- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
✍️दीपक कुमार द्विवेदी
जब भी समाज में वैचारिक बहसों के नाम पर किसी एक पक्ष को कटघरे में खड़ा किया जाता है, तब निष्पक्षता और वस्तुनिष्ठता सबसे पहले दम तोड़ती है। 22 अगस्त 2026 को पुणे के एआईएसएसएमएस (AISSMS) ग्राउंड में आयोजित ‘छात्रों की गूँज’ कार्यक्रम में राहुल गांधी ने भारतीय परिवार व्यवस्था और महिलाओं की स्वतंत्रता को लेकर जो तीखे प्रहार किए, उन्होंने इसी चयनात्मक और एकतरफा विमर्श को फिर से हवा दी है। उन्होंने भारतीय परिवार को एक निश्चित चौखटे में कैद और पितृसत्तात्मक बताते हुए महिलाओं को किसी भी पुरुष के नियंत्रण से मुक्त होने का आह्वान किया। यह सोचना भ्रामक है कि स्त्री के अधिकारों और सुरक्षा पर चर्चा गलत है; लोकतंत्र में यह आवश्यक है। लेकिन गंभीर प्रश्न यह है कि जिस कसौटी से भारत और उसके प्राचीन संस्कारों को मापा जा रहा है, क्या वही कठोर पैमाने राहुल गांधी के अपने राजनीतिक विमर्श, वैचारिक स्रोतों और उनके ननिहाल पर भी लागू होते हैं?
इतिहास और तथ्यों के आईने में जब हम इस वैचारिक पाखंड की थाह लेते हैं, तो कई अनुत्तरित प्रश्न सामने आते हैं। राहुल गांधी की मातृभूमि भारत है, किंतु उनका ननिहाल इटली से जुड़ा है; सोनिया गांधी का जन्म 9 दिसंबर 1946 को इटली के लुसियाना, विसेंज़ा में हुआ था, जो कि लोकसभा के आधिकारिक जीवनी अभिलेखों में भी दर्ज है। जिस यूरोपीय समाज को आधुनिक लोकतंत्र और महिला अधिकारों का आदर्श मानकर प्रस्तुत किया जाता है, वहाँ भी महिलाओं को राष्ट्रीय स्तर पर मताधिकार पाने के लिए 1945 तक लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ी थी और 2 जून 1946 को उन्होंने पहली बार राष्ट्रीय चुनाव तथा राजतंत्र-गणराज्य जनमत-संग्रह में मतदान किया था। इसके विपरीत, स्वतंत्र भारत के संविधान ने प्रारंभ से ही स्त्री और पुरुष को समान राजनीतिक नागरिकता और सार्वभौमिक मताधिकार प्रदान किया, जिसके लिए भारत को इटली की तरह दशकों इंतजार नहीं करना पड़ा। आज भारत की संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी को ऐतिहासिक रूप से मजबूत करने के लिए 106वें संविधान संशोधन के माध्यम से एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान लागू किया जा चुका है।
इसके बावजूद, यदि पश्चिमी आँकड़ों और रिपोर्टों को देखें, तो तस्वीर काफी भिन्न दिखाई देती है। 'ओईसीड' (OECD) की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, इटली में पुरुषों और महिलाओं की श्रम-बल भागीदारी के बीच लगभग 18 प्रतिशत अंक का बड़ा अंतर आज भी दर्ज है। वहाँ महिला प्रबंधकीय भागीदारी लगभग 29 प्रतिशत है और बड़ी संख्या में नियोजित महिलाएँ अंशकालिक काम करने को विवश हैं। रिपोर्ट यह भी बताती है कि बच्चों के जन्म के बाद देखभाल का पूरा उत्तरदायित्व आज भी मुख्य रूप से महिलाओं पर ही है। इसके अलावा, मार्च 2026 में प्रकाशित आँकड़ों के अनुसार इटली की महिला रोजगार दर केवल 53.2 प्रतिशत थी, जिसमें पुरुषों की तुलना में 17.8 प्रतिशत अंकों का स्पष्ट अंतर बना हुआ है। ऐसे में, यह एक स्वाभाविक प्रश्न है कि राहुल गांधी अपनी ही ननिहाल की धरती इटली या यूरोपीय समाज की इन पितृसत्तात्मक संरचनाओं और श्रम-बाजार की असमानताओं के खिलाफ आवाज उठाने कब जाएंगे? क्या वे वहाँ जाकर ‘पिंजरा तोड़ो’ या स्वतंत्रता के ऐसे ही किसी अभियान का नेतृत्व करने का साहस कभी दिखाएंगे?
यदि बात इटली और यूरोपीय समाज की हो, तो वहाँ की ऐतिहासिक और सामाजिक संरचना लंबे समय से गहरी पितृसत्तात्मक मान्यताओं और चर्च के काले अध्यायों में जकड़ी रही है। मध्यकालीन रोमन कैथोलिक चर्च और कैनन लॉ (कैनन कानून) के साये में महिलाओं को सदियों तक दोयम दर्जे का नागरिक माना गया, उनकी आत्मा और शरीर पर कड़े पहरे बिठाए गए। यूरोपीय इतिहास में लगभग 1400 से 1775 के बीच 'Witchcraft' (जादूटोना) के झूठे और मनगढ़ंत आरोपों के नाम पर लगभग एक लाख लोगों पर मुकदमे चलाए गए और 40,000 से 60,000 के बीच मासूमों को—जिनमें अधिकांश अभागिन महिलाएँ थीं—अमानवीय यातनाएँ देकर जिंदा जला दिया गया या मृत्युदंड के घाट उतार दिया गया। सोचिए, उन महिलाओं की चीखों, उनकी लाचारी और उनकी टूटी हुई आत्माओं का दर्द क्या कभी किसी सामाजिक न्याय के स्वयंभू योद्धा के दिल को नहीं झकझोरता? चर्च के तहखानों में, मठों के एकांत में और पितृसत्तात्मक धार्मिक विधानों के नाम पर सदियों तक जो अमानवीयता स्त्रियों के साथ हुई, उस दर्दनाक इतिहास पर पर्दा डालकर केवल भारतीय परिवार को निशाना बनाना क्या बौद्धिक बेईमानी नहीं है? आज भी इटली के सामाजिक ताने-बाने में गहरी पितृसत्तात्मक मानसिकता और पारिवारिक दबाव काम करते हैं, जिसके कारण दक्षिणी इटली के कई क्षेत्रों में महिलाएँ आर्थिक रूप से पूरी तरह निष्क्रिय हैं। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि जो लोग भारत के हर परिवार को ‘पिंजरा’ घोषित करने में जरा भी संकोच नहीं करते, वे इटली के इस पितृसत्तात्मक और चर्च-प्रेरित इतिहास पर हमेशा रहस्यमय चुप्पी साध लेते हैं।
यह दोहरा चरित्र केवल राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं है, बल्कि कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की कार्यप्रणाली में भी स्पष्ट झलकता है। सोनिया गांधी के राजनीतिक मार्गदर्शन और उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि में पलने वाली मानसिकता भी इसी पितृसत्तात्मक और वंशवादी व्यवस्था को सुदृढ़ करती रही है। जिस कांग्रेस पार्टी में दशकों से एक ही परिवार का सर्वोच्च वर्चस्व रहा है, वहाँ भी नेतृत्व और अवसरों की समानता का पैमाना नदारद है। बेटा होने के नाते राहुल गांधी बहुत कम उम्र में पार्टी के शीर्ष पदों पर काबिज हो गए, जबकि बेटी होने के नाते प्रियंका गांधी को राजनीतिक मंच पर अपनी जगह बनाने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा। यदि राहुल गांधी वास्तव में परिवार के भीतर और समाज में पितृसत्ता को समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, तो क्या वे अपनी माँ सोनिया गांधी के समक्ष यह प्रस्ताव रखने का नैतिक साहस दिखाएंगे कि अब कांग्रेस पार्टी की पूरी कमान और प्रधानमंत्री पद की दावेदारी उनकी बहन प्रियंका गांधी को सौंपी जाए? जब वे अपने ही राजनीतिक दल और परिवार के भीतर इस वंशवादी और पितृसत्तात्मक व्यवस्था को चुनौती नहीं दे सकते, तो उन्हें भारतीय समाज को उपदेश देने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
भारतीय परिवार व्यवस्था पर प्रहार करने से पहले हमें अपनी दार्शनिक और सांस्कृतिक जड़ों को समझना होगा। भारतीय परंपरा में स्त्री और पुरुष को कभी भी एक-दूसरे का विरोधी या प्रतिद्वंद्वी नहीं माना गया। हमारे यहाँ प्रकृति और पुरुष के सहयोग के बिना सृष्टि के निर्माण की कल्पना ही नहीं की जा सकती यही कारण है कि वेद-पुराणों से लेकर अर्धनारीश्वर की दार्शनिक अवधारणा तक, स्त्री और पुरुष को एक-एक दूसरे का पूरक और पूर्णता प्रदान करने वाली शक्तियों के रूप में देखा गया है। इसके विपरीत, यदि विश्व की अन्य धार्मिक और वैचारिक परंपराओं का ऐतिहासिक अवलोकन किया जाए, तो बाइबल की कथाओं में भी जहाँ स्त्री की उत्पत्ति आदम की पसली से बताई गई है, वहीं इस्लाम और शरिया के वैधानिक प्रावधानों में भी महिलाओं के अधिकार और स्वतंत्रता को लेकर कई ऐसी सीमाएँ हैं जिनपर दुनिया भर के मानवाधिकारवादी और सुधारक लंबे समय से सवाल उठाते रहे हैं।
किंतु विडंबना यह है कि राहुल गांधी या उनके वामपंथी-कम्युनिस्ट सलाहकारों के मुँह से बाइबल की रचना, चर्च के अत्याचारों, या इस्लाम की रूढ़ियों और लैंगिक असमानताओं पर कभी एक भी तीखा शब्द नहीं निकलता। वे बाइबल या कुरान की उन व्यवस्थाओं पर प्रश्न उठाने से हमेशा बचते हैं जहाँ महिलाओं की स्वतंत्र नागरिकता या सामाजिक स्थिति सीमित होती है। इसके विपरीत, वे केवल हिंदू समाज, उसकी सहिष्णुता और उसकी परिवार-व्यवस्था को हीन दिखाने का प्रयास करते हैं। पुणे के उस कार्यक्रम में भी जब यह विमर्श गढ़ा गया, तो वहाँ मौजूद उन बेटियों ने इसका सबसे सटीक उत्तर दिया जो अपने परिवारों के समर्थन, पिता की गाढ़ी कमाई और त्याग के बल पर दूर-दूर से आकर अपनी उच्च शिक्षा ग्रहण कर रही हैं। जो पिता अपना पेट काटकर बेटी को पढ़ाता है, उसके स्नेह और संरक्षण को ‘नियंत्रण’ या ‘पिंजरा’ बता देना भारतीय परिवार के यथार्थ के साथ सबसे बड़ा छल है।
भारत में कमियाँ अवश्य रही हैं, और हर जीवंत समाज की तरह हमने अपनी ऐतिहासिक कुप्रथाओं का सामना करते हुए निरंतर सुधार भी किया है। हमारे यहाँ समय-समय पर संत, सुधारक और मनीषी पैदा हुए जिन्होंने समाज को भीतर से परिष्कृत किया। हमारे पूर्वजों ने स्त्री की गरिमा और मर्यादा की रक्षा के लिए महायुद्ध लड़े चाहे वह त्रेतायुग में माता सीता की रक्षा के लिए रावण के विरुद्ध राम का संघर्ष हो, या महाभारत का कालजयी प्रसंग, जो स्त्री के अपमान के विरुद्ध लड़ा गया था। हमने अपनी गलतियों को स्वीकारा है और लगातार सुधरते हुए आज दुनिया के सबसे आधुनिक, सहिष्णु और जीवंत समाजों में अपनी जगह बनाई है।
भारत की स्त्री को शिक्षा, सुरक्षा, संपत्ति और निर्णय लेने की पूर्ण स्वतंत्रता चाहिए, और आज देश की बेटियाँ हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं। लेकिन उन्हें अपनी ही संस्कृति, अपने माता-पिता और अपने परिवार के खिलाफ युद्ध छेड़ने वाली वह पश्चिम-प्रेरित विचारधारा नहीं चाहिए जो हर भारतीय रिश्ते को शोषण का साधन मानती है। सुधार और आत्मद्वेष में बहुत बड़ा अंतर होता है। इतिहास और न्याय की ईमानदार माँग यही है कि यदि कसौटी तय होगी, तो वह सार्वभौमिक होगी वह भारत से लेकर इटली, यूरोप, चर्च के इतिहास, क्रिश्चियनिटी और इस्लाम तक, हर उस चौखटे पर समान रूप से लागू होगी जहाँ नारी की स्वतंत्रता, गरिमा और उसके आंसुओं पर पहरे बिठाए जाते हैं।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें