सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

क्या हर समस्या का समाधान एक नया CEO है?



✍️ दीपक कुमार द्विवेदी

अयोध्या में राममंदिर के दानपात्र से कथित चोरी का प्रकरण सामने आने के बाद स्वाभाविक रूप से लोगों का ध्यान चोरी, सुरक्षा व्यवस्था और कर्मचारियों की भूमिका पर गया। लेकिन मेरे विचार से यह घटना केवल कुछ व्यक्तियों के कथित भ्रष्ट आचरण का विषय नहीं है। यह उस गहरे सामाजिक परिवर्तन का परिणाम भी है, जिसे हम पिछले डेढ़-दो सौ वर्षों से समझने का प्रयास ही नहीं कर रहे। यह परिवर्तन है समाज की शक्ति का क्षय और राज्य को सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ तथा "माई-बाप" मान लेने की मानसिकता।

राममंदिर तीर्थ क्षेत्र न्यास से जुड़े वरिष्ठ पदाधिकारी नृपेन्द्र मिश्रा ने इस घटना के बाद मंदिर प्रबंधन के लिए CEO नियुक्त करने की आवश्यकता बताई। यह कथन सुनकर मेरे मन में पहला प्रश्न यही उठा कि क्या हम हर समस्या का समाधान अब केवल किसी नए अधिकारी, किसी नए पद और किसी नए प्रशासनिक ढाँचे में ही खोजेंगे? जिस राममंदिर को सरकारी नियंत्रण से मुक्त, समाज-संचालित व्यवस्था का आदर्श मॉडल बताया गया था, उसी राममंदिर के लिए अब समाधान एक और प्रशासक में खोजा जा रहा है। यह केवल एक प्रशासनिक प्रस्ताव नहीं, बल्कि हमारे समय की मानसिकता का दर्पण है।

भारत में आज एक सामान्य धारणा बन चुकी है कि व्यवस्था केवल आईएएस अधिकारी चला सकते हैं, न्याय केवल न्यायालय कर सकते हैं, अनुशासन केवल पुलिस स्थापित कर सकती है और समाज स्वयं कुछ नहीं कर सकता। यदि कोई विवाद हो तो एसडीएम देखेंगे, यदि कोई अपराध हो तो पुलिस देखेगी, यदि कोई नैतिक संकट हो तो न्यायालय देखेगा। समाज की भूमिका केवल दर्शक की रह गई है। यही वह मानसिकता है जिसने राज्य को "माई-बाप" और समाज को आश्रित बना दिया है।

विडंबना यह है कि भारतीय परंपरा का स्वरूप इसके ठीक विपरीत था।

भारतीय राज्य-दर्शन में राजा महत्वपूर्ण था, लेकिन सर्वशक्तिमान नहीं था। समाज का अपना अधिकार क्षेत्र था, ग्राम का अपना अधिकार क्षेत्र था, कुल का अपना अधिकार क्षेत्र था और राज्य का अपना अधिकार क्षेत्र था। राजा समाज का स्थानापन्न नहीं था। वह व्यवस्था का संरक्षक था।

ब्रिटिश प्रशासक चार्ल्स मेटकाफ ने भारतीय ग्रामों को Little Republics अर्थात् "लघु गणराज्य" कहा था। उन्होंने देखा कि भारतीय गाँव अपने अधिकांश कार्य स्वयं संचालित करते हैं। इतिहासकार धर्मपाल ने अपनी चर्चित पुस्तक The Beautiful Tree में ब्रिटिश शासन से पूर्व भारतीय समाज की स्वशासी संस्थाओं का विस्तृत वर्णन किया है। ग्राम पंचायतें केवल नालियाँ साफ कराने या तालाब बनवाने का काम नहीं करती थीं। वे सामाजिक अनुशासन का भी केंद्र थीं।

यह कहना सही नहीं होगा कि प्राचीन भारत में हत्या, राजद्रोह या बड़े अपराधों का निर्णय पंचायतें करती थीं। ऐसे विषय राजसत्ता के अधिकार क्षेत्र में आते थे। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि सामाजिक जीवन का बड़ा भाग समाज स्वयं संचालित करता था। चोरी, छल, विश्वासघात, सामाजिक मर्यादा भंग करना, सामुदायिक नियमों का उल्लंघन करना इन विषयों पर समाज की स्पष्ट प्रतिक्रिया होती थी।

ग्राम-बहिष्कार, जाति-बहिष्कार, सामाजिक निष्कासन और अनेक मामलों में सार्वजनिक निंदा जैसी व्यवस्थाएँ केवल दमन के साधन नहीं थीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व के उपकरण थीं। आधुनिक दृष्टि से इनमें अनेक दोष दिखाई दे सकते हैं, लेकिन यह भी सत्य है कि इनके कारण व्यक्ति केवल कानून से नहीं, समाज की दृष्टि से भी भयभीत रहता था।

यही कारण है कि भारतीय नीतिशास्त्र ने दण्ड को व्यवस्था का अनिवार्य अंग माना।

महाभारत के शांतिपर्व में कहा गया है—

> दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति।
दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः॥

अर्थात् दण्ड ही समाज को अनुशासित करता है और वही उसकी रक्षा करता है।

अर्थशास्त्र में कौटिल्य ने स्पष्ट लिखा—

> दण्डाभावे मत्स्यन्यायमुद्भावयति।

अर्थात् दण्ड के अभाव में मत्स्यन्याय उत्पन्न होता है, जहाँ बलवान दुर्बल को निगल जाता है।

शुक्रनीति में शुक्राचार्य कहते हैं—

> दण्ड एव हि लोकानां राजा भवति रक्षणे।

अर्थात् लोक की रक्षा में दण्ड ही वास्तविक शासक है।

विदुर नीति में विदुर धृतराष्ट्र को सावधान करते हैं कि अपराधियों के प्रति दुर्बलता और अनुचित उदारता अंततः राज्य और समाज दोनों के लिए घातक सिद्ध होती है।

भारतीय परंपरा ने कभी यह नहीं कहा कि केवल उपदेश से व्यवस्था चल सकती है। उसने करुणा को भी स्थान दिया और दण्ड को भी। उसने क्षमा को भी महत्व दिया और अनुशासन को भी।

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में भगवान राम के माध्यम से एक गहन सामाजिक सत्य व्यक्त किया—

> विनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होय न प्रीति॥

भगवान राम पहले विनय करते हैं, प्रतीक्षा करते हैं, संवाद करते हैं। लेकिन जब उससे परिणाम नहीं निकलता तो दण्ड की संभावना प्रकट करते हैं। उसके बाद ही समुद्र मार्ग देने के लिए तैयार होता है। यह केवल धार्मिक प्रसंग नहीं है, बल्कि व्यवस्था का सिद्धांत है। जहाँ आवश्यक हो, वहाँ दण्ड की संभावना भी होनी चाहिए।

दुर्भाग्य से आधुनिक भारत में दण्डनीति को लगभग नकारात्मक शब्द बना दिया गया। विशेष रूप से हिंदू समाज के भीतर यह धारणा बैठाई गई कि हम केवल शांति की बात करेंगे, केवल संवाद करेंगे और केवल सुधार की बात करेंगे। परिणाम यह हुआ कि दण्ड और अनुशासन का विचार सार्वजनिक जीवन से पीछे हटता गया।

यहीं हिंदू संगठनों की भी एक बड़ी समस्या दिखाई देती है। उन्होंने लाखों कार्यकर्ताओं को समाज जोड़ना सिखाया, संवाद सिखाया, सबको साथ लेकर चलना सिखाया। यह सब आवश्यक था। लेकिन उन्होंने दण्डनीति का प्रयोग कब और कैसे करना है, यह अपेक्षित गंभीरता से नहीं सिखाया। परिणामस्वरूप संगठन से निकले अनेक कार्यकर्ता जब किसी संस्था, न्यास या प्रशासनिक दायित्व में पहुँचे तो वे अनुशासन लागू करने में संकोच करने लगे। वे आवश्यकता से अधिक उदार और आवश्यकता से अधिक लोकतांत्रिक हो गए। जहाँ कठोर निर्णय अपेक्षित था, वहाँ समझौते और टालमटोल का मार्ग अपनाया गया।

अंग्रेजों ने इस स्थिति की आधारशिला और मजबूत की। 1860 की भारतीय दण्ड संहिता, 1861 का पुलिस अधिनियम और 1872 का साक्ष्य अधिनियम लागू करके उन्होंने न्याय और दण्ड को केंद्रीकृत कर दिया। समाज की भूमिका धीरे-धीरे कम होती गई। स्वतंत्रता के बाद भी वही औपनिवेशिक ढाँचा लगभग यथावत बना रहा।

आज भारत में लगभग पाँच हजार से अधिक IAS अधिकारी, लगभग पाँच हजार IPS अधिकारी, लाखों सरकारी कर्मचारी और विशाल न्यायिक तंत्र है। यह व्यवस्था आवश्यक हो सकती है, लेकिन इसके साथ एक दूसरी मानसिकता भी विकसित हुई—"राज्य सब कुछ करेगा।"

यही मानसिकता आज दिखाई देती है। कोई व्यक्ति अपराध करे तो समाज की पहली प्रतिक्रिया नैतिक नहीं, प्रशासनिक होती है। कोई मंदिर लुटे तो नया अधिकारी बैठाओ। कोई विद्यालय बिगड़े तो नया विभाग बनाओ। कोई संस्था संकट में हो तो नई समिति बना दो। हर समस्या का उत्तर राज्य है।

इसके दुष्परिणाम सामने हैं।

आज समाज का बड़ा वर्ग अपराधी को उसके अपराध से नहीं, उसकी जाति और समूह से पहचानता है। उत्तर प्रदेश के कुख्यात अपराधी विकास दुबे का उदाहरण इसका प्रमाण है। जिस व्यक्ति पर पुलिस अधिकारियों की हत्या का आरोप था, उसके समर्थन में भी जातीय तर्क दिए गए। जिसने ब्राह्मण पुलिस अधिकारियों की हत्या करवाई, उसी को कुछ लोगों ने केवल ब्राह्मण होने के कारण अपना प्रतिनिधि बताने का प्रयास किया। यह नैतिक दृष्टि का नहीं, जातीय दृष्टि का उदाहरण है।

यदि समाज का नैतिक ढाँचा सुदृढ़ होता तो अपराधी पहले अपराधी माना जाता, बाद में कुछ और।

राममंदिर के कथित चोरी प्रकरण में भी यही प्रश्न उठता है। यदि आरोप सत्य सिद्ध होते हैं और मंदिर के कर्मचारियों ने भगवान राम को अर्पित धन में हाथ डाला है तो क्या समाज उन्हें स्पष्ट रूप से अस्वीकार करेगा? क्या उनके परिवार, परिचित और सामाजिक समूह कहेंगे कि यह कृत्य निंदनीय है? या फिर वही होगा जो आज अनेक मामलों में होता है—कोई जातीय आधार पर बचाव करेगा, कोई व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर और कोई राजनीतिक कारणों से।

यही समाज के नैतिक क्षरण का संकेत है।

समाज-केंद्रित व्यवस्था का अर्थ यह नहीं कि अतीत में सब कुछ आदर्श था। लेकिन उसमें समाज के पास आत्म-संशोधन की क्षमता थी। वह सही और गलत का निर्णय करने का साहस रखता था। आज वह साहस घट रहा है।

राममंदिर का यह प्रकरण केवल चोरी का प्रकरण नहीं है। यह उस मानसिकता का परिणाम है जिसमें समाज अपनी शक्ति छोड़ता गया और राज्य को सर्वशक्तिमान बनाता गया। आज राज्य को माई-बाप मान लिया गया है। मानो समाज के पास न निर्णय की शक्ति है, न अनुशासन की, न उत्तरदायित्व की।

भारतीय परंपरा का संदेश इससे भिन्न था। कौटिल्य, विदुर, शुक्राचार्य और तुलसीदास सभी एक ही बात कहते हैं व्यवस्था केवल कानून से नहीं चलती, केवल उपदेश से भी नहीं चलती। व्यवस्था तब चलती है जब समाज अपनी मर्यादा की रक्षा करे और राज्य न्याय की रक्षा करे।

जब समाज अपना दायित्व छोड़ देता है, तब राज्य का विस्तार होता है। और जब राज्य सर्वशक्तिमान बन जाता है, तब समाज निर्बल होता जाता है। किसी भी राष्ट्र के लिए यही सबसे बड़ा संकट होता है।

राममंदिर की घटना हमें यही प्रश्न पूछने के लिए बाध्य करती है क्या हम समाज की खोई हुई उत्तरदायित्व-शक्ति को पुनः जागृत करेंगे, या फिर प्रत्येक संकट का समाधान किसी नए CEO, किसी नए IAS अधिकारी और किसी नए प्रशासनिक ढाँचे में खोजते रहेंगे? इतिहास का अनुभव बताता है कि सशक्त राज्य से अधिक महत्वपूर्ण सशक्त समाज होता है। राज्य की शक्ति सीमित होती है, समाज की शक्ति असीमित। राष्ट्रों का भविष्य अंततः उसी से निर्धारित होता है।

टिप्पणियाँ