सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

कर्मफल बनाम सोशल जस्टिस

आज के इस लेख में हम सनातन धर्म के कर्मफल-आधारित न्याय सिद्धांत और आधुनिक सामाजिक न्याय की अवधारणा के मध्य निहित मूलभूत वैचारिक अंतर पर विचार करेंगे। यह विषय केवल दार्शनिक विमर्श का नहीं, बल्कि समकालीन भारत के वैचारिक, सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष का केंद्र बन चुका है। आज देश में जाति, समानता, आरक्षण, अधिकार, ऐतिहासिक अन्याय और सामाजिक प्रतिनिधित्व जैसे अधिकांश प्रश्न प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से न्याय की इन्हीं दो भिन्न अवधारणाओं के इर्द-गिर्द घूमते हैं। परिणामस्वरूप समाज में संवाद की अपेक्षा टकराव, समरसता की अपेक्षा विद्वेष और कर्तव्यबोध की अपेक्षा अधिकारबोध का विस्तार होता दिखाई देता है। 


ऐसे समय में यह समझना आवश्यक हो जाता है कि भारत की चिरंतन सभ्यता ने न्याय को किस दृष्टि से देखा था और आधुनिक सामाजिक न्याय की अवधारणा किस वैचारिक भूमि पर विकसित हुई। क्योंकि किसी भी राष्ट्र का भविष्य केवल उसकी राजनीतिक व्यवस्था से नहीं, बल्कि उसकी न्याय-दृष्टि से भी निर्धारित होता है।


सनातन धर्म में न्याय का आधार व्यक्ति का जन्म नहीं, उसका कर्म है। यहाँ प्रत्येक मनुष्य अपने कर्मों का स्वयं उत्तरदायी है और वही उसके सुख-दुःख, उन्नति-पतन तथा जीवन-यात्रा का कारण बनता है। यही कर्मफल सिद्धांत भारतीय जीवन-दर्शन की आधारशिला है, जिसने केवल न्याय व्यवस्था ही नहीं, बल्कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की संतुलित साधना का मार्ग प्रशस्त किया। इस व्यवस्था का उद्देश्य समाज में प्रतिशोध नहीं, बल्कि आत्मानुशासन, उत्तरदायित्व, समरसता और लोकमंगल की स्थापना था। इसलिए सनातन चिंतन में न्याय केवल दंड देने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि धर्म की प्रतिष्ठा और व्यक्ति के चरित्र-निर्माण का माध्यम माना गया है। यहीं से आधुनिक सामाजिक न्याय और सनातन के कर्मफल-आधारित न्याय सिद्धांत के बीच वैचारिक अंतर की वास्तविक यात्रा आरम्भ होती है।


सनातन धर्म के कर्मफल और न्याय सिद्धांत को समझाने वाली ऐसी हजारों कथाएँ भारतीय वाङ्मय में बिखरी पड़ी हैं। वे केवल धार्मिक आख्यान नहीं हैं, बल्कि भारतीय न्याय-दर्शन की जीवंत व्याख्या हैं। रामकथा-परंपरा में एक अत्यंत प्रसिद्ध प्रसंग आता है। भगवान श्रीराम अयोध्या का शासन कर रहे थे। प्रतिदिन की भाँति वे राजसभा में प्रजा की समस्याएँ सुन रहे थे। उसी समय राजमहल के द्वार पर एक घायल कुत्ता आकर खड़ा हो गया। उसने द्वारपालों से विनम्र स्वर में कहा, "मुझे अयोध्या के महाराज श्रीराम से न्याय चाहिए।" द्वारपालों को यह असामान्य लगा, पर उन्होंने भीतर जाकर श्रीराम को सूचना दी कि राजद्वार पर एक कुत्ता न्याय की याचना लेकर खड़ा है। श्रीराम ने बिना किसी विलंब के आदेश दिया, "उसे सम्मानपूर्वक सभा में लाया जाए। न्याय पाने का अधिकार केवल मनुष्यों का नहीं, प्रत्येक प्राणी का है।"


सभा में पहुँचकर कुत्ते ने प्रणाम किया और कहा, "राजन! एक ब्राह्मण ने बिना किसी अपराध के मेरे सिर पर प्रहार किया है। मैं आपके राज्य में न्याय की आशा लेकर आया हूँ।" श्रीराम ने तत्काल उस ब्राह्मण को राजसभा में बुलवाया। उसने स्वीकार किया कि क्रोध और भूख के वशीभूत होकर उसने कुत्ते को दंडित किया। श्रीराम ने सभा के ऋषियों और मंत्रियों से विचार-विमर्श किया। तत्पश्चात उन्होंने आश्चर्यजनक रूप से पीड़ित कुत्ते से ही पूछा, "तुम्हारे अनुसार इस अपराध का क्या दंड होना चाहिए?" सभा को लगा कि कुत्ता अवश्य कठोर दंड की माँग करेगा, किंतु उसने शांत स्वर में कहा, "महाराज, इसे किसी बड़े मठ का महंत बना दीजिए।" पूरा दरबार स्तब्ध रह गया। श्रीराम ने कारण पूछा। तब कुत्ते ने उत्तर दिया, "पूर्वजन्म में मैं स्वयं एक मठ का महंत था। प्रारंभ में मैंने धर्मपूर्वक अपने दायित्व निभाए, परंतु धीरे-धीरे पद का अहंकार, प्रतिष्ठा का मोह और अधिकार का दुरुपयोग मेरे भीतर बढ़ता गया। उसी अधर्म का परिणाम है कि आज मुझे कुत्ते की योनि प्राप्त हुई है। यह ब्राह्मण भी क्रोध, अहंकार और असंयम से ग्रस्त है। यदि इसे भी वही पद मिलेगा तो अपने कर्मों के कारण यह भी वही फल भोगेगा जो मैंने भोगा।"


इस कथा का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि श्रीराम ने न तो ब्राह्मण होने के कारण अपराध को छिपाया और न ही कुत्ता होने के कारण उसकी प्रार्थना को अस्वीकार किया। न्याय का आधार केवल कर्म था। अपराधी का जन्म नहीं देखा गया, पीड़ित का रूप नहीं देखा गया; केवल धर्म और कर्म को आधार बनाकर निर्णय हुआ। यही सनातन धर्म की न्याय-दृष्टि का सार है कि मनुष्य अपने कर्मों का अधिकारी है और वही उसके सुख-दुःख, सम्मान-असम्मान तथा भविष्य का वास्तविक निर्धारक है। यही कर्मफल का सिद्धांत भारतीय न्याय-दर्शन की आत्मा है।


अब प्रश्न यह है कि यदि भारतीय सभ्यता का न्याय-दर्शन हजारों वर्षों तक कर्म, धर्म और व्यक्तिगत उत्तरदायित्व पर आधारित रहा, तो फिर वर्तमान भारत में समूह-आधारित सामाजिक न्याय का विमर्श इतना प्रभावशाली कैसे बन गया? इसका उत्तर केवल भारतीय राजनीति में नहीं, बल्कि पिछले लगभग ढाई सौ वर्षों के वैश्विक बौद्धिक इतिहास में निहित है। आधुनिक सोशल जस्टिस की अवधारणा अचानक उत्पन्न नहीं हुई। इसके पीछे लंबे समय तक चले दार्शनिक, राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तनों की एक श्रृंखला है। 1789 की फ्रांसीसी क्रांति ने यूरोप की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया। राजसत्ता, चर्च और परंपरागत संस्थाओं को चुनौती मिली तथा स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को आधुनिक राज्य के मूल आदर्शों के रूप में प्रस्तुत किया गया। इसके साथ ही यह विचार भी मजबूत हुआ कि समाज में विद्यमान असमानताओं को दूर करने के लिए राज्य को सक्रिय हस्तक्षेप करना चाहिए।


इसी वातावरण में जर्मन दार्शनिक जॉर्ज विल्हेम फ्रेडरिक हेगल (1770–1831) ने इतिहास को द्वंद्व की प्रक्रिया के रूप में समझाने का प्रयास किया। हेगल का मानना था कि इतिहास स्थिर नहीं रहता, बल्कि विरोधी विचारों और शक्तियों के संघर्ष से आगे बढ़ता है। उनके अनुसार प्रत्येक व्यवस्था अपने भीतर ऐसे विरोधाभास उत्पन्न करती है, जो अंततः एक नई व्यवस्था को जन्म देते हैं। यह विचार आगे चलकर यूरोप के अनेक राजनीतिक सिद्धांतों की आधारशिला बना।

उन्नीसवीं शताब्दी में कार्ल मार्क्स (1818–1883) और फ़्रेडरिक एंगेल्स (1820–1895) ने हेगल की इसी द्वंद्वात्मक पद्धति को आर्थिक आधार दिया। 1848 में प्रकाशित उनकी प्रसिद्ध किताब द कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो और 1867 में प्रकाशित दास कैपिटल के माध्यम से उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि मानव इतिहास मूलतः वर्ग-संघर्ष का इतिहास है। उनके अनुसार समाज दो प्रमुख वर्गों—शोषक और शोषित—में विभाजित है तथा राजनीति, कानून, संस्कृति, शिक्षा और धर्म भी अंततः आर्थिक संरचना से प्रभावित होते हैं। मार्क्स का विश्वास था कि पूँजीवादी व्यवस्था का अंत वर्ग-संघर्ष के माध्यम से होगा और उसके स्थान पर एक वर्गविहीन समाज की स्थापना होगी। इस प्रकार इतिहास को समझने का केंद्र व्यक्ति से हटकर वर्ग बन गया।


बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में यह स्पष्ट हो गया कि केवल आर्थिक संघर्ष के आधार पर पश्चिमी समाजों में अपेक्षित राजनीतिक परिवर्तन नहीं हो रहा था। इसी परिस्थिति में इटली के विचारक अंतोनियो ग्राम्शी (1891–1937) ने अपनी प्रसिद्ध किताब प्रिजन नोटबुक्स (Prison Notebooks) में लिखा कि किसी राष्ट्र को बदलने के लिए केवल संसद और सरकार पर अधिकार पर्याप्त नहीं है। वास्तविक परिवर्तन तब होता है, जब शिक्षा, विश्वविद्यालय, साहित्य, मीडिया, इतिहास-लेखन, कला, सिनेमा और सांस्कृतिक संस्थानों की वैचारिक दिशा बदल दी जाए। ग्राम्शी ने इसे सांस्कृतिक वर्चस्व (Cultural Hegemony) कहा। उनका विचार था कि समाज पहले विचारों से बदलता है, राजनीति बाद में बदलती है।


इसके बाद 1923 में जर्मनी के फ्रैंकफर्ट नगर में स्थापित इंस्टीट्यूट फ़ॉर सोशल रिसर्च से जुड़े विचारकों—मैक्स हॉर्खाइमर, थियोडोर अडोर्नो, हर्बर्ट मार्क्यूज़, एरिख फ़्रॉम और बाद में युर्गेन हाबरमास—ने क्रिटिकल थ्योरी को आगे बढ़ाया। इन विचारकों ने परिवार, धर्म, शिक्षा, संस्कृति, भाषा, परंपरा और सामाजिक संस्थाओं का आलोचनात्मक अध्ययन किया। उनकी अनेक किताबों और शोधों का प्रभाव धीरे-धीरे यूरोप और अमेरिका के विश्वविद्यालयों में फैलता गया। इसके बाद पहचान, संस्कृति, लैंगिकता, नस्ल और सामाजिक संरचनाओं पर आधारित नए अध्ययन सामने आने लगे।



इसी बौद्धिक वातावरण में अमेरिका के 1950 और 1960 के दशक के नागरिक अधिकार आंदोलन के बाद डेरिक बेल, किम्बर्ले क्रेंशॉ, रिचर्ड डेलगाडो, मारी मात्सुदा और अन्य विधि-विद्वानों ने क्रिटिकल रेस थ्योरी को विकसित किया। इसका उद्देश्य अमेरिकी समाज में नस्लीय भेदभाव और संस्थागत व्यवस्थाओं का अध्ययन करना था। बाद के वर्षों में यही विश्लेषणात्मक पद्धति अमेरिका के विश्वविद्यालयों से निकलकर दुनिया के अन्य देशों तक पहुँची। भारत में भी कुछ भारतीय और विदेशी शिक्षाविदों ने जाति को इसी प्रकार की पहचान-आधारित दृष्टि से पढ़ना प्रारंभ किया। इसी संदर्भ में क्रिटिकल कास्ट थ्योरी शब्द प्रचलन में आया। यह किसी एक किताब या एक लेखक का सिद्धांत नहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों, शोध-पत्रों और अकादमिक विमर्शों में विकसित अध्ययन-पद्धति है। आज भारत में जाति, प्रतिनिधित्व, सामाजिक न्याय, पहचान की राजनीति और सार्वजनिक नीतियों से जुड़ी अनेक बहसों में इस दृष्टिकोण का प्रभाव दिखाई देता है। इसके कारण वर्तमान वैचारिक संघर्ष में व्यक्ति के कर्म की अपेक्षा उसकी सामाजिक पहचान को अधिक महत्व देने की प्रवृत्ति पर व्यापक बहस खड़ी हुई है।


अब प्रश्न यह है कि भारत में "सोशल जस्टिस" केवल एक संवैधानिक अभिव्यक्ति न रहकर राजनीति, शिक्षा, न्यायपालिका, मीडिया और विश्वविद्यालयों का सबसे प्रभावशाली शब्द कैसे बन गया? यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ। इसके पीछे औपनिवेशिक शासन, पश्चिमी राजनीतिक दर्शन, स्वतंत्र भारत की नीतियों और बाद की चुनावी राजनीति का लंबा क्रम दिखाई देता है। अंग्रेज़ों ने भारत में केवल शासन नहीं किया, बल्कि भारतीय समाज को समझने और नियंत्रित करने के लिए उसे जनगणना, जातीय वर्गीकरण और कानूनी श्रेणियों में बाँटना भी प्रारंभ किया। 1871 से प्रारंभ हुई नियमित जनगणनाओं ने पहली बार पूरे भारत की जातियों को सरकारी अभिलेखों का विषय बनाया। इसके बाद सामाजिक प्रश्नों को देखने की भाषा भी धीरे-धीरे बदलने लगी।


स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद संविधान की प्रस्तावना में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय को राष्ट्र के आदर्शों में स्थान मिला। संविधान निर्माण में डॉ. भीमराव आंबेडकर की केंद्रीय भूमिका रही। उन्होंने समान अवसर, विधिक समानता और वंचित समुदायों के संवैधानिक संरक्षण पर विशेष बल दिया। दूसरी ओर पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारत ने राज्य-नियोजित विकास और समाजवादी आर्थिक नीति को अपनाया। 1955 के अवाड़ी अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने "सोशलिस्टिक पैटर्न ऑफ सोसाइटी" को अपनी नीति घोषित किया। बाद में 1976 में 42वें संविधान संशोधन द्वारा प्रस्तावना में "समाजवादी" शब्द भी जोड़ा गया। इसी अवधि में भारतीय विश्वविद्यालयों में पश्चिमी समाजशास्त्र, राजनीतिक विज्ञान और इतिहास-लेखन का प्रभाव निरंतर बढ़ता गया, जिससे सामाजिक न्याय का विमर्श अकादमिक जगत में भी मजबूत होता गया। 


इसके बाद 1979 में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की सरकार ने बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल की अध्यक्षता में मंडल आयोग का गठन किया। आयोग ने 1980 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की और सामाजिक तथा शैक्षिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण का ढाँचा सुझाया। 1990 में प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा मंडल आयोग की प्रमुख सिफारिशों को लागू करने की घोषणा के साथ "सोशल जस्टिस" भारतीय राजनीति का सबसे प्रभावशाली नारा बन गया। इसके बाद बिहार, उत्तर प्रदेश और देश के अनेक राज्यों में अनेक राजनीतिक दलों ने स्वयं को सामाजिक न्याय की राजनीति का प्रतिनिधि बताना प्रारंभ किया। समानांतर रूप से विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, मीडिया और गैर-सरकारी संगठनों में भी सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व, पहचान और ऐतिहासिक वंचना पर आधारित अध्ययन तेजी से बढ़े। 

यहीं से भारत में न्याय की दो भिन्न अवधारणाएँ समानांतर दिखाई देने लगती हैं। एक ओर वह भारतीय परंपरा है, जहाँ न्याय का आधार व्यक्ति का धर्म, उसका कर्म और उसका उत्तरदायित्व है। दूसरी ओर आधुनिक सामाजिक न्याय का वह विमर्श है, जिसमें समूह, प्रतिनिधित्व, ऐतिहासिक वंचना और राज्य की भूमिका केंद्रीय स्थान ग्रहण करती है। इसी बिंदु पर सनातन धर्म के कर्मफल-आधारित न्याय सिद्धांत और आधुनिक सामाजिक न्याय की अवधारणा के बीच मूलभूत वैचारिक अंतर स्पष्ट होकर सामने आता है, और यही अंतर आज भारत के बौद्धिक तथा राजनीतिक विमर्श का एक महत्वपूर्ण आधार बन गया है।

यहाँ एक गंभीर दार्शनिक प्रश्न उत्पन्न होता है। क्या इतिहास में हुए अन्यायों का पूर्ण न्याय वर्तमान में संभव है? जिन लोगों ने अन्याय किया, वे अब जीवित नहीं हैं। जिन लोगों ने अत्याचार सहा, वे भी इस संसार में नहीं हैं। ऐसी स्थिति में इतिहास का प्रतिकार किस सीमा तक और किस प्रकार किया जा सकता है? यह प्रश्न केवल भारत का नहीं, बल्कि समूचे विश्व का है।


इतिहास की पीड़ा को स्वीकार करना और उससे शिक्षा लेना आवश्यक है। किंतु यदि न्याय की प्रक्रिया व्यक्ति से हटकर स्थायी समूहगत पहचान पर आधारित हो जाए, तो समाज में नई प्रकार की वैमनस्यता भी जन्म ले सकती है। इसलिए अनेक दार्शनिक इस बात पर बल देते हैं कि वर्तमान और भविष्य में अन्याय न हो, यह सुनिश्चित करना अधिक महत्वपूर्ण है, बजाय इसके कि वर्तमान पीढ़ियों को अतीत के समस्त नैतिक उत्तरदायित्व का वाहक मान लिया जाए।


सनातन दृष्टि का आग्रह भी यही है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मों के लिए उत्तरदायी है। यदि कोई आज अन्याय करता है, तो उसे आज दंड मिलना चाहिए। यदि कोई आज वंचित है, तो उसके उत्थान के लिए समाज और राज्य को संवेदनशील होना चाहिए। किंतु किसी व्यक्ति का नैतिक मूल्यांकन केवल उसके जन्म, जाति या वंश के आधार पर करना भारतीय न्याय-दृष्टि का मूल सिद्धांत नहीं रहा।


यह भी उतना ही सत्य है कि भारत के इतिहास में अनेक प्रकार की सामाजिक विषमताएँ और अन्याय हुए। उन्हें नकारना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा। किंतु उनका समाधान भी ऐसा होना चाहिए जो समाज को स्थायी रूप से विभाजित न करे, बल्कि परस्पर विश्वास, उत्तरदायित्व और समरसता को सुदृढ़ करे।


भारत के सामने आज केवल अपनी सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा का प्रश्न नहीं है, बल्कि विश्व को एक वैकल्पिक न्याय-दृष्टि देने का ऐतिहासिक अवसर भी है। आज पूरी दुनिया जिस सोशल जस्टिस की अवधारणा से प्रभावित है, उसका मूल आधार समाज को विभिन्न पहचानों में विभाजित करके देखना है। राइट, लेफ्ट और सेंटर की राजनीति से लेकर विश्वविद्यालयों के बौद्धिक विमर्श तक, मनुष्य को किसी-न-किसी पहचान के आधार पर परिभाषित किया जा रहा है। कहीं श्वेत और अश्वेत का संघर्ष है, कहीं पुरुष और महिला का, कहीं उपनिवेशवादी और उपनिवेशित का, कहीं बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक का, तो भारत में जाति को उसी दृष्टि से देखने का प्रयास किया जा रहा है। क्रिटिकल रेस थ्योरी ने जिस प्रकार अमेरिकी समाज को नस्ल के आधार पर समझने का प्रयास किया, उसी प्रकार क्रिटिकल कास्ट थ्योरी भारत को जातियों के स्थायी संघर्ष के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास करती है। परिणाम यह हुआ कि व्यक्ति का मूल्यांकन उसके चरित्र, पुरुषार्थ और कर्म से नहीं, बल्कि उसकी पहचान से होने लगा। समाज में नई-नई पहचानें गढ़ी जा रही हैं, नए-नए संघर्ष खड़े किए जा रहे हैं और युवाओं को समाज-निर्माता के बजाय पहचान-आधारित संघर्षों का योद्धा बनाया जा रहा है। अधिकारों की भाषा निरंतर विस्तृत होती जा रही है, जबकि कर्तव्य, आत्मसंयम और उत्तरदायित्व का स्थान सिकुड़ता जा रहा है। इतिहास के नाम पर वर्तमान समाज को बाँटने का यह क्रम जितना आगे बढ़ेगा, सामाजिक समरसता उतनी ही दुर्लभ होती जाएगी।

यहीं सनातन अथवा वैदिक धर्म का कर्मफल-आधारित न्याय सिद्धांत मानवता के सामने एक बिल्कुल भिन्न मार्ग प्रस्तुत करता है। सनातन धर्म मनुष्य को न जाति मानता है, न वर्ण, न नस्ल, न लिंग और न किसी समूह का स्थायी प्रतिनिधि। वह सबसे पहले उसे आत्मा मानता है। इसलिए सनातन धर्म केवल मत, पंथ, संप्रदाय, मज़हब या रिलिजन नहीं है। वह सृष्टि, जीवन और आत्मा के शाश्वत नियमों का दर्शन है। आत्मा और ब्रह्म का संबंध, पुनर्जन्म का सिद्धांत, कर्मफल का अटल न्याय, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की पुरुषार्थ व्यवस्था, सृष्टि का त्रिगुणात्मक स्वरूप तथा आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक व्यवस्था—ये सब मिलकर ऐसी न्याय-दृष्टि का निर्माण करते हैं जिसमें किसी मनुष्य को उसके जन्म के कारण न स्थायी अपराधी माना जाता है और न स्थायी पीड़ित। प्रत्येक आत्मा अपने कर्मों से अपना भविष्य स्वयं लिखती है। इसलिए यहाँ किसी के पूर्वजों का अपराध किसी दूसरे का अपराध नहीं बनता और किसी के पूर्वजों का पुण्य किसी दूसरे का अधिकार नहीं बनता। न्याय का आधार केवल कर्म है, जन्म नहीं; धर्म है, प्रतिशोध नहीं।

यही कारण है कि सनातन धर्म मनुष्य को अपने भीतर झाँकने की प्रेरणा देता है, दूसरे को दोषी सिद्ध करने की नहीं। वह बताता है कि समाज का परिवर्तन कानून से पहले मनुष्य के भीतर होता है। डाकू रत्नाकर महर्षि वाल्मीकि बन सकते हैं, अंगुलिमाल परिवर्तित हो सकता है, क्योंकि सनातन धर्म किसी आत्मा के लिए परिवर्तन का द्वार कभी बंद नहीं करता। इसके विपरीत यदि समाज का आधार स्थायी पहचानें बन जाएँ, तो संघर्ष भी स्थायी हो जाएगा। फिर प्रत्येक पीढ़ी अपने पूर्वजों के संघर्ष, अपराध और पीड़ाओं का बोझ लेकर जन्म लेगी और समाज कभी समरस नहीं हो सकेगा। यही कारण है कि भारत का भविष्य भी और मानवता का भविष्य भी इस प्रश्न पर निर्भर करेगा कि न्याय का आधार कर्म होगा या पहचान। यदि आधार कर्म होगा, तो मनुष्य अपने जीवन का उत्तरदायित्व स्वयं स्वीकार करेगा; यदि आधार पहचान होगी, तो संघर्ष का कोई अंत नहीं होगा।

आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत अपनी सभ्यतागत दृष्टि को हीनभावना से नहीं, आत्मविश्वास से प्रस्तुत करे। विश्व को केवल आर्थिक मॉडल, राजनीतिक व्यवस्था या तकनीकी प्रगति की आवश्यकता नहीं है; उसे ऐसी न्याय-दृष्टि की आवश्यकता है जो मनुष्य को बाँटे नहीं, जो उसे उसके कर्मों के प्रति उत्तरदायी बनाए, जो अधिकारों के साथ कर्तव्य की भी चर्चा करे, जो प्रकृति को उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि पूज्य माने, जो समाज को संघर्ष नहीं, समरसता की दिशा में ले जाए और जो आत्मा से ब्रह्म तक की यात्रा को जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य माने। यही सनातन धर्म का कर्मफल-आधारित न्याय सिद्धांत है। भारत यदि अपने इस मूल दर्शन को पुनः समझकर विश्व के सामने स्थापित कर सका, तो वह केवल अपने अतीत का गौरव स्मरण नहीं करेगा, बल्कि भविष्य की मानव सभ्यता को भी एक ऐसा मार्ग देगा जहाँ मनुष्य की पहचान उसके जन्म से नहीं, उसके कर्म से होगी; जहाँ संघर्ष का नहीं, सह-अस्तित्व का मार्ग होगा; और जहाँ न्याय का आधार प्रतिशोध नहीं, धर्म होगा।

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