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सरकार माई-बाप नहीं है, अर्थव्यवस्था समाज की शक्ति से चलती है



✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

इस देश की निजी कंपनियों और संस्थानों पर जबरदस्ती कब्ज़ा कर लेना, उनके संसाधनों को अपने नियंत्रण में ले लेना, फिर उन्हें बर्बाद कर देना और उस पूरी व्यवस्था को समाजवाद का नाम दे देना आखिर यह किस आर्थिक सिद्धांत में आता है?

कोई कंपनी अपनी पूँजी लगाकर, अपना जोखिम उठाकर व्यवसाय करती है। उद्यमी अपनी पूँजी लगाता है, ऋण लेता है, श्रमिकों को रोजगार देता है, उत्पादन करता है और बाजार में प्रतिस्पर्धा करता है। लेकिन यदि उसे यह भरोसा ही न हो कि उसकी संपत्ति और निवेश सुरक्षित हैं, यदि उसे यह पता न हो कि राज्य उसके संसाधनों पर कब कब्ज़ा कर लेगा, तो वह व्यवसाय में अपनी पूँजी क्यों लगाएगा? जिस व्यवस्था में निवेश की सुरक्षा की गारंटी नहीं होगी, वहाँ उद्यमिता कैसे विकसित होगी?

भारत में 1950 से 1990 तक आर्थिक व्यवस्था में राज्य की भूमिका अत्यधिक व्यापक थी। सरकार व्यवसाय करती थी, सरकार उद्योग चलाती थी और सरकार ही नियामक भी थी। औद्योगिक लाइसेंस, आयात नियंत्रण, सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार और अनेक क्षेत्रों में सरकारी नियंत्रण इस व्यवस्था के प्रमुख आधार थे। इस दौर में भारत की आर्थिक वृद्धि अपेक्षाकृत धीमी रही। 1950 से 1980 के दशक के बीच औसत आर्थिक वृद्धि लगभग 3.5 प्रतिशत के आसपास रही, जिसे अर्थशास्त्री राज कृष्ण ने बाद में ‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ कहा।

यहाँ प्रश्न केवल आर्थिक वृद्धि की दर का नहीं है। प्रश्न उस आर्थिक दर्शन का है जिसमें राज्य को समाज की आर्थिक गतिविधियों का मुख्य संचालक बना दिया गया।

अंग्रेजों के जाने के बाद भारत के सामने औद्योगिक और आर्थिक पुनर्निर्माण की बड़ी चुनौती थी। स्वतंत्रता के बाद राज्य ने भारी उद्योग, ऊर्जा, इस्पात, परिवहन और आधारभूत संरचना के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह भूमिका उस समय आवश्यक भी थी। लेकिन समस्या तब पैदा हुई जब राज्य की भूमिका निर्माण से आगे बढ़कर अर्थव्यवस्था के व्यापक नियंत्रण तक पहुँच गई। निजी उद्यम के लिए लाइसेंस, अनुमति और सरकारी नियंत्रण की ऐसी व्यवस्था खड़ी हुई जिसमें व्यवसाय करने की स्वतंत्रता सीमित हो गई।

1991 में आर्थिक संकट के बाद भारत को उसी व्यवस्था में बड़े परिवर्तन करने पड़े। औद्योगिक लाइसेंसिंग में व्यापक कमी की गई, आयात नियंत्रण घटाए गए और निजी तथा विदेशी निवेश के लिए अर्थव्यवस्था को अधिक खुला किया गया। इसका अर्थ यह था कि भारत स्वयं यह स्वीकार कर रहा था कि अर्थव्यवस्था में राज्य के अत्यधिक नियंत्रण की अपनी सीमाएँ हैं।

चीन का उदाहरण हमारे सामने है। चीन राजनीतिक रूप से कम्युनिस्ट राज्य बना रहा, लेकिन 1978 के बाद उसने आर्थिक क्षेत्र में बाजार की भूमिका बढ़ाई। निजी उद्यम, विदेशी निवेश, निर्यात और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया गया। चीन ने राजनीतिक व्यवस्था समाप्त किए बिना आर्थिक व्यवस्था में बड़े परिवर्तन किए और इसके बाद उसकी आर्थिक वृद्धि की गति अत्यंत तेज हुई।

अर्थात चीन ने यह समझ लिया कि राजनीतिक रूप से कम्युनिस्ट होना और अर्थव्यवस्था के प्रत्येक क्षेत्र को सरकारी नियंत्रण में रखना एक ही बात नहीं है।

लेकिन भारत में आज भी एक मानसिकता दिखाई देती है कि सरकार ही सब कुछ करे। सरकार नौकरी दे, सरकार व्यवसाय करे, सरकार उद्योग चलाए, सरकार भोजन दे, सरकार आर्थिक सहायता दे, सरकार हर समस्या का समाधान करे। यह राज्य को ‘माई-बाप’ मानने की मानसिकता है।

यहीं मूल समस्या है।

राज्य समाज का मालिक नहीं है। राज्य समाज का एक अंग है।

भारतीय चिंतन में राज्य को समाज से ऊपर सर्वशक्तिमान संस्था के रूप में नहीं देखा गया। राजा भी धर्म के अधीन माना गया और उसके लिए ‘राजधर्म’ की अवधारणा विकसित हुई। राज्य का दायित्व समाज के जीवन को अपने नियंत्रण में लेना नहीं, बल्कि धर्म, न्याय, सुरक्षा और व्यवस्था की रक्षा करना था।

आज हमने उलटी मानसिकता विकसित कर ली है। नागरिक सरकार से पूछता है—सरकार मेरे लिए क्या करेगी? जबकि भारतीय दृष्टि से प्रश्न होना चाहिए—समाज अपनी शक्ति से क्या कर सकता है और राज्य उस शक्ति की रक्षा कैसे करेगा?

अर्थव्यवस्था समाज की उत्पादक शक्ति से बनती है।

किसान खेती करता है। व्यापारी व्यापार करता है। उद्योगपति उद्योग लगाता है। श्रमिक श्रम करता है। वैज्ञानिक अनुसंधान करता है। निवेशक पूँजी लगाता है। लाखों-करोड़ों लोगों की इन गतिविधियों से उत्पादन, व्यापार, रोजगार और संपत्ति का निर्माण होता है।

सरकार इन सभी की जगह नहीं ले सकती।

इसीलिए सरकार का काम व्यापार करना नहीं, बल्कि व्यापार के लिए सुरक्षा, कानून, शांति और निष्पक्ष नियमन उपलब्ध कराना है।

सरकार का काम व्यवसायी बनना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि व्यवसायी कानून के भीतर स्वतंत्र रूप से व्यवसाय कर सके।

सरकार का काम हर उद्योग अपने हाथ में लेना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि किसी उद्योग पर अवैध कब्ज़ा न हो, किसी व्यापारी के साथ अन्याय न हो, अनुबंधों का पालन हो, संपत्ति सुरक्षित रहे और बाजार में प्रतिस्पर्धा बनी रहे।

यदि सरकार स्वयं व्यवसाय भी करे और उसी व्यवसाय की नियामक भी हो, तो हितों का टकराव स्वाभाविक है। सरकार एक ओर नियम बनाए और दूसरी ओर उन्हीं नियमों के अंतर्गत स्वयं बाजार में प्रतिस्पर्धा करे—यह स्वस्थ आर्थिक व्यवस्था नहीं हो सकती।

इसका अर्थ यह नहीं कि राज्य की आर्थिक भूमिका बिल्कुल समाप्त कर दी जाए। रक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा, रणनीतिक क्षेत्र, प्राकृतिक एकाधिकार और कुछ सार्वजनिक सेवाओं में राज्य की प्रत्यक्ष भूमिका आवश्यक हो सकती है। लेकिन हर क्षेत्र में सरकार का व्यवसायी बन जाना समाज की आर्थिक शक्ति को कमजोर करता है।

जब उद्यमी को सुरक्षा मिलती है, तो वह पूँजी लगाता है। पूँजी से उत्पादन होता है। उत्पादन से रोजगार पैदा होता है। रोजगार से आय बढ़ती है। आय से बाजार बढ़ता है और बाजार के विस्तार से नए निवेश की संभावना पैदा होती है। इस प्रकार उद्यमी केवल अपना व्यवसाय नहीं बनाता, वह आर्थिक संसाधन भी तैयार करता है।

जब राज्य हर काम अपने हाथ में लेने लगता है, तो समाज की यह उत्पादक शक्ति धीरे-धीरे राज्य पर निर्भर होने लगती है।

जो काम समाज कर सकता है, उसे समाज को करने दीजिए।

अर्थव्यवस्था को अनावश्यक सरकारी नियंत्रण से मुक्त कीजिए।

उद्यमी को अपराधी की तरह मत देखिए।

व्यवसायी को केवल इसलिए चोर मत मानिए कि वह लाभ कमाता है।

लाभ व्यवसाय की आर्थिक सफलता का एक सामान्य परिणाम है। समस्या लाभ कमाने में नहीं, बल्कि कानून तोड़कर लाभ कमाने में है। इसलिए व्यवसाय का विरोध नहीं, बल्कि समान कानून और कठोर नियमन होना चाहिए।

हम जानते हैं कि जब कोई निजी कंपनी सरकार का टेंडर लेती है तो उसे अपनी कार्यशील पूँजी लगानी पड़ती है, कई मामलों में बैंक गारंटी देनी पड़ती है और परियोजना पूरी होने तक आर्थिक जोखिम उठाना पड़ता है। काम में गंभीर गड़बड़ी होने पर आर्थिक नुकसान और बैंक गारंटी के जोखिम का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए निजी उद्यम को केवल सरकारी संसाधन पर निर्भर व्यक्ति के रूप में देखना वास्तविक आर्थिक जोखिम को समझना नहीं है।

अडानी समूह की बात की जाती है। यह समूह 1980 के दशक में स्थापित हुआ और बाद में बंदरगाह, ऊर्जा, लॉजिस्टिक्स, हवाई अड्डे और अन्य क्षेत्रों में विस्तारित हुआ। आज भारत की कई कंपनियाँ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कारोबार कर रही हैं। किसी भी उद्योगपति या कंपनी का मूल्यांकन भावनात्मक समर्थन या विरोध से नहीं, बल्कि निवेश, रोजगार, उत्पादन, ऋण, लाभ, कर भुगतान, बाजार व्यवहार और कानून के अनुपालन जैसे तथ्यों के आधार पर होना चाहिए।

भारत को बड़ी वैश्विक कंपनियों की आवश्यकता है। अमेरिका और चीन की आर्थिक शक्ति के पीछे केवल सरकार नहीं है; उनके पीछे बड़ी संख्या में वैश्विक स्तर की कंपनियाँ, पूँजी बाजार, तकनीकी संस्थाएँ और उद्यमी हैं। भारत को भी ऐसे उद्यमियों और कंपनियों की आवश्यकता है जो देश के भीतर ही नहीं, बल्कि विश्व बाजार में प्रतिस्पर्धा करें।

लेकिन इसके लिए हमें अपनी मानसिकता बदलनी होगी।

यदि हर व्यक्ति सरकारी नौकरी चाहता है और हर व्यवसाय को संदेह की दृष्टि से देखता है, तो आर्थिक शक्ति कैसे बनेगी?

यदि पूँजी लगाने वाले को यह डर हो कि सरकार कभी भी उसके व्यवसाय में मनमाना हस्तक्षेप कर सकती है, तो निवेश कैसे बढ़ेगा?

यदि सफल उद्यमी को सम्मान देने के बजाय उसकी सफलता को ही अपराध मान लिया जाए, तो युवा उद्यमिता की ओर क्यों जाएँगे?

और यदि सरकार को ही ‘माई-बाप’ मान लिया जाए, तो समाज अपनी आर्थिक शक्ति कब विकसित करेगा?

आरक्षण के प्रश्न पर भी यही बात लागू होती है। यदि वास्तव में मेरिट और प्रतिस्पर्धा की चिंता है, तो केवल सरकारी नौकरियों तक सीमित बहस पर्याप्त नहीं है। खुली अर्थव्यवस्था, निजी रोजगार, उद्यमिता, पूँजी तक पहुँच, शिक्षा और सभी क्षेत्रों में अवसरों की समानता पर भी उतनी ही गंभीरता से बात करनी होगी।

सरकारी नौकरियाँ सीमित हैं। लेकिन उद्यमिता की संभावनाएँ सीमित नहीं हैं। एक उद्यमी स्वयं रोजगार पाने के साथ अनेक लोगों के लिए रोजगार पैदा कर सकता है। एक उद्योग के साथ उसके सहायक उद्योग, आपूर्तिकर्ता और सेवा क्षेत्र भी विकसित होते हैं।

इसलिए भारत को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें सरकार की भूमिका स्पष्ट हो और समाज की भूमिका उससे भी अधिक स्पष्ट हो।

सरकार का काम व्यापार करना नहीं है।
सरकार का काम सुरक्षा देना है।
सरकार का काम कानून-व्यवस्था बनाए रखना है।
सरकार का काम न्याय देना है।
सरकार का काम निष्पक्ष नियमन करना है।

और उत्पादन, व्यापार, निवेश तथा उद्यमिता का बड़ा क्षेत्र समाज को करना चाहिए।

हमने लंबे समय तक ऐसी व्यवस्था देखी जिसमें सरकार अर्थव्यवस्था की मालिक और संचालक बनती गई। उसके बाद 1991 में हमें उसी व्यवस्था से बाहर निकलने के लिए आर्थिक सुधार करने पड़े। इसलिए आज फिर उसी राज्य-प्रधान मानसिकता की ओर लौटना समाधान नहीं है।

हिंदू समाज की ऐतिहासिक शक्ति उसकी सामाजिक संस्थाओं, परिवार, समुदाय, व्यापार, दान, उद्यमिता और स्वावलंबन में रही है। राज्य ने कभी समाज के प्रत्येक कार्य का स्थान नहीं लिया था। आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज फिर अपनी आर्थिक और सामाजिक शक्ति को पहचाने।

हम संपन्नता को अपना आभूषण मानने वाले समाज रहे हैं। हमें संपन्नता को अपराध और गरीबी को आदर्श बनाने वाली मानसिकता से बाहर निकलना होगा।

राज्य आवश्यक है, लेकिन राज्य सर्वस्व नहीं है।
सरकार आवश्यक है, लेकिन सरकार समाज की मालिक नहीं है।
नियमन आवश्यक है, लेकिन अनावश्यक नियंत्रण नहीं।
व्यवसाय आवश्यक है, क्योंकि उत्पादन और संपत्ति का निर्माण समाज की आर्थिक शक्ति से होता है।

जो काम समाज कर सकता है, वह समाज को करने दीजिए। राज्य का काम समाज की शक्ति को अपने नियंत्रण में लेना नहीं, बल्कि उस शक्ति की रक्षा करना है।











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