- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
✍️दीपक कुमार द्विवेदी
दिल्ली के जंतर-मंतर पर आज जो विरोध प्रदर्शन हुआ है, वह केवल कुछ असंतुष्ट चेहरों का रोष नहीं है, बल्कि यह उस गहरी सामाजिक घुटन और चीत्कार की अभिव्यक्ति है जो आज भारत के बहुसंख्यक अनारक्षित वर्ग के सीने में दशकों से सुलग रही है। एक तरफ जब हम भारत की स्वतंत्रता के 80 वर्ष पूरे होने का गौरव मनाते हुए 2047 के 'विकसित भारत' का स्वर्णिम स्वप्न देखते हैं, तो दूसरी तरफ एक ऐसा कड़वा और विदारक सच भी है जहाँ सामान्य घरों के प्रतिभाशाली युवाओं की आँखें अपनी योग्यता के क्रूर दमन पर आंसुओं से भर जाती हैं। यह दर्द किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस नौसिखिए, गरीब और मेधावी छात्र का है जो बस इसलिए पिस जाता है क्योंकि उसके पास न तो जातिगत वोट-बैंक का दबाव है और न ही सड़कों पर तांडव मचाने वाला कोई राजनीतिक बाहुबल।
यदि हम इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें, तो इस सामाजिक विखंडन की नींव 141 वर्ष पहले 1882 के 'हंटर आयोग' के साथ पड़ी थी। 19वीं सदी के कथित समाज सुधारक ज्योतिराव गोविंदराव फुले ने शूद्रों और अतिशूद्रों के लिए शिक्षा व प्रतिनिधित्व की बात उठाई थी, जो छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन से प्रेरित थे। आगे चलकर 1901 में कोल्हापुर के शाहू महाराज ने वंचित समुदाय के लिए रियासतों में आरक्षण की शुरुआत की। 1932 में यरवदा सेंट्रल जेल में हुए 'पूना पैक्ट' (जिस पर महात्मा गांधी और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने हस्ताक्षर किए थे), 1953 के कालेलकर आयोग, 1979 के 'मंडल आयोग' की सिफारिशों और 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के बाद अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए तथा 1989 के बाद अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) के लिए आरक्षण के विस्तार ने इस व्यवस्था को आधुनिक राजनीति का सबसे प्रभावी हथियार बना दिया।
आज स्थिति यह है कि संवैधानिक रूप से आरक्षण लागू हुए 76 वर्ष और कुल व्यवस्था को चलते हुए 141 वर्ष बीत चुके हैं, किंतु इसका वास्तविक लाभ समाज के हर शोषित तक पहुँचने के बजाय राजनीतिक स्वार्थों की भेंट चढ़ चुका है।
आज के समय में जब अनारक्षित समूहों के लोग जंतर-मंतर पर 'आरक्षण हटाओ' की माँग लेकर उतरते हैं, तो एक गंभीर प्रश्न यह उठता है कि क्या यह माँग तार्किक और व्यावहारिक है? इसका उत्तर स्पष्ट रूप से 'नहीं' है।
यदि अनारक्षित समूह दिल्ली में 10 हजार या 1 लाख लोगों की भीड़ भी जुटा ले, तो इसके जवाब में आरक्षित समूहों द्वारा 10 लाख या 1 करोड़ लोगों की उग्र, अनुशासनहीन और आक्रामक भीड़ सड़क पर खड़ी कर दी जाएगी। परिणाम क्या होगा? देश के गाँव-गाँव, नगर-नगर और गली-गली में जातिगत विद्वेष की भीषण आग सुलग उठेगी। जो लोग सदियों से सह-अस्तित्व और सामाजिक समरसता के साथ एक-दूसरे के सुख-दुःख के साथी बनकर रह रहे थे, वे एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाएंगे। यह वही भयावह दृश्य होगा जहाँ हिंदू समाज आपस में सिर फोड़कर और कट-मरकर खुद को समाप्त कर लेगा।
यह वही पटकथा है जिसे वैश्विक शक्तियां जैसे ईसाई मिशनरियों, कम्युनिस्ट ताकतों, कट्टरपंथी इस्लामिक जिहादियों और ग्लोबल मार्केट फोर्सेज का 'कॉकटेल'—चाहता है, ताकि भारत भीतर से टूट जाए। कम्युनिस्टों की हमेशा से 'क्लास वार' (वर्ग संघर्ष) की राजनीति रही है, और वे अनारक्षित समूहों को केवल अपने राजनीतिक एजेंडे को साधने के लिए एक 'टूल' के रूप में उपयोग करना चाहते हैं।
जिन जातियों के लोग राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, बड़े प्रशासनिक पदों, मंत्री और विधायक के रूप में दशकों से सर्वोच्च पदों पर पहुँच चुके हैं, वे आज भी अपनी ही संतानों को बार-बार आरक्षण का लाभ दिलाते हैं। वे मंचों से खुद को 'शोषित, पीड़ित और वंचित' बताते हैं और गर्व से कहते हैं कि नंद वंश से लेकर आज तक हमारे राजा थे, लेकिन जब सुविधाओं और कोटे का लाभ लेने की बारी आती है, तो वे खुद को सबसे बड़ा पीड़ित घोषित कर देते हैं। इसके विपरीत, वाल्मीकि समाज या अन्य अत्यंत पिछड़ी जातियाँ आज भी अपने ही समाज की उन प्रभावशाली जातियों द्वारा दुत्कारे जाने और शोषण का शिकार होने को विवश हैं। एक समुदाय दूसरे समुदाय के साथ रोटी-बेटी का संबंध नहीं बनाता, छुआछूत मानता है, और जब उन तक आरक्षण का लाभ नहीं पहुँचता, तो वे हाशिए पर ही रह जाते हैं।
भारत के अनेक हिस्सों में अनुसूचित जातियों और प्रभावशाली ओबीसी जातियों के बीच भूमि, मजदूरी, सामाजिक प्रतिष्ठा, स्थानीय सत्ता और जातिगत संबंधों को लेकर संघर्षों का लंबा इतिहास है। निजी तथा अकादमिक शोध भी इस वास्तविकता को दर्ज करते हैं। भौमिक, दासगुप्ता और पाल के अध्ययन ने 2005 से 2021 तक के राज्यवार आँकड़ों के आधार पर अनुसूचित जातियों के विरुद्ध अपराधों का अध्ययन किया है। इस शोध में गैर-एससी/एसटी हिंदू समूहों के भीतर ओबीसी और अन्य समूहों की आर्थिक असमानता तथा अनुसूचित जातियों के विरुद्ध दर्ज अपराधों और दोषसिद्धि के बीच संबंध का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि सामाजिक और आर्थिक असमानता तथा संस्थागत शक्ति जातिगत अपराधों और उनके न्यायिक परिणामों को प्रभावित करती है।
मध्य प्रदेश में एससी-एसटी अधिनियम के मामलों को लेकर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के एक सर्वे ने इससे भी अधिक सीधा आँकड़ा सामने रखा। सितंबर 2018 में एसोसिएशन के तत्कालीन अध्यक्ष आदर्श मुनि त्रिवेदी ने सर्वे के परिणाम जारी किए। सर्वे के अनुसार वर्ष 2015-16 में मध्य प्रदेश की तीनों हाई कोर्ट पीठों तथा लगभग 90 प्रतिशत जिला न्यायालयों में सामने आए मामलों के अध्ययन में 81 प्रतिशत आरोपी ओबीसी समुदायों से, 14 प्रतिशत सामान्य वर्ग से और 5 प्रतिशत अल्पसंख्यक समुदायों से संबंधित बताए गए। इसी सर्वे के अनुसार लगभग 90 प्रतिशत मामले एससी समुदाय की ओर से और 10 प्रतिशत मामले एसटी समुदाय की ओर से दर्ज किए गए थे। सर्वे में यह भी दावा किया गया कि अध्ययन में शामिल मामलों में लगभग 75 प्रतिशत आरोपियों को न्यायालय से बरी किया गया।
यह आँकड़ा मध्य प्रदेश हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के सर्वे का है और इसी रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए। लेकिन इसे नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा। इस सर्वे ने मध्य प्रदेश में यह गंभीर प्रश्न खड़ा किया कि एससी-एसटी अधिनियम के अंतर्गत दर्ज मामलों में आरोपी सामाजिक समूह कौन हैं और इन मामलों का न्यायालय में परिणाम क्या रहा। यदि उस अध्ययन में 81 प्रतिशत आरोपी ओबीसी समुदायों से बताए गए हैं, तो यह उस राजनीतिक धारणा पर सीधा प्रश्न है जिसमें भारत के जातिगत संघर्ष को केवल 'सवर्ण बनाम दलित' के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
निजी और अकादमिक अध्ययनों में भी दलित समुदायों तथा प्रभावशाली ओबीसी जातियों के बीच संघर्षों का उल्लेख मिलता है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में भूमि, मजदूरी, राजनीतिक प्रभाव, सामाजिक प्रतिष्ठा और अंतर्जातीय संबंधों को लेकर दलितों और प्रभावशाली मध्यवर्ती जातियों के बीच संघर्षों का अध्ययन हुआ है। इसलिए यह कहना कि दलित समुदायों का संघर्ष केवल सवर्ण जातियों के साथ है, भारत की पूरी सामाजिक तस्वीर नहीं है।
यही वह तथ्य है जिसे 'बहुजन एकता' और '85 बनाम 15' की राजनीति सामने नहीं आने देना चाहती। मंच पर ओबीसी, एससी और एसटी को एक साथ खड़ा करके एक विशाल बहुजन समाज की तस्वीर बनाई जाती है, लेकिन जमीन पर उन्हीं समुदायों के बीच मौजूद सामाजिक दूरी और जातिगत वर्चस्व की चर्चा नहीं होती। जिन ओबीसी जातियों के पास कई क्षेत्रों में संख्या-बल, भूमि, राजनीतिक संगठन और स्थानीय प्रभाव है, उनके सामने वाल्मीकि तथा अन्य अत्यंत पिछड़ी जातियों की स्थिति बिल्कुल अलग है।
फिर भी इन्हीं प्रभावशाली जातियों को पूरे बहुजन समाज का प्रतिनिधि बताकर यह दावा किया जाता है कि 85 प्रतिशत लोग एक तरफ हैं और 15 प्रतिशत दूसरी तरफ। लेकिन प्रश्न यह है कि उस 85 प्रतिशत के भीतर वास्तविक शक्ति किसके पास है? यदि कुछ जातियाँ राजनीतिक रूप से अत्यंत प्रभावशाली हैं और कुछ जातियाँ आज भी अपने ही व्यापक सामाजिक समूह के भीतर पीछे खड़ी हैं, तो केवल संख्या के आधार पर सभी को एक जैसा बताना वास्तविकता के साथ छल है।
वाल्मीकि समाज और अन्य अत्यंत पिछड़ी जातियों की स्थिति इस विरोधाभास को और स्पष्ट करती है। एक ओर बहुजन एकता के नारे हैं और दूसरी ओर उसी समाज के भीतर रोटी-बेटी के संबंधों में दूरी, सामाजिक भेदभाव और जातिगत श्रेष्ठता की प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं। जब सामाजिक व्यवहार में ही समानता नहीं है, तब केवल राजनीतिक मंच पर एकता का प्रदर्शन किस काम का?
सच्चाई यह है कि आरक्षण की बहस का सबसे बड़ा विरोधाभास आरक्षण के बाहर नहीं, बल्कि आरक्षण के भीतर दिखाई देता है। वर्षों से 'बहुजन', 'पिछड़ा' और 'वंचित' के नाम पर एक व्यापक राजनीतिक एकता का दावा किया जाता रहा है, लेकिन जब यह प्रश्न उठता है कि आरक्षण का वास्तविक लाभ किसे मिला, तब उसी व्यापक समूह के भीतर की असमानता सामने आ जाती है। यह कोई राजनीतिक कल्पना नहीं है। केंद्र सरकार ने 2017 में न्यायमूर्ति जी. रोहिणी की अध्यक्षता में आयोग गठित किया था और उसे स्पष्ट जिम्मेदारी दी गई थी कि वह ओबीसी की केंद्रीय सूची में शामिल जातियों के बीच आरक्षण के लाभ के असमान वितरण की जाँच करे तथा आवश्यकता पड़ने पर उप-वर्गीकरण का वैज्ञानिक आधार सुझाए। आयोग ने लगभग छह वर्ष के अध्ययन के बाद 31 जुलाई 2023 को अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंप दी।
इस आयोग से जुड़े उपलब्ध विश्लेषणों में जो आंकड़ा सामने आया, वह पूरे ओबीसी विमर्श की आँखें खोलने वाला था। लगभग 1.3 लाख केंद्रीय सरकारी नौकरियों और केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में ओबीसी प्रवेश से संबंधित आंकड़ों के अध्ययन में पाया गया कि लगभग 97 प्रतिशत लाभ ओबीसी की केवल 25 प्रतिशत जातियों तक सिमटा हुआ था। दूसरी ओर लगभग 37 प्रतिशत ओबीसी समुदायों की इन अवसरों में कोई हिस्सेदारी दर्ज नहीं हुई। इतना ही नहीं, लगभग दस ओबीसी समुदायों ने ही करीब 24.95 प्रतिशत लाभ प्राप्त किया था।
अब जरा इस तथ्य को उस राजनीतिक नारे के सामने रखिए जिसमें दिन-रात '85 बनाम 15' दोहराया जाता है। यदि 85 प्रतिशत की सामाजिक संरचना को एक समान और एकजुट वंचित समूह बताकर राजनीति की जाती है, तो फिर यह सवाल भी पूछा जाएगा कि उसी 85 प्रतिशत के भीतर 25 प्रतिशत जातियाँ लगभग 97 प्रतिशत लाभ तक कैसे पहुँच गईं और लगभग 37 प्रतिशत ओबीसी समुदायों की हिस्सेदारी शून्य कैसे रह गई?
यहीं से 'बहुजन एकता' के राजनीतिक नारे की असली परीक्षा शुरू होती है। यदि वास्तव में लक्ष्य सबसे पिछड़े व्यक्ति को आगे लाना है, तो ओबीसी के भीतर उप-वर्गीकरण का विरोध क्यों होना चाहिए? यदि सभी पिछड़े समान रूप से लाभान्वित नहीं हुए हैं, तो आरक्षण के भीतर अधिक पिछड़े समुदायों के लिए न्यायपूर्ण हिस्सेदारी की मांग ही तो सामाजिक न्याय की अगली सीढ़ी है।
यही बात अनुसूचित जातियों पर भी लागू होती है। अनुसूचित जाति को एक समान सामाजिक समूह मान लेना वास्तविक भारत को समझने की भूल है। सर्वोच्च न्यायालय ने 1 अगस्त 2024 के 'स्टेट ऑफ पंजाब बनाम दविंदर सिंह' निर्णय में सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ के माध्यम से अनुसूचित जातियों के भीतर उप-वर्गीकरण की संवैधानिक संभावना को स्वीकार किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अधिक वंचित समूहों तक आरक्षण का लाभ पहुँचाने के लिए अनुभवजन्य और परिमाणात्मक आंकड़ों के आधार पर उप-वर्गीकरण किया जा सकता है। यह निर्णय स्वयं प्रमाण है कि आरक्षित वर्गों के भीतर भी वंचना समान नहीं है।
इसलिए जब हम जाटव जैसे अपेक्षाकृत बड़े और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली एससी समूहों तथा वाल्मीकि जैसे अत्यंत वंचित समुदायों की सामाजिक स्थिति की चर्चा करते हैं, तो सवाल किसी जाति को दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व और लाभ के वास्तविक वितरण का है। यही प्रश्न एसटी समुदायों के भीतर भी उठता है। उदाहरण के लिए राजस्थान की राजनीति में मीणा समुदाय का राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव एक स्थापित तथ्य है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पूरे एसटी वर्ग का लाभ केवल मीणा समुदाय को मिला है। इसके लिए जातिवार आधिकारिक आंकड़े आवश्यक हैं। सही सवाल यह है कि एसटी आरक्षण का लाभ विभिन्न जनजातीय समुदायों में किस अनुपात में पहुँचा और कौन-से समुदाय अभी भी पीछे हैं।
ऐसी स्थिति में, यदि अनारक्षित समूह अपनी ऊर्जा को 'आरक्षण हटाओ' जैसी अव्यवहारिक जिद में नष्ट करेगा, तो वह अनजाने में उन ताकतों का मोहरा बन जाएगा जो '85 बनाम 15' का विषैला नैरेटिव चलाकर देश में स्थायी जातीय संघर्ष पैदा करना चाहती हैं। हमें अंग्रेजों द्वारा बोए गए 'फूट डालो और राज करो' के बीज तथा स्वतंत्रता के बाद राजनीतिक कारणों से मजबूत की गई जातिगत कृत्रिम पहचानों के जाल से बाहर निकलना होगा।
अनारक्षित समूहों को चाहिए कि वे विरोध की उस संकीर्ण राजनीति को छोड़ें और समाज के उन अंतिम पायदान पर बैठे शोषितों, दलितों, वनवासियों और अति पिछड़ों की आवाज बनें जिन तक आज 141 वर्षों में भी राज्य की कोई व्यवस्था नहीं पहुँच पाई है। हमें आरक्षित और अनारक्षित के इस कृत्रिम विभाजन को समाप्त करके उन तमाम जरूरतमंदों को अपने साथ खड़ा करना होगा जिन्हें आरक्षण का एक प्रतिशत भी लाभ नहीं मिला है।
जब हम 'आरक्षण हटाओ' के बजाय 'आरक्षण सुधार' यानी क्रीमी लेयर को बाहर करने और वास्तविक जरूरतमंद को लाभ देने की तार्किक और न्यायसंगत मांग को लेकर आगे बढ़ेंगे, और समाज के सभी वर्गों को हिंदुत्व और सांस्कृतिक सह-अस्तित्व के व्यापक छाते के नीचे जोड़ेंगे, तो देश की 90% जनता हमारे साथ खड़ी होगी। भीड़तंत्र की अंधी दौड़ और कुंठा से बाहर निकलकर हमें एक सच्चे 'धर्मयोद्धा' की भूमिका निभानी होगी, जो बिना किसी द्वेष के, सत्य, न्याय और सामाजिक समरसता के बल पर एक अखंड, संगठित और विकसित भारत का निर्माण करे।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें