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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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।।ॐ।।
-डॉ. नितिन सहारिया ,महाकौशल
वर्तमान समय में देश व विश्व , समाज के अंदर वातावरण कुछ ठीक नहीं है। देशो के बीच आपस में वैमनस्य , षड्यंत्र, धिन्गामुस्ति चल रही हैं। कुल मिलाकर समाज व विश्व में संतुलन, संयम ,सद्भाव का अभाव दिखाई दे रहा है। प्राणीमात्र के प्रति संवेदना ,प्रेम, करुणा का अभाव प्रतीत हो रहा है। रास्ट्रो के अंदर आपसी कलह, षड्यंत्र, आंदोलन, प्रगतिशील सरकार को गिराने के लिए तरह-तरह के कुचक्र, छल-कपट के षड्यंत्र चल रहे हैं। वर्चस की लड़ाई चल रही है। जबकि वैश्विक मानवता के उज्जवल भविष्य के लिए चिंतन व कार्यक्रम कम नहीं चल रहे हैं। किन्तु आज व्यक्ति व समाज का चिंतन संकुचित ,स्वार्थी, अलगाववादी, इकंडेपन का दिखाई पड़ता है। आज वैश्विक परिदृश्य मे अशांति,कलह, युद्ध , विनाश के बादल मन्डराते नज़र आ रहे हैं।
इसी संदर्भ में युगऋषि, वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य लिखते हैं कि-
" विगत शताब्दियों में विज्ञान और बुद्धिवाद ने असाधारण प्रगति की है। इनके सहारे बहुमुखी प्रगति की आशा की जानी चाहिए थी और सतोगुणी वातावरण फिर से वापस लौटना चाहिए था, पर दुर्भाग्य से वह आशा पूरी नहीं हुई, वरन उल्टे ही दृश्य दृष्टिगोचर हो रहे हैं। असमानताएं बड़ी हैं। द्वेष -दुर्भाव में बढ़ोतरी हुई है । स्वार्थ परता आधिकाधिक सघन होती गई है। करुणा और शालीनता के स्रोत मानो सूखने ही लगे हैं। *हर कोई अधिकारों के लिए अपनी मांग बढ़ाने में निरत है, कर्तव्यों की ओर से उपेक्षा की प्रवृत्ति ही बढ़ रही है।* चिंतन, चरित्र और व्यवहार की दृष्टि से स्थिति दिन-दिन पतन पराभव की ओर गिरते जाने का परिणाम यह हुआ है कि *चेतनात्मक वातावरण का हर क्षेत्र प्रदूषण से भर गया है। वायु ,जल ,मिट्टी, आकाश आदि* में बढ़ते जा रहे प्रदूषण इसके अतिरिक्त हैं। आशंका और अविश्वास बढ़ते -बढ़ते आगामी संभावित महायुद्ध की तैयारीयों में जुट गए हैं। वैज्ञानिक आयुधोँ के ऐसे आविर्भाव हुए हैं, जो यदि चल पड़े तो इस सुंदर दुनिया का और उसकी प्राणी संपदा का अस्तित्व भी शेष रहने देंगे या नहीं, इसमें संदेह है। *साधारण क्रम से भी विषाक्तता जिस तेजी से बढ़ रही है, उसे देखते हुए लगता है कि कहीं दुनिया धीमी आत्महत्या की ओर तो नहीं बढ़ रही है!* बढ़ती हुई नशेबाजी और अंधाधुंध जनसंख्या वृद्धि ऐसे दो उदाहरण हैं, जो प्रगति और शांति की संभावनाओं को धूमिल करके रख देते हैं। गरीब -अमीर के, नर -नारी के ,जात-पात के ,अशिक्षित- शिक्षित के बढ़ते हुए अंतर भी निराशाजनक संभावनाओं के घटाटोप समेटकर ही सामने खड़े कर देते हैं। असंतोष ,आशंका ,उदिग्न्ता और असहयोग की बढ़ती हुई मानसिकता हर किसी को तनाव ग्रस्त किए हुए हैं।
*अवांछनीय वातावरण से न शरीर स्वस्थ रहता है और न मन संतुलित।* देखा जाता है कि आधिकाधिक शरीर दुर्बलता और अस्वस्थता से ग्रस्त हैं। जिन्हें पूर्ण स्वस्थ कहा जा सके उनके दर्शन दुर्लभ हो रहे हैं। *ईर्ष्या , द्वेष से जलती हुई मानसिकता ने घर-घर में शमशान जैसे वीभत्स दृश्य उपस्थित कर दिए हैं।* सहयोग तो स्वार्थ भर के लिए शेष रह गया है। उस आत्मीयता की अभिवृद्धि हो ही नहीं रही है, जिसके कारण एक और एक मिलकर ग्यारह बनने की युक्ति सार्थक होती थी।
*पिछली दो-तीन शताब्दियों में प्रगति के नाम पर जो कुछ सुविधा- साधन बन पड़े हैं, उन्हें मोटी दृष्टि से देखने पर प्रतीत होता है की धरती पर देवताओं ने नया स्वर्गलोक बसा लिया है।* 500 वर्ष पुराने व्यक्ति कहीं जीवित हों और पुराने जमाने तथा आज के युग की वे आज तुलना करें तो उन्हें इस प्रगतिशीलता पर आश्चर्यचकित होकर रहना पड़ेगा *किंतु ऊपर से सुसज्जा वाली परत उघाड़ते ही जो अनुभव होता है,उसे नर्क से भी गया- गुजरा कहा जा सकता है। दुष्ट चिंतन ने आचरण को भ्रष्ट करके रख दिया है।* शालीनता का स्थान निष्ठुरता ने ग्रहण कर लिया है। *वासना ,तृष्णा और अहंता की कभी न पूरी होने वाली खाई को पाटने में लोग अहनिर्श इस प्रकार लगे हैं, मानो कुबेर के साधन और इंद्र के वैभव से उन्हें कम नहीं, अधिक ही चाहिए।* इस व्यामोह के कुचक्र से मनुष्य इतनी गहरी दलदल में धंसता ही चला गया है कि उबरने की बात सोचना तक संभव नहीं बन पड़ रहा है; फिर छुटकारा मिले भी तो कैसे!
*बाहर से बन -ठनकर निकलने की विडंबना में भीतर- ही -भीतर मनुष्य कितना खोखला हो गया है,* इसे देखकर आश्चर्य होता है। परिणीति सामने है। *समृद्धि भले ही बढी हो,पर मनुष्य भीतर से इतना खोखला होता चला गया है ,मानो घुनसमुदाय ने किसी खंबे को पूरी तरह जरा-जीर्ण करके रख दिया हो* और वह अब-तब धराशायी होने की बाट जोह रहा हो।
वैभव का बाहुल्य और उदिग्न्ता का विस्फोट साथ-साथ कैसे बैठे रह सकते हैं? यह लगता तो आश्चर्यजनक है,पर विश्लेषण इसी यथर्त्ता के निष्कर्ष पर पहुंचता है। *परिस्थितियों पर और भी अधिक ऊहापोह करने पर पता चलता है कि हम सब किसी महाअशुभ के महागर्त में गिरने जा रहे हैं।* वैभव का दुरुपयोग प्रयोक्ता के लिए ही नहीं ,सर्वसाधारण के लिए भी विपत्ति लाता है। कला, समृद्धि, चतुरर्ता ,संपदा आदि के सभी पक्ष यदि नीतिमत्ता की राह छोड़ दें तो फिर ईश्वर ही मालिक है!
*मन:स्थिति के गड़बडा जाने पर परिस्थितियों की विपन्नता स्वाभाविक है। जिधर से भी पर्दा उठाया जाता है, उधर ही चमकीले खोल की आड़ में एक विषैला सर्प बैठा दीखता है।*
प्रगतिशीलता ने मनुष्य को जिस स्तर का बना दिया है, उसे देखते हुए लगता है कि वर्जनाओं को उदरस्त करने से पूर्व निकटवर्तियों और समीपस्थों का भक्षण कर जाने की नीति अब अपवाद नहीं रही, वरन् उसने सार्वजनिक प्रचलन की मान्यता प्राप्त कर ली है। इस बीच मानवीय गरिमा की सत्ता को ढूंढ निकालना सुनिश्चित हो रहा है। जहां दिखता भी है,वहां उपजने वाली आशा भीतरी छह्म को देखकर निराशा में बदल जाती है।
दुरुपयोग से तो अमृत भी विष बन जाता है। उसने वर्तमान प्रगति के पक्षधर दर्शन,कौशल ,स्वभाव, रुझान ,प्रयास आदि को सहचर बना लिया है। ऐसी दशा में अनर्थ का ही पोषण हुआ है। विकृत मानसिकता ने तो विपन्न परिस्थितियों को ही जन्म दिया है और बिषधरों का एक अच्छा -खासा समुदाय फन फैलाए हुए दसों दिशाओं में कोलाहल मचाता दिखता है। लगता है कि यही सब चलता रहा तो आदिमकाल से अब तक संचित की गई मानवीय संस्कृति और प्रगति का अंत होकर रहेगा।
वर्तमान स्थिति से सभी विचारशील चिंतित हो उसके हल खोजते भी हैं और सुझाते भी हैं, पर कार्यान्वयन का अवसर आते ही उसके लिए साहस का अंत हो गया प्रतीत होता है।
अभ्ययस्त विचार ही स्वभाव में सम्मिलित होकर एक से एक बड़े कुतूहल और कुकृत्य कर दिखाते हैं। जो इस कुचक्र से बचे रहे हों उनकी गणना अपवाद रूप में उंगलियों पर करनी पड़ेगी।
साधारण बुद्धि के लोग वैभव की चमकदार पिटारी में बैठे विनाश के महाबिषधर का आभास न पा सकें, यह संभव है, किंतु उस मदारी को तो वास्तविकता का ज्ञान होना ही चाहिए, जिसके इसारे पर यह सब भला -बुरा विस्तार होता रहता है। सृष्टा ने मनुष्य एवं इस धरित्री को अपनी सर्वोत्तम कलाकृति के रूप में बनाया है। मनुष्य की संरचना प्राय: उन्हीं तत्वों से की है, जिनके द्वारा उसका अपना अस्तित्व विनिर्मित हुआ है। नियंता की इच्छा यही रही है कि बड़े अरमानों के साथ बनाई गई उसकी इस कलाकृति का विकास हो। वह न इस धरती का अंत चाहता है और न उसे यह सुहाता है कि मनुष्य आत्महत्या के मार्ग पर चलकर अपना विनाश अपने आप कर ले, इसलिए उसने इस आड़े वक्त में डूबती नाव को बचाने के लिए कुशल मल्लाह जैसा पराक्रम कर दिखाने का निश्चय किया है। "हारे को हरी नाम" का ही एकमात्र संबल रह जाता है। गज और द्रौपदी जैसे अनेक उदाहरण भी इसके प्रमाण हैं। बालकों को कारण बताने का कुतूहल अभिभावक एक सीमा तक ही करते हैं। जब वे माचिस का खेल खेलने पर उतारू होते हैं तो उनकी इस हरकत को रोक भी दिया जाता है।"

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