सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक आख्यानों के पार भारत

आज भारतीय समाज को समझने के लिए कुछ शब्द लगभग स्थायी सत्य की तरह स्थापित कर दिए गए हैं—पितृसत्तात्मक व्यवस्था, ब्राह्मणवाद, ब्राह्मणवादी पितृसत्ता, सवर्ण वर्चस्व। इन शब्दों का इतना अधिक प्रयोग हुआ कि अब इनके अर्थ पर विचार करने की आवश्यकता भी बहुत कम लोग महसूस करते हैं। लेकिन यदि कोई सरल प्रश्न पूछे कि क्या ये शब्द वेदों में मिलते हैं? क्या उपनिषदों ने भारतीय समाज को पितृसत्तात्मक कहा है? क्या महाभारत, रामायण या पुराणों में ब्राह्मणवाद जैसी कोई अवधारणा मिलती है? तो उत्तर नकारात्मक होगा। फिर यह शब्द भारतीय समाज की पहचान कैसे बन गए?

इस प्रश्न का उत्तर इतिहास में छिपा हुआ है। अंग्रेज जब भारत आए तो उनका उद्देश्य केवल व्यापार या शासन नहीं था। किसी भी राष्ट्र पर स्थायी अधिकार स्थापित करने के लिए उसकी स्मृति, उसके इतिहास और उसके आत्मविश्वास को बदलना आवश्यक होता है। जेम्स मिल ने 1817 में हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इंडिया लिखी। उन्होंने न संस्कृत पढ़ी थी, न भारतीय दर्शन का अध्ययन किया था और न ही भारत के सामाजिक जीवन को भीतर से समझा था, फिर भी उन्होंने भारतीय सभ्यता का निर्णय सुना दिया। बाद में मैकॉले की शिक्षा नीति ने भारतीय ज्ञान परम्परा को विद्यालयों से बाहर कर दिया। पश्चिमी इतिहास और समाजशास्त्र को आधुनिक ज्ञान का पर्याय बना दिया गया। स्वतंत्रता के बाद भी यही प्रवृत्ति समाप्त नहीं हुई। विश्वविद्यालयों में मार्क्सवादी विश्लेषण और औपनिवेशिक इतिहासलेखन ने भारतीय समाज को वर्ग संघर्ष, सत्ता संघर्ष और स्त्री-पुरुष संघर्ष की दृष्टि से पढ़ना शुरू किया। धीरे-धीरे वही भाषा मीडिया, राजनीति और सामाजिक विमर्श की भाषा बन गई।

यहीं सबसे बड़ी भूल हुई। भारत को उसी चश्मे से देखने का प्रयास किया गया जिससे यूरोप को देखा जाता था।

भारतीय समाज का आधार कभी राजसत्ता नहीं रहा। यहाँ अंतिम सत्य ब्रह्म है। उपनिषद कहते हैं—"सर्वं खल्विदं ब्रह्म।" अर्थात जो कुछ दिखाई देता है, वह उसी ब्रह्म का विस्तार है। वही उपनिषद कहते हैं—"अहं ब्रह्मास्मि" और "तत्त्वमसि"। इसका अर्थ है कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर वही परम तत्व विद्यमान है। जब प्रत्येक प्राणी में एक ही आत्मा है तो स्थायी शोषक और स्थायी शोषित का सिद्धांत भारतीय दर्शन का आधार कैसे हो सकता है?

भारतीय जीवन को समझना हो तो चार पुरुषार्थों को समझना होगा—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। आज का अधिकांश राजनीतिक विमर्श अर्थ और सत्ता तक सीमित है, इसलिए उसे हर जगह संघर्ष दिखाई देता है। सनातन परम्परा कहती है कि अर्थ कमाओ, काम का भी सम्मान करो, लेकिन दोनों धर्म के अधीन रहें और अंततः जीवन का लक्ष्य मोक्ष हो। यही कारण है कि यहाँ राजा भी संन्यासी बन सकता है और संन्यासी राजाओं का गुरु बन सकता है। जनक इसका उदाहरण हैं। वे राजमहल में रहते हुए भी विदेह कहलाते हैं। श्रीराम लंका जीतकर उसे अपने राज्य में नहीं मिलाते, विभीषण को सौंप देते हैं। भरत स्वयं सिंहासन पर नहीं बैठते, चरणपादुकाओं को राज्य का प्रतीक मानते हैं। यह राजनीति नहीं, धर्म की संस्कृति है।

भारतीय समाज को पितृसत्तात्मक कहने वाले शायद अर्धनारीश्वर की कल्पना को भूल जाते हैं। संसार की कौन-सी सभ्यता है जिसने ईश्वर को आधा पुरुष और आधा स्त्री रूप में स्वीकार किया हो? शिव बिना शक्ति के पूर्ण नहीं हैं। ब्रह्मा सरस्वती के बिना सृष्टि नहीं कर सकते। विष्णु लक्ष्मी के बिना पालन नहीं कर सकते। यहाँ स्त्री और पुरुष दो विरोधी वर्ग नहीं, एक ही सत्य के दो आयाम हैं। परिवार में माता और पिता के दायित्व अलग हो सकते हैं, लेकिन अधिकार और सम्मान का आधार दायित्व है, प्रभुत्व नहीं। जैसे शरीर में हृदय और मस्तिष्क दोनों आवश्यक हैं, वैसे ही समाज में स्त्री और पुरुष दोनों अपरिहार्य हैं।

इसी प्रकार वर्ण व्यवस्था को भी केवल सत्ता के चश्मे से देखना उचित नहीं है। ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र को विराट पुरुष के विभिन्न अंग कहा गया है। क्या कोई व्यक्ति अपने पैरों से घृणा कर सकता है? क्या हाथ सिर के शत्रु होते हैं? शरीर की तरह समाज भी एक जीवित व्यवस्था है। गीता में श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि वर्ण गुण और कर्म के आधार पर है। इतिहास में अनेक सामाजिक विकृतियाँ आईं, उन्हें स्वीकार करना चाहिए, लेकिन विकृति को ही सनातन सिद्धांत मान लेना सत्य का सरलीकरण है।

भारतीय ज्ञान परम्परा की सबसे बड़ी विशेषता उसकी बौद्धिक स्वतंत्रता है। यहाँ प्रश्न पूछना पाप नहीं है। नचिकेता यम से प्रश्न करता है, गार्गी याज्ञवल्क्य से प्रश्न करती हैं, अर्जुन श्रीकृष्ण से प्रश्न करता है। श्रुति, स्मृति, आगम, निगम, षड्दर्शन, शैव, वैष्णव, शाक्त, बौद्ध, जैन, सिख, यहाँ तक कि चार्वाक भी इस विशाल परम्परा के भीतर संवाद करते हैं। किसी एक पुस्तक या एक व्यक्ति को अंतिम प्रमाण नहीं माना गया। सत्य की खोज निरंतर चलती रहती है।

यही कारण है कि धर्म का अर्थ भी यहाँ पश्चिम के रिलिजन जैसा नहीं है। धर्म किसी एक उपासना पद्धति का नाम नहीं, बल्कि वह व्यवस्था है जो व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और सम्पूर्ण सृष्टि को धारण करती है। महाभारत का वचन है—"धारणाद्धर्ममित्याहुः।" धर्म केवल मंदिर में नहीं, व्यवहार में दिखाई देता है; न्याय में दिखाई देता है; करुणा में दिखाई देता है; प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व में दिखाई देता है।

विष्णु पुराण भारतवर्ष को केवल भूमि का टुकड़ा नहीं, कर्मभूमि कहता है। यहाँ जीवन केवल जन्म और मृत्यु के बीच की यात्रा नहीं, बल्कि आत्मा की अनंत यात्रा है। कर्म, पुनर्जन्म, लोक, परलोक और मोक्ष इस यात्रा के पड़ाव हैं। जो सभ्यता जीवन को इस व्यापक दृष्टि से देखती हो, उसे केवल सत्ता और संघर्ष की भाषा में समझना संभव नहीं है।

आज आवश्यकता किसी नए वैचारिक युद्ध की नहीं, बल्कि स्मृति के पुनर्जागरण की है। हमें यह याद करना होगा कि भारत की आत्मा सिंहासन में नहीं, ऋषियों की परम्परा में बसती है; राज्य में नहीं, धर्म में बसती है; और धर्म का भी अंतिम आधार ब्रह्म है। जब यह बात समझ में आ जाती है तो पितृसत्ता, ब्राह्मणवाद और ऐसे अनेक आयातित शब्द अपने आप छोटे पड़ जाते हैं। तब भारत एक संघर्षरत समाज नहीं, बल्कि आत्मा से परब्रह्म तक की यात्रा करने वाली एक जीवंत सभ्यता के रूप में दिखाई देता है। यही उसकी सबसे बड़ी पहचान है और यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति भी।

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