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वनवासी’ शब्द से इतनी तकलीफ क्यों? संविधान पढ़िए, फिर अमित शाह से सवाल कीजिए!


- डॉ. मयंक चतुर्वेदी 

भारतीय राजनीति में अब शायद शब्द भी वोट बैंक के हिसाब से तय होने लगे हैं। कोई शब्द संविधान में है या नहीं, उसका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ क्या है, उसके पीछे समाज को जोड़ने का भाव है या तोड़ने का, इन सवालों से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है कि उससे राजनीतिक लाभ कितना उठाया जा सकता है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा जनजातीय समाज के संदर्भ में ‘वनवासी’ शब्द का प्रयोग क्या हुआ, कांग्रेस सांसद सुखदेव भगत और विपक्ष को मानो एक नया राजनीतिक हथियार मिल गया। 

संसद परिसर में विरोध, बयानबाजी और यह आरोप कि ‘वनवासी’ कहना आदिवासी पहचान को कमजोर करना है, किंतु जरा ठहरिए। सवाल उठाने वालों से एक सीधा सवाल है, जिस संविधान की शपथ लेकर आप संसद में हंगामा कर रहे हैं, क्या आपने उसे ठीक से पढ़ा है? 

क्‍योंकि भारतीय संविधान जनजातीय समुदायों के लिए जिस स्पष्ट संवैधानिक संज्ञा का इस्तेमाल करता है, वह है, ‘अनुसूचित जनजाति’ (Scheduled Tribes)। अनुच्छेद 342 इसी संवैधानिक पहचान और अधिसूचना की व्यवस्था करता है। पांचवीं और छठी अनुसूची जनजातीय क्षेत्रों के संरक्षण और प्रशासन से जुड़े विशेष प्रावधान करती हैं। यानी संवैधानिक अधिकार किसी राजनीतिक नारे से नहीं, संविधान से आते हैं।

‘वनवासी’ कह दिया तो संविधान कैसे बदल गया?

विपक्ष से पूछा जाना चाहिए कि यदि किसी जनजातीय समाज को ‘वनवासी’ कहा गया तो उसके संवैधानिक अधिकार का कौन-सा प्रावधान समाप्त हो गया? क्या अनुच्छेद 342 निरस्त हो गया? क्या अनुसूचित जनजातियों की सूची बदल गई? क्या पांचवीं अनुसूची खत्म हो गई? क्या आरक्षण और संवैधानिक संरक्षण समाप्त हो गए? कहना होगा कि इनमें से किसी प्रश्न का उत्तर ‘हां’ में नहीं है। फिर यह हंगामा किसलिए?

यहां समझ लेना चाहिए कि ‘वनवासी’ शब्द अपने मूल अर्थ में किसी समुदाय को नीचा दिखाने वाला शब्द नहीं है। यह वन में रहने वाले समाज की भौगोलिक और जीवन-पद्धति से जुड़ी पहचान को व्यक्त करता है। जैसे नगर में रहने वाला नगरवासी और गांव में रहने वाला ग्रामवासी कहलाया, वैसे ही वन क्षेत्र में रहने वाले समाज को वनवासी कहना भाषाई रूप से सही है। उपलब्ध सामग्री भी इसे प्रकृति के साथ सहजीवी जीवन और वन-संस्कृति से जोड़ती है।

जिस ‘वन’ को आप पिछड़ेपन का प्रतीक बना रहे हैं, वही भारत की संस्कृति में गौरव है

वास्तविक समस्या शायद ‘वनवासी’ शब्द में नहीं, उस दृष्टि में है जो ‘वन’ को पिछड़ेपन का पर्याय मानती है। भारतीय सभ्यता में वन त्याग, तपस्या, साधना और प्रकृति से संवाद का क्षेत्र रहा है। भगवान श्रीराम का वनवास भारतीय सांस्कृतिक स्मृति का महान अध्याय है। निषादराज गुह और माता शबरी के प्रसंग सामाजिक आत्मीयता और सम्मान के प्रतीक हैं। जब कहा जाता है हे, अरण्‍यवासी, तब भी यह शब्‍द बहुत सम्‍मान का प्रतीक रहा है, यानी आप वनवासी कहें या अरण्‍यवासी, दोनों का अर्थ एक ही है। महाराणा प्रताप के संघर्ष में भील समाज का योगदान हो या जनजातीय वीरों का स्वतंत्रता संग्राम में बलिदान, कहना होगा कि भारत का इतिहास वनवासी समाज की वीरता के बिना अधूरा है। फिर ‘वनवासी’ शब्द को अपमान बताने की इतनी जल्दी क्यों?

राजनीतिक सुविधा के लिए पहचान की नई दीवार?

सच; यहां जो समझ आता है, वह इन सांसदों के विचार से यही लगता है कि इनकी असली चिंता शब्द न होकर उसके राजनीतिक इस्तेमाल की है। ‘जनजातीय समाज’ भारत की सामाजिक संरचना का अभिन्न हिस्सा है। उसकी अपनी परंपराएं हैं, अपनी भाषाएं हैं, अपनी सांस्कृतिक स्मृतियां हैं, अपने नायक हैं और प्रकृति से जुड़ी विशिष्ट जीवन-दृष्टि है। इस विशिष्टता का सम्मान होना चाहिए, लेकिन इन्‍हें लगता है कि सम्‍मान के नाम पर यदि हम आदिवासी का नैरेटिव गढ़ेंगे तो इन भोलेभाले बन्‍धुओं को अन्‍य समाज से विलग करना आसान रहेगा, लेकिन ये भूल जाते हैं कि सम्मान और अलगाव के इस अंतर को जनजाति समाज भी समझता है और संपूर्ण भारत के अन्‍य समाज भी इसके सच को जानते हैं। 

जनजातीय समाज की विशिष्ट पहचान का सम्मान करने का अर्थ यह नहीं कि उसके और शेष भारतीय समाज के बीच ‘मूल निवासी बनाम बाहरी’ की दीवार खड़ी कर दी जाए। उपलब्ध सामग्री इसी बात पर जोर देती है कि भारतीय समाज को ऐसी कृत्रिम श्रेणियों में बांटना सामाजिक समरसता के लिए घातक है।

कांग्रेस सांसद सुखदेव भगत समेत तमाम कांग्रेसियों एवं अन्‍य को यह समझना चाहिए कि भारत का इतिहास अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया के औपनिवेशिक अनुभव की हूबहू प्रतिकृति नहीं है। इसलिए वहां विकसित ‘Indigenous’ या ‘Aboriginal’ अवधारणाओं को भारतीय सामाजिक संरचना पर यांत्रिक ढंग से आरोपित नहीं किया जा सकता है। यह शब्‍द वास्‍तव में औपनिवेशिक नैरेटिव के राजनीतिक इस्तेमाल से जुड़ा है। 

जेनेटिक विज्ञान को भी राजनीतिक नारे में मत बदलिए

सुखदेव भगत एवं अन्‍य कांग्रेस के सांसद अच्‍छा हो अध्‍ययन करें, ताकि उन्‍हें पता चल सके कि भारत की आनुवंशिक विविधता और इतिहास उपलब्ध सामग्री राखीगढ़ी, ANI-ASI और विभिन्न भारतीय समुदायों के आनुवंशिक अध्ययनों को भारत की दीर्घकालिक जनसंख्‍यात्‍मक निरंतरता के संदर्भ में रखती है। इसका अर्थ यह है कि भारतवर्ष के सभी लोग भले ही अलग-अलग जाति वर्ग, पंथ में बंटे हों, उनके पूर्वज एक हैं और उनका डीएनए भी आपस में एक है। इसलिए इसका व्यापक संदेश यही है कि भारतीय समाज को वैज्ञानिक रूप से भी ‘बाहरी बनाम मूल निवासी’ खांचे में नहीं बांटा जा सकता है। 
 
सांसदों को संसद में प्रदर्शन से पहले संविधान की कक्षा क्यों नहीं करनी चाहिए?

सुखदेव भगत यदि गृह मंत्री से सवाल करना चाहते हैं तो उन्हें पूरा अधिकार है। लोकतंत्र में सरकार से प्रश्न पूछना विपक्ष का धर्म है। लेकिन विपक्ष का धर्म यह भी है कि उसके प्रश्न तथ्यों पर आधारित हों। यदि ‘वनवासी’ शब्द के प्रयोग को जनजातीय अधिकारों पर हमला बताया जा रहा है, तो यह बताया जाना चाहिए कि कौन-सा संवैधानिक अधिकार प्रभावित हुआ? कौन-सा कानून टूटा? कौन-सा संरक्षण वापस लिया गया? सिर्फ शब्द को लेकर भावनात्मक आरोप लगा देना संवैधानिक तर्क नहीं हो सकता। संसद गंभीर विमर्श का सर्वोच्च मंच है, शब्दों की राजनीति का अखाड़ा नहीं। 

जनजातीय समाज को भड़काना आसान, उसके वास्तविक प्रश्नों का समाधान कठिन

आज देश के जनजातीय समाज को सबसे अधिक जरूरत किस चीज की है? क्या उसे ‘आदिवासी बनाम वनवासी’ की बहस चाहिए? या शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कौशल विकास, भूमि अधिकार, वनाधिकार, आजीविका और बेहतर बुनियादी सुविधाओं पर ठोस राजनीतिक प्रतिबद्धता? क्या जनजातीय युवा के भविष्य का प्रश्न इस बात से तय होगा कि संसद में उसे ‘आदिवासी’ कहा गया या ‘वनवासी’? 

निश्चित रूप से नहीं। उसका भविष्य इस बात से तय होगा कि उसे शिक्षा मिले, रोजगार मिले, उसके अधिकार सुरक्षित हों और उसकी संस्कृति एवं परंपराओं को सम्मान मिले, इसलिए राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे जनजातीय समाज की भावनाओं को उकसाने के बजाय उसके वास्तविक प्रश्नों पर प्रतिस्पर्धा करें।

पहचान का सम्मान कीजिए, लेकिन भारत को खांचों में मत बांटिए

जनजातीय समाज को उसकी विशिष्ट पहचान के साथ सम्मान देना भारत की जिम्मेदारी है, किंतु इसी सम्मान के नाम पर भारतीय समाज को ‘मूल निवासी’ और ‘गैर-मूल निवासी’ की राजनीतिक श्रेणियों में बांटना एक खतरनाक दिशा होगी। नगरवासी, ग्रामवासी और वनवासी, वस्‍तुत: ये भारत की विविध सामाजिक संरचना के अलग-अलग रूप हो सकते हैं, लेकिन राष्ट्र एक है। ध्‍यान रहे, सांस्कृतिक विविधता भारतीयता की शक्ति है। विविध पंथ, मत, दर्शन अपने भेद नहीं वैशिष्‍य हमारा है। एक-एक को ह्दय लगाकर भारत की विराट शक्‍ति को प्रकटाना ही हम सभी का ध्‍येय होना चाहिए। 

अब वनवासी समाज ही तय करे कि उसकी पहचान का राजनीतिक ठेका किसके पास है

ऐसे में अब सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि जनजातीय समाज स्‍वयं विचार करे कि उसके लिए क्‍या अच्‍छा है। यदि ‘वनवासी’ शब्द किसी समुदाय के लिए सम्मान, आत्मीयता और प्रकृति से उसके ऐतिहासिक संबंध को व्यक्त करता है, तो उसे अपमान बताकर राजनीतिक तूफान खड़ा करना समझदारी नहीं है, ऐसे में विपक्ष के नेताओं के लिए सबसे उचित सलाह यही है कि अमित शाह का विरोध कीजिए, सरकार की आलोचना कीजिए, नीतियों पर सवाल उठाइए; पर जनजातीय समाज की भावनाओं को राजनीतिक बारूद मत बनाइए। संविधान की किताब खोलिए, तथ्यों को पढ़िए और फिर संसद में सवाल पूछिए।

क्योंकि जनजातीय समाज को सम्मान चाहिए, अपना राजनीतिक इस्तेमाल नहीं। उसे अधिकार चाहिए, वो उसे दें, विभाजनकारी नैरेटिव नहीं दें और एक अंतिम बात कि भारत को ‘मूल निवासी बनाम बाहरी’ की नई लड़ाई नहीं चाहिए,बल्कि यदि कुछ चाहिए तो वह यही हो सकता है कि हम सभी नगरवासी, ग्रामवासी और वनवासी एकजुट शक्ति से निर्मित समरस और सशक्त राष्ट्र भारत को विश्‍व शक्‍ति बनाने के लिए एक स्‍वर, एक गति, एक लय और एक ताल के साथ समवेत हो आगे बढ़ें और हर दिशा में छा जाएं।

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