सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

पीढ़ियों के बीच खड़ी होती दीवारें और सभ्यतागत संघर्ष का नया चेहरा





दीपक कुमार द्विवेदी 


आज पूरी मानवता और संपूर्ण विश्व एक ऐसे अदृश्य और खामोश चक्रव्यूह में घिर चुका है, जिसकी पीड़ा को महसूस करके किसी भी संवेदनशील और राष्ट्रप्रेमी व्यक्ति का कलेजा कांप उठेगा। आज समाज और दुनिया के शरीर पर एक ऐसा अदृश्य परजीवी आकर बैठ गया है, जो इंसान को एक ही झटके में नहीं मारता, बल्कि चुपचाप उसके शरीर से लिपटकर उसकी जीवन ऊर्जा और एक-एक बूंद खून चूसता रहता है। इस व्यवस्था के शिकार व्यक्ति को शुरुआती दौर में यह अहसास भी नहीं होता कि कोई बाहरी ताकत उसके भीतर के संस्कारों, शांति और आनंद को धीरे-धीरे खत्म कर रही है। आज इन वैश्विक ताकतों की भूख इतनी अंधी और असीम हो चुकी है कि इस धरती के सारे संसाधन कम पड़ चुके हैं, और यह मानवता को निचोड़ते हुए अंतरिक्ष और अन्य ग्रहों तक अपनी लूट को फैलाने में जुटा है। इसके लिए इंसान का कोई आत्मिक, पारिवारिक या सामाजिक मूल्य नहीं बचा है; व्यक्ति केवल और केवल एक उपभोग करने वाली वस्तु यानी 'कंज्यूमर' मात्र बनकर रह गया है। इस क्रूर व्यवस्था को इससे कोई सरोकार नहीं है कि इस अंधी दौड़ में घर-परिवार बिखर रहे हैं, युवा नशे के अंधकार में डूब रहे हैं, लोग अपनी प्राकृतिक पहचान और परंपराएं खो रहे हैं, या एक आम इंसान जीवनभर बैंक की ईएमआई, होम लोन और बच्चों की शिक्षा के भारी-भरकम बोझ तले पिसते-पिसते दम तोड़ने को विवश हो रहा है। आज स्थिति यह हो चुकी है कि यदि किसी मध्यम वर्गीय परिवार को अपने बच्चे के सातवीं कक्षा के किसी अच्छे स्कूल में प्रवेश के लिए केवल एडमिशन फीस के नाम पर तीन से चार लाख रुपये चुकाने पड़ जाएं, तो माता-पिता अपनी जीवनभर की पूंजी, स्वास्थ्य और मानसिक सुकून को दांव पर लगा देते हैं। घर में कोई गंभीर बीमारी आ जाए तो पूरा परिवार सड़क पर आ जाता है, और यह बाजार दूर खड़ा होकर इस लाचारी का तमाशा देखता रहता है।


इस मानवीय पतन और सांस्कृतिक क्षरण के पीछे पश्चिम की वे प्रयोगशालाएं और वैचारिक कारखाने काम कर रहे हैं जो कभी बंद कमरों में गढ़े गए थे। वर्ष 1990 में प्रसिद्ध अमेरिकी राजनीतिक विज्ञानी सैमुअल पी. हंटिंगटन ने अपनी चर्चित और दूरदर्शी पुस्तक 'क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन' यानी सभ्यताओं का संघर्ष के माध्यम से पहली बार दुनिया को एक बहुत बड़े और आसन्न खतरे से आगाह किया था। उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया था कि भविष्य के युद्ध केवल राजनीतिक सीमाओं के नहीं, बल्कि सभ्यताओं के बीच होंगे। उस पुस्तक और वैश्विक वास्तविकताओं का गहन अध्ययन करने पर यह साफ उजागर होता है कि पश्चिमी संस्थाएं, वैश्विक बाजारवादी ताकतें, पूंजीवाद, डेमोक्रेसी, वैश्विक संस्थाएं, और सबसे बढ़कर ईसाई मिशनरियां तथा कम्युनिस्ट यह सब अलग-अलग नहीं बल्कि एक ही असुरी कॉकटेल के रूप में काम कर रहे हैं। इतिहास और वैचारिक धरातल पर यह अकाट्य सत्य है कि ईसाई मिशनरियों ने ही सुनियोजित तरीके से कम्युनिस्टों को आगे बढ़ाया और पाला-पोसा है, क्योंकि क्रिश्चियन चर्च के वैचारिक विस्तार और पश्चिम के वर्चस्व का ही एक संशोधित रूप कम्युनिज्म और आधुनिक वामपंथ में दिखाई देता है। इसके साथ ही इस्लाम के रूप में वे आक्रांता शक्तियां भी इसी षड्यंत्र में साठगांठ रखती हैं, जो सदियों से इस देश और संस्कृति पर आक्रमण करती आई हैं।


इन सबका एक ही साझा और अंतिम लक्ष्य है भारत और चीन जैसे प्राचीन, जीवंत और सनातन सभ्यतागत राष्ट्रों को नष्ट करना, तथा हिंदू धर्म, भारतीय राष्ट्र और पारिवारिक संस्थाओं को पूरी तरह ध्वस्त कर देना। पश्चिम इन सभ्यतागत राष्ट्रों पर अपनी विचारधारा थोपकर उन्हें अपना गुलाम बनाना चाहता है ताकि पूरी दुनिया उनके बताए रास्ते पर चले। यदि हम वैश्विक परिदृश्य को देखें, तो चीन में ये ताकतें सफल भी हो गईं; वहां कम्युनिस्ट शासन और वैचारिक प्रदूषण के माध्यम से चीन की मूल संस्कृति और सभ्यता को लगभग ध्वस्त कर दिया गया। आज भले ही चीन अपनी जड़ों की ओर लौटने का असफल प्रयास कर रहा है, लेकिन बहुत देर हो चुकी है। परंतु भारत के मामले में ये ताकतें हजार वर्षों के निरंतर आक्रमणों, नरसंहारों और अत्याचारों के बावजूद आज तक सफल नहीं हो पाईं। हजार वर्ष के भीषण आक्रमणों के बावजूद भारत को न जीत पाने का यह गम इन विदेशी और विघटनकारी ताकतों के सीने में आज भी एक नस्तर की तरह चुभता है। चूंकि वे सीधे तौर पर भारत की सनातन आत्मा को नहीं जीत पाए, इसलिए उन्होंने कम्युनिस्टों, ईसाई मिशनरियों और तमाम वैचारिक मुखौटों को आगे बढ़ाया जो असल में क्रिश्चियन और पश्चिमी प्रभुत्व के ही सबसे सॉफ्ट और साथ ही सबसे हिंसक रूप हैं। यही कारण है कि वे भारत पर कभी परजीवी की तरह तो कभी घुन की तरह, अपने अलग-अलग रूपों और माध्यमों से निरंतर हमले करते आ रहे हैं।


पूंजीवाद, समाजवाद, लोकतंत्र या वर्ग संघर्ष जैसे जितने भी सिद्धांत पश्चिम की धरती पर पैदा हुए, उनका पूरा ढांचा केवल 'अर्थ' और 'काम' के भोग पर केंद्रित था। उनके संकीर्ण चिंतन में धर्म, नैतिकता और मोक्ष के लिए कोई स्थान नहीं था। यही कारण है कि पश्चिम के ये मॉडल पूरी तरह अनुभवहीन और अव्यवहारिक साबित हुए, और जहाँ-जहाँ इन्हें थोपा गया, वहाँ समाज, राष्ट्र और मानवता भीतर से तबाह हो गई।
लेकिन इस बर्बादी का सबसे कुटिल और खतरनाक हथियार वह वैचारिक षड्यंत्र है जिसके तहत समाज को अंदर से खोखला करने के लिए सुनियोजित तरीके से मोहरे बदले जाते हैं। इतिहास गवाह है कि इन ताकतों ने पहले लोगों को जातियों के नाम पर आपस में लड़ाया आर्य और द्रविड़ के झूठे सिद्धांत गढ़े गए। उसके बाद भाषा और क्षेत्र के नाम पर दरारें पैदा की गईं। फिर स्त्री और पुरुष के बीच वैचारिक दीवारें खड़ी की गईं। और अब, इस सभ्यतागत युद्ध के तहत इन्होंने समाज को तोड़ने की सबसे नई और कुत्सित तकनीक अपना ली है 'पीढ़ीगत युद्ध' यानी जेनरेशन वारफेयर। इस जनरेशन वॉर के तहत बेबी बूमर्स, जेनरेशन एक्स, मिलेनियल्स, जेनरेशन जेड, जेनरेशन अल्फा और जेनरेशन बीटा जैसी विभिन्न पीढ़ियों के बीच कृत्रिम वैचारिक टकराव को हवा दी जा रही है, ताकि सनातन समाज की मूल इकाई यानी परिवार को अंदर से दीमक की तरह खाया जा सके।
इस जनरेशन वॉर की कहानी पड़ोसी देश नेपाल में हुई हिंसक घटनाओं से आरम्भ होती है, जिसकी पृष्ठभूमि सितंबर 2025 से बनती दिखाई दी थी। वहां सोशल मीडिया मंचों पर प्रतिबंध लगाने के बाद बड़ी संख्या में युवाओं को सड़कों पर उतारकर एक रिजीम चेंज ऑपरेशन चलाया गया था। नेपाल की इन घटनाओं के तुरंत बाद भारत में भी इसे दोहराने की साजिश रची गई। इस पीढ़ीगत युद्ध के मोहरे के रूप में 'जेन-जी' शब्द का प्रयोग किया गया। पड़ोसी देश नेपाल में हुई राजनीतिक उथल-पुथल से ठीक पहले 'जेन-जी' शब्द को आम जनजीवन में कोई दूर-दूर तक नहीं जानता था। लेकिन रातों-रात वैश्विक डिजिटल तंत्र और वैचारिक कारखानों के माध्यम से इस शब्द को इस तरह हवा दी गई कि आज यह हर बच्चे और युवा की जुबान पर बैठा दिया गया है। इस एक शब्द के सहारे 2000 के बाद जन्मी नई पीढ़ी को 1990 के दशक से पहले की पीढ़ी के आमने-सामने खड़ा कर दिया गया है, ताकि बच्चे अपने दादा-दादी, माता-पिता, अपने परिवार, अपने समाज और अपनी सनातन संस्कृति को अपना दुश्मन समझने लगें और अपनी ही जड़ों पर कुल्हाड़ी मार लें।


इसी सुनियोजित जहर का एक अत्यंत विचलित करने वाला और नग्न रूप हाल ही में संसद मार्च के नाम पर हुए उस कुत्सित घटनाक्रम में सामने आया, जब 20 जुलाई को 'कॉकरोच जनता पार्टी' के बैनर तले सड़कों पर भारी हिंसा फैलाई गई। यह पूरा षड्यंत्र एक सोशल मीडिया मीम पेज से शुरू हुआ था, जहां सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश द्वारा फर्जी डिग्री और जालसाजी करने वालों के संदर्भ में कहे गए 'कॉकरोच' शब्द को संदर्भ से काटकर तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया और जेन-जी के नाम पर एक कृत्रिम आंदोलन खड़ा किया गया। इस आंदोलन का घोषित और बाहरी मुद्दा नीट पेपर लीक बताया गया था, लेकिन विडंबना यह है कि उस पूरे प्रदर्शन और मंच पर न तो नीट पेपर लीक की कोई वास्तविक चर्चा हुई और न ही उस समस्या के समाधान का दूर-दूर तक कोई जिक्र था। नीट पेपर लीक तो केवल एक मुखौटा था, जबकि वास्तविक और छिपा हुआ एजेंडा 'डिसमेंटल हिंदुत्व' यानी हिंदू संस्कृति और सनातन व्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त करना था।


संसद मार्च के दौरान उस भीड़ ने जो तांडव मचाया, उसने साबित कर दिया कि उनका लक्ष्य शिक्षा या व्यवस्था सुधारना नहीं था। उस मंच से देश के सबसे लोकप्रिय और लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के खिलाफ जिस स्तर की अभद्र, अमर्यादित और निकृष्ट भाषा का प्रयोग किया गया, उसने सार्वजनिक जीवन की सारी मर्यादाओं को तार-तार कर दिया। यह बेहद चिंताजनक तथ्य है कि इस अशोभनीय भाषा का प्रयोग करने वाले कोई अनुभवी राजनेता नहीं, बल्कि पंद्रह से पच्चीस वर्ष की आयु के युवा लड़के और लड़कियां थे, जिनका सार्वजनिक जीवन और शालीनता से कोई वास्ता नहीं बचा है। उस आंदोलन में खुलकर 'ब्राह्मणवाद से आजादी' जैसे नारे लगाए गए, भगवान श्रीराम और हिंदू देवी-देवताओं का खुलेआम अपमान किया गया, 'मेरा लिंग मेरी मर्जी' जैसे नारे गूंजे और यहाँ तक कि 'बस नाम रहेगा अल्लाह का' जैसे नारे लगाकर बहुसंख्यक समाज की आस्था को सीधी चुनौती दी गई। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, जो एक अभिभावक की भांति इस राष्ट्र और संस्कृति की रक्षा कर रहे हैं, उन्हें तानाशाह और हत्यारा बताकर हर आंदोलन को हिंसक बनाने का कुत्सित प्रयास किया गया ताकि पुलिस की गोली चले और उन लाशों पर राजनीतिक रोटियां सेकी जा सकें। उनकी स्वर्गीय मां तक को गालियां दी गईं और उनकी कब्र खोदने जैसी निकृष्ट बातें कही गईं।


लेकिन इन सबके बीच उस नेतृत्व का बड़प्पन और अभिभावकीय हृदय दुनिया ने तब देखा, जब परसों रात्रि ठीक बारह बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने एक इंस्टाग्राम रील वीडियो जारी कर उन युवक-युवतियों को पूरी तरह क्षमा कर दिया, जिन्होंने उन्हें और उनकी मां को गालियां दी थीं। उन्होंने स्नेह और करुणा से भरे शब्दों में कहा कि बच्चे हैं, गलतियों से सीखते हैं और उन्हें सुधारने का एक अवसर अवश्य मिलना चाहिए। एक राजनेता जब इस प्रकार अपने ऊपर हुए निजी और निकृष्ट प्रहारों को भुलाकर राष्ट्र के नौनिहालों के भविष्य पर विचार करता है, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि वह व्यक्ति सिर्फ एक शासक नहीं, बल्कि इस देश का सच्चा और संवेदनशील अभिभावक है।


इसके बावजूद, इन सबके दुखद परिणाम आज हमारे घरों और कक्षाओं के भीतर साफ दिखाई दे रहे हैं। जब एक पिता अपने घर को बचाने या संतान को सही राह दिखाने के लिए उसे थोड़ी सी भी सख्ती से डांटता है, तो वही बेटा थाने जाकर अपने ही पिता के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की धमकी देता है। स्कूल और कॉलेजों से बाहर निकलते समय जब कोई छात्र शिक्षक को धमकी देता है, तो यह उस समाज-केंद्रित व्यवस्था के पूरी तरह ढह जाने का प्रमाण है जहाँ कभी गुरु को भगवान का दर्जा दिया जाता था और बड़ों का आदर ही जीवन का सबसे बड़ा संस्कार माना जाता था। यह सब उस आधुनिक व्यवस्था का परिणाम है जो फ्रांसीसी क्रांति के बाद बंद कमरों में पैदा हुई, जिसके सभी सिद्धांत मनुष्य को केवल भोग और भौतिकता तक सीमित कर देते हैं।


इस वैश्विक और सामाजिक संकट से उबरने का मार्ग केवल सतही समझौतों या राजनीतिक भाषणों से नहीं मिल सकता। प्रकृति का शाश्वत नियम त्रिगुणात्मक और संतुलन पर आधारित है सूर्य, चंद्रमा और नौ ग्रहों से लेकर सृष्टि का हर कण एक निश्चित नियम और संतुलन से चलता है। सृष्टि का यह स्वरूप आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक इन तीन आयामों पर टिका है। जो भी व्यवस्था इस संतुलन को तोड़कर केवल भोग और भौतिकता पर जोर देगी, उसका पतन अकाट्य है। हमें पश्चिम के उन बंद कमरों में रचे गए खोखले सिद्धांतों को त्यागकर अपने उस प्राचीन सनातन चिंतन की ओर लौटना होगा जो जीवन के चारों पुरुषार्थों धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के संतुलन की बात करता है। जब तक मनुष्य अपने जीवन में 'धर्म' को केंद्र में रखकर अर्थ और काम का संचालन नहीं करेगा, तब तक इस परजीवी की जकड़ से मानवता को मुक्त नहीं कराया जा सकता। हमें अपनी जड़ों से जुड़ना होगा, पारिवारिक संवाद और संस्कारों को पुनः जीवित करना होगा तथा एक ऐसा सकारात्मक विमर्श खड़ा करना होगा जो आने वाली पीढ़ियों को विनाश के गर्त से बचाकर एक नई, सशक्त और संतुलित दिशा दे सके।

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