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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
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✍️दीपक कुमार द्विवेदी
कल हम स्वतंत्रता दिवस मनाएंगे, लेकिन क्या यह दिन केवल उल्लास, आतिशबाजी और मिठाइयों का है? जब चौदह अगस्त की सिहरन भरी और खौफनाक रात जेहन में उतरती है, तो जश्न के बीच एक हूक सी उठती है। लाल किले की प्राचीर से गूँजने वाले शहनाई के सुरों और आसमान को छूते तिरंगों के नीचे उन करोड़ों लोगों के पाँव के छाले और आँखों का वह खारा पानी अनसुनी भाषा में बोल पड़ता है, जिन्हें आज़ादी तो मिली, लेकिन अपनी ही मिट्टी पर शरणार्थी बना दिए जाने की भारी कीमत पर। विभाजन का यह दर्द महज़ दो देशों के बीच कागजी लकीर खींचने भर का दस्तावेज नहीं था, बल्कि यह इंसानियत के जिस्म पर लगाया गया वह नासूर था, जिसकी कसक आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी बिना किसी शोर के रिसती रहती है।
वर्ष 1947 की उस झुलसा देने वाली गर्मियों में दिल्ली के सत्ता के गलियारों में भले ही पंडित जवाहरलाल नेहरू का ऐतिहासिक भाषण 'ट्रिस्ट विद डेस्टिनी' (नियति से मिलन) गूँज रहा हो, लेकिन दूसरी तरफ पंजाब के खेतों से लेकर बंगाल के डेल्टा तक, रावलपिंडी की तंग गलियों से लेकर नोआखली के गाँवों तक, आम इंसानों के हिस्से में सिर्फ राख, खून और सिसकियाँ आई थीं। इतिहासकार सर पेरेड्रे ग्रिफिथ, लारी कॉलिंस और डोमिनिक लापिएरे के दस्तावेज स्पष्ट रूप से बताते हैं कि डेढ़ करोड़ से अधिक लोग रातों-रात अपनी सदियों पुरानी जमीन, पुरखों की राख, मंदिरों-गुरुद्वारों और अपनी तहजीब से बेदखल कर दिए गए। यह मानव इतिहास का सबसे बड़ा, सबसे तेज और सबसे त्रासद विस्थापन था, जहाँ लगभग चालीस लाख लोगों की निर्मम हत्या हुई और करोड़ों लोग अपने घर, गाँव और संपत्ति छोड़कर पलायन करने को मजबूर हुए।
यह पीड़ा सिर्फ संपत्ति के नुकसान की नहीं थी, बल्कि यह उस साझा संस्कृति और आत्मीयता के टूटने की थी जहाँ पीढ़ियों से लोग एक साथ जीते आए थे। ट्रेनें जब शरण भरकर लाहौर से अमृतसर या कलकत्ता से ढाका की तरफ आती थीं, तो उनमें जिंदा इंसानों की जगह अपनों की कटी-फटी लाशों के सिवा कुछ नहीं मिलता था। सियालकोट, फैसलाबाद, मुल्तान या रावलपिंडी छूटने का गम क्या होता है, यह उन बुजुर्गों की झुकी हुई पीठ और नम आँखों से समझा जा सकता है, जिन्होंने अपनी आँखों के सामने अपनी माताओं और बहनों को आबरू बचाने के लिए कुओं में कूदते देखा था। 'पार्टीशन म्यूज़ियम' की फाइलों और मौखिक इतिहास के पन्नों में दर्ज एक बुजुर्ग का वह संस्मरण आज भी कलेजा चीर देता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि हमने देश तो पा लिया, लेकिन अपना घर, अपनी बोली, अपने गीत और अपनी मिट्टी हमेशा के लिए खो दी। ब्रिटिश न्यायविद् सर साइरिल रेडक्लिफ द्वारा बिना किसी ज़मीनी समझ, बिना भूगोल की जानकारी और महज़ कुछ हफ्तों (जुलाई 1947) में खींचे गए उस अंधेरगर्दी वाले नक्शे ने इंसानियत के माथे पर हमेशा के लिए कालिख पोत दी।
इतिहास की यह कड़वी सच्चाई हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि यह सब अचानक नहीं हुआ था। भारत के विभाजन की वैचारिक पृष्ठभूमि बहुत पहले राजनीतिक इस्लाम और घृणा की आंधी के रूप में तैयार हो चुकी थी। वर्ष 1885 के आसपास सर सैयद अहमद खान द्वारा दिए गए द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (टू नेशन थ्योरी) ने इस सोच को हवा दी कि हिंदू और मुस्लिम दो अलग कौम हैं जो एक साथ नहीं रह सकतीं। इसी हिंदू घृणा, मजहबी कट्टरता और अंग्रेजों की 'फूट डालो और राज करो' की नीति ने समाज में जो जहर घोला, उसका भयावह परिणाम 16 अगस्त 1946 के 'प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस' (डायरेक्ट एक्शन डे) के रूप में सामने आया। बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री एच.एस. सुहरावर्दी द्वारा समर्थित उस दिन कलकत्ता की गलियों में जो कुछ हुआ, वह भारतीय इतिहास का सबसे काला पन्ना था, जहाँ एक अलग इस्लामिक राष्ट्र की मांग को लेकर भड़के दंगों में एक ही रात में चौदह हजार से अधिक हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया गया, और उनकी लाशों को सड़कों पर छोड़ दिया गया। महिलाओं के साथ हुए पैशाचिक कृत्यों और बर्बरता की कल्पना मात्र से आत्मा काँप जाती है।
उस दौर में सड़कों पर गूँजने वाले नारे "लड़कर लिया पाकिस्तान, हँसकर लेंगे हिंदुस्तान" उसी राजनीतिक इस्लाम की मानसिकता के परिचायक थे, जिसके तहत भारत का मजहबी आधार पर विभाजन किया गया। यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। विभाजन के समय और उसके ठीक बाद लाखों हिंदुओं और सिखों को मौत के घाट उतार दिया गया, और करोड़ों लोगों को अपने पुरखों के घर-बार, जमीनें छोड़कर भागना पड़ा। इतिहास के इस रक्तरंजित पन्ने को भुलाया नहीं जा सकता। पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में 1971 के दौरान पाकिस्तानी सेना और मजहबी ताकतों द्वारा हिंदुओं पर हुए अत्याचारों और करोड़ों लोगों के पलायन की पीड़ा हो, या फिर हाल के वर्षों में दीपू दास जैसे युवाओं को मजहबी भीड़ द्वारा केवल हिंदू होने के कारण जिंदा जलाए जाने की घटनाएँ हों, यह प्रमाणित करती हैं कि राजनीतिक इस्लाम की वह मानसिकता आज भी उसी रूप में सक्रिय है। मोपला विद्रोह (1921) से लेकर हालिया दिल्ली दंगों (फरवरी 2020 में सीएए विरोध के दौरान हुई हिंसा) और कश्मीरी पंडितों के विस्थापन तक, यह दर्द लगातार गहराता रहा है। यहाँ तक कि 1937 में जब बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय के 'वंदे मातरम' गीत के पदों को केवल इसलिए छांट दिया गया क्योंकि वे मुस्लिम लीग को पसंद नहीं आए थे, तब से लेकर आज तक संसद में इसके पूर्ण गान को लेकर विरोध देखने को मिलता है।
आज के परिप्रेक्ष्य में यदि हम इस प्रवाह को गहराई से देखें, तो वे विभाजनकारी और वैचारिक खतरे समाप्त नहीं हुए हैं, बल्कि उनके स्वरूप और आयाम और अधिक जटिल हो गए हैं। आज केवल मजहबी कट्टरता ही नहीं, बल्कि जाति, भाषा और क्षेत्रवाद के नाम पर देश को तोड़ने के लिए वामपंथी ताकतों और विदेशी पोषित एजेंडों के तहत सक्रिय क्रिश्चियन मिशनरियों के षड्यंत्र भी बेरोकटोक चल रहे हैं। पूर्वोत्तर राज्यों को भारत से अलग करके एक अलग 'क्रिश्चियन नेशन' बनाने की साजिशें और 'गज़वा-ए-हिन्द' जैसे मंसूबों के तहत राष्ट्र की अखंडता को खंडित करने के एजेंडे आज भी राष्ट्र के सामने गंभीर चुनौती बने हुए हैं। आज़ादी के बाद भी कई राज्यों (जैसे पंजाब, केरल, पश्चिम बंगाल, असम, मिजोरम सहित लगभग नौ राज्यों और क्षेत्रों) में डेमोग्राफिक बदलाव के कारण हिंदू अल्पसंख्यक हो चुके हैं या इस स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं। वर्ष 1976 में आपातकाल के दौरान संविधान की प्रस्तावना में 'सेक्युलरिज्म' और 'सोशलिज्म' शब्द जोड़े जाने के बाद से इन बुनियादी और अस्तित्वगत समस्याओं पर खुलकर बात करने से बचा जाता रहा है।
ऐतिहासिक भूलों और विभाजन की इस त्रासदी को स्मरण रखने की दिशा में वर्ष 2021 में 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा हुई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी लंबे समय से 14 अगस्त को ‘अखंड भारत संकल्प दिवस’ के रूप में मनाता रहा है। इस दिन विभाजन की पीड़ा और उसके कारणों को याद करने के साथ अखंड भारत का संकल्प लिया जाता है। यह संकल्प केवल अतीत को याद करने का संकल्प नहीं है। असली प्रश्न यह है कि जिस भारत को विभाजन ने खंडित किया, उसे भविष्य में फिर से सांस्कृतिक, बौद्धिक, आर्थिक और सामरिक रूप से इतना शक्तिशाली कैसे बनाया जाए कि भारत की दिशा कोई दूसरा तय न कर सके।
विभाजन के घाव को याद रखना इसलिए जरूरी है कि राष्ट्र भूलने से मजबूत नहीं होता। जिस पीढ़ी ने अपना घर खोया, जिसने लाहौर, रावलपिंडी, मुल्तान, सियालकोट, ढाका और सिंध की अपनी मिट्टी छोड़ी, उसने केवल जमीन नहीं खोई थी; उसने अपने बचपन, अपने देवस्थान, अपने पुरखों की स्मृतियाँ और अपने जीवन का एक हिस्सा पीछे छोड़ दिया था। लेकिन उन्हीं लोगों ने भारत आकर फिर से जीवन खड़ा किया। यही हमारी शक्ति है। भारतीय समाज की पहचान केवल यह नहीं कि वह कितना सहता है; उसकी पहचान यह भी है कि वह टूटने के बाद कितनी ताकत से फिर खड़ा होता है।
इसलिए अखंड भारत का संकल्प केवल नक्शे पर एक रेखा बदलने का स्वप्न नहीं हो सकता। अखंड भारत पहले मन में बनेगा, फिर समाज में और उसके बाद शक्ति के रूप में दिखाई देगा। जब तक हम अपने इतिहास को दूसरों के लिखे हुए निष्कर्षों से समझेंगे, अपनी संस्कृति को लेकर संकोच करेंगे और अपनी राष्ट्रीय शक्ति को केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित रखेंगे, तब तक अखंड भारत का संकल्प अधूरा रहेगा।
हमारे ऋषियों की दृष्टि इससे कहीं बड़ी थी। ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ ऋग्वेद (9.63.5) का यह उद्घोष किसी भू-राजनीतिक विजय का नारा नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज को श्रेष्ठ बनाने की विराट आकांक्षा है। यहाँ ‘आर्य’ जन्म या नस्ल नहीं, श्रेष्ठ आचरण और उदात्त जीवन का बोध कराता है। भारत की दृष्टि अपने को श्रेष्ठ घोषित करने की नहीं, बल्कि श्रेष्ठ जीवन-मूल्यों को स्थापित करने की थी।
इसीलिए भारतीय परंपरा में चक्रवर्ती सम्राट की कल्पना केवल अधिक भूमि जीत लेने वाले राजा की नहीं है। चक्रवर्ती वह है जिसके राज्य में धर्म, न्याय और सुव्यवस्था प्रतिष्ठित हो। भारत ने शक्ति को कभी अपने आप में अंतिम लक्ष्य नहीं माना। शक्ति का उद्देश्य धर्म की रक्षा और लोकव्यवस्था की स्थापना रहा। यही कारण है कि अखंड भारत का संकल्प केवल भूमि का प्रश्न नहीं, धर्म की प्रतिष्ठा और भारतीय सभ्यता की पुनःस्थापना का संकल्प है।
लेकिन धर्म की रक्षा का अर्थ यह नहीं कि हम शास्त्रों के नाम पर हर व्यक्ति को एक ही तराजू से तौलें। भारतीय परंपरा व्यक्ति के जन्म से अधिक उसके आचरण को देखती है। मनुस्मृति धर्म के दस लक्षण बताती है
“धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥”
— मनुस्मृति, 6.92
धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी से विरति, शुचिता, इन्द्रिय-निग्रह, विवेक, विद्या, सत्य और अक्रोध ये धर्म के लक्षण हैं। इसलिए किसी व्यक्ति का जन्म किसी भी कुल, समुदाय या परंपरा में हुआ हो, यदि उसका आचरण धर्मसम्मत है, प्रकृति और समाज के प्रति उसका व्यवहार रक्षक का है, तो उसके साथ न्याय और सहअस्तित्व का व्यवहार ही धर्मसम्मत है। लेकिन जो व्यक्ति हिंसा, निर्दोषों की हत्या, आतंक, स्त्री-अवमानना, राष्ट्र-विघटन या अधर्म को अपना साधन और लक्ष्य बनाता है, उसके सामने केवल इसलिए हाथ बाँधकर खड़े रहना कि वह भी मनुष्य है—यह धर्म नहीं, धर्म की दुर्बलता है।
महाभारत का स्पष्ट वचन है—
“धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।”
— महाभारत, वनपर्व, 3.313.128
धर्म नष्ट किया जाएगा तो वही विनाश का कारण बनेगा और धर्म की रक्षा की जाएगी तो वही रक्षक बनेगा। इसलिए धर्मरक्षा में मोह के लिए स्थान नहीं है। गीता का कुरुक्षेत्र इसी सत्य को सामने रखता है। अर्जुन के सामने अपने ही बंधु-बांधव खड़े थे; लेकिन श्रीकृष्ण ने उसे संबंधों के मोह में धर्म से विमुख होने की शिक्षा नहीं दी। जब प्रश्न धर्म की स्थापना और अधर्म के प्रतिरोध का हो, तब व्यक्तिगत संबंध कर्तव्य से ऊपर नहीं हो सकते।
इसी बात को समझे बिना ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ को समझना भी अधूरा है। महोपनिषद् का वचन है “उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्”। उदार चरित्र वाले के लिए यह पूरी पृथ्वी परिवार है। परिवार का अर्थ यह नहीं कि परिवार के भीतर अधर्म को भी धर्म मान लिया जाए। परिवार में प्रेम है तो अनुशासन भी है; करुणा है तो संरक्षण भी है। भारतीय विश्व-दृष्टि का अर्थ यह नहीं कि दैवी और आसुरी प्रवृत्तियों में कोई भेद ही न किया जाए। जो जीवन और धर्म की रक्षा करता है, उसके प्रति करुणा; जो निर्दोष जीवन, समाज और राष्ट्र को नष्ट करता है, उसके प्रति प्रतिरोध यही धर्मसम्मत विवेक है।
हमारे पुराणों की कथा-परंपरा इसी संघर्ष से भरी हुई है। देवासुर संग्राम केवल कोई पुरानी कथा नहीं, बल्कि भारतीय चिंतन में दैवी और आसुरी प्रवृत्तियों के संघर्ष का प्रतीक भी है। राम का रावण के विरुद्ध खड़ा होना, कृष्ण का कंस और कुरुक्षेत्र के अधर्म के विरुद्ध खड़ा होना, देवी का असुरों का संहार करना इन कथाओं में धर्म की स्थापना केवल प्रवचन से नहीं होती; अधर्म का प्रतिरोध भी धर्म का अनिवार्य अंग है।
इसीलिए अखंड भारत का संकल्प पूरा करने के लिए सबसे पहले हमें अपने भीतर की दुर्बलता को समाप्त करना होगा। केवल नारे लगाने से अखंड भारत नहीं बनेगा। हमें शिक्षा में अपने इतिहास और सभ्यता का सत्य स्थापित करना होगा; युवाओं में चरित्र और राष्ट्रीय दृष्टि पैदा करनी होगी; अपनी भाषाओं और ज्ञान-परंपराओं को मजबूत करना होगा; आर्थिक शक्ति बढ़ानी होगी; विज्ञान और तकनीक में आत्मनिर्भर बनना होगा; अपनी सीमाओं और समुद्री हितों की रक्षा के लिए सैन्य शक्ति बढ़ानी होगी और समाज को जाति, क्षेत्र तथा संकीर्ण स्वार्थों से ऊपर उठाकर राष्ट्रीय एकात्मता में जोड़ना होगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात हमें सद्गुण-विकृति से बाहर निकलना होगा। क्षमा सद्गुण है, लेकिन अपराधी को अपराध करने देना क्षमा नहीं है। सहिष्णुता सद्गुण है, लेकिन अपने समाज और राष्ट्र के विनाश को देखते हुए मौन रहना सहिष्णुता नहीं है। करुणा सद्गुण है, लेकिन करुणा के नाम पर अधर्म को संरक्षण देना धर्म नहीं है। शांति महान मूल्य है, लेकिन ऐसी शांति जिसका मूल्य अपनी संस्कृति, समाज और राष्ट्र का विनाश हो, वह शांति नहीं, आत्मविस्मृति है।
भारतीय दर्शन ने प्रकृति को सत्त्व, रज और तम के त्रिगुणात्मक स्वरूप में समझा है। तीनों गुण प्रकृति का हिस्सा हैं; समस्या गुणों के अस्तित्व में नहीं, उनके असंतुलन में है। समाज में भी यही नियम चलता है। सत्त्व दिशा देता है, रज गति देता है और तम विश्राम तथा स्थूलता का आधार बनता है; लेकिन जब तम जड़ता और अज्ञान में बदल जाए, रज स्वार्थ और उन्माद में बदल जाए और सत्त्व दुर्बल पड़ जाए, तब व्यक्ति से लेकर समाज और राष्ट्र तक विकृति का शिकार होने लगता है। राष्ट्रीय जीवन में भी संतुलन आवश्यक है ज्ञान चाहिए, शक्ति चाहिए और कर्म की गति भी चाहिए।
अखंड भारत के लिए हमें इसी संतुलित शक्ति की आवश्यकता है। केवल भावुकता नहीं, संगठन चाहिए। केवल इतिहास का गौरव नहीं, वर्तमान की उपलब्धि चाहिए। केवल संस्कृति की चर्चा नहीं, संस्कृति को जीने वाला समाज चाहिए। केवल शस्त्र नहीं, शास्त्र भी चाहिए। केवल आर्थिक विकास नहीं, राष्ट्रीय उद्देश्य भी चाहिए। और सबसे बढ़कर ऐसी पीढ़ी चाहिए जिसे भारत के भविष्य पर विश्वास हो।
हमारे ऋषियों ने जिस भारत की कल्पना की, वह स्वयं को केवल एक भूभाग मानकर संतुष्ट नहीं था। उसकी दृष्टि विराट थी। ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ का भाव संसार को श्रेष्ठ जीवन की ओर ले जाने का था। चक्रवर्ती की कल्पना व्यापक धर्मव्यवस्था की थी। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ उदार चरित्र वाले मनुष्य की विश्व-दृष्टि थी। इसलिए भारत का विश्व नेतृत्व किसी दूसरे राष्ट्र पर प्रभुत्व की आकांक्षा नहीं, बल्कि अपने ज्ञान, धर्म, संस्कृति, विज्ञान और सामर्थ्य से विश्व को दिशा देने की क्षमता का नाम होना चाहिए।
आज भारत के सामने अवसर भी है और दायित्व भी। दुनिया शक्ति-संतुलन के नए दौर में प्रवेश कर रही है। ऐसे समय में भारत यदि अपनी सभ्यता को समझकर अपनी आर्थिक, तकनीकी, सैन्य और बौद्धिक शक्ति को एक दिशा में लगा दे, तो वह केवल अपने भविष्य को नहीं बदल सकता, बल्कि विश्व व्यवस्था में अपनी भूमिका को भी पुनर्परिभाषित कर सकता है।
इसलिए 14 अगस्त को हमें केवल यह नहीं कहना चाहिए कि भारत कभी विभाजित हुआ था। हमें यह कहना चाहिए कि खंडित भारत हमारी स्मृति है, लेकिन खंडित रहना हमारी नियति नहीं है।
जिस भारत के लिए हमारे पूर्वजों ने संघर्ष किया, जिस भारत को विभाजन ने घायल किया और जिस भारत की विराट कल्पना हमारे ऋषियों ने की उस भारत को फिर से शक्तिशाली, संगठित, आत्मविश्वासी और विश्व का मार्गदर्शन करने योग्य बनाना हमारी पीढ़ी का दायित्व है।
अखंड भारत का संकल्प केवल भूमि को जोड़ने का संकल्प नहीं है; यह समाज को जोड़ने, संस्कृति को पुनर्जीवित करने, शक्ति अर्जित करने और धर्म की प्रतिष्ठा करने का संकल्प है।
14 अगस्त हमें विभाजन की पीड़ा देता है, लेकिन उसी पीड़ा से एक प्रश्न भी उठता है क्या हम आने वाली पीढ़ी को वही खंडित भारत सौंपेंगे, जो हमें मिला, या ऐसा भारत बनाएँगे जिसकी एकता, संस्कृति और शक्ति के सामने विभाजन की स्मृति भी एक दिन इतिहास का अंतिम अध्याय बनकर रह जाए?
उत्तर हमारे हाथ में है।
हमारा संकल्प स्पष्ट होना चाहिए भारत भीतर से अखंड हो, शक्ति में समर्थ हो, संस्कृति में आत्मविश्वासी हो और अपनी सभ्यतागत दृष्टि के साथ विश्व का नेतृत्व करने की क्षमता फिर प्राप्त करे।
यही विभाजन-विभीषिका के बलिदानों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
यही धर्म की रक्षा होगी।
यही राष्ट्र की रक्षा होगी।
और यही अखंड भारत के संकल्प को जीवन देने का मार्ग होगा।
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