सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

शब्दों के मायाजाल में भटकता भारत और 'रामराज्य' की पुकार




✍️दीपक कुमार द्विवेदी 


आज जब मैं अपने चारों ओर के समाज को देखता हूँ, तो विकास के तमाम शोर-शराबे के बीच एक गहरी खामोशी और पीड़ा महसूस होती है। यह बड़ी विचित्र विडंबना है कि जिस आधुनिकता और व्यवस्था को हमने अपना भविष्य मान लिया है, उसी के भीतर हमारी एक बहुत बड़ी आबादी डिप्रेशन, अकेलेपन और कर्ज के भारी बोझ तले सिसक रही है। यह सब देखकर मन में एक प्रश्न उठता है कि आखिर चूक कहाँ हुई? इस प्रश्न का उत्तर उस गहरे और भयानक भ्रम में छिपा है, जिसे आज हम 'डेमोक्रेसी' और 'लोकतंत्र' को एक समझने की भूल कर रहे हैं। सच तो यह है कि भारत के ऊपर यूरोपीय 'क्रिश्चियन नेशन-स्टेट' (ईसाई राष्ट्र-राज्य) की एक ऐसी केंद्रीकृत, दानवी और पैशाचिक व्यवस्था उसी विकृत रूप में थोप दी गई है, जिसका खामियाजा आज पश्चिमी देश अपने ही समाज के पतन के रूप में भुगत रहे हैं।

यह समझना बहुत आवश्यक है कि आज दुनिया जिन विचारधाराओं के बोझ तले दबकर हांफ रही है, वे हमारी मिट्टी की उपज नहीं हैं। उनका जन्म 1789 की फ्रांस की क्रांति के उस रक्तरंजित दौर में हुआ था। आज हम जिस 'राइट विंग' (दक्षिणपंथ) और 'लेफ्ट विंग' (वामपंथ) की बात करते हैं, वह कोई दार्शनिक विचार नहीं था, बल्कि फ्रांस की असेंबली में बैठने की एक व्यवस्था मात्र थी। जो लोग बदलाव के खिलाफ थे, वे दाईं ओर बैठे, जो क्रूर और हिंसक बदलाव चाहते थे, वे बाईं ओर बैठे और बीच वालों को 'सेंटर' कहा गया। इसी उथल-पुथल में चर्च और सत्ता के खूनी संघर्ष को रोकने के लिए 'सेक्युलरिज्म' का पर्दा डाला गया, और लोगों की निष्ठा चर्च से हटाकर एक कृत्रिम सत्ता (नेशन-स्टेट) से जोड़ने के लिए 'नेशनलिज्म' गढ़ा गया। इसी अंध-भौतिकतावाद की कोख से पूंजीवाद जन्मा, और उसकी प्रतिक्रिया में समाज को वर्ग-संघर्ष की आग में झोंकने वाला समाजवाद पैदा हुआ। इन सभी वादों ने समग्र मानवता को केवल तोड़ने और निगलने का ही काम किया है।


भारत की सबसे बड़ी त्रासदी तब शुरू हुई, जब हमने इन पश्चिमी अवधारणाओं का अंधा अनुकरण किया और शब्दों के झूठे मायाजाल में फंस गए। हमने मान लिया कि 'रिलिजन' ही 'धर्म' है और 'डेमोक्रेसी' ही 'लोकतंत्र' है। जबकि रिलिजन केवल एक पंथ या पूजा-पद्धति है, और धर्म सृष्टि का वह शाश्वत नियम है जो समाज को पतन से बचाता है। महर्षि वेदव्यास जी ने महाभारत में बड़ी स्पष्टता से कहा है— "धारणाद् धर्ममित्याहुः धर्मो धारयते प्रजाः" अर्थात जो समाज को धारण करे और उसे सुव्यवस्थित रखे, वही धर्म है। अग्नि का धर्म जलाना है, जल का शीतलता देना, वैसे ही शासक का धर्म प्रजा का पालन करना है।


जब पश्चिम की इस 'डेमोक्रेसी' को भारत में महिमामंडित करके लागू किया गया, तो इसके परिणाम बड़े ही विनाशकारी सिद्ध हुए। जिन समस्याओं को भारतीय समाज ने सदियों के विदेशी और क्रूर आक्रमणों के दौरान भी नहीं पनपने दिया, वे इस आधुनिक व्यवस्था में नासूर बन गईं। इतिहास साक्षी है कि इस्लामिक और अंग्रेजी आक्रमणों के लंबे कालखंड के बावजूद भारत में धर्मांतरण केवल 10 से 15 प्रतिशत तक ही सीमित रहा। जब अंग्रेज यहाँ से गए, तब ईसाई आबादी मात्र 2 प्रतिशत थी। लेकिन इस 'डेमोक्रेसी' के आठ दशकों के शासन में, घोषित रूप से भले ही यह आंकड़ा 3 प्रतिशत बताया जाए, परंतु अघोषित रूप से (क्रिप्टो-क्रिश्चियन) आबादी लगभग 15 प्रतिशत तक पहुँच चुकी है। 1947 में इस पूरे उपमहाद्वीप में मुस्लिम आबादी 24 प्रतिशत थी, जो आज बढ़कर 50 प्रतिशत के पार हो चुकी है। यह विचार करने योग्य बात है कि यदि यह डेमोक्रेसी इतनी ही महान व्यवस्था है, तो बहुसंख्यक हिंदू समाज आज जाति, भाषा, क्षेत्र और स्त्री-पुरुष के नाम पर इतना अधिक विखंडित क्यों हो रहा है?
इसका मूल कारण यह है कि आधुनिक नेशन-स्टेट समाज को केवल 'भेड़' मानता है और उसे सभ्य बनाने के नाम पर केवल नियंत्रित करता है। आज की इस डेमोक्रेसी में कोई भी बाहुबली, भ्रष्टाचारी या माफिया चुनाव जीतकर सत्ता के शीर्ष पर बैठ जाता है और उसे दंड मिलना असंभव हो जाता है। वहीं, एक आम आदमी यदि ट्रेन में बिना टिकट मजबूरी में सफर करता पकड़ा जाए, तो वह जेल में सड़ जाता है, उसे कोई पूछने वाला नहीं होता। यह कैसी व्यवस्था है जहाँ राज्य सर्वशक्तिमान है लेकिन न्याय नदारद है?


इसके विपरीत, भारत का अपना एक वास्तविक लोकतंत्र था, जो सबसे निचले स्तर यानी 'ग्राम पंचायत' में बसता था। गाँव की अपनी एक सुव्यवस्थित और स्वावलंबी प्रणाली थी। गाँव का मुखिया छोटे अपराधों का दंड देकर समाज को अनुशासित रखता था। केंद्रीय स्तर पर राजतंत्र अवश्य था, लेकिन हमारा राजा पश्चिमी देशों की तरह निरंकुश और सर्वशक्तिमान नहीं होता था। वह सदैव 'धर्म के अधीन' होता था, इसीलिए उसे भगवान विष्णु का प्रतिनिधि माना जाता था।

हमारे यहाँ शासक सत्ता का उपभोग करने वाला नहीं, बल्कि एक संन्यासी और सेवक होता था। राजा जनक शासक होकर भी 'विदेह' (संन्यासी) कहलाए। भगवान राम के वनवास जाने पर भरत ने स्वयं को राजा नहीं माना, बल्कि राम की खड़ाऊं को सिंहासन पर रखकर एक सेवक की भांति अयोध्या का शासन चलाया। मेवाड़ का गौरवशाली इतिहास इसका जीवंत प्रमाण है, जहाँ महाराणा प्रताप और उनके वंशज आज भी स्वयं को राजा नहीं, बल्कि अपनी कुलदेवता 'एकलिंगजी महादेव' का दीवान (सेवक) मानकर शासन करते हैं। हमारे राजा धर्माचार्यों और कुल गुरुओं से मार्गदर्शन लेकर नीतियां बनाते थे।


शासन कैसा होना चाहिए, इसका स्पष्ट विधान हमारे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। महर्षि चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र में लिखा है

"प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्।
नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्॥

(प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है। जो राजा को खुद प्रिय लगे, वह हितकारी नहीं, बल्कि जो प्रजा को प्रिय और लाभकारी हो, वही राजा का सच्चा हित है।)


प्राचीन भारत में अराजकता इसलिए नहीं पनप पाती थी क्योंकि शुक्र नीति, विदुर नीति, मनुस्मृति और अर्थशास्त्र में न्याय और दंड का ऐसा कठोर व स्पष्ट विधान था, जो किसी व्यक्ति या माफिया को नहीं, बल्कि धर्म और सत्य को स्थापित करता था।


अंततः, हमें यह समझना होगा कि भारत का अंतिम लक्ष्य केवल भौतिक विकास की अंधी दौड़ में शामिल होना नहीं है। हमारे ऋषियों ने प्रजा के आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक विकास का स्वप्न देखा था। और इस सर्वांगीण विकास का विश्व में केवल एक ही मॉडल है, और वह है 'रामराज्य'। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में जिस सच्चे शासन का वर्णन किया है, वह आज की इस खोखली डेमोक्रेसी और कम्युनिज्म के मुंह पर एक करारा तमाचा है:

 "दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा ।। सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥"
 


क्या आज की इस आधुनिक डेमोक्रेसी, वामपंथ या पूंजीवाद के शासन में ऐसे समाज की कल्पना भी की जा सकती है जहाँ किसी को कोई कष्ट न हो और सब प्रेमपूर्वक अपने कर्तव्यों का पालन करें? उत्तर होगा नहीं। इसलिए, जब तक हम पश्चिमी शब्दों और वादों के इस मायाजाल को नहीं तोड़ेंगे, हम अपने समाज और राष्ट्र के लिए कभी उचित निर्णय नहीं ले पाएंगे। भारत को आज इस विदेशी और आसुरी व्यवस्था के मोहपाश से मुक्त होने और अपने मूल सनातन सिद्धांतों की ओर लौटने की परम आवश्यकता है, क्योंकि हमारे हर मर्ज की दवा हमारी अपनी ही जड़ों में सुरक्षित है।

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