सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

जब एल्गोरिद्म तय करने लगें जनमत


✍️दीपक कुमार द्विवेदी

डिजिटल युग में शक्ति की परिभाषा बदल चुकी है। कभी यह माना जाता था कि जिस राष्ट्र के पास सबसे बड़ी सेना होगी, सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था होगी और सबसे प्रभावशाली मीडिया होगा, वही विश्व राजनीति की दिशा तय करेगा। इक्कीसवीं शताब्दी में यह समीकरण बदल चुका है। आज सूचना का प्रवाह नियंत्रित करने वाले डिजिटल मंच स्वयं एक वैश्विक शक्ति बन चुके हैं। उनके पास कोई सेना नहीं है, कोई संसद नहीं है, कोई संविधान नहीं है, फिर भी वे प्रतिदिन अरबों लोगों तक पहुँचने वाली सूचनाओं के प्रवाह को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

हाल की दो घटनाओं ने भारत के सामने इस प्रश्न को और गंभीर बना दिया है। पहली घटना यह रही कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का एक महत्वपूर्ण वीडियो कुछ समय के लिए इंस्टाग्राम से हट गया। बाद में मेटा ने इसे तकनीकी त्रुटि बताते हुए वीडियो बहाल किया और सार्वजनिक रूप से खेद व्यक्त किया। दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस ने छात्र आंदोलन के दौरान पाकिस्तान से संचालित सैकड़ों सोशल मीडिया खातों की पहचान कर उन पर कार्रवाई की और कहा कि वे भ्रामक सामग्री तथा दुष्प्रचार फैला रहे थे। ये दोनों घटनाएँ अलग-अलग अवश्य हैं, परंतु दोनों एक ही बड़े प्रश्न की ओर संकेत करती हैं—डिजिटल मंच अब केवल संवाद का माध्यम नहीं रहे, वे राष्ट्रीय सुरक्षा, लोकतांत्रिक स्थिरता और जनमत-निर्माण का भी हिस्सा बन चुके हैं।

यह समझना आवश्यक है कि आधुनिक लोकतंत्र केवल चुनाव से संचालित नहीं होते। लोकतंत्र का आधार नागरिक की स्वतंत्र राय है। यदि नागरिक की राय बनने से पहले उसकी सूचना का प्रवाह ही किसी एल्गोरिद्मिक व्यवस्था के माध्यम से नियंत्रित होने लगे, तो लोकतंत्र की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। इसी कारण यूरोपीय संघ ने Digital Services Act लागू किया, जिसके अंतर्गत बहुत बड़े ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्मों से यह अपेक्षा की गई कि वे अपने एल्गोरिद्मिक जोखिमों का मूल्यांकन करें, पारदर्शिता बढ़ाएँ और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर पड़ने वाले प्रभावों के प्रति उत्तरदायी रहें। अमेरिका में भी बड़ी तकनीकी कंपनियों के डेटा-संग्रह, विज्ञापन-तंत्र और बाज़ार-शक्ति को लेकर Federal Trade Commission तथा न्याय विभाग लगातार जाँच और कार्रवाई करते रहे हैं। यह इस बात का संकेत है कि स्वयं पश्चिमी लोकतंत्र भी बिग टेक की बढ़ती शक्ति को चुनौती के रूप में देख रहे हैं।

भारत के लिए यह विषय और अधिक संवेदनशील है। यहाँ करोड़ों युवा अपनी सूचना का प्रमुख स्रोत सोशल मीडिया को बना चुके हैं। ऐसे में यदि विदेशी दुष्प्रचार नेटवर्क, बॉट नेटवर्क, डीपफेक या समन्वित डिजिटल अभियान किसी संवेदनशील मुद्दे पर सक्रिय हो जाएँ, तो उनका प्रभाव कुछ घंटों में लाखों लोगों तक पहुँच सकता है। विश्व के अनेक देशों ने चुनावों में विदेशी प्रभाव, दुष्प्रचार और सोशल मीडिया अभियानों की जाँच की है। इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक आंदोलन या प्रत्येक डिजिटल अभियान विदेशी प्रभाव का परिणाम होता है, लेकिन यह अवश्य स्पष्ट हो चुका है कि सोशल मीडिया अब राष्ट्रीय सीमाओं से परे संचालित होने वाला प्रभावशाली माध्यम है।

यही कारण है कि भारत को डिजिटल संप्रभुता को केवल तकनीकी विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय नीति का विषय मानना होगा। जिस प्रकार दूरसंचार, रक्षा और वित्तीय प्रणाली के लिए नियामकीय ढाँचे बनाए गए हैं, उसी प्रकार अत्यधिक प्रभाव वाले डिजिटल मंचों के लिए भी पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और स्वतंत्र ऑडिट की सुदृढ़ व्यवस्था आवश्यक है। यदि किसी सामग्री की पहुँच घटाई जाती है, यदि किसी पोस्ट को हटाया जाता है, यदि किसी विषय को असाधारण रूप से बढ़ावा मिलता है, तो उसके पीछे की प्रक्रिया की समीक्षा का अधिकार लोकतांत्रिक संस्थाओं के पास होना चाहिए।
बिग टेक का प्रश्न किसी एक कंपनी या किसी एक राजनीतिक दल का प्रश्न नहीं है। यह उस भविष्य का प्रश्न है जिसमें नागरिक क्या देखेगा, क्या पढ़ेगा और किन तथ्यों के आधार पर अपनी राय बनाएगा। लोकतंत्र का वास्तविक आधार स्वतंत्र नागरिक है, और स्वतंत्र नागरिक का आधार स्वतंत्र तथा विश्वसनीय सूचना है। यदि सूचना का प्रवाह अपारदर्शी एल्गोरिद्म और निजी मंचों के पूर्ण नियंत्रण में चला जाए, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे केवल मतदान की प्रक्रिया बनकर रह सकता है।

भारत आज विश्व की सबसे बड़ी डिजिटल लोकतांत्रिक शक्ति बनने की ओर अग्रसर है। इसलिए आवश्यक है कि तकनीकी नवाचार का स्वागत हो, पर उसके साथ उत्तरदायित्व भी सुनिश्चित हो। डिजिटल मंच भारत में कार्य करें, निवेश करें, नवाचार करें, अभिव्यक्ति के मंच बनें—परंतु भारतीय कानूनों, लोकतांत्रिक मूल्यों और सार्वजनिक उत्तरदायित्व से ऊपर कोई भी निजी मंच नहीं हो सकता। यही डिजिटल युग में

टिप्पणियाँ