सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

यूथ_आईकॉन #विश्वासराव_भट्ट :

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फाल्गुन का महीना था महाशिवरात्रि पर रुद्राभिषेक करने के बाद शनिवार वाड़ा में प्रसाद ग्रहण करने बालाजी बाजीराव का परिवार एक साथ बैठा था. सभी शांत थे. पेशवा श्रीमंत बालाजी बाजीराव के माथे पर चिंता की लकीर साफ दिख रही थी। उनके भाई कृष्ण राव (शमशेर बहादुर), रघुनाथ राव और सदाशिवराव "भाऊ" भी अपने अपने आसन पर चुपचाप प्रसाद ग्रहण कर रहे थे। परंतु 18 वर्ष के भावी पेशवा विश्वास राव भट्ट असहज भाव से अपनी थाली में हाथ नही लगा रहे थे। 

माता गोपिका ने उन्हे खीर परोसते हुए पूछा - क्यों परेशान हो? 

नीली आंखों और अद्भुत सुंदरता के धनी बलिष्ठ युवा विश्वासराव ने पूरी दृढ़ता के साथ कहा - मुझे भी "अब्दालियों" से लड़ने उत्तर के अभियान में काका श्रीमंत सदाशिवराव भाऊ के साथ जाना है।

बालाजी बाजीराव : परंतु इस विषय पर निर्णय हो चुका है। आप नही जायेंगे। अभियान का नेतृत्व काका सदाशिवराव भाऊ और कृष्णा राव करेंगे. अभी आप की आयु कम है.

विश्वासराव : पिताश्री.. काका ने पिछले दस वर्षों से मुझे युद्ध कौशल में सघन प्रशिक्षण दिया है। जिसका फल आप लोगों ने निजाम के विरुद्ध सिंदखेड़ा और उदगीर के युद्धों में मेरी क्षमता और प्रबंधन को देखा है।

बालाजी बाजीराव : पुत्र विश्वास.. मुझे तुम्हारी वीरता और कौशल में तनिक भी संदेह नही. तुम्हारी तलवार बाजी से अधिक लोग तुम्हारी तीरंदाजी से प्रभावित हूं. और रही बात रणनीति कि तो जिस कुशलता से तुमने काका के साथ मिलकर दिल्ली के मुगल "शहंशाह" आलमगीर द्वितीय की हत्या को उन्ही के लोगों (इमाद उल मुल्क के सिपाहियों) द्वारा करवा दी; मुझे हिंदवी स्वराज का भविष्य सुरक्षित दिखता है।

विश्वासराव : तो फिर आप मुझे क्यों रोक रहे है? कदाचित पुत्रमोह...!!

बालाजी बाजीराव : मेरी चिंता ये है कि क्या रुहेलखंड के पठान, क्या दिल्ली और हरियाणा के मुगल और क्या अवध के शिया, राक्षसों की टोली, जो अब तक एक दूसरे से कुत्ते बिल्लियों की तरह लड़ रहे थे, आज मजहब के नाम पर "हरे परचम" के तले एकजुट हो गए हैं. 

राजा सूरजमल और अन्य राजपूताना के अन्य राजा बहुत विश्वसनीय नहीं हैं. इतिहास गवाह है कि वे अपने निजी स्वार्थ / अहंकार में कब पलटी मार दें या पीछे हट जाए, भरोसा नही. सूचना मिली है कि #सिखों ने अब्दालियों से बिना लड़े ही हथियार डाल कर उन्हे दिल्ली आने का सुरक्षित रास्ता दे दिया है।

ना करे नारायण... परंतु अगर हमारी सेना को किसी तरह की अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता पड़ी तो 1500 km दूर संदेश आने और रसद/कुमुक पहुंचने में महीनो लग जायेंगे. 

पंत प्रधानों के साथ हुई बैठकों में कई सेना के प्रधान और स्वयं क्षत्रपति भी पूछ रहे हैं कि क्या हमे अब्दालियों से लड़ने 1500km दूर उत्तर के अभियान में जाना भी चाहिए? 

विश्वासराव गरज कर बोले : वो राक्षस हिंदुओं का भयंकर नरसंहार, बलात्कार और लूटपाट करते हुए पंजाब, हरियाणा और दिल्ली के द्वार तक पहुंच चुके हैं। हम यहां चुप बैठे रहें? नही... 

अगर आप ने मुझे जाने की अनुमति नहीं दी, तो मैं अन्न जल त्याग दूंगा..

पेशवा बालाजी ने अपनी पत्नी की तरफ देखा..

माता गोपिका बाई ने कहा : ये एक मां के लिए गौरव की बात होगी अगर उसका पुत्र मातृभूमि और धर्म रक्षा के लिए रण भूमि को चुने. मेरी सहमति है.

अस्तु.... 50,000 की सेना श्रीमंत सदाशिव राव भाऊ के नेतृत्व में उत्तर के अभियान पर निकल पड़ी... 9 महीने बाद #पानीपत में राक्षसों और मनुष्यों के बीच भीषण संग्राम हुआ. 

जैसी आशंका थी, ऐन मौके पर #राजा_सूरजमल अपनी सेना के साथ युद्ध के मैदान से पीछे हट गए... और अन्य कई राजपूत राजा जैसे जयपुर के माधो सिंह अब्दालियों के साथ मिल गए.. अन्य जाट राजा युद्ध के लिए आए ही नही....

अभियान लंबा खिंचने के कारण भोजन खत्म हो गया था. आस पास के अन्य जाट, राजपूत और यहां तक कि सिखों को भोजन सामग्री देने के लिए संदेश भेजे गए. सिखों को इसका मूल्य तक चौथ में समायोजित (adjust) करने का ऑफर दिया गया... परंतु सहायता और भोजन दोनों नही पहुंचे..

मकर संक्रांति के दिन तीन दिन की भूखी सेना युद्ध के मैदान में लड़ने को उतरी.. 

उस दिन पानीपत में रणचंडी भी लहू की नदियां देख कर व्यथित हो गई होंगी.. विश्वासराव, सदाशिव राव और कृष्णा राव अपने पूर्वज पेशवा श्रीमान #बाजीराव_बल्लाल जी की रण परंपरा के अनुरूप अग्रिम पंक्ति में सिपाहियों के साथ लड़े और अपने 50 हजार साथी सैनिकों के साथ वीरता से लड़ते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया. 

19 वर्ष की आयु में जब खेलने और खाने के दिन होते हैं, उस तेजस्वी युवक ने हिंदुत्व की रक्षा हेतु रणवेदी में अपने प्राणों की आहूति दी....

आज विश्वासराव की #जन्म_जयंती है. 

जिस दिल्ली की रक्षा हेतु उन्होंने ने प्राण त्यागे, वहां उनके जन्मोत्सव का कोई कार्यक्रम नही हुआ..

जिस पुणे में उनका जन्म हुआ, उस महाराष्ट्र में उनकी स्मृति में कोई कार्यक्रम नहीं हुए.. आपकी टाइम लाइन पर भी कदाचित ही कोई लेख या गौरव गान दिखा होगा..

अगर आप ने ये लेख यहां तक पढ़ा है; तो आज अपने परिवार के युवाओं से पूछिए कि उनका ICON (प्रतिमान या हीरो) कौन है?

19 वर्ष की आयु में अप्रतिम वीरता के साथ हिंदुत्व का ध्वजवाहक ये बालक विश्वासराव हिंदुओं का #Youth_Icon क्यों नही होना चाहिए?

खैर.... 

वीर योद्धा विश्वासराव की जन्म जयंती पर मेरा सादर नमन है...

Love U My Hero... 🧡🤗🧡

~~ बाबा African "हिन्दुस्तानी" ✍️

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