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#ब्राम्हण_विरोध या #ब्रम्ह_विरोध?



जो ब्राम्हण विरोधी एजेंडा ईसाई लूटेरों ने शुरू किया वह वस्तुत: ब्राम्हण विरोध नहीं था ब्रम्ह विरोध था, जीसस के पक्ष को मजबूत बनाने हेतु। 

ब्राम्हणवाद के नाम पर ब्रम्ह का विरोध करना ही उनका उद्देश्य था। क्योंकि ऐसा कोई वाद होता नहीं है। होता तो जो लोग इतनी प्रखरता से विरोध करते हैं वे दिखायी देते। 

एक जो कॉमन नैरेटिव गढ़ा गया - जिसका कोई ग्रन्थ समर्थन नहीं करता वह है - जन्मजात श्रेष्ठता का भाव होने को ब्रम्हमवाद कहते हैं। 

अब इसके तीन पक्ष्य हैं:
1- जन्मजात श्रेष्ठता का भाव न हो तो निम्नता का भाव होगा। क्योंकि बुद्द्धि सदैव दो पक्षयों में ही सोचती है। पॉजिटिव या नेगेटिव। तीसरा भाव सिर्फ किसी निर्बुद्धि प्राणी में अर्थात पागल में होगा या फिर योगी में - समभाव। 99.0% जनता दोनों में ही नहीं आती। 

2- श्रेष्ठता की नस्लीय सुपेरियोरिटी का भाव अब्राहमिक मत की उपज है - जिसका अर्थ होता है पशुबल से दूसरे मत वालों को प्रताड़ित करना। भारतीय संदर्भ में श्रेष्ठता का अर्थ है अलग है। समाज में शक्ति के तीन माध्यम हैं - विद्या, धन और शक्ति। भारतीय परंपरा में श्रेष्ठ होने का अर्थ है विद्यवान - निशुल्क विद्या दान करे, धनवान उचित पात्र को दान करे, और शक्ति का उपयोग कमजोरों की रक्षा में किया जाय। इसके प्रमाण उपलब्ध हैं। 

3- यदि कोई अपने आपको श्रेष्ठ समझता है तो समझता रहे, मेरे बाप का क्या ले जाता है। किसी के सोचने पर तो प्रतिबंध लगाया नहीं जा सकता। शेखचिल्ली पना कहते हैं इसे। साइकाइट्री में इसे मानसिक रोग कहते हैं - मेगलोमानिया

निष्कर्ष :

"यह ब्राम्हण के विरोध से कम लेकिन ब्रम्ह के विरोध से अधिक सम्बंधित है।
जिससे जीसस को सुपर ब्रम्ह स्थापित किया जा सके।

ईसाइयों ने शुरू किया इसे 19वीं शताब्दी में। 
तो यह प्रश्न उठता है कि भारतीयों ने इसका विरोध क्यों नहीं किया?
करता कौन? जो अशिक्षित थे, अशिक्षित अर्थात अंग्रेजी भाषा से अनभिज्ञ, उन्हें पता ही नहीं था कि उनके बच्चों के मस्तिष्क में शिक्षा के नाम पर भरा क्या जा रहा है। 
और जो शिक्षित थे वे विद्वान मूर्ख ईसाई एजेंडे का शिकार बन चुके थे/हैं - और उसका टूल था शिक्षा और सूचना प्रसारण के समस्त साधन, जिन पर पहले ईसाइयों का कब्जा था। बाद में पढ़े लिखे मूर्ख भारतीयों का कब्जा हो गया"।

1930 में विल दुरंत अपनी पुस्तक The Case For India में लिखता है: "गरीब भारतीय जब किसी तरह इतनी महगी पढ़ाई पढ़कर विश्वविद्यालयों में दाखिला पाता था तो वह ऐसे दुश्चक्र में फंस जाता है जिसकी उसे अपेक्षा नहीं होती, उसे शिक्षा के माध्यम से अभारतीय और एंटी भारतीय बनाया जा रहा है।"

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#De_Indianised and #Anti_Indian Indian #Education 

©त्रिभुवन सिंह

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