सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

पुणे की घटना और बदलते रिश्तों की सच्चाई



✍️दीपक कुमार द्विवेदी 

सुबह कार्यालय पहुँचा तो रोज़ की तरह काम शुरू होने से पहले हल्की बातचीत चल रही थी। हमारे विभाग के बगल में मानव संसाधन अनुभाग है। वहाँ हमारी वरिष्ठ एचआर अधिकारी एक सहकर्मी से चर्चा कर रही थीं, जिनका विवाह अभी पिछले महीने ही हुआ था। चर्चा पुणे के लोहगढ़ किले की उस घटना पर थी, जिसमें लगभग 600 करोड़ रुपये की संपत्ति के उत्तराधिकारी केतन अग्रवाल की हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया। वरिष्ठ अधिकारी का प्रश्न बहुत सरल था "यदि साथ नहीं रहना था तो मना कर देती, हत्या क्यों?"

मैं अपनी मेज़ पर बैठा उनकी बातें सुन रहा था। मेरे चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। यह मुस्कान किसी घटना पर नहीं, बल्कि उस विडंबना पर थी कि जिस विषय पर मैं वर्षों से लिखता आया हूँ, वही आज सामान्य कार्यालयी चर्चा का विषय बन चुका था। मुझे कुछ दिन पहले एक स्वाध्यायी बड़े भाई की बात याद आई। उन्होंने कहा था—"यदि भारतीय परिवार टूटे, तो समझना कि केवल सामाजिक परिवर्तन नहीं हुआ, बल्कि सभ्यता की नींव हिलने लगी है।"

पुणे की घटना के बाद सोशल मीडिया पर उससे भी अधिक विचित्र दृश्य दिखाई दिया। अपराध की चर्चा कम हुई, अपराधी की जिम्मेदारी कम करने की कोशिश अधिक हुई। एक नया तर्क सामने आया "लड़की तो अपने प्रेम के लिए यह सब कर रही थी, असली दोष तो उस पुरुष का है जिसने हत्या की।"

यहीं से प्रश्न केवल अपराध का नहीं, विचार का हो जाता है।

यदि कोई वयस्क महिला प्रेम कर सकती है, उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकती है, नौकरी कर सकती है, करोड़ों की संपत्ति का प्रबंधन कर सकती है, मतदान कर सकती है, विवाह कर सकती है, तलाक ले सकती है और अपने जीवन के स्वतंत्र निर्णय ले सकती है, तो क्या अपराध में उसकी भूमिका की जिम्मेदारी भी उसी की नहीं होगी? यदि उत्तर "नहीं" है तो यह समानता नहीं, संरक्षणवाद है। यह महिला का सम्मान नहीं, उसकी नैतिक क्षमता का अपमान है।

आज समाज में एक ऐसी विचारधारा भी दिखाई देती है जिसे मैं विषैला फेमिनिज्म कहता हूँ। इसका अर्थ महिला अधिकारों की लड़ाई नहीं है। भारतीय परंपरा तो गार्गी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा और अहिल्याबाई की परंपरा है, जहाँ स्त्री ज्ञान, शक्ति और नेतृत्व का प्रतीक है। वास्तविक महिला सशक्तिकरण शिक्षा, सम्मान, सुरक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता और निर्णय क्षमता का विस्तार करता है।

विषैला फेमिनिज्म उससे अलग है। वह हर परिस्थिति को स्त्री बनाम पुरुष संघर्ष में बदल देता है। उसमें स्त्री कभी उत्तरदायी नागरिक नहीं होती, वह हमेशा पीड़िता होती है। यदि सफलता मिले तो वह उसकी स्वतंत्रता का परिणाम है, लेकिन यदि अपराध हो जाए तो दोष किसी पुरुष, परिवार, समाज या व्यवस्था पर डाल दिया जाता है। समान अधिकार की माँग के साथ समान उत्तरदायित्व स्वीकार नहीं किया जाता।

पुणे की घटना के बाद यही प्रवृत्ति दिखाई दी। सोशल मीडिया पर अनेक लोगों ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि हत्या का वास्तविक दोष उस पुरुष का है जिसने हत्या की, जबकि महिला केवल प्रेम में बह गई थी। यह तर्क न्यायशास्त्र, नैतिकता और सामान्य बुद्धि तीनों की कसौटी पर कमजोर पड़ता है।

यदि कोई व्यक्ति हत्या की योजना बनाता है, षड्यंत्र रचता है, दूसरे व्यक्ति को बुलाता है, घटना को दुर्घटना का रूप देने का प्रयास करता है, तो उसे केवल इसलिए कम उत्तरदायी नहीं माना जा सकता क्योंकि वह महिला है। ऐसा करना महिलाओं की स्वायत्तता को ही नकारना है।

यह प्रवृत्ति अकेली नहीं चल रही। इसके साथ एक दूसरी शक्ति भी समानांतर दिखाई देती है—उपभोक्तावाद और अति-भौतिकतावाद। बाज़ार को सबसे अधिक आवश्यकता स्वतंत्र उपभोक्ता की होती है। संयुक्त परिवार साझा संसाधनों पर चलता है, जबकि विखंडित परिवार अनेक स्वतंत्र उपभोक्ता तैयार करता है। एक परिवार चार परिवार बनता है तो चार घर, चार गाड़ियाँ, चार रसोइयाँ, चार बीमा योजनाएँ, चार ऋण और चार उपभोग चक्र बनते हैं। इसलिए परिवार का कमजोर होना केवल सामाजिक घटना नहीं, आर्थिक संरचना को भी प्रभावित करता है।

समाजशास्त्री रॉबर्ट डी. पुटनम ने Bowling Alone में सामाजिक पूँजी के क्षरण पर विस्तार से लिखा है। फ्रांसिस फुकुयामा ने Trust में स्पष्ट किया कि किसी भी समाज की वास्तविक शक्ति पारस्परिक विश्वास और मजबूत परिवार हैं। एमिल दुर्खीम ने सामाजिक विघटन और एकाकीपन को मानसिक संकटों से जोड़ा। जोनाथन हैइट ने डिजिटल संस्कृति के कारण युवाओं में बढ़ते अकेलेपन और चिंता पर गंभीर प्रश्न उठाए हैं। इन सब अध्ययनों का सार यही है कि जब परिवार कमजोर होते हैं तो समाज की आंतरिक शक्ति भी कमजोर होने लगती है।

भारत में भी यह परिवर्तन दिखाई दे रहा है। संयुक्त परिवार तेजी से घट रहे हैं। वृद्धाश्रम बढ़ रहे हैं। पारिवारिक विवादों से जुड़े अपराध और आत्महत्याएँ चिंता का विषय हैं। संबंधों में धैर्य कम और तात्कालिक निर्णय अधिक दिखाई दे रहे हैं। सोशल मीडिया ने तुलना, त्वरित आकर्षण और निरंतर विकल्पों की संस्कृति को सामान्य बना दिया है।

यही वह वातावरण है जहाँ परंपरा को पिछड़ापन, विवाह को बंधन, मातृत्व को बाधा और त्याग को मूर्खता बताने वाले विमर्श लोकप्रिय होते हैं। संघर्ष सहयोग से बड़ा दिखाई देने लगता है। अधिकार दायित्व से अलग हो जाते हैं। व्यक्ति परिवार से बड़ा हो जाता है और इच्छा संस्कार से।

पुणे की घटना को केवल एक हत्या मानना इसलिए पर्याप्त नहीं है। लगभग 600 करोड़ रुपये की संपत्ति के उत्तराधिकारी केतन अग्रवाल की मृत्यु यह भी बताती है कि आर्थिक समृद्धि चरित्र, विश्वास और संस्कार का विकल्प नहीं बन सकती। करोड़ों की संपत्ति भी उस व्यक्ति को सुरक्षित नहीं रख सकी जो अपने सबसे निकट के संबंध पर विश्वास कर रहा था।

समाज को आज एक कठिन प्रश्न का सामना करना होगा। क्या हम ऐसी समानता चाहते हैं जिसमें अधिकार तो समान हों लेकिन उत्तरदायित्व अलग-अलग हों? क्या हम ऐसी आधुनिकता चाहते हैं जिसमें परिवार केवल कानूनी व्यवस्था बनकर रह जाए और विश्वास का कोई मूल्य न बचे? क्या हम ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ हर संबंध सुविधा से चले और हर संकट का दोष किसी दूसरे पर डाल दिया जाए?

महिला सशक्तिकरण का अर्थ महिलाओं को जिम्मेदारी से मुक्त करना नहीं, बल्कि उन्हें पूर्ण नैतिक, सामाजिक और नागरिक व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार करना है। और न्याय का अर्थ किसी पक्ष का समर्थन नहीं, बल्कि कर्म के आधार पर उत्तरदायित्व तय करना है।

आज आवश्यकता किसी एक घटना पर क्षणिक आक्रोश व्यक्त करने की नहीं, बल्कि परिवार, विश्वास, उत्तरदायित्व और सांस्कृतिक मूल्यों पर गंभीर राष्ट्रीय संवाद की है। क्योंकि जिस दिन समाज अपराध से अधिक अपराधी की वैचारिक सफाई देने लगेगा, उस दिन समझ लेना चाहिए कि संकट केवल कानून का नहीं, चेतना का भी हो चुका है।

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