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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
जब राष्ट्र अपनी आंतरिक और बाह्य चुनौतियों से पार पाकर एक सशक्त दिशा में आगे बढ़ता है, तब प्रगति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा वे वैचारिक और मानसिक प्रपंच बनते हैं जो प्रत्यक्ष रूप से हथियार नहीं उठाते, बल्कि बौद्धिक मुखौटे के पीछे छिपकर व्यवस्था को अंदर से खोखला करने का षड्यंत्र रचते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 80वें स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर लाल किले की प्राचीर से 76 मिनट के अपने ऐतिहासिक संबोधन में जिस खतरे की ओर देश का ध्यान आकृष्ट किया गया, वह सीधे तौर पर हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा, देश के सह-अस्तित्व की परंपरा, सामाजिक समरसता और देश की एकता-अखंडता के लिए सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष खतरा बन चुका है। प्रधानमंत्री ने देश के सामने पूरी स्पष्टता के साथ इन बौद्धिक नक्सलियों को बेनकाब करते हुए कहा कि जंगलों में बंदूक उठाने वाले नक्सलियों से भी ज़्यादा खतरनाक वे लोग हैं जो शहरों, शिक्षण संस्थानों या प्रभावशाली मंचों पर बैठकर उन्हें वैचारिक, कानूनी और बौद्धिक समर्थन देते हैं। ये लोग कलम और बौद्धिकता की आड़ में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को 'क्रांति' या 'सामाजिक न्याय' का मुखौटा पहनाते हैं और आदिवासियों तथा युवाओं को संविधान के खिलाफ खड़े होने के लिए भड़काते हैं, जबकि इनके खुद के बच्चे सुरक्षित शहरों और विदेशों में उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं।
कुछ बड़े बुद्धिजीवी और विचारक यह तर्क देते हैं कि सोवियत संघ के टूटने के बाद कम्युनिस्ट विचारधारा का अंत हो चुका है। वैश्विक स्तर पर वामपंथ का चुनावी सूपड़ा साफ होने या सोवियत संघ के विघटन को उनकी पूर्ण विदाई समझना आधुनिक राजनीति की सबसे सतही और भ्रामक समझ होगी। वास्तविकता यह है कि साम्यवादियों ने खत्म होने के बजाय सन 1923 के बाद अपनी पूरी नीति, युद्ध-रणनीति और वैचारिक धुरी को बदल लिया है। यह समझना बेहद महत्वपूर्ण है कि कम्युनिज्म कभी नहीं बदला है चाहे वह पुराना रूप हो या नया। कार्ल मार्क्स की वह भविष्यवाणी कि दुनिया का मजदूर एकजुट होकर हिंसक क्रांति लाएगा, पूरी तरह गलत साबित हो चुकी है। जब वह पारंपरिक आर्थिक वर्ग-संघर्ष (अमीर बनाम गरीब या पूंजीपति बनाम मजदूर) का मॉडल दुनिया भर में विफल हो गया, तब इन कम्युनिस्टों ने अपने आपको अपडेट किया। कम्युनिज्म का मूल आधार हमेशा से 'वर्ग संघर्ष' (Class Struggle) रहा है, और वह आज भी नहीं बदला है; अंतर केवल इतना आया है कि उन्होंने 'आर्थिक वर्ग संघर्ष' को छोड़कर 'कल्चरल मार्क्सवाद' (Cultural Marxism) यानी सांस्कृतिक वर्ग संघर्ष का मार्ग चुन लिया है। इसके तहत अब उनका हमला देश की भौगोलिक सीमाओं या आर्थिक ढांचों पर नहीं, बल्कि समाज की संस्कृति, धर्म, राष्ट्र और परिवार जैसी बुनियादी संस्थाओं पर केंद्रित हो गया है।
इस पूरे ताने-बाने की असल बुनियाद, इसका मूल प्राण और कल्चरल मार्क्सवाद की असली जान 'पहचान आधारित राजनीति' में है, जिसे आज वैश्विक स्तर पर 'आइडेंटिटी पॉलिटिक्स' (Identity Politics) कहा जाता है। कम्युनिज्म का मूल चरित्र वर्ग संघर्ष से कभी अलग नहीं हो सकता; पहले यह मिल-मालिक और मजदूर के बीच लड़ा जाता था, और अब यह समाज की पहचानों के बीच लड़ा जा रहा है। इस सांस्कृतिक वर्ग संघर्ष को भड़काने और इसे निरंतर बढ़ाने के लिए इनके पास 1000 से भी ऊपर छद्म-अकादमिक उपकरण और वैचारिक शस्त्र उपलब्ध हैं, जिनमें से 'क्रिटिकल रेस थ्योरी' (Critical Race Theory - CRT) कोई बुनियादी नींव नहीं, बल्कि इस वर्ग संघर्ष की आग को धधकाने वाला महज़ एक टूल है। इनकी क्रूरता का आलम यह है कि इनके बौद्धिक कारखानों से हर छह महीने में एक नया वैचारिक शस्त्र ईजाद कर दिया जाता है। इस पूरे वैचारिक शस्त्रागार की धुरी 'क्रिटिकल थ्योरी' (Critical Theory) है, जिसका घोषित उद्देश्य किसी व्यवस्था को सुधारना नहीं, बल्कि वर्ग संघर्ष को नए-नए तरीकों से जीवित रखना और स्थापित सामाजिक व्यवस्था के हर स्तंभ को पूरी तरह ध्वस्त (Deconstruct) करना है।
जो काम इस विचारधारा ने पश्चिमी देशों को भीतर से पंगु बनाने के लिए 'क्रिटिकल रेस थ्योरी' के नाम पर किया, जहाँ नस्ल को वर्ग संघर्ष का माध्यम बनाकर पूरे समाज को शोषक और शोषित में बांट दिया गया, ठीक उसी वर्ग संघर्ष के मॉडल को अब भारत में भी आयात किया जा चुका है। भारत के विशिष्ट संदर्भ में इन्होंने नस्ल की जगह 'जाति' को वर्ग संघर्ष का माध्यम बनाया और इसे 'क्रिटिकल कास्ट थ्योरी' (Critical Caste Theory) का नाम दे दिया। इसका एकमात्र उद्देश्य भारतीय समाज को जाति, उप-जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर नए वर्गों में बांटकर इस तरह खंडित कर देना है कि 'राष्ट्र' और 'राष्ट्रीयता' की सामूहिक चेतना कभी एकजुट ही न हो सके। इस वर्ग संघर्ष को गति देने वाले अन्य उपकरण आज अकादमिक और सामाजिक विमर्शों में विषैले फेमिनिज्म (Radical & Toxic Feminism), पॉप कल्चर, कैंसिल कल्चर, बहु-संस्कृतिवाद (Multiculturalism), समलैंगिकता विमर्श और उत्तर-आधुनिकतावाद यानी 'पोस्ट-मॉडर्निज्म थ्योरी' (Postmodernism Theory) जैसे हजारों आकर्षक नामों के पीछे छिपकर हमारे घरों की चौखट तक पहुँच चुके हैं।
आज जब देश के सुरक्षा बल जंगलों में आतंकवाद और प्रत्यक्ष हथियारी नक्सलवाद को कुचलकर विजय प्राप्त कर रहे हैं, तब ये दिमागी नक्सली मानवाधिकार, पर्यावरण या अन्य मुद्दों की आड़ लेकर विकास परियोजनाओं, बुनियादी ढांचे के निर्माण और सुरक्षा बलों के अभियानों में कानूनी और सामाजिक अड़चनें पैदा कर रहे हैं। कांग्रेस के पूर्व केंद्रीय मंत्री जैसे बड़े नेता, जो अपने पर्यावरण मंत्री के कार्यकाल के दौरान पर्यावरण के नाम पर देश की महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को रुकवाने वाले प्रमुख एक्टिविस्ट रहे हैं, वे इसी दिमागी नक्सल तंत्र का जीता-जागता उदाहरण हैं। ये अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि को नुकसान पहुँचाने और सामाजिक विभाजन (जाति, भाषा या क्षेत्र के नाम पर) को गहरा करने का निरंतर प्रयास करते हैं। प्रधानमंत्री ने मुखर होकर कहा कि नक्सलवाद को केवल सुरक्षा बलों के जरिए जंगलों में खत्म करना काफी नहीं है; इसके बौद्धिक और वैचारिक जाल को बेनकाब करने के लिए समाज और युवाओं को जागरूक होना पड़ेगा। यह स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है कि जंगलों में लड़ने वाले नक्सलियों से सरकार और सेना निपट सकती है, लेकिन अर्बन या बौद्धिक 'दिमागी नक्सलियों' के खिलाफ इस लड़ाई में सरकार को तब तक पूर्ण सफलता नहीं मिल सकती जब तक समाज का सक्रिय सहयोग न हो। यह वैचारिक लड़ाई किसी एक सरकार की नहीं, बल्कि देश के हर जागरूक भारतीय को मिलकर लड़नी होगी।
यदि हम इनके ऐतिहासिक और वैचारिक मूल में जाएं, तो पाते हैं कि जब भारत अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहा था, तब ये कम्युनिस्ट ताकतें अंग्रेजों के पक्ष में बैटिंग कर रही थीं। कम्युनिस्टों ने 15 अगस्त, 1951 तक स्वतंत्र भारत को मान्यता देने से इनकार कर दिया था और मित्राखिन अभिलेखागार से यह सिद्ध होता है कि इन्हें विदेशी जासूस एजेंसियों द्वारा वित्त पोषित किया जाता था। 1946 में ब्रिटिश कैबिनेट मिशन के समक्ष इन कम्युनिस्टों ने एक प्रस्ताव रखा था कि भारत को 17 अलग-अलग देशों में विभाजित कर दिया जाए, जिसमें 'सिखिस्तान', बंगाल, दार्जिलिंग और कश्मीर जैसे क्षेत्रों को अलग देश बनाने के कुचक्र रचे गए थे। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान जब देश का सैनिक सीमा पर लहू बहा रहा था, तब इन्हीं वैचारिक ताकतों और सीपीआई (एम) के नेताओं (जैसे ज्योति बसु, एच.के.एस. सुरजीत और बी.टी. राणादिवे) ने खुलेआम चीन का समर्थन किया था, भारत को आक्रमणकारी घोषित किया था और सेना की पूर्तियों को बाधित करने के लिए भीतरघात के षड्यंत्र रचे थे।
ये लोग खुद को बौद्धिक स्वतंत्रता का मसीहा बताते हैं, लेकिन वास्तव में 'कैंसल कल्चर' और 'पॉलिटिकल करेक्टनेस' के बल पर हर उस व्यक्ति की आवाज को कुचल देते हैं जो अपनी पारंपरिक संस्कृति, मर्यादा और राष्ट्रवाद की बात करता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसा लोकतांत्रिक नेता, जिन्हें उनकी मां तक गालियां दी जाती हैं और जो हर आलोचना को सहन करते हैं, उनके विरुद्ध अतीत में अखबार तक बंद कर दिए जाते थे और आपातकाल थोप दिया जाता था; वैचारिक असहिष्णुता की यह पराकाष्ठा इन्हीं तत्वों की देन रही है।
इस पूरे वैश्विक विमर्श का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि वर्तमान में यह केवल वामपंथी दलों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने वैश्विक ताकतों का एक अभूतपूर्व कॉकटेल तैयार कर लिया है। इस कॉकटेल में एक तरफ कल्चरल मार्क्सवादी हैं, तो दूसरी तरफ ग्लोबल मार्केट की बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, क्रिश्चियन मिशनरीज और वैश्विक संस्थाओं का एक बहुत बड़ा जाल है। संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO), विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) जैसी शक्तिशाली अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इसी कॉकटेल के एजेंडे को दुनिया भर में नीतिगत स्तर पर थोप रही हैं। इस कॉकटेल का राजनीतिक चेहरा यह है कि इस विचारधारा के लोग पारंपरिक राजनीतिक दलों में केंचुली की तरह प्रवेश कर चुके हैं। जैसे अमेरिका में इन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर गहरे तक पैठ बना ली है, ठीक उसी तरह भारत में कांग्रेस जैसी मुख्यधारा की विपक्षी पार्टियों के भीतर प्रवेश करके उनके पूरे वैचारिक एजेंडे को अपने नियंत्रण में ले लिया है। इस रणनीति के तहत अलग-अलग क्षेत्रों, अलग-अलग राजनीतिक दलों, सरकारों और देश की संवैधानिक संस्थाओं पर परोक्ष रूप से कब्ज़ा जमाया जा रहा है।
इस कॉकटेल का सबसे बड़ा प्रामाणिक विरोधाभास यह है कि कल तक पूंजीवाद को पानी पी-पीकर कोसने वाले कम्युनिस्ट आज ग्लोबल मार्केट की बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) के सबसे पसंदीदा वैचारिक एजेंट बन चुके हैं, जिसे आधुनिक राजनीतिशास्त्र में 'वोक कैपिटलिज्म' (Woke Capitalism) कहा जाता है। आज दुनिया की बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अपने कॉर्पोरेट एजेंडे और वैश्विक निवेश के ESG (Environmental, Social, and Governance) मानकों के अनुपालन के नाम पर इस सांस्कृतिक वर्ग संघर्ष को बढ़ावा देने वाली थ्योरियों और उनके प्रचारकों को भारी-भरकम वेतन पर 'हायर' (Hire) करती हैं। इस अपवित्र गठबंधन का अंतिम उद्देश्य भारत जैसे देशों की सुदृढ़, आत्मनिर्भर और सांस्कृतिक रूप से मजबूत सामाजिक संस्थाओं और संयुक्त परिवार व्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त करना है। इसके पीछे एक गहरा व्यावसायिक और आर्थिक गणित काम करता है; जब तक संयुक्त परिवार व्यवस्था जीवित है, व्यक्ति अपनी मानसिक, सामाजिक और आर्थिक ज़रूरतों के लिए परिवार पर निर्भर रहता है। लेकिन जैसे ही परिवार व्यवस्था टूटती है, व्यक्ति समाज में अकेला, अवसादग्रस्त और वैचारिक रूप से अनाथ हो जाता है। ऐसी स्थिति में वह अपनी हर छोटी-बड़ी आवश्यकता के लिए पूरी तरह से इन वैश्विक कॉर्पोरेट कंपनियों के प्रोडक्ट्स और नैरेटिव पर आश्रित हो जाता है, जिससे अंततः एक विचारहीन और पूरी तरह नियंत्रित उपभोक्तावादी बाजार तैयार होता है।
यही कारण है कि जिन्हें केवल ईवीएम के चुनावी नतीजे या राजनीतिक दलों की सीटें देखकर लगता है कि कम्युनिस्ट अब सत्ता में नहीं हैं, वे बहुत बड़े भ्रम में जी रहे हैं। साम्यवाद अब प्रत्यक्ष राजनीतिक सत्ता के रास्ते नहीं, बल्कि देश के अदृश्य प्रशासनिक तंत्र और 'डीप स्टेट' (Deep State) के माध्यम से परोक्ष रूप से व्यवस्था चला रहा है। हमारी न्यायपालिका में यह तत्व कोर्ट के भीतर बैठकर वकीलों और जजों के एक सक्रियतावादी नेटवर्क के रूप में स्थापित हो चुका है, जो निरंतर ऐसी कानूनी व्याख्याएं गढ़ने का प्रयास करते हैं जिससे पारंपरिक परिवार व्यवस्था और सांस्कृतिक मूल्यों को 'रूढ़िवादी' ठहराकर कमजोर किया जा सके। हमारे विश्वविद्यालयों में ये बुद्धिजीवी और प्रोफेसर के रूप में पूरे अकादमिक तंत्र पर कब्ज़ा करके बैठते हैं, जिनका दिन-रात का एकमात्र काम युवा पीढ़ी के अवचेतन मन में जाति, भाषा, क्षेत्र और अपनी ही संस्कृति के प्रति हीनभावना और जहर घोलने वाली काल्पनिक थ्योरियाँ गढ़ना है। 1959 में स्थापित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), जिसके पहले कुलपति डॉ. नूरुल हसन थे, जैसे संस्थानों से लेकर ICHR, ICCR, ICPR और NCERT जैसी संस्थाओं तक में हिंदू विरोधी और राष्ट्रविरोधी तत्वों ने जो घुसपैठ की, उसने हमारी पाठ्यपुस्तकों और इतिहास को विकृत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
इतना ही नहीं, देश की नौकरशाही और प्रशासनिक गलियारों में भी ये तत्व आईएएस (IAS) अधिकारियों के रूप में सरकारी नीतियों के माध्यम से मध्यम मार्ग, नारीवाद और जाति के नाम पर समाज को प्रशासनिक स्तर पर बांटने और वर्ग संघर्ष को तेज करने का काम करते हैं। इसका सबसे प्रत्यक्ष उदाहरण विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के समय-समय पर आने वाले कुछ हालिया नीतिगत विनियम और वैचारिक दिशा-निर्देश हैं, जो प्रगतिशीलता और सुधार की आड़ में समाज को संस्थागत स्तर पर विभाजित करने का एजेंडा चलाते हैं।
संक्षेप में कहें तो, पारंपरिक मार्क्सवाद से लेकर कल्चरल मार्क्सवाद तक की यह यात्रा वैश्विक सभ्यता और भारत के अस्तित्व के लिए अत्यंत खतरनाक मोड़ पर पहुँच चुकी है। साम्यवाद ने कभी अपना मूल चरित्र नहीं बदला है, उसने केवल अपने हथियार, रणक्षेत्र और मुखौटे बदले हैं। वे मानवाधिकार, पर्यावरण और सामाजिक न्याय के विभिन्न मुखौटों के साथ आते हैं और देश की आंतरिक सुरक्षा, विकास, सह-अस्तित्व की परंपरा, सामाजिक समरसता और परिवार व्यवस्था को ध्वस्त करना चाहते हैं। वे अब सीमाओं पर सेना लेकर नहीं लड़ते; इस वैश्विक कॉकटेल ने इस युद्ध को हमारे शिक्षण संस्थानों, हमारी उच्च अदालतों, हमारी प्रशासनिक नीतियों, मुख्यधारा के राजनीतिक दलों और हमारे घरों के ड्राइंग रूम तक पहुँचा दिया है। प्रत्यक्ष रूप से भले ही उनकी सरकार न दिखती हो, लेकिन देश का अदृश्य प्रशासनिक तंत्र आज भी इसी वैचारिक परोक्ष नियंत्रण में संचालित हो रहा है। इसलिए केवल सतही इतिहास को देखकर यह सोचना कि वे खत्म हो गए हैं, सिर पर मंडराते वास्तविक और विनाशकारी खतरे से आँखें मूंद लेने जैसा आत्मघाती कदम है। हमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस आह्वान को समझते हुए इन दिमागी नक्सलियों को पहचानना होगा, इन्हें समाज से पूरी तरह आइसोलेट करना होगा और अपनी युवा पीढ़ी को इनके वैचारिक जाल से मुक्त कराकर एक सशक्त, समर्थ और स्वाभिमानी राष्ट्र के निर्माण में अपनी बौद्धिक ऊर्जा को लगाना होगा।
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