सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

भारत की राजनीति में नया मोड़



रामजी के अस्तित्व को नकारने, रामभक्तों पर गोली चलाने और पवित्र हनुमान गढ़ी मंदिर परिसर में रोजा इफ्तार कराने वालों जिव्हा पर भी अब रामजी का नाम

--रमेश शर्मा 

इन दिनों भारतीय राजनीति में एक नया मोड़ आ गया है। जिन राजनैतिक दलों के शासनकाल में रामभक्तों पर गोलियाँ चलीं, जिन्होंने अदालत में शपथपत्र देकर भगवान राम के अस्तित्व को कल्पनात्मक बताया और जिन्होंने अयोध्या में रामजन्म स्थान पर मंदिर की बजाय पर अस्पताल बनाने की बात कही, यही नहीं मुस्लिम तुष्टीकरण केलिये हनुमान गढ़ी मंदिर परिसर में रोजा इफ्तार और नमाज हुई, वे सभी अब प्रतिदिन रामजी का नाम ले रहे हैं। इनमें सबसे आगे समाजवादी पार्टी है। 
समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी सहित कुछ विपक्षी दलों के नेता इन दिनों श्रीरामजी का नाम इतने उच्च स्वर में ले रहें हैं, मानों उनसे बड़ा कोई दूसरा रामभक्त है ही नहीं। इनमें सबसे आगे समाजवादी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और उनके सांसद विधायक हैं। इसकी समाजवादी पार्टी का पूरा इतिहास मुस्लिम तुष्टीकरण और हिन्दु आस्था पर आघात करने की घटनाओं से भरा है। समाजवादी पार्टी ने अपने शासनकाल में पूरे अयोध्या आँदोलन को रामभक्ति और आस्था से नहीं अपितु हिन्दू मुसलमान की दृष्टि से देखा था। सपा शासनकाल में ही रामभक्तों पर गोलियाँ चलीं थीं। अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इतिहास की कयी घटनाओं का उल्लेख कर सपा की दिखावटी रामभक्ति की कलई खोल दी है। इसमें मुस्लिम तुष्टीकरण और हिन्दु आस्था पर आघात करने वाली वह घटना भी है जब तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के निर्देश पर हनुमान गढ़ी मंदिर परिसर में मुसलमानों ने आकर रोजा इफ्तारी की और नमाज पढ़ी थी। यह उन दिनों की बात है जब भारतीय राजनीति में मुस्लिम तुष्टीकरण की मानों कोई स्पर्धा चल रही थी। किसी नेता को भारतीय संसाधनों पर पहला अधिकार मुसलमानों का दिखता था, तो किसी नेता के आँसू बटाला हाउस के एनकाउंटर में मारे गये मुस्लिम आतंकवादी के मारे जाने पर आँसू निकल पड़े थे, किसी को मुस्लिम आंतकवादी भटके हुये नौजवान लगते थे तो कोई नेता इस बात कि खुली घोषणा करता है कि यदि उत्तर प्रदेश में उनके दल की सरकार होती तो अयोध्या का बाबरी ढाँचा कभी नहीं गिरने देते। ऐसे तमाम दावे करने वाले राजनीतिक दलों के नेता इन दिनों अयोध्या रामनाम की चर्चा में डूबे हुये हैं। उनके स्वर इतने तीव्र हैं कि चारों ओर इसी की चर्चा हो रही है। अभी यह स्पष्ट नहीं हो रहा कि इनकी यह रामभक्ति वास्तविक है अथवा कपटमुनि कालनेमि की भाँति है। कपटमुनि कालनेमि का प्रसंग रामचरितमानस के लंका काँड में है। रामजी और रावण के बीच युद्ध आरंभ हो गया था। मेघनाथ के शक्ति प्रहार से लक्ष्मणजी अचेत हुये और उनके उपचार की औषधि लेने हनुमानजी हिमालय प्रस्थित हुये। हनुमानजी को भ्रमित करने केलिये असुर कालनेमि मार्ग में बैठकर जोर जोर से राम नाम का जपने लगा। हनुमानजी का ध्यान उसकी ओर गया, और वे इतने इतने प्रभावित हुये कि लक्ष्य की ओर आगे बढ़ने की बजाय वहीं रुककर पूजन की तैयारी करने लगे। स्नान करने सरोवर में गये। वहाँ रहने वाली एक मगरी ने हनुमान जी को कालनेमि की कपटभक्ति से सचेत किया। हनुमान जी सावधान हुये। उन्होंने कालनेमि का उद्धार किया और अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ गये। कालनेमि वास्तविक रामभक्त नहीं था। उसका उसका अतीत तो धर्म विरुद्ध आचरण से भरा था। उसने कितनी ही बात संत महात्माओं की आस्था पर आघात किया था। कितने ही यज्ञों का विध्वंस किया था। लेकिन रामभक्त हनुमानजी का ध्यान भटकाने केलिये कपटमुनि बनकर जोर जोर से रामनाम जपने लगा। उसने रामभक्ति ऐसा अभिनय किया कि हनुमानजी भी भ्रमित हो गये थे। लेकिन मगरी ने कपटमुनि कालनेमि की पोल खोलकर रखदी थी और हनुमानजी सतर्क होकर आगे बढ़े। इन दिनों उत्तर प्रदेश के राजनैतिक वातावरण में लगभग यही परिदृश्य दिखाई दे रहा है। कल तक जो लोग अयोध्या में राम जन्मस्थान मंदिर निर्माण में कदम कदम पर अवरोध खड़ा कर रहे थे, आज उन सबके स्वरों से रामभक्ति के शब्द झर रहे हैं। इनमें समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और उनकी पूरी टोली रामजी और अयोध्या की महिमा का ऐसा गुणगान कर रहे हैं कि सभी रामभक्तों का ध्यान उनकी ओर आकर्षित होने लगा। जबकि अध्यक्ष अखिलेश यादव और उनके पिता मुलायम सिंह यादव ने कभी अयोध्या जन्मस्थान पर जाकर रामलला के दर्शन भी नहीं किये। चुनाव प्रचार के दौरान कयी बार अयोध्या गये, मुख्य मार्ग से भी निकले लेकिन मंदिर परिसर में जाने से सदैव परहेज किया। इसका कारण यह है कि समाजवादी पार्टी और उसके संस्थापक अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव से लेकर आजतक उनके अधिकांश नेताओं ने अयोध्या आँदोलन को कभी हिन्दु आस्था से जोड़कर देखा ही नहीं। उनकी दृष्टि में मुस्लिम तुष्टीकरण प्राथमिकता में रहा। समाजवादी के शासनकाल में किसी भी मंदिर का जीर्णोद्धार तक नहीं हुआ जबकि कब्रिस्तानों का विस्तार हुआ, उनकी बाउण्ड्री वाॅल भी बनी। समाजवादी पार्टी के शासनकाल में कितनी क्रूरता से राम मंदिर आँदोलन का दमन करने का दमनचक्र चला था, यह पूरे संसार ने देखा है। अयोध्या की सड़कें और गलियाँ भी रामभक्तों के खून से लाल हो गई थीं। रामभक्तों की लाशें देखकर संपूर्ण भारत ने तो शोक मनाया, लेकिन समाजवादी पार्टी के नेताओं ने शोक व्यक्त करने की बजाय सीना फुलाया था। मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के चचेरे भाई रामगोपाल यादव ने तो यहाँ तक कहा था कि- "कारसेवक सीढ़ियाँ चढ़ तो गये थे लेकिन उतर नहीं पाये"। और जब ढाँचा ढह गया तो सबसे अधिक आँसू समाजवादी पार्टी के नेताओं ने ही बहाये थे। अयोध्या उजड़ने लगी थी। पुलिस और प्रशासन के भय से कयी परिवार पलायन कर गये थे। यह सारा विवरण समय समय पर मीडिया में आया है। नये विकास कार्य होना तो सड़कों की मरम्मत भी ठीक से नहीं होती थी। लेकिन समय ने करवट बदली। समाजवादी पार्टी सत्ता बाहर हुई। अयोध्या में विकास कार्य आरंभ हुये और रामलला भी अपने जन्म स्थान पर विराजमान हो गये। 
अब लंबे समय तक विपक्ष में रहकर समाजवादी पार्टी के नेता और अखिलेश यादव यह समझ गये हैं कि आस्थावान हिन्दुओं की भावना के अनुरूप बात करने से ही उनकी नैय्या पार लगेगी। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट भी आने लगी है। इसीलिए वे अब अचानक अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के विभिन्न नेता मीडिया प्रतिनिधियों के सामने, सोशल मीडिया एकाउंट पर और विभिन्न सभा बैठकों में उच्च स्वर से रामनाम जपने लगे हैं। लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सपा नेताओं की इस कथित भक्ति की एक बार फिर कलई खोलकर रखदी। अपनी पिछली अयोध्या यात्रा में उन्होंने मुस्लिम तुष्टीकरण और हिन्दू आस्था पर आघात करने की एक ऐसी घटना का स्मरण कराया जिसे सुनकर सभी रामभक्त हत्प्रभ हैं। यह घटना नवम्बर 2003 की है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दावा किया कि तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के निर्देश पर अयोध्या के पवित्र श्रीहनुमान गढ़ी मंदिर परिसर में रोजा इफ्तारी कराई गई थी और नमाज पढ़ी गई थी। मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ की बात का समर्थन उत्तर प्रदेश पुलिस से सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक ब्रजलाल जी ने भी किया है। ब्रजलाल जी उनदिनों फैजावाद जिले में एसपी के रूप में पदस्थ थे और अयोध्या नगर फैजाबाद जिले के अंतर्गत ही आता था। मीडिया के पूछने पर ब्रजलाल जी ने पूरा घटनाक्रम बताया। उस वर्ष मायावती सरकार अपदस्थ हुई और मुलायमसिंहजी ने सत्ता संभाली थी। वर्ष 2003 में 26 अक्टूबर से रमजान का महीना आरंभ हुआ था। मुख्यमंत्री श्री मुलायम सिंह यादव ने लखनऊ रेंज के आई जी और कलेक्टर फैजावाद को बुलाकर हिन्दु आस्था के प्रमुख केन्द्र अयोध्या के श्रीहनुमान गढ़ी मंदिर के सभागार में रोजा इफ्तारी प्रबंध करने के निर्देश दिये। लेकिन तत्कालीन सीनियर पुलिस अधीक्षक सबरवाल जी ने कानून व्यवस्था बिगड़ने का हवाला देकर असहमति जताई। संतो और स्थानीय नागरिकों ने भी विरोध किया। लेकिन प्रशासन मुख्यमंत्री मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव का निर्देश पालन करने पर अड़ा रहा। ब्रजलाल जी के अनुसार उस समय लखनऊ रेंज के आईजी और फैजावाद कलेक्टर मुख्यमंत्री का निर्देश पालन करने में पूरी शक्ति लगा रहे थे। सरकार की ओर से महंत ज्ञानदास जी पर दबाव बनाया गया। वे झुक गये। उन्होंने मंदिर की सीढ़ियों सहित अपने आश्रम में रोजा इफ्तार और नमाज केलिये सहमति दे दी। ज्ञानदास जी का आश्रम, मंदिर की दीवार से लगा हुआ था। उनके आश्रम में आयोजन हुआ। आश्रम के प्रांगण में एक स्थान पर मूर्तियाँ रखीं थीं। मुस्लिम समाज के लोग बड़ी संख्या में आये। ब्रजलाल जी के अनुसार सभी ने जूते चप्पल मूर्तियों के पास ही उतारे। कयी मूर्तियाँ खंडित भी हुईं। इस आयोजन का संपूर्ण संत समाज ने विरोध किया। एक आश्रम के एक अन्य महंत धर्मदास जी ने प्रशासन से बहुत गुहार लगाई। लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई तो उन्होंने न्यायालय की शरण ली। न्यायालय में यह प्रकरण वर्ष 2005 तक चला। न्यायालय ने भी इसे अनुचित माना और भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति न करने के निर्देश दिये। मुलायम सिंह यादव सरकार और उसके नेताओं ने तर्क दिया था कि आयोजन का उद्देश्य हिन्दु मुसलमान के बीच निकटता लाने केलिये था। कहने और सुनने में यह तर्क अच्छा लग सकता है लेकिन इसकी सच्चाई अलग है। भाईचारा बढ़ाने के नामपर यह आयोजन मुस्लिम तुष्टीकरण और हिन्दु आस्था पर गहरा कुठाराघात था। यदि उद्देश्य भाईचारा बढ़ाना होता तो भाईचारे केलिये किसी प्रसिद्ध मस्जिद परिसर हनुमान चालीसा या सुन्दर काँड के पाठ का आरोजन भी हो सकता था। जो नहीं हुआ। सपा नेताओं द्वारा दिये गये भाईचारे के तर्क पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यही प्रश्न अखिलेश यादव से पूछा कि कि भाईचारा बढ़ाने केलिये मंदिर में तो नमाज कराई लेकिन क्या किसी मस्जिद में हनुमान चालीसा का पाठ क्यों कराया ? उनके प्रश्न पर पूरी समाजवादी पार्टी ने चुप्पी साध ली है। योगी आदित्यनाथ की चुनौती पर समाजवादी पार्टी और उसके नेताओं की चुप्पी स्वाभाविक भी है। चूँकि समाजवादी पार्टी की यह चुप्पी स्वाभाविक है। उनका उद्देश्य भाईचारा बढ़ाना नहीं, मुस्लिम तुष्टीकरण है। तुष्टीकरण केलिये वे किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रित्व काल में हनुमान गढ़ी मंदिर में रोजा इफ्तार और नमाज पढ़ने की घटना का विरोध योगी आदित्यनाथ जी ने उस समय भी किया था। तब वे गोरखपुर से सांसद थे। घटना की सूचना मिलते ही वे अयोध्या आये और उन्होंने हनुमान गढ़ी मंदिर के द्वार पर सभा करके इसकी पुनरावृत्ति न करने की चेतावनी दी। इस घटना को अब तेइस साल होने आ गये। हिन्दु आस्था की रक्षा केलिये महंत योगी आदित्यनाथ के जो तेवर तब थे वही अंदाज आज भी है। इसीलिए उनके कथन में वास्तविक रामभक्तों को दिखावटी भक्ति के प्रदर्शन से सावधान रहने का संकेत भी है।

टिप्पणियाँ