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जनसांख्यिकी परिवर्तन : क्या भारत एक नए राष्ट्रीय विमर्श के द्वार पर खड़ा है?



✍️ कैलाश चन्द्र

हरियाणा के ऐतिहासिक समालखा में 24–26 जुलाई 2026 को सम्पन्न राष्ट्र सेविका समिति की अखिल भारतीय कार्यकारिणी एवं प्रतिनिधि मंडल की बैठक केवल एक संगठनात्मक समीक्षा तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने भारत के भविष्य से जुड़े एक अत्यंत गंभीर विषय—जनसंख्या असंतुलन एवं जनसांख्यिकीय परिवर्तन—को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में स्थापित करने का प्रयास किया।

बैठक में देश के 40 प्रांतों से 488 प्रतिनिधियों की उपस्थिति, समिति के 90 वर्ष पूर्ण होने की पृष्ठभूमि, तथा कार्य-विस्तार की समीक्षा के साथ यह तथ्य भी सामने आया कि वर्तमान में समिति का कार्य 852 जिलों तक पहुँच चुका है तथा 4,886 शाखाएँ और 1,173 मिलन नियमित रूप से चल रहे हैं। यह विस्तार सामाजिक संगठन की दृष्टि से महत्वपूर्ण संकेत माना जा सकता है।

किन्तु बैठक का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष वह प्रस्ताव रहा जिसमें जनसंख्या असंतुलन को राष्ट्रीय संकट बताते हुए सभी समुदायों के लिए समान राष्ट्रीय जनसंख्या नीति तथा समान नागरिक संहिता लागू करने का आग्रह किया गया। यह प्रस्ताव भारत में लंबे समय से चल रहे उस विमर्श को पुनः सामने लाता है कि क्या जनसांख्यिकीय परिवर्तन केवल सांख्यिकीय विषय है या इसका प्रभाव राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक निरंतरता और विकास नीति तक जाता है।

भारत विश्व का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है, परंतु राष्ट्रीय नीति का प्रश्न केवल कुल जनसंख्या नहीं, बल्कि उसकी संरचना (population structure), आयु-वितरण, क्षेत्रीय वितरण, प्रजनन दर तथा सामाजिक परिवर्तन से भी जुड़ा है। विभिन्न सरकारी तथा स्वतंत्र अध्ययनों में यह संकेत मिलता है कि विभिन्न राज्यों एवं समुदायों में प्रजनन दरों में उल्लेखनीय अंतर है। साथ ही, सीमावर्ती क्षेत्रों में अवैध प्रवासन, तीव्र शहरीकरण, आंतरिक पलायन तथा वृद्ध होती आबादी जैसी चुनौतियाँ भी नीति-निर्माताओं के सामने उपस्थित हैं।
आज भारत अनेक प्रकार की जनसांख्यिकीय चुनौतियों का सामना कर रहा है—
• कुछ राज्यों में जन्मदर प्रतिस्थापन स्तर (Replacement Level Fertility) से नीचे पहुँच चुकी है।
• अनेक क्षेत्रों में युवाओं का विवाह विलंबित हो रहा है और परिवार का आकार लगातार छोटा होता जा रहा है।
• ग्रामीण क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर महानगरों की ओर पलायन सामाजिक एवं आर्थिक असंतुलन उत्पन्न कर रहा है।
• सीमावर्ती क्षेत्रों में अवैध प्रवासन पर समय-समय पर राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से चिंता व्यक्त की जाती रही है।
• भारत अभी "युवा राष्ट्र" है, पर आने वाले दशकों में वृद्धजन आबादी तेजी से बढ़ने का अनुमान है, जिससे सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक उत्पादकता की नई चुनौतियाँ सामने आ सकती हैं।
• शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण तथा रोजगार के अवसरों में क्षेत्रीय असमानताएँ भी जनसांख्यिकीय परिवर्तन को प्रभावित करती हैं।
इन्हीं संदर्भों में राष्ट्र सेविका समिति ने अपने प्रस्ताव में जनसंख्या नीति, अवैध घुसपैठ, सामाजिक जागरूकता तथा समान नागरिक संहिता जैसे विषयों को राष्ट्रीय दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया है। प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि समाज को परिवार संस्था के प्रति उत्तरदायित्व, समय पर विवाह, संतुलित पारिवारिक जीवन तथा सामाजिक दायित्वों के प्रति जागरूक होना चाहिए।

हालाँकि, यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि जनसांख्यिकी का प्रश्न केवल भावनात्मक या राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक, सामाजिक, आर्थिक और वैज्ञानिक अध्ययन का विषय भी है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में जनसंख्या संबंधी नीतियाँ समानता, मौलिक अधिकारों, महिलाओं की स्वायत्तता, सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा विश्वसनीय आँकड़ों के आधार पर निर्मित होती हैं। इसलिए इस विषय पर व्यापक संवाद, पारदर्शी आँकड़े और तथ्याधारित विमर्श आवश्यक है।

समिति की बैठक से यह संदेश भी उभरकर आया कि राष्ट्र निर्माण केवल शासन का कार्य नहीं, बल्कि समाज की सक्रिय भागीदारी से ही संभव है। यदि भारत को आगामी शताब्दी में जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) का पूर्ण उपयोग करना है, तो उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, कौशल विकास, रोजगार सृजन, स्वस्थ परिवार व्यवस्था, सीमाओं की सुरक्षा तथा संतुलित जनसंख्या नीति जैसे विषयों पर समन्वित दृष्टि अपनानी होगी।

कुरुक्षेत्र की पावन भूमि से अपने समापन उद्बोधन में वंदनीया प्रमुख संचालिका शांता कुमारी जी ने संगठन के कार्यकर्ताओं का आह्वान किया कि वे अपने व्यक्तित्व का निरंतर परिष्कार करें और राष्ट्रहित में गुणवत्तापूर्ण कार्य-विस्तार का संकल्प लें। यह संदेश केवल संगठन के लिए नहीं, बल्कि समूचे समाज के लिए भी प्रासंगिक है कि आने वाला भारत केवल आर्थिक शक्ति से नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और दूरदर्शी जननीति से निर्मित होगा।

जनसांख्यिकी अंततः केवल संख्या का विज्ञान नहीं है; यह राष्ट्र के भविष्य की दिशा का संकेतक है। यदि समय रहते संतुलित, न्यायसंगत और दूरदर्शी नीतियाँ बनाई जाएँ, तो जनसंख्या भारत की सबसे बड़ी शक्ति बन सकती है। परंतु यदि इस विषय की उपेक्षा हुई, तो वही जनसांख्यिकीय परिवर्तन सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक चुनौतियों का कारण भी बन सकता है। इसलिए आवश्यकता भय या विवाद की नहीं, बल्कि तथ्य, संवाद और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व पर आधारित नीति-विमर्श की है।
✍️ कैलाश चन्द्र

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