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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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✍️ कैलाश चन्द्र
क्या भारत की स्वतंत्रता केवल एक धारा का परिणाम थी? क्या 1857 का संघर्ष केवल दिल्ली, कानपुर, लखनऊ और झाँसी की कहानी है? और क्या उन हजारों स्थानीय योद्धाओं, किसानों, जमींदारों, सैनिकों और सामान्य लोगों के बलिदान को राष्ट्रीय इतिहास में पर्याप्त स्थान मिला, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी?
उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में खजुहा के निकट मुगल रोड पर स्थित ‘बावनी इमली’ इन प्रश्नों को अत्यंत तीखे ढंग से हमारे सामने रखती है।
फतेहपुर जिला प्रशासन के आधिकारिक विवरण के अनुसार, ठाकुर जोधा सिंह अटैया को 28 अप्रैल 1858 को खजुहा के निकट एक इमली के पेड़ पर 51 अन्य क्रांतिकारियों के साथ फाँसी दी गई। वही पेड़ आज भी विद्यमान है और यह स्थल ‘बावनी इमली’ के नाम से शहीद स्मारक के रूप में जाना जाता है।
भारत सरकार के स्वतंत्रता-संग्राम संबंधी अभिलेखों में भी जोधा सिंह अटैया और उनके साथियों के संघर्ष का उल्लेख मिलता है। इसलिए बावनी इमली को केवल लोक-स्मृति या किंवदंती कहकर खारिज करना उचित नहीं होगा।
ठाकुर जोधा सिंह अटैया और फतेहपुर का प्रतिरोध
जोधा सिंह अटैया रसूलपुर अटैया के जमींदार और 1857 के स्थानीय प्रतिरोध के प्रमुख नेताओं में थे। फतेहपुर में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष जून 1857 से ही तीव्र हो चुका था।
फतेहपुर जिला प्रशासन के विवरण के अनुसार, दरियाव सिंह, उनके पुत्र सुजान सिंह और अन्य क्रांतिकारियों ने 8 जून 1857 को खागा तहसील पर कब्जा कर लिया था और 11 जुलाई तक जिले का बड़ा हिस्सा क्रांतिकारियों के नियंत्रण में रहा।
यह तथ्य महत्वपूर्ण है। इससे स्पष्ट होता है कि 1857 केवल मेरठ से दिल्ली तक सैनिकों की क्रान्ति नहीं थी। अनेक क्षेत्रों में स्थानीय समाज, जमींदार, किसान, सैनिक और नेतृत्वकर्ता अंग्रेजी प्रशासन की संरचनाओं को चुनौती दे रहे थे।
इसी व्यापक पृष्ठभूमि में जोधा सिंह अटैया के संघर्ष को समझना चाहिए।
बावनी इमली : 52 लोगों की सामूहिक फाँसी
स्थानीय ऐतिहासिक परंपरा तथा सरकारी विवरणों के अनुसार, जोधा सिंह अटैया और उनके साथियों को ब्रिटिश सेना ने गिरफ्तार किया और 28 अप्रैल 1858 को 52 क्रांतिकारियों को एक ही इमली के पेड़ पर फाँसी दी।
यह घटना 1857 के दमन की क्रूरता का स्थानीय उदाहरण है। ब्रिटिश सत्ता ने विद्रोह को कुचलने के लिए केवल युद्धरत सैनिकों से संघर्ष नहीं किया, बल्कि स्थानीय नेतृत्व और उसके सहयोगियों को भी कठोर दंड दिया।
स्थानीय स्मृति में यह भी सुरक्षित है कि शवों को लंबे समय तक पेड़ पर लटकाए रखा गया, ताकि आसपास के लोगों में भय पैदा किया जा सके। भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव संबंधी अभिलेख में भी शवों को 37 दिनों तक लटकाए रखने का उल्लेख मिलता है।
यहीं से बावनी इमली केवल एक पेड़ नहीं रह जाती—वह औपनिवेशिक दमन, प्रतिरोध और बलिदान का स्मृति-चिह्न बन जाती है।
30 अगस्त से 7 सितंबर 1857 : दिल्ली के बाहर भी क्रांति जारी थी
1857 की राष्ट्रीय कथा को प्रायः दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, झाँसी और ग्वालियर जैसे प्रमुख केन्द्रों के माध्यम से समझाया जाता है। लेकिन 30 अगस्त से 7 सितंबर 1857 के बीच, जब दिल्ली पर ब्रिटिश घेराबंदी निर्णायक चरण में प्रवेश कर रही थी, उसी समय अवध, कानपुर, बिहार, बुंदेलखंड और अन्य क्षेत्रों में भी संघर्ष, पुनर्गठन और प्रतिरोध जारी था।
यह सप्ताह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाता है कि 1857 कोई एक शहर की लड़ाई नहीं थी, बल्कि अनेक समानांतर स्थानीय संघर्षों का विशाल जाल था।
30–31 अगस्त : दिल्ली और अवध में संघर्ष जारी
30 अगस्त को कोई ऐसी एक अखिल-भारतीय घटना नहीं हुई जिसे अलग से ‘अगस्त क्रांति दिवस’ कहा जाए। दिल्ली की घेराबंदी जारी थी और विद्रोही पक्ष सक्रिय था। अवध में ग्रामीण समाज, तालुकेदार और स्थानीय योद्धा अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दे रहे थे।
31 अगस्त तक लखनऊ रेजीडेंसी की घेराबंदी भी जारी थी। समकालीन ब्रिटिश विवरणों में इस अवधि की दैनिक सैन्य गतिविधियों का उल्लेख मिलता है।
अर्थात उस समय दिल्ली ही नहीं, लखनऊ भी सक्रिय युद्धक्षेत्र था।
1–3 सितंबर : अवध और कानपुर का सैन्य पुनर्गठन
सितंबर के आरम्भ में कानपुर ब्रिटिश सेना के लिए लखनऊ की ओर अभियान का प्रमुख आधार बन चुका था। Havelock की सेना पहले ही लंबे संघर्ष से कमजोर थी और अतिरिक्त सैनिकों की आवश्यकता थी। बाद में Sir James Outram के आने से संयुक्त अभियान की योजना बनी।
दूसरी ओर लखनऊ में विद्रोही सेनाएँ रेजीडेंसी की घेराबंदी बनाए हुए थीं।
इसलिए कानपुर और लखनऊ को अलग-अलग घटनाओं की तरह देखना 1857 की वास्तविक सैन्य संरचना को समझने के लिए पर्याप्त नहीं है।
4 सितंबर : दिल्ली में निर्णायक मोड़
4 सितंबर को दिल्ली के सामने ब्रिटिश सेना के लिए भारी siege-train पहुँची। समकालीन सैन्य अधिकारी Charles John Griffiths के विवरण के अनुसार इसमें भारी तोपें, mortars और बड़ी मात्रा में ammunition था। अतिरिक्त यूरोपीय सैनिकों, Baluch Battalion और Jhind की Sikh cavalry के आने से ब्रिटिश सेना की शक्ति भी बढ़ी।
अब दिल्ली की मजबूत दीवारों को तोड़ने के लिए निर्णायक artillery operation संभव हुआ।
5–6 सितंबर : अंतिम assault की तैयारी
5 और 6 सितंबर तक British engineers ने trenches और batteries की तैयारी तेज कर दी। Richard Baird Smith और अन्य engineers की योजनाओं के आधार पर दिल्ली की दीवारों में breach बनाने की तैयारी हो रही थी।
यहाँ यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि ब्रिटिश सेना स्वयं कठिन परिस्थितियों में थी। बीमारी, casualties और लंबे siege ने उसके सैनिकों को भारी नुकसान पहुँचाया था।
अर्थात दिल्ली पर अंतिम आक्रमण किसी सरल सैन्य विजय का परिणाम नहीं था; इसके पीछे महीनों की घेराबंदी, सैन्य पुनर्गठन और भारी तोपखाने की तैयारी थी।
7 सितंबर : दिल्ली का वास्तविक siege
समकालीन सैन्य अधिकारी Charles Griffiths ने लिखा कि 7 सितंबर 1857 से दिल्ली का “actual siege” माना जा सकता है।
इसके बाद 8, 10 और 11 सितंबर को विभिन्न siege batteries ने दिल्ली की दीवारों पर लगातार गोलाबारी की और 14 सितंबर को अंतिम assault शुरू हुआ। 20–21 सितंबर तक दिल्ली पर ब्रिटिश नियंत्रण स्थापित हो गया।
लेकिन इसी समय भारत के दूसरे क्षेत्रों में संघर्ष समाप्त नहीं हुआ था।
फतेहपुर, कानपुर, अवध, बिहार और बुंदेलखंड
फतेहपुर
फतेहपुर में विद्रोह जून 1857 से सक्रिय था। खागा तहसील पर क्रांतिकारियों का कब्जा और जिले के बड़े हिस्से पर कुछ समय तक उनका नियंत्रण इस बात का प्रमाण है कि स्थानीय स्तर पर ब्रिटिश प्रशासन को गंभीर चुनौती मिली थी।
बाद में यही क्षेत्र जोधा सिंह अटैया जैसे स्थानीय नेतृत्व के प्रतिरोध और अंततः बावनी इमली के सामूहिक बलिदान का साक्षी बना।
कानपुर
नाना साहेब के नेतृत्व में कानपुर जून-जुलाई 1857 में ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध महत्वपूर्ण केन्द्र रहा। हेवलॉक (Havelock) द्वारा कानपुर पर पुनः अधिकार किए जाने के बाद भी यह क्षेत्र रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बना रहा। अगस्त-सितंबर में कानपुर लखनऊ अभियान का प्रमुख सैन्य आधार था।
अवध
अवध 1857 के सबसे व्यापक जन-आधारित प्रतिरोध क्षेत्रों में था। 1856 में ब्रिटिशों द्वारा अवध के विलय के बाद तालुकेदारों, किसानों, सैनिकों और स्थानीय नेतृत्व में असंतोष गहरा था।
लखनऊ में बिरजिस कद्र को प्रतीकात्मक नेतृत्व मिला और ग्रामीण अवध में व्यापक प्रतिरोध जारी रहा। इसलिए 30 अगस्त–7 सितंबर की अवध-स्थिति को केवल ‘एक बड़ी लड़ाई नहीं हुई’ कहकर समाप्त नहीं किया जा सकता। लखनऊ की लगातार घेराबंदी स्वयं एक सतत युद्ध थी।
बिहार
बिहार में कुँवर सिंह 1857 के प्रमुख स्थानीय नेताओं में थे। आरा के संघर्ष और ब्रिटिश सैन्य कार्रवाई के बाद भी बिहार में प्रतिरोध समाप्त नहीं हुआ था।
यह इस बात का उदाहरण है कि स्थानीय नेतृत्व और ग्रामीण समाज ने अनेक क्षेत्रों में ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी।
बुंदेलखंड
बुंदेलखंड में संघर्ष केवल झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई तक सीमित नहीं था। झाँसी, सागर और आसपास के क्षेत्रों में ब्रिटिश प्रशासन को चुनौती मिली।
हालाँकि 30 अगस्त से 7 सितंबर की प्रत्येक तारीख के लिए किसी विशिष्ट बड़ी लड़ाई का दावा करने से पहले स्थानीय सैन्य डायरी, Political Proceedings और जिला अभिलेखों की जाँच आवश्यक है। इतिहास को प्रभावशाली बनाने के लिए तारीख गढ़ना उचित नहीं।
क्या इतिहास किसी एक विचारधारा की संपत्ति है?
यहीं सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है। यदि 52 लोगों की सामूहिक फाँसी जैसी घटना सरकारी अभिलेखों और स्मारक परंपरा में दर्ज है, तो राष्ट्रीय इतिहास की सामान्य स्मृति में यह घटना इतनी सीमित क्यों है?
क्या हमारी इतिहास-दृष्टि अत्यधिक दिल्ली-केंद्रित रही?
क्या राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में स्थानीय शहीदों को पर्याप्त स्थान नहीं मिला? क्या क्रांतिकारी, किसान, सैनिक और क्षेत्रीय प्रतिरोधों को गांधी-कांग्रेस-केंद्रित कथा के सामने अपेक्षाकृत कम स्थान मिला? इन प्रश्नों पर गंभीर शोध आवश्यक है।
कम्युनिस्ट या JNU के इतिहासकारों ने बावनी इमली जैसे स्थानीय समूह के संघर्ष को क्यों छिपाया” एक गंभीर प्रश्न है और इसे प्रमाणित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करने के लिए पाठ्यपुस्तकों, इतिहास-लेखन समितियों, लेखकों और अभिलेखों का प्रत्यक्ष तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक होगा।
लेकिन यह प्रश्न उठाना पूरी तरह उचित है कि इतिहास में किन्हें प्रमुखता मिली और किन्हें हाशिए पर छोड़ दिया गया?
“बिना खड्ग बिना ढाल”—पूरी कहानी नहीं
1954 की फिल्म जागृति का प्रसिद्ध गीत—
“दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल,
साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।”
गांधीजी के अहिंसक संघर्ष की लोकप्रिय सांस्कृतिक अभिव्यक्ति था। कवि प्रदीप ने इस किस मजबूरी में लिखा था। यह भी अध्ययन का विषय है लेकिन इतिहास को किसी गीत की दो पंक्तियों में समेटना संभव नहीं है। भारत की स्वतंत्रता के पीछे अनेक धाराएँ थीं—1857 का सशस्त्र प्रतिरोध, किसान और स्थानीय विद्रोह, क्रांतिकारी आंदोलन, गांधी के नेतृत्व में जनांदोलन, भगत सिंह और उनके साथियों का बलिदान, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज, 1946 का नौसैनिक विद्रोह तथा द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन की आर्थिक-सामरिक कमजोरी।
अहिंसा का योगदान नकारना गलत है। लेकिन सशस्त्र क्रांतिकारियों और स्थानीय शहीदों के योगदान को नकारना भी उतना ही गलत है।
इतिहास को पूरा कीजिए, किसी को मिटाइए नहीं
गांधी को सम्मान देने के लिए जोधा सिंह अटैया को भुलाना आवश्यक नहीं। भगत सिंह को सम्मान देने के लिए गांधी को नकारना आवश्यक नहीं। नेताजी को याद करने के लिए कांग्रेस को मिटाना आवश्यक नहीं। और स्थानीय शहीदों को राष्ट्रीय इतिहास में स्थान देने का अर्थ किसी एक राजनीतिक विचारधारा का विरोध करना भी नहीं है।
भारत की स्वतंत्रता किसी एक व्यक्ति, एक संगठन या एक पद्धति की निजी उपलब्धि नहीं थी।
यह दीर्घ ऐतिहासिक संघर्ष का परिणाम थी। किसी ने सत्याग्रह किया। किसी ने जेल भरी। किसी ने हथियार उठाए। किसी ने अंग्रेजी प्रशासन को अपने क्षेत्र से बाहर किया। किसी ने जंगलों और गाँवों में छापामार संघर्ष किया। किसी ने फाँसी का फंदा चूमा। और किसी का शव कई दिनों तक उस पेड़ पर लटका रहा, जिसे आज हम बावनी इमली के नाम से जानते हैं।
बावनी इमली के 52 शहीद इसी विराट स्वतंत्रता-संग्राम के अंग हैं।
उनकी स्मृति को राष्ट्रीय इतिहास में स्थान देना किसी के योगदान को कम करना नहीं है। यह केवल इतना कहना है—
इतिहास अधूरा नहीं होना चाहिए।
28 अप्रैल—बावनी इमली के 52 अमर बलिदानियों को शत्-शत् नमन। प्रमुख नगरों और शहरों के परे 30 अगस्त से 7 सितंबर कहे, अथवा 21 सितम्बर 1857 तक लगातार दिल्ली के बाहर भी एक सशस्त्र क्रांति जारी थी। समय समय पर उसका पावन स्मरण आवश्यक है।
✍️ कैलाश चन्द्र
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