सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

क्या बंगाल में हिंदू महासभा के श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने मुस्लिम लीग के साथ मिलीजुली सरकार बनाई थी ?



यह एक सफ़ेद झूठ है जिसे लोगों को भ्रमित करने के लिए कभी किसी ने गढ़ लिया होगा। फिर तो जब जिसको सुविधा हुई, इसकी तान छेड़ता रहा।   
भारत सरकार कानून, 1935 के अंतर्गत, पहली बार प्रांतों में हिंदुओं और मुसलमानों के लिए पृथक्‌ निर्वाचन क्षेत्र और विस्तीर्ण मताधिकार के साथ प्रांतीय चुनाव हुए थे। बंगाल में कांग्रेस को 54, मुस्लिम लीग को 37 और फ़ज़लुल हक़ की कृषक प्रजा पार्टी को 36 सीटें मिली थीं। किसानों के हित में भूव्यवस्था के सुधार के लिए कटिबद्ध कृषक प्रजा पार्टी और कांग्रेस में नीतिगत एकरूपता थी। संयुक्त सरकार बनाने के लिए दोनों में वार्ता भी हुई थी, किंतु कृषक प्रजा पार्टी की वरीयता भूव्यवस्था में सुधार के कानून लाने और कांग्रेस की वरीयता जेलों में बंद क्रांतिकारियों को रिहा करने की थी, इसलिए दोनों में समझौता नहीं हो सका। उसके बाद कृषक प्रजा पार्टी के फ़ज़लुल हक़ के नेतृत्व में मुस्लिम लीग और कृषक प्रजा पार्टी की साझा सरकार बन गई।

 फ़ज़लुल हक़ मुस्लिम लीग के बंगाल से बाहर के नेताओं द्वारा बंगाल में मुस्लिम कार्ड खेले जाने और ‘इस्लाम ख़तरे में है’ का शोशा खड़ाकर साम्प्रदायिक तनाव पैदा करने से त्रस्त थे। कृषक प्रजा पार्टी के लगभग आधे एम एल ए मुस्लिम लीग की नीतियों के विरोध में साझा सरकार का समर्थन छोड़कर कांग्रेस में आ गए। कांग्रेस अध्यक्ष सुभासचंद्र बोस तथा बंगाल कांग्रेस अध्यक्ष शरत चंद्र बोस ने बंगाल को साम्प्रदायिक भँवर से बचाने के लिए कृषक प्रजा पार्टी के साथ मिलकर हिंदू-मुस्लिम साझा सरकार बनाने का प्रस्ताव गांधी जी की स्वीकृति के लिए भेजा जिसे गांधी जी ने मौलाना आज़ाद, घनश्याम दास विड़ला और बंगाल के उद्योगपति तथा कृषक प्रजा पार्टी व मुस्लिम लीग की साझा सरकार में वित्त मंत्री नलिनी सरकार की सलाह पर अस्वीकार कर दिया । 


आख़िर, दिसम्बर, 41 में फ़ज़लुल हक़ ने मुस्लिम लीग का दामन छोड़कर हिंदू महासभा के श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सहयोग से सरकार बना ली। इस तरह हिंदू महासभा ने बंगाल में मुस्लिम लीग नहीं, कृषक प्रजा पार्टी के साथ सरकार बनाई थी जो एक सेक्युलर पार्टी थी और मुस्लिम लीग की मुस्लिम परस्त तथा विभाजनकारी नीतियों से त्रस्त थी।  

मार्च 43 में मुस्लिम लीग ने योरोपियन एम एल ए के सहयोग से फ़ज़लुल हक़ को अपदस्थ कर नज़िमुद्दीन के नेतृत्व में अपनी सरकार बना ली जिसमें श्यामा प्रसाद मुखर्जी के शमिल होने का कोई प्रश्न ही नहीं था।

ग़लत तथ्यों के आधार पर लोगों को भ्रमित कर इतिहास के राजनीतिक इस्तेमाल का खेल खेलना राजनीतिक बिरादरी में प्रचलित अवसरवाद का प्रतिबिम्ब है। किंतु इतिहासकारों और इतिहासज्ञों के लिए तो यह शर्म की बात है। 
~ कमलाकांत त्रिपाठी 
( वरिष्ठ साहित्यकार एवं इतिहासकार)

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