण’ कहना रक्षासूत्र की पूरी सांस्कृतिक genealogy को संकुचित करना है।यह तथ्य रक्षाबंधन के आधुनिक भाई-बहन रूप को निरस्त नहीं करता। लेकिन यह बताता है कि उसका symbolic grammar केवल patriarchal protection तक सीमित नहीं है।

किसी अवधारणा का दुरुपयोग उस अवधारणा को अमान्य नहीं करता।राज्य सुरक्षा देता है। राज्य कभी-कभी सुरक्षा के नाम पर स्वतंत्रता भी सीमित करता है।क्या इसलिए “public safety” की अवधारणा ही गलत है? पति पत्नी की देखभाल करता है।कभी वही देखभाल control बन सकती है।
क्या इसलिए care itself patriarchal है?नहीं।माता बच्चे की सुरक्षा करती है।कभी वही protection overprotection बन सकती है।क्या इसलिए मातृत्व oppressive है?नहीं।समस्या है—protection का transformation into control. इसलिए वास्तविक आलोचना का लक्ष्य “रक्षा” नहीं, protective paternalism होना चाहिए था। मोहतरमा राखी के ही पीछे पड़ गईं। 

मादाम को दो अलग वस्तुओं को अलग रखना समझ नहीं आता है—ritual brotherhood और kinship surveillance।पहला सांस्कृतिक अनुष्ठान है।दूसरा सामाजिक सत्ता-संरचना।दोनों कई बार ऐतिहासिक रूप से overlap कर सकते हैं।लेकिन overlap identity नहीं है।यदि कोई राजा मंदिर में जाकर पूजा करता है और उसी राज्य में अत्याचार भी करता है, तो मंदिर-पूजा और अत्याचार को एक ही चीज़ घोषित नहीं किया जा सकता।उसी तरह भाई का protective role और भाई का controlling role समान नहीं हैं।

यदि हर asymmetrical obligation को power relation मान लिया जाए, तो प्रेम की विशिष्टता खोने लगती है।माँ-बेटे का सम्बन्ध।दादा-पोती का सम्बन्ध।बड़े भाई-छोटी बहन का सम्बन्ध।वृद्ध माता-पिता की देखभाल।इन सबमें obligations समान नहीं होते।कभी एक देता है, दूसरा लेता है।कभी दूसरा देता है।कभी दोनों अलग-अलग चीजें देते हैं।मानवीय सम्बन्ध perfect reciprocity पर नहीं टिके होते।Marcel Mauss के gift-exchange की भाषा में कहें तो gift कभी केवल वस्तु नहीं होता; वह obligation और सम्बन्ध भी उत्पन्न करता है। राखी का उपहार भी केवल आर्थिक लेन-देन नहीं है।बहन राखी बाँधती है।भाई उपहार देता है।लेकिन असली exchange वस्तुओं का नहीं, स्मृति और दायित्व का है।इसलिए उसे capitalist transaction या patriarchal contract में घटा देना उसकी relational economy को कम करना है।

बहन इस त्यौहार में passive है? यह प्रश्न अक्सर छूट जाता है।वह केवल “protection मांगने वाली” नहीं है।वह ritual की initiator है।वह सूत्र चुनती है।वह भाई की कलाई पर बाँधती है।वह मंगलकामना करती है।वह भाई के जीवन में अपनी उपस्थिति को पुनर्स्थापित करती है।वह उसे एक नैतिक स्मृति से बाँधती है।यहाँ agency कहाँ गई? राखी का अनुष्ठान बहन को केवल protected subject बनाता है—यह निष्कर्ष अनुष्ठान की performative structure को पर्याप्त ध्यान से नहीं पढ़ता।

‘सुरक्षा’ और ‘स्वतंत्रता’ विरोधी नहीं हैं, मादाम।आपका सबसे बड़ा conceptual error यहीं है। कुछ विमर्श ऐसे प्रस्तुत होते हैं मानो— freedom या protection।लेकिन सभ्य समाज में लक्ष्य है— freedom through protection. संविधान नागरिक को स्वतंत्रता देता है।और उसी संविधान के तहत राज्य सुरक्षा देता है। महिला रात में सड़क पर चल सके—यह freedom है।उस सड़क पर पर्याप्त lighting, policing और transport हो—यह protection है।दोनों एक-दूसरे के शत्रु नहीं।यदि सड़क असुरक्षित है तो “स्वतंत्रता” केवल कागज पर रह जाती है।यदि सुरक्षा के नाम पर सड़क पर जाने से ही रोक दिया जाए, तो protection freedom को खा जाती है।इसलिए सही सिद्धान्त है—
सुरक्षा ऐसी हो जो स्वतंत्रता की पूर्वशर्त बने, उसका विकल्प नहीं।यही सिद्धान्त रक्षाबंधन पर भी लागू होता है।

‘बेटी को मत जाने दो’ और ‘मैं उसके साथ जाऊँगा’ में civilisation का फर्क है।दो वाक्य हैं।पहला—“रात में मत निकलो; बाहर खतरा है।”दूसरा—“रात में तुम्हें निकलना है तो मैं सुनिश्चित करूँगा कि तुम सुरक्षित पहुँचो।पहला restriction है।दूसरा protection।पहला agency घटाता है।दूसरा agency को सम्भव बनाता है।इसलिए प्रश्न यह नहीं कि “क्या सुरक्षा है?” प्रश्न यह है—
सुरक्षा की कीमत कौन चुका रहा है? यदि सुरक्षा की कीमत स्त्री की स्वतंत्रता है—तो वह दमन है। यदि सुरक्षा की कीमत रक्षक का अपना श्रम, समय, साहस और जोखिम है—तो वह दायित्व है। पितृसत्ता स्त्री से स्वतंत्रता छीनकर सुरक्षा देती है; स्नेह के डोरे का रक्षक स्वयं जोखिम लेकर सुरक्षा देता है। दोनों को एक ही नाम देना विश्लेषण के नाम पर मजाक है।

किसी विवाह का आदर्श यह नहीं बताता कि हर विवाह आदर्श है।किसी मातृत्व का आदर्श यह नहीं बताता कि हर माँ आदर्श है।किसी गुरु-शिष्य परम्परा का आदर्श यह नहीं बताता कि हर गुरु नैतिक है। उसी प्रकार राखी का symbolic ideal यह प्रमाणित नहीं करता कि हर भाई protective, loving या just है।अनुष्ठान normative aspiration है, empirical census नहीं। यह distinction anthropology में बहुत महत्त्वपूर्ण है।किसी संस्कृति का ritual यह बताता है कि समाज किस सम्बन्ध को किस प्रकार अर्थवान बनाना चाहता है; वह यह प्रमाणपत्र नहीं देता कि समाज का हर सदस्य वास्तव में हमेशा वैसा ही व्यवहार करता है।

सबसे दिलचस्प यह है कि इस पर्व में ‘रक्षा’ स्वयं स्त्री के हाथ से शुरू होती है।यहाँ gender symbolism फिर उलट जाता है।राखी कौन बाँधता है?बहन।किसे? भाई को। किसे संकल्पित करता है? भाई को।अर्थात् ritual agency स्त्री के हाथ में है।इससे यह सिद्ध नहीं होता कि रक्षाबंधन पूर्णतः feminist ritual है।ऐसा दावा भी अतिशयोक्ति होगा।
लेकिन इतना अवश्य सिद्ध होता है कि इसे केवल—“पुरुष शक्तिशाली → स्त्री कमजोर → पुरुष स्त्री की रक्षा करता है” की एकरेखीय कथा में समेटना मूर्खता है।

भारतीय धार्मिक imagination में स्त्री केवल protected नहीं है।वह protector भी है।दुर्गा रक्षिका है।काली संहारिका है।चण्डिका दैत्यविनाशिनी है।इन्द्राणी इन्द्र को रक्षा-सूत्र बाँधती है।और देवी की उपासना में स्वयं पुरुष भक्त protection माँगता है।अर्थात् भारतीय symbolic universe में—स्त्री = protected इतना ही समीकरण नहीं है।
बल्कि—स्त्री = protector, शक्ति, जननी, ज्ञान, सम्पदा और संहारिणी भी है।इसलिए रक्षाबंधन को भारतीय स्त्री-सांस्कृतिक अनुभव की संपूर्ण व्याख्या बना देना उतना ही गलत होगा जितना उसे patriarchal prison का पूरा blueprint मान लेना।

रक्षा बंधन है—लेकिन किसका? भाई को बहन के प्रति? हाँ। पर बहन को भी भाई के प्रति।नैतिकता को व्यक्ति के प्रति।राज्य को नागरिक के प्रति।सत्ता को मर्यादा के प्रति।मनुष्य को अपने दायित्व के प्रति।और यहीं “बंधन” का अर्थ imprisonment से हटकर ethical binding हो जाता है। किसी को दूसरे के दुःख के प्रति बाँध देना कैद नहीं है।करुणा भी एक बंधन है।कर्तव्य भी।प्रेम भी।
प्रतिज्ञा भी।संविधान भी—एक अर्थ में।

हमें झूठे द्वैतों से बचना होगा। एक कहता है-पुरुष रक्षक है, इसलिए स्त्री कमजोर है।दूसरा कहता है— पुरुष की protective भूमिका है, इसलिए वह patriarchal है। दोनों गलत हैं।पहला biological determinism है।दूसरा interpretive determinism।वास्तविकता अधिक जटिल है।एक पुरुष अपनी बहन से अत्यन्त प्रेम कर सकता है और उसके जीवन पर कोई नियंत्रण न रखे।एक भाई “रक्षा” के नाम पर हिंसक नियंत्रक भी हो सकता है।एक ही ritual दो अलग सामाजिक contexts में दो अलग अर्थ ग्रहण कर सकता है।सांस्कृतिक प्रतीक का अर्थ उसके उपयोग से बनता है, लेकिन उसका अर्थ केवल उसके सबसे बुरे उपयोग से तय नहीं होता।

यदि बंधन का हर अर्थ दमन मान लिया है तो समाज बचेगा कैसे? मानव समाज पूर्ण autonomy पर नहीं चलता।हर सम्बन्ध कुछ obligations उत्पन्न करता है।माता-पिता का दायित्व।संतान का दायित्व।नागरिक का दायित्व।न्यायाधीश का दायित्व।डॉक्टर का दायित्व।सैनिक का दायित्व।पति-पत्नी का दायित्व।मित्र का दायित्व।भाई-बहन का दायित्व।यदि हर obligation को “restriction of freedom” कह दिया जाए तो समाज में केवल atomised individuals बचेंगे।मानव व्यक्ति स्वतंत्र है—लेकिन relational भी है।पूर्ण स्वतंत्रता का व्यक्ति एक दार्शनिक abstraction है; वास्तविक मनुष्य सम्बन्धों में जीता है।

रक्षाबंधन इसी relational anthropology का उत्सव है।

टिप्पणियाँ