सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

अभी स्कन्द पुराण को पढ़ रहा था। इसके आरंभिक अध्याय में जो शिवपूजन की महिमा बताई गई है, उसमें कहा गया है कि :

अभी स्कन्द पुराण को पढ़ रहा था। इसके आरंभिक अध्याय में जो शिवपूजन की महिमा बताई गई है, उसमें कहा गया है कि : 

“जो निरन्तर शिवजी की पूजामें संलग्न रहते हैं, मनमें दृढ़ विश्वास रखकर सम्पूर्ण विश्वको शिवके रूपमें देखते हैं, उत्तम बुद्धिका आश्रय ले सदाचारका पालन करते तथा अपने वर्ण-धर्म और आश्रम-धर्ममें स्थित रहते हैं, वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा कोई भी क्यों न हों, भगवान् शिवके परम प्रिय होते हैं। चाण्डाल हो या सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण, भजन करनेपर सभी भगवान् शंकरको अत्यन्त प्रिय लगते हैं।”

इसे मि श न - पोषित या हार्वर्ड पोषित या वामपंथी मानस में डाल दो तो वह भड़कायेगा कि यही तो भारतीय ब्राह्मणवादी व्यवस्था की सबसे परिष्कृत वैचारिक चाल है। ऊपर से यह घोषणा करता है कि 'चाण्डाल और ब्राह्मण दोनों शिव को समान प्रिय हैं', किन्तु उसी वाक्य में पहले यह भी सुनिश्चित कर देता है कि हर व्यक्ति 'अपने वर्ण-धर्म और आश्रम-धर्म में स्थित रहे।'

यदि सचमुच चाण्डाल और ब्राह्मण समान हैं, तो फिर चाण्डाल को चाण्डाल ही क्यों रहने दिया जा रहा है? उसे ब्राह्मण बनने का अधिकार क्यों नहीं? उसे वेद पढ़ने, यज्ञ कराने, मंदिर का महन्त बनने, सामाजिक नेतृत्व करने का अधिकार कहाँ है?

लेकिन धर्म यहाँ विद्रोह नहीं पैदा करता, समर्पण पैदा करता है। यदि कोई शूद्र अपनी जाति छोड़कर ज्ञान-सत्ता में प्रवेश करना चाहे, तो उसे नहीं कहा गया कि व्यवस्था बदलो; उसे कहा गया कि अपने वर्ण में रहकर भक्ति करो।

'चाण्डाल भी शिव को प्रिय है'—यह वाक्य पहली दृष्टि में उदार लगता है, किन्तु ध्यान दीजिए कि यह सामाजिक नहीं, केवल धार्मिक समावेशन है। यह नागरिक समानता नहीं देता; केवल आध्यात्मिक सांत्वना देता है।

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अब यह पूरी आलोचना एक ऐसे पूर्वग्रह पर टिकी है कि मनुष्य का अंतिम सत्य आर्थिक और सामाजिक संबंध हैं। इसलिए ये हर ग्रंथ को केवल सत्ता, वर्ग और वर्चस्व के दस्तावेज़ के रूप में पढ़ते हैं। किंतु सनातन दर्शन का आरंभ ही इस मान्यता से नहीं होता।

इनका पहला भ्रम यह है कि 'वर्ण' को इन्होंने केवल 'विशेषाधिकार' (privilege) मान लिया है, जबकि शास्त्रों में उसका मूल विचार 'कर्तव्य' (duty) है। इसीलिए इस वाक्य में अधिकारों की नहीं, 'स्वधर्म में स्थित रहने' की बात कही गई है। यहाँ वर्ण किसी के शोषण का लाइसेंस नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व का विधान है।

दूसरा भ्रम इससे भी बड़ा है।

ये कहते हैं कि 'यदि चाण्डाल शिव को प्रिय है तो वह ब्राह्मण क्यों नहीं बन जाता?'
सनातन दर्शन प्रत्युत्तर देता है—प्रश्न ही गलत है।

ब्राह्मण होना कोई सामाजिक प्रमोशन नहीं है। यदि ब्राह्मण होना केवल उच्च वेतनमान वाली सरकारी नौकरी की तरह है, तब आपका प्रश्न उचित है। परंतु शास्त्र में ब्राह्मण होना सबसे पहले सबसे कठिन अनुशासन है—त्याग, तप, स्वाध्याय, संयम, सत्य और आत्मनिग्रह का दायित्व। यह कोई 'प्रिविलेज' नहीं, एक कठोर व्रत है।

ये लोग पूरी व्यवस्था को आधुनिक शक्ति-सिद्धांत (power theory) से पढ़ रहे हैं, जबकि यह ग्रंथ धर्म-सिद्धांत (dharma theory) में लिखा गया है।

तीसरा भ्रम यह है कि ये आध्यात्मिक समानता को 'सांत्वना' कहकर खारिज कर देते हैं।

परन्तु इतिहास में किसी भी स्थायी सामाजिक परिवर्तन का स्रोत पहले मनुष्य की चेतना में आया है।

यदि किसी सभ्यता में पहली बार यह घोषणा होती है कि 'चाण्डाल और ब्राह्मण दोनों ईश्वर को समान प्रिय हैं', तो यह सत्ता की घोषणा नहीं है; सत्ता की वैधता पर पहला प्रहार है।
क्योंकि यदि ईश्वर की दृष्टि में दोनों समान हैं, तो मनुष्य की दृष्टि में असमानता को अनंत काल तक वैध नहीं ठहराया जा सकता।

वे इसे व्यवस्था की रक्षा समझ रहे हैं; वास्तव में यह व्यवस्था के भीतर रखा गया ऐसा आध्यात्मिक विस्फोटक है, जो धीरे-धीरे बाहरी संरचनाओं को भी बदल देता है।
भक्ति आंदोलन इसी बीज से निकला।नन्दनार, रविदास, चोखामेला, कनकदास, कबीर—इन सबने इसी आध्यात्मिक समता को सामाजिक भाषा दी। यदि मूल ग्रंथों में यह बीज ही न होता, तो ऐसी परंपराएँ किस आधार पर विकसित होतीं?

वे कहते हैं कि धर्म विद्रोह को भक्ति में बदल देता है।
सनातन कहता है—भक्ति ही सबसे गहरा विद्रोह है।

जिस दिन चाण्डाल यह जान लेता है कि स्वयं महादेव उसे ब्राह्मण जितना ही प्रिय मानते हैं, उसी दिन सामाजिक अपमान की आध्यात्मिक वैधता समाप्त हो जाती है। उसके आत्मसम्मान का स्रोत समाज नहीं, शिव हो जाते हैं।यह परिवर्तन केवल राजनीतिक क्रांति से कहीं अधिक गहरा है।

उनकी दृष्टि में सत्ता ऊपर से नीचे आती है।
सनातन की दृष्टि में सत्ता भीतर से बाहर जाती है।

जब मनुष्य स्वयं को शिवस्वरूप देख लेता है, तब उसके सामने कोई भी सामाजिक भय स्थायी नहीं रह सकता।

वे ग्राम्शी का 'हेजेमनी' पढ़ते हैं; उपनिषद् 'अहं ब्रह्मास्मि' पढ़ाते हैं।

वे मार्क्स का 'वर्ग-संघर्ष' देखते हैं; गीता 'समदर्शित्व' की बात करती है।

उनका लक्ष्य सत्ता का पुनर्वितरण है।
सनातन का लक्ष्य अहंकार का विसर्जन है।

और यही दोनों परंपराओं का सबसे बड़ा दार्शनिक अंतर है।

सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने इस वाक्य का सबसे क्रांतिकारी अंश देखा ही नही

'सम्पूर्ण विश्व को शिवरूप में देखना।'

यह कथन केवल समानता (equality) नहीं देता; यह अस्तित्वगत अभेद (ontological non-duality) की घोषणा करता है।

मार्क्सवाद मनुष्यों को समान बनाना चाहता है।
शैव दर्शन कहता है—वे मूलतः कभी असमान थे ही नहीं।

मार्क्सवाद सामाजिक संरचना बदलता है।
शैव दर्शन अस्तित्व की अनुभूति बदलता है।
एक बाहर से भीतर आता है; दूसरा भीतर से बाहर।

इसलिए यह कहना कि यह श्लोक केवल व्यवस्था-संरक्षक है, उसके आध्यात्मिक आशय को सामाजिक श्रेणियों तक सीमित कर देना है। यह वैसा ही है जैसे कोई संगीत-रचना को केवल कागज़ पर लिखी स्याही मान ले और ध्वनि, लय तथा अनुभूति को अप्रासंगिक घोषित कर दे।

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