सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

भारत में धर्म और राजनीति को अलग क्यों नहीं देखा गया?




✍️दीपक कुमार द्विवेदी

वातानुकूलित कमरों की कृत्रिम ठंडक में बैठे हमारे स्वयंभू बुद्धिजीवियों और आधुनिक विमर्शों में आजकल एक तर्क बहुत शान से उछाला जाता है— "दुनिया मंगल ग्रह तक पहुँच चुकी है। राज्य का कोई धर्म नहीं होना चाहिए, धर्म नितांत व्यक्तिगत विषय है, और राजनीति को धर्म से अलग रखना चाहिए।" यह तर्क सुनने में बड़ा तार्किक और प्रगतिशील लगता है, लेकिन वास्तविकता में यह उस भयंकर वैचारिक उपनिवेशवाद की देन है, जिसने हमारी पूरी की पूरी पीढ़ी को अपनी जड़ों से काटकर एक खोखले आसमान में लटका दिया है। हमारी सबसे बड़ी सभ्यतागत त्रासदी यह है कि हमने अपनी पूरी चेतना का अनुवाद पश्चिमी शब्दों में कर डाला। हमने 'रिलीजन' (Religion) को 'धर्म' मान लिया, 'साइंस' (Science) को 'विज्ञान' और 'पॉलिटिक्स' (Politics) को 'राजनीति'। इसी भाषाई और वैचारिक अंधेपन ने हमें उस खाई में धकेल दिया है, जहाँ से हमें अपना ही गौरवशाली अतीत पिछड़ा और अंधविश्वासी दिखाई देने लगा है।

सेक्युलरिज्म का विष और राजधर्म का शाश्वत सत्य

पश्चिम में 'सेक्युलरिज्म' शब्द की उपज इसलिए हुई क्योंकि वहाँ राजसत्ता और क्रूर चर्च (मज़हबी सत्ता) के बीच खूनी टकराव था। सत्ता पर एकाधिकार के लिए वहाँ चर्च और राज्य लड़े, इसीलिए उन्हें राजसत्ता को रिलिजन से अलग करना पड़ा। लेकिन भारत में, जब हमारे संविधान की प्रस्तावना में यह 'सेक्युलरिज्म' (पंथनिरपेक्षता/धर्मनिरपेक्षता) शब्द थोपा गया, तो इसने हमारे पूरे राष्ट्रीय चिंतन में एक भयंकर विकृति पैदा कर दी।

भारत की पुण्यभूमि पर राजसत्ता और धर्म के बीच ऐसा कोई टकराव कभी हुआ ही नहीं। यहाँ का दर्शन बिल्कुल भिन्न है। यहाँ राजसत्ता कभी धर्म से ऊपर नहीं रही; बल्कि राजसत्ता सदैव 'धर्म' के अधीन होती है। जब राजा धर्म (न्याय, मर्यादा और कर्त्तव्य) के अधीन होकर राज्य करता है, तो सत्ता और धर्म एकाकार हो जाते हैं। इसी उदात्त परंपरा के कारण ही तो महाराज जनक एक प्रतापी राजा होकर भी 'विदेह' और संन्यासी कहलाए। वे राजसिंहासन पर बैठकर भी भौतिक लिप्तता से मुक्त थे। धर्म-विहीन राज्य, राजा, समाज या व्यक्ति, प्राण-विहीन मृत देह के समान है जो केवल सड़ना जानती है।

देवगुरु बृहस्पति से लेकर शुक्राचार्य, विदुर, मनु और आचार्य चाणक्य तक—हजारों नीति शास्त्र इसी वैदिक परंपरा में लिखे गए। इन सभी शास्त्रों का एक ही उद्घोष है कि राजनीति और धर्म एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। धर्म कोई व्यक्तिगत पूजा-पद्धति नहीं है, बल्कि यह 'स्वधर्म' (व्यक्तिगत कर्तव्य) से शुरू होकर 'राष्ट्रधर्म', 'राजधर्म', 'विश्व धर्म' और अंततः 'सृष्टि धर्म' (ब्रह्मांडीय संतुलन) तक की एक अखंड यात्रा है। राजनीति के बिना धर्म की रक्षा संभव ही नहीं है, क्योंकि जब तक राजसत्ता ढाल बनकर खड़ी नहीं होती, तब तक आततायी शक्तियां राष्ट्रधर्म को निगल जाती हैं। जब भगवान श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र में कूटनीति और राजनीति के पाशे फेंकते हैं, तो वे कोई सत्ता-संघर्ष नहीं, बल्कि इसी शाश्वत धर्म की संस्थापना कर रहे होते हैं।

'ऋतम्', पुरुषार्थ और ब्रह्मांडीय संतुलन

धर्म क्या है? महर्षि वेदव्यास कहते हैं- "धारणाद् धर्ममित्याहु:"। जो इस चराचर जगत को धारण करे, वही धर्म है। सृष्टि तीन गुणों— सत्त्व, रज और तम— से मिलकर बनी है। मानव जीवन और यह ब्रह्मांड तीन आयामों में विभक्त है— आधिभौतिक (सांसारिक और भौतिक जगत), आधिदैविक (प्राकृतिक और ब्रह्मांडीय ऊर्जा) और आध्यात्मिक (परम चेतना)।
इस पूरे ब्रह्मांडीय संतुलन को हमारे वेदों में 'ऋतम्' कहा गया है। ऋतम् वह सर्वोच्च शाश्वत नियम है जिससे सूर्य, चंद्र, नदियां और मनुष्य—सब अपने-अपने मार्ग पर अनुशासित चलते हैं। हमारे ऋषियों ने मानव जीवन को इसी ऋतम् के अधीन चार पुरुषार्थों धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष* के सजीव ढांचे में पिरोया है। इनमें 'धर्म' ही वह धुरी है जो हमारे 'अर्थ' (संपत्ति) और 'काम' (वासनाओं) पर नैतिक नियंत्रण रखती है। जब समाज से यह धर्म विदा लेता है, तो राष्ट्र पतन की ओर जाता है और मनुष्य केवल एक भोगी पशु बनकर रह जाता है।
साइंस का भौतिक भ्रम और 'शून्य' से 'अनंत' की यात्रा

इसी अंधी दौड़ में आधुनिक युवा तर्क देता है कि "हमें साइंस की बात करनी चाहिए।" हम 'साइंस' को 'विज्ञान' समझने की भयानक भूल कर बैठे हैं। भारत में साइंस के लिए 'यांत्रिक शिल्पशास्त्र' अधिक उचित शब्द है। साइंस केवल भौतिक जगत की सुख-सुविधाएं दे सकता है, शांति नहीं। आज के आधुनिक साइंटिस्ट और तथाकथित तर्कवादी केवल 'शून्य' (Void / Dark Matter) की उपासना कर रहे हैं। वे भौतिक जगत को ही पूर्ण सत्य मान बैठे हैं।

जबकि भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में स्पष्ट कहा है कि केवल अव्यक्त या शून्य की उपासना क्लेशकारी है। भौतिक जगत सत्य अवश्य है, लेकिन वह 'पूर्ण सत्य' नहीं है। पूर्ण सत्य वह परब्रह्म है— वे भगवान नारायण हैं, जो क्षीरसागर में 'अनंत शेष' (समय और अंतरिक्ष की अनंतता) की शय्या पर विराजमान हैं। ईशावास्य उपनिषद का मंत्र "ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं..." उसी अनंत पूर्णता का उद्घोष है। धर्म शून्य से अनंत तक की यात्रा है, और उस परम चेतना को समग्रता से जानना ही 'विज्ञान' है।

'खीर' से जन्म का उपहास और परब्रह्म का विज्ञान

जब इसी पश्चिमी चश्मे से हमारा स्वयंभू बुद्धिजीवी वर्ग अपने शास्त्रों को देखता है, तो वह उपहास के साथ पूछता है— "भगवान राम खीर खाने से कैसे पैदा हो गए?" यह प्रश्न उनकी संकीर्ण, विशुद्ध भौतिक और वासना-प्रेरित दृष्टि का परिणाम है। सृष्टि केवल *'मैथुनिक' (जैविक और शारीरिक प्रजनन) नहीं होती। इससे बहुत पहले ब्रह्मा जी के संकल्प से *'मानसिक सृष्टि' (चेतना की शक्ति से उत्पत्ति)*का प्रादुर्भाव होता है।

जब उस अनंत, निराकार परब्रह्म को आधिभौतिक (साकार) रूप में अवतार लेना था, तो उस प्रचंड आधिदैविक तेज को कोई भी साधारण स्त्री अपनी जैविक क्षमता से सहन नहीं कर सकती थी। महाराज दशरथ द्वारा किया गया 'पुत्रेष्टि यज्ञ' कोई कर्मकांड नहीं, बल्कि वेदों के सर्वोच्च नियम 'ऋतम्' और आधिदैविक ऊर्जा का प्रकटीकरण था। यज्ञ की अग्नि से प्रकट हुआ 'चरु' (खीर) कोई मिठाई नहीं, बल्कि मंत्रों की ध्वनि-ऊर्जा और आधिदैविक शक्तियों द्वारा संघनित परब्रह्म का आधिभौतिक बीज (Divine Seed) था।
भगवान राम ने गर्भ में किसी साधारण शिशु की तरह जन्म नहीं लिया, बल्कि वे प्रकट हुए। रामचरितमानस इस ब्रह्मांडीय घटना की साक्षी है- "भए प्रगट कृपाला दीनदयाला, कौसल्या हितकारी।" भगवान विष्णु अपने चतुर्भुज, अलौकिक रूप में माता कौशल्या के समक्ष प्रकट हुए। लेकिन माता ने कहा कि मुझे आपका यह अखिल ब्रह्मांडीय रूप नहीं, बल्कि एक पुत्र का रूप चाहिए। तब वह निराकार परब्रह्म, माता के भाव के वशीभूत होकर साकार बाल रूप में आ गया। इसे समझने के लिए हजारों-लाखों वर्ष का तप चाहिए, और यदि तप न हो तो वह निश्छल भाव चाहिए जिससे भगवान शिव को लाठी मारने वाले एक भोले व्याध (शिकारी) को भी शिव दर्शन हो जाते हैं। पश्चिमी साइंस की प्रयोगशालाओं में इस 'भाव' और 'आधिदैविक विज्ञान' को नहीं परखा जा सकता।

एकतरफा सहिष्णुता, अब्राहमिक क्रूरता और वैश्विक यथार्थ

हमें बचपन से एक आत्मघाती अफीम चटाई गई कि "सभी रिलिजन एक हैं, हमें सहिष्णु होना चाहिए।" हम हिंदू तो "वसुधैव कुटुंबकम्" और "एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति" को मानने वाले लोग हैं। लेकिन क्या क्रिश्चियन, मुस्लिम या यहूदी इस बात को मानते हैं? बिल्कुल नहीं! उनके डॉक्ट्रिन के अनुसार, जो उनकी किताब और पैगंबर को नहीं मानता, वह 'काफिर'* या 'नॉन-बिलीवर' (Heathen) है, और उसे अनंत काल तक नरक की आग में जलना है।

जब वे हमारी सहिष्णुता और बहुलवाद को मानते ही नहीं, तो यह एकतरफा भाव क्यों? यदि वे इतने ही सहिष्णु हैं, तो आज दुनिया में 120 ईसाई राष्ट्र और 57 घोषित मुस्लिम देश क्यों हैं? 1947 में भारत के टुकड़े करके इस्लामिक देश (पाकिस्तान) क्यों बनाया गया? आज भारत के पूर्वोत्तर को एक ईसाई देश बनाने के हिंसक प्रयास क्यों हो रहे हैं? हजार वर्षों तक भारत पर जो बर्बर जिहादी आक्रमण हुए, जिनमें हमारे हजारों मंदिर तोड़े गए, हमारी बहन-बेटियों को लूटकर मध्य-एशिया की मंडियों में टके-टके में बेचा गया—क्या वह उनका 'वसुधैव कुटुंबकम्' था?

आज भारत में एक 'सेक्युलर' संविधान लागू है, राज्य कहता है कि उसका कोई धर्म नहीं होगा। लेकिन इस धर्म-विहीन राजसत्ता का परिणाम क्या है? हिंदुओं के मतांतरण और भारत की डेमोग्राफी बदलने के लिए विदेशों से हर साल करोड़ों रुपये क्यों आ रहे हैं? धर्मांतरण का 'प्रोजेक्ट जोशुआ' (Joshua Project) क्यों चलाया जा रहा है? 'लव जिहाद' के सुनियोजित षड्यंत्र क्यों चल रहे हैं?

इतिहास की छाती पर लिखा वह क्रूर सत्य हम कैसे भूल गए? 1947 के विभाजन के समय, 'जय भीम-जय मीम' का नारा देकर जोगेंद्र नाथ मंडल तथाकथित दलित हिंदुओं को लेकर पाकिस्तान चले गए ('दलित' शब्द भी क्रिश्चियन मिशनरियों की ही उपज है, जिसका उद्देश्य समाज को बांटना था)। लेकिन जब वहाँ हिंदुओं का कत्लेआम शुरू हुआ, तो वे खुद तो अपनी जान बचाकर भाग आए, लेकिन उन करोड़ों हिंदुओं को मरने के लिए छोड़ दिया, जो आज भी वहाँ तिल-तिल कर मिट रहे हैं। अक्सर लोग कहते हैं कि हमारी और पाकिस्तान-बांग्लादेश की संस्कृति एक है। संस्कृति एक हो सकती है, लेकिन यदि धर्म रूपी आत्मा नहीं है, तो वह समाज मुर्दा है। वहाँ हमारी बहन-बेटियों की इज्जत सरेआम लूटी जा रही है, पिछले ही वर्ष बांग्लादेश में दीपू दास को हिंदू होने के कारण जिंदा जला दिया गया।

रील्स, सूटकेस और आधुनिकता का विकृत विष

जब समाज से धर्म (मर्यादा और कर्तव्य बोध) विदा लेता है, तो जो भयानक पतन होता है, वह आज हमारे घरों में दिख रहा है। हमने 'स्वतंत्रता' और 'आधुनिकता' के इतने विकृत अर्थ गढ़ लिए हैं कि हृदय कांप उठता है। एक ओर हमारी युवा पीढ़ी है; जिन माता-पिता ने अपना खून-पसीना एक करके, अपना पेट काटकर बच्चों को पाला, आज विवाह के बाद वही बेटा, अपनी पत्नी के तानों और 'आधुनिक' होने के दंभ में अपने ही बूढ़े माता-पिता को घर से निकालकर सड़कों पर धक्के खाने के लिए छोड़ देता है।

दूसरी ओर, इसी खोखली आधुनिकता और आभासी दुनिया ('रील्स') के छलावे में हमारी बेटियां अपना शील और धर्म भूल रही हैं। जब माता-पिता उन्हें फूहड़ रील देखने या बनाने से रोकते हैं, या स्वच्छंदता पर पाबंदी लगाते हैं, तो उन्हें अपना ही घर 'कैद' लगने लगता है। इसी झूठी आज़ादी और बगावत की तलाश में वे 'लव जिहाद' का शिकार हो जाती हैं और विधर्मियों के साथ घर से भाग जाती हैं। उन्हें लगता है कि वे खुली हवा में सांस लेने जा रही हैं, लेकिन उनके इस सफर का अंत किसी वीरान जंगल में सूटकेस में भरे 35 टुकड़ों के रूप में, या किसी फ्रिज में रखी लाश के रूप में होता है। यह केवल अपराध नहीं है, यह धर्म-विहीन समाज की सड़ती हुई लाश की दुर्गंध है।

वैदिक अर्थव्यवस्था और हमारा चारित्रिक पतन

आर्थिक दृष्टि से भी, आज जो भारत गरीब दिखता है, वह मात्र 200 वर्ष पूर्व तक दुनिया का सबसे धनी देश था। हमारा आर्थिक मॉडल पश्चिमी कैपिटलिज्म नहीं, 'वैदिक मॉडल ऑफ इकॉनमी'* था। समाज के हर वर्ण की सहभागिता थी। यदि ब्राह्मण शिक्षक था, तो वह केवल धनाढ्य के बच्चों को नहीं, बल्कि सबको पढ़ाता था। शिक्षा और व्यापार धर्म के अधीन थे, इसीलिए 'बेईमान' (Dishonest) जैसे शब्द हमारे समाज के शब्दकोश में ही नहीं थे—ये आक्रांताओं की भाषा के शब्द हैं।

ज़रा अपने अतीत की ओर मुड़कर देखिए! धर्म (मर्यादा) की रक्षा के लिए इक्ष्वाकु वंश के राजा दिलीप ने एक गाय (नंदिनी) की खातिर खूंखार सिंह के सामने अपना मस्तक रख दिया था। आदि शंकराचार्य मात्र आठ वर्ष की आयु में अपनी वृद्ध माता को छोड़कर राष्ट्र को जोड़ने निकल पड़े थे। धर्म और स्वाभिमान की रक्षा के लिए महाराणा प्रताप ने वनों में घास की रोटियां खाना स्वीकार किया। हमारी माताओं और बहनों ने अपने सतीत्व की रक्षा के लिए 'जौहर' की धधकती ज्वाला में हंसते-हंसते प्राणों की आहुति दे दी।

और आज? आज हम इतने गिर चुके हैं कि महज़ 'दो बोरी चावल' के लालच में लोग अपना शाश्वत धर्म नीलाम कर रहे हैं! भीष्म पितामह कितने बड़े धर्मज्ञ थे, लेकिन जब द्रौपदी का चीर-हरण हो रहा था और वे चुप रहे, तो इसका कठोर दंड उन्हें बाणों की शय्या के रूप में मिला। आज जब पड़ोस में हमारी बहनों को उठाया जा रहा है, और हम टीवी स्क्रीन देखते हुए आराम से चाय की चुस्कियां ले रहे हैं, तो इससे बड़ा अधर्म क्या होगा?

समय का आवाहन

धर्म के बिना कोई जीव एक सेकंड भी जीवित नहीं रह सकता। सांस लेना, पानी पीना, परिवार का भरण-पोषण करना सब धर्म है। जैसे एक परिवार को बाहरी और आंतरिक खतरों से बचाने के लिए एक मुखिया चाहिए, वैसे ही राष्ट्र के हजारों-लाखों परिवारों को सुरक्षित रखने के लिए राजसत्ता की आवश्यकता होती है। राजनीति और धर्म अलग नहीं हैं। राजसत्ता जब धर्म के अधीन होकर कार्य करती है, तभी राष्ट्र जीवित रहता है।
यह समय है उस पश्चिमी 'सेक्युलरिज्म' के अनुवादित चश्मे को उतार फेंकने का। यदि हम अपने शाश्वत पुरुषार्थों, ऋतम् और राजधर्म की ओर नहीं लौटे, तो वह दिन दूर नहीं जब हम अपनी ही धरती पर इतिहास का एक मिटा हुआ पन्ना मात्र रह जाएंगे।

टिप्पणियाँ