सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

त्रासदी यह है कि जो जेन-जी के नाम पर वहां अपनी असभ्यता, अभद्रता और अशिष्टता के अलग अलग सैंपल पेश कर रहे थे, वे जेन-जी का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे थे।

त्रासदी यह है कि जो जेन-जी के नाम पर वहां अपनी असभ्यता, अभद्रता और अशिष्टता के अलग अलग सैंपल पेश कर रहे थे, वे जेन-जी का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे थे।

असल जेन-ज़ी शिक्षा के पुराने पड़ गये ढाँचे से असंतुष्ट है। जेन-ज़ी वह है जिसने एक इंटरनेटहीन संसार नहीं देखा। लेकिन शिक्षा का पूरा स्ट्रक्चर आज के भारत में अधिकांशतः वही चला आ रहा है। इसे अमेरिकी शिक्षाविद् नील पोस्टमैन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक The End of Education में संकेत किया था। उनका तर्क था कि शिक्षा तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक उसके पीछे कोई महान मानवीय उद्देश्य न हो। यदि शिक्षा का ध्येय केवल नौकरी उपलब्ध कराना रह जाए, तो वह प्रशिक्षण (training) तो हो सकती है, शिक्षा (education) नहीं। पोस्टमैन लिखते हैं कि विद्यालयों को केवल सूचना-संचय का केन्द्र नहीं, बल्कि जीवन के अर्थ की खोज का स्थान होना चाहिए। The End of Education का लगभग यही स्वर आज Excellent Sheep में और अधिक तीखे रूप में सुनाई देता है। डेरेसिविज़ बताते हैं कि प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय अत्यन्त सफल, किन्तु आन्तरिक रूप से दिशाहीन युवाओं का निर्माण कर रहे हैं। वे उत्कृष्ट परीक्षार्थी तो हैं, परन्तु यह नहीं जानते कि उन्हें जीवन में वास्तव में करना क्या है। लेखक के अनुसार शिक्षा ने उन्हें "कैसे सोचना है" यह नहीं सिखाया; केवल "कैसे सफल दिखना है" यह सिखाया।

इस पुस्तक का पूरा नाम है — Excellent Sheep: The Miseducation of the American Elite and the Way to a Meaningful Life। इसमें लेखक अमरीकी अभिजात्य (Ivy League आदि) शिक्षा व्यवस्था की तीखी आलोचना करते हैं।

उनका कहना है कि अभिजात्य कॉलेज “एक्सीलेंट शीप” पैदा करते हैं।ये संस्थान उच्च अंक और उपलब्धियाँ हासिल करने वाले, लेकिन आज्ञाकारी, जोखिम से डरने वाले और दिशाहीन छात्र तैयार करते हैं — जिन्हें लेखक “उत्कृष्ट भेड़” कहते हैं।

शिक्षा में मेरिटोक्रेसी को जगह होनी थी पर “मेरिट” के नाम पर असल में विशेषाधिकार (धन, कनेक्शन, निजी स्कूल, एफर्मेटिव एक्शन को पुरस्कृत करते हैं। असली मेधा के बजाय संसाधनों की प्रधानता होती है।कॉलेज का असली काम छात्रों को अपना मूल्य-प्रणाली, नैतिक साहस और जीवन का अर्थ खोजने में मदद करना है। आज यह काम लगभग समाप्त हो चुका है।अत्यधिक दबाव, निरंतर प्रतिस्पर्धा और “परफेक्ट” रहने की चाहत के कारण कई छात्र मानसिक रूप से थके हुए, दिशाहीन और उदास रहते हैं।अधिकांश छात्र बैंकों और कंसल्टिंग में चले जाते हैं क्योंकि वे नहीं जानते कि वे वास्तव में क्या चाहते हैं, इसलिए सबसे सुरक्षित और प्रतिष्ठित रास्ता (बैंकिंग, कंसल्टिंग) चुन लेते हैं।मानवीय विद्याओं (humanities) और गंभीर चिंतन की जगह व्यावसायिक और कौशल-आधारित शिक्षा ने ले ली है, जिससे छात्रों में आलोचनात्मक सोच और कल्पनाशक्ति कमजोर पड़ रही है।कॉलेज विशेषाधिकार को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाते हैं और समाज के बाकी हिस्सों से ऐसे वर्ग को और अधिक अलग-थलग कर देते हैं।

“क्रेडेंशियलिज़्म” (प्रमाणपत्र-वाद) हावी हो गया है। शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान या विकास नहीं, बल्कि डिग्री, रिज्यूमे और “गोल्ड स्टार” जमा करना रह गया है। हर गतिविधि रिज्यूमे के लिए की जाती है।

सार्वजनिक उच्च शिक्षा को मजबूत बनाने और छात्रों को आत्म-खोज और जोखिम लेने का अवसर देने वाली शिक्षा की अनुशंसा वे कर रहे हैं। वे सच्ची लिबरल आर्ट्स शिक्षा पर जोर देने की वकालत करते हैं और दाखिले की प्रक्रिया में सुधार (वर्ग-आधारित सकारात्मक कार्रवाई, विरासत और एथलीट कोटा कम करना) चाहते हैं। एफर्मेटिव एक्शन या सकारात्मक कार्रवाई को हमारे यहाँ आरक्षण कहा गया है।

उनकी ये स्थापनाएँ पुस्तक के चार भागों — Sheep, Self, Schools और Society — में फैली हुई हैं।

कभी Excellent Sheep पढ़िए और दिल्ली के कुछ प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों को देखिए। और देखिए कि भारत की शिक्षा को कैसे कुछ रटे रटाए जुमलों में कैद कर दिया गया है। पितृसत्ता, ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद, जय भीम। सुनिए उन ढपलीबाजों के नारे। देखिये उनके हाथ में थमाए गए बोर्ड्स। 

या Richard Sander & Stuart Taylor Jr. (2012) की पुस्तक Mismatch: How Affirmative Action Hurts Students It’s Intended to Help, and Why Universities Won’t Admit It को पढ़िए। यह किताब “Mismatch Theory” को विस्तार से पेश करती है — कि race-based preferences छात्रों को उनकी तैयारी से ऊँचे स्तर के संस्थानों में भेज देते हैं, जिससे उनके प्रदर्शन, ग्रेड और स्नातक दर पर नकारात्मक असर पड़ता है। यह सिद्धांत आज भी बहस का केंद्र है और Supreme Court के 2023 के फैसले (Students for Fair Admissions) में भी चर्चा में रहा। Race-based affirmative action छात्रों को उनकी अकादमिक तैयारी से ऊँचे स्तर के संस्थानों में प्रवेश दिला देता है। परिणामस्वरूप वे कक्षा में नीचे के स्तर पर रह जाते हैं। इसका एक Cascade Effect है। शीर्ष विश्वविद्यालयों में preferences देने से अगले स्तर के कॉलेजों में भी mismatch पैदा होता है। यह प्रभाव पूरे सिस्टम में नीचे तक फैल जाता है।Preference पाने वाले छात्र अक्सर कक्षा के निचले 10-20% में रहते हैं। कई अध्ययनों में अश्वेत लॉ स्टूडेंट्स का औसत GPA सबसे निचले स्तर पर पाया गया।Mismatch के कारण preference पाने वाले छात्रों की डिग्री पूरी करने की दर उन छात्रों से कम होती है, जो समान योग्यता रखते हुए कम selective कॉलेज में जाते हैं। कई ऐसे छात्र इंजीनियरिंग, विज्ञान, गणित और इकोनॉमिक्स जैसे कठिन विषयों से हट जाते हैं, क्योंकि वे प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाते हैं।लॉ स्कूलों में mismatch के कारण अश्वेत छात्रों की बार परीक्षा पास करने की दर काफी कम हो जाती है। समान योग्यता वाले लेकिन बेहतर-matched छात्रों का प्रदर्शन बेहतर होता है।लगातार खराब प्रदर्शन छात्रों के आत्मविश्वास को तोड़ता है और उन्हें यह महसूस कराता है कि वे “असफल” हैं, जबकि कम selective जगह पर वे अच्छा प्रदर्शन कर सकते थे।विश्वविद्यालय और प्रशासन mismatch के सबूतों को स्वीकार करने से इनकार करते हैं या उन्हें छुपाने की कोशिश करते हैं, क्योंकि यह उनके diversity एजेंडे के खिलाफ जाता है।Affirmative action जिन छात्रों की मदद करने का दावा करता है, उन्हीं को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाता है। वे बेहतर-matched कॉलेज में जाकर अधिक सफल हो सकते थे। उनकी अनुशंसा यह है कि Race-based preferences के बजाय class-based या socioeconomic preferences, तथा छात्रों को उनकी तैयारी के अनुरूप कॉलेज में भेजने से बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। कैलिफोर्निया में Proposition 209 के बाद कुछ सुधार के संकेत भी मिले थे।

या पढ़िए The Diversity Delusion (Heather Mac Donald, 2018) जिसका मुख्य तर्क है कि “Diversity” के नाम पर चलाया जा रहा अभियान असल में विश्वविद्यालयों को बौद्धिक रूप से कमजोर कर रहा है और समाज में विभाजन बढ़ा रहा है। Diversity एक भ्रम (Delusion) बन गया है।अमेरिका में यह विश्वास गहरा गया है कि देश में व्यवस्थागत नस्लवाद और लिंगभेद हर जगह मौजूद है। इसी भ्रम ने पूरे विश्वविद्यालय तंत्र को विकृत कर दिया है। योग्यता (merit) आधारित मानकों को अब नस्लीय या लैंगिक पूर्वाग्रह का प्रमाण मान लिया गया है। उच्च मानकों को बनाए रखना “racist” या “sexist” करार दिया जा रहा है। Race-based preferences अल्पसंख्यक छात्रों को उनकी तैयारी से ऊँचे संस्थानों में भेजते हैं, जिससे वे अकादमिक रूप से पिछड़ जाते हैं और आत्मविश्वास खो बैठते हैं (Mismatch प्रभाव)। Diversity Bureaucracy का विस्तार हो रहा है। विश्वविद्यालयों में diversity अधिकारियों, administrators और प्रशिक्षण कार्यक्रमों की एक पूरी मशीनरी खड़ी हो गई है, जो छात्रों और फैकल्टी को निरंतर “oppression” और “privilege” का पाठ पढ़ाती है। विचारों की विविधता नदारद है। Diversity का मतलब केवल त्वचा के रंग और लिंग तक सीमित रह गया है। वैचारिक भिन्नता (viewpoint diversity) को पूरी तरह दबा दिया गया है। असहमत आवाज़ों को सेंसर या हिंसा से चुप कराया जाता है। छात्रों को शिकार (Victim) बताकर पाला जा रहा है।छात्रों को यह सिखाया जा रहा है कि वे अपनी पहचान (race/gender) के कारण लगातार उत्पीड़ित हैं। इससे उनमें शिकायत करने की मानसिकता (grievance culture) पैदा होती है, न कि लचीलापन या आत्मनिर्भरता।पश्चिमी सभ्यता के महान ग्रंथों (Shakespeare, Milton आदि) को “oppressive” बताकर हाशिए पर धकेल दिया गया है। शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान प्राप्ति के बजाय राजनीतिक सक्रियता बन गया है।विश्वविद्यालय से निकले ये विचार अब कंपनियों, सरकारी विभागों और पूरे समाज में फैल गए हैं। Implicit bias training और diversity quotas योग्यता को कमजोर कर रहे हैं। लेखक का आह्वान है कि विश्वविद्यालयों को फिर से खुली जांच-पड़ताल, तर्क और सामान्य मानवीयता (common humanity) पर आधारित शिक्षा की ओर लौटना चाहिए। Identity politics के बजाय व्यक्ति की योग्यता और चरित्र को महत्व देना चाहिए।

A Dubious Expediency: How Race Preferences Damage Higher Education
(Gail Heriot & Maimon Schwarzschild द्वारा संपादित) पुस्तक अभी 2021 में आई है। यह पुस्तक आठ निबंधों का संग्रह है। इसमें Race-based preferences के उच्च शिक्षा पर दुष्प्रभावों की सप्रमाण आलोचना की गई है। उन्होंने निष्कर्ष निकाला है कि अस्थायी सुविधा के लिए अपनाया गया यह रास्ता लंबे समय में हानिकारक सिद्ध हुआ है। ये नीतियाँ जिन छात्रों की मदद करने का दावा करती हैं, उन्हीं को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाती हैं। बेहतर-matched कॉलेज में जाने पर उनके परिणाम बेहतर होते। Race preferences ने परिसरों में नस्लीय अलगाव (separate dorms, programs) और identity politics को बढ़ावा दिया है। छात्र दुनिया को नस्ल के चश्मे से देखने लगते हैं।Mismatch की समस्या से निपटने के लिए ग्रेड इन्फ्लेशन बढ़ा है और पाठ्यक्रम को आसान बनाया गया है, जिससे पूरे संस्थान के मानक गिरे हैं। Preferences ने प्रोफेसरों और परिसर की राजनीतिक झुकाव को और बाईं ओर धकेल दिया है। असहमत विचारों के लिए जगह कम हो गई है।शुरू में छोटे-मोटे कदम के रूप में शुरू हुई affirmative action धीरे-धीरे एक बड़े “मॉनस्टर” में बदल गई, जिसने विश्वविद्यालयों की मूल प्रकृति को बदल दिया है। 

Jason L. Riley की पुस्तक The Affirmative Action Myth: Why Blacks Don’t Need Racial Preferences to Succeed अभी 2025 में आई है। यह पुस्तक Affirmative Action की आवश्यकता और लाभों के आम दावों को चुनौती देती है। लेखक का मुख्य तर्क है कि अश्वेत अमेरिकियों ने सरकारी preferential policies के बिना भी उल्लेखनीय प्रगति की थी, और ये नीतियाँ असल में नुकसानदायक रही हैं। Affirmative Action एक मिथक है और यह धारणा गलत है कि अश्वेत समुदाय की प्रगति के लिए racial preferences अनिवार्य हैं। ऐतिहासिक तथ्य इस दावे का समर्थन नहीं करते। 1960 के दशक से पहले इन समुदायों ने तेज प्रगति दर्ज की थी। 1940 से 1960 के बीच (Jim Crow काल में भी) अश्वेत गरीबी दर 87% से घटकर 47% हो गई। आय, शिक्षा और मध्यम वर्ग में प्रवेश की दरें affirmative action से पहले तेजी से बढ़ रही थीं।Preferences के बाद प्रगति धीमी पड़ी। 1960-70 के दशक में racial preferences लागू होने के बाद कई सकारात्मक रुझान धीमे पड़ गए या रुक गए। गरीबी घटने, शिक्षा और परिवार की स्थिरता में सुधार की रफ्तार कम हो गई। Preferences के कारण अश्वेत छात्रों और पेशेवरों पर यह आशंका रहती है कि उनकी सफलता योग्यता से नहीं, बल्कि नस्लीय लाभ से मिली है। इससे उनकी उपलब्धियों की वैधता पर सवाल उठते हैं।अश्वेत समुदाय की समस्याओं का मुख्य समाधान परिवार की स्थिरता और सांस्कृतिक कारकों में है, न कि preferential admissions या hiring में।वर्तमान नस्लीय अंतरों को मुख्यतः “systemic racism” से जोड़ने वाला दृष्टिकोण अधूरा, अतिरंजित और भ्रामक है। व्यवहार, संस्कृति और पारिवारिक संरचना जैसे कारक अधिक महत्वपूर्ण हैं।अश्वेत मध्यम वर्ग का उदय preferences से पहले हो चुका था और अश्वेत मध्यम वर्ग का बड़ा हिस्सा affirmative action नीतियों से पहले ही विकसित हो चुका था। ये नीतियाँ उसके अस्तित्व के लिए आवश्यक नहीं थीं।Affirmative Action के समर्थक अक्सर चुनिंदा या भ्रामक आंकड़ों का इस्तेमाल करते हैं, जबकि व्यापक ऐतिहासिक रुझान इसके विपरीत तस्वीर पेश करते हैं।लेखक का निष्कर्ष है कि अश्वेत अमेरिकियों को विशेष preferential treatment की जरूरत नहीं है। वे अपनी योग्यता और प्रयासों से सफल हो सकते हैं, जैसा कि इतिहास ने पहले दिखाया है। Riley का तर्क है कि Affirmative Action न तो आवश्यक थी और न ही लाभदायक साबित हुई। अश्वेत प्रगति का असली आधार व्यक्तिगत प्रयास, परिवार और संस्कृति रहा है, न कि सरकारी नस्लीय तरजीह।

Justin Driver की पुस्तक The Fall of Affirmative Action: Race, the Supreme Court, and the Future of Higher Education अभी 2025 के अंत में आई। इस वर्ष उसकी बहुत चर्चा हो रही है। और Race, Class, and Affirmative Action: College Admissions in a New Era शीर्षक पुस्तक तो अभी जनवरी 2026 में आई है। 

इन सब बौद्धिक प्रयासों ने ही वह वातावरण बनाया कि SFFA v. Harvard / UNC (2023) प्रकरण में Chief Justice John Roberts द्वारा लिखे गए बहुमत (6-3) के फैसले ने Race-based admissions को असंवैधानिक बताते हुए कहा कि Harvard और UNC के race-conscious admissions कार्यक्रम 14वें संशोधन के Equal Protection Clause का उल्लंघन करते हैं। उन्होंने कहा कि इस पर Strict Scrutiny लागू होती है।Race के आधार पर कोई भी वर्गीकरण “strict scrutiny” के अधीन है। सरकार को अत्यंत ठोस और मापने योग्य कारण दिखाने होंगे।उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों द्वारा बताए गए लक्ष्य (diversity के शैक्षिक लाभ, भविष्य के नेता तैयार करना, विचारों का बाजार आदि) इतने अस्पष्ट और अमापनीय हैं कि न्यायालय उनकी समीक्षा नहीं कर सकता। Race को किसी छात्र के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। College admissions zero-sum प्रक्रिया है — एक को लाभ देना दूसरे को नुकसान पहुँचाना है। यह मानना कि किसी नस्ल के सभी सदस्य एक जैसे सोचते या अनुभव रखते हैं, असंवैधानिक stereotyping है। उन्होंने याद दिलाया कि Grutter (2003) में कहा गया था कि race preferences किसी न किसी बिंदु पर समाप्त होनी चाहिए। Harvard और UNC के कार्यक्रमों में कोई स्पष्ट end point नहीं था।छात्रों की नस्लीय संख्या को किसी निश्चित अनुपात में बनाए रखना “outright racial balancing” है, जो असंवैधानिक है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को व्यक्ति के रूप में देखना होगा। छात्रों को उनकी नस्ल के आधार पर नहीं, बल्कि व्यक्तिगत अनुभव, उपलब्धियों और गुणों के आधार पर आंका जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि निजी विश्वविद्यालयों (जैसे Harvard) पर भी Title VI of the Civil Rights Act के तहत यही प्रतिबंध लागू होते हैं, क्योंकि वे संघीय धन लेते हैं। न्यायालय ने साफ कर दिया कि “Eliminating racial discrimination means eliminating all of it.” Race को admissions में सीधे कारक के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

अब यह भी जान लीजिए कि भारत की अतिरक्षण व्यवस्था तो उससे भी कहीं बढ़कर थी। पर भारत में परिवर्तन छोड़िए, शैक्षणिक परिसरों में ऐसे अध्ययन करने में भी आपके धर लिये जाने की संभावना अधिक है। 

आप जेन जी पर आपका पाँच हजार वर्ष पुराना तर्क लादना चाहते हो। उसे आपके सौ साल पहले के तर्क स्वीकार नहीं। 

वो जूमर्स हैं। उन्हें कीलित कैसे कर सकते हैं?

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