सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

पहचान की राजनीति या समाज को तोड़ने की परियोजना?

उस बंदे ने झूठ नहीं कहा है।

वह एक परियोजना है। 

ध र्म अं त र ण के षड्यंत्रकारियों ने पहले वनवासियों को लक्ष्य बनाया। फिर अनुसूचित जातियों को और अब उनके द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग निशाने पर लिये गये हैं। 

जरा इस पैटर्न का राज्यों में बारीक अध्ययन कीजिए। 

कैसे इन दिनों अन्य पिछड़ा वर्गों को अनुसूचित जातियों से गड्ड मड्ड करने की रणनीति पर काम हो रहा है। 

कुछ राज्यों में देखिये कि OBC के लोग कैसे क न् व र्ट हो रहे हैं।

यादवों को बतलाया जा रहा है कि वे हिन्दू नहीं हैं। उत्तर प्रदेश में यादव समाज — जो संख्या में विशाल और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली है — में एक विशेष नैरेटिव चलाया जा रहा है। यह कहा जा रहा है कि कृष्ण को वेदों में असुर कहा गया है। इसलिए यदुवंशी वैदिक हिन्दू नहीं हैं। इस नैरेटिव को मजबूत करने के लिए कुछ हिन्दी फिल्म, कुछ यूट्यूब चैनल, कुछ पत्रिकाएँ और कुछ NGOs काम कर रहे हैं। यादवों को एक मि श न यह समझाने में लगा है ताकि यादव समाज अपनी हिन्दू पहचान से विमुख हो। 

जाटों को बतलाया जा रहा है कि वे हिन्दू नहीं हैं। जाट समाज में एक ऐसा नैरेटिव चलाया जा रहा है जिसमें उन्हें बताया जाता है कि वे "original Hindus" नहीं। उनकी किसान पहचान, उनकी योद्धा परम्परा और उनकी क्षेत्रीय गर्व को लेकर एक अलग cultural identity में convert करने की कोशिश है। किसान आंदोलन के दौरान यह पैटर्न विशेष रूप से दिखाई पड़ रहा था जहाँ कुछ बाहरी ताकतों ने जाट आन्दोलन को एक anti-state और anti-Hindu direction देने का प्रयास किया।

झारखण्ड में "सरना धर्म" आन्दोलन वनवासी समाज को हिन्दू धर्म से काटने का सबसे organized प्रयास है। जनगणना में सरना को एक अलग धार्मिक code देने की माँग की जा रही है। सरना एक sacred grove है। वह पवित्र वृक्षस्थल जिसके पेड़ों को काटा नहीं जा सकता। ऐसे sacred grove भारत में कई अंचलों में है। पर सरना धर्म की तरह उसका नया धर्म बनाने की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। कल को इस तर्क से यह राजस्थान में ओरण धर्म चलाने का प्रयास करते मिलेंगे। इससे वनवासी समाज की जनसांख्यिकीय गणना में हिन्दुओं की संख्या घटेगी और धर्म अ न्त र ण को और legal cover मिलेगा ।

केरल और तमिलनाडु में OBC जातियों — Ezhava, Nadar, Vanniyar आदि — में एक ऐसा नैरेटिव चलाया जाता रहा है जिसमें उनकी पीड़ा को हिन्दू सवर्णों के विरुद्ध एक perpetual conflict के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। पेरियार की विरासत को इस तरह interpret किया गया है कि हिन्दू धर्म का विरोध ही सामाजिक न्याय है। इससे एक बड़ा OBC वर्ग इस क्षेत्र में धर्मान्तरण के लिए vulnerable बना है।

पंजाब में दलित सिख और हिन्दू दलित के बीच एक अनावश्यक दरार बनाने का प्रयास निरन्तर जारी है। डेरा culture को सिख मुख्यधारा और हिन्दू मुख्यधारा दोनों से काटकर एक अलग पहचान बनाने की कोशिश है जो आगे ध र्म अं त र ण के लिए उर्वर जमीन बने।

वे हमेशा आ तं क के कव्हर फायर का प्रयोग करते रहे हैं। 

जहाँ जहाँ फैले वहाँ नक्सल या खालिस्तान या इन्सर्जेंसी की पृष्ठभूमि रही। 

षड्यंत्र कभी खुले मैदान में नहीं लड़ता। उसे एक smokescreen चाहिए, एक ऐसी परिस्थिति जिसमें राज्य का ध्यान बँटा रहे, सुरक्षा तन्त्र थका रहे, और नागरिक समाज भयभीत रहे। इसी भूमिका में आतङ्क, नक्सलवाद, खालिस्तान और पूर्वोत्तर की insurgency "कव्हर फायर" का काम करती है।

यह pattern भौगोलिक रूप से सत्यापन योग्य है।

पूर्वोत्तर भारत — जहाँ मि श न री अ न्त र ण सर्वाधिक सफल रहा — वहाँ दशकों तक सशस्त्र उग्रवाद (ULFA, NSCN, BODO आदि) की पृष्ठभूमि रही। राज्य की समस्त ऊर्जा सुरक्षा पर खर्च होती रही, सांस्कृतिक घुसपैठ का प्रतिरोध नहीं हो सका।

झारखण्ड, छत्तीसगढ़, ओडिशा — जहाँ वनवासी ध र्म अन्त रण का दूसरा बड़ा केन्द्र रहा — वहाँ नक्सलवाद ने दशकों तक "red corridor" बनाए रखा। नक्सल आन्दोलन ने वनवासी समाज को राज्य के विरुद्ध संगठित किया, जिससे पारम्परिक सामाजिक और धार्मिक नेतृत्व कमजोर पड़ा और अन्त रण की राह सुगम हुई।

पंजाब — जहाँ खालिस्तान आन्दोलन ने 1980-90 के दशक में भारतीय राज्य को झकझोर दिया — वहाँ Sikh identity को Hindu civilizational संदर्भ से काटने का प्रयास उसी काल में सबसे तीव्र था।

कश्मीर — जहाँ आतङ्कवाद की आड़ में पण्डितों का निष्कासन हुआ — वहाँ एक पूरी हिन्दू उपस्थिति को मिटा दिया गया।

यह संयोग नहीं है। यह pattern है। जहाँ-जहाँ धर्म अन्त रण और सांस्कृतिक विस्थापन की परियोजना को गहरा करना था, वहाँ-वहाँ पहले एक ऐसा सुरक्षा संकट खड़ा किया गया जो राज्य को अन्य कार्यों से विमुख करे। कव्हर फायर का तात्पर्य यही है — जब आगे से गोलीबारी हो, तो पार्श्व से घुसपैठ होती है।

अन्य न आ पाएँ इसलिये seclusion की एक climate निर्मित की जाती रही है। 

पृथकतावादी मानसिकता की मैन्युफैक्चरिंग पर ध्यान दें। 

यह परियोजना केवल किसी व्यक्ति को एक धर्म से दूसरे धर्म में ले जाने की प्रक्रिया नहीं है। उससे पहले एक दीर्घकालिक सांस्कृतिक प्रक्रिया चलती है जिसे "seclusion की climate" कहा जा सकता है। इसका अर्थ है — लक्ष्य समूह को उसके मूल समाज से काट देना, उसके चारों ओर एक ऐसा घेरा बना देना जिसमें बाहरी विचार, बाहरी संस्कृति और बाहरी व्यक्ति न आ सकें।

इस seclusion के अनेक स्तर हैं।

भौगोलिक seclusion : वनवासी और दूरस्थ क्षेत्रों में NGO networks इस तरह काम करती हैं कि अन्य सामाजिक कार्यकर्ता, हिन्दू संगठन या सरकारी अधिकारी आसानी से नहीं पहुँच सकते। उन क्षेत्रों में एक ऐसा माहौल बनाया जाता है जहाँ "बाहरी लोग" — विशेषतः हिन्दू सांस्कृतिक कार्यकर्ता — को संदेह की दृष्टि से देखा जाए।

सूचना seclusion : लक्ष्य समूह को एक विशेष narrative में रखा जाता है। उन्हें वही जानकारी दी जाती है जो उनके मूल समाज से उनकी दूरी बढ़ाए। हिन्दू धर्म के बारे में केवल नकारात्मक, विकृत या अतिरञ्जित जानकारी दी जाती है। संतों, आचार्यों और परम्परा की सकारात्मक व्याख्याएँ उन तक नहीं पहुँचने दी जातीं।

भावनात्मक seclusion : लक्ष्य व्यक्ति को यह अनुभव कराया जाता है कि उसके "अपने समाज" ने उसे अस्वीकार किया है, उसका शोषण किया है। यह भावना — चाहे वास्तविक हो या आरोपित — एक emotional void बनाती है जिसे फिर नए धर्म की "स्वीकृति" और "प्रेम" से भरा जाता है।

सांस्थानिक seclusion : school, hospital, orphanage, marriage bureau — इन सभी सेवा संस्थाओं के माध्यम से एक ऐसा ecosystem तैयार किया जाता है जिसमें लाभार्थी का समस्त जीवन उन्हीं संस्थाओं पर निर्भर हो जाता है। इस निर्भरता में धर्मान्तरण का दबाव — कभी प्रत्यक्ष, कभी अप्रत्यक्ष — सदा विद्यमान रहता है।

यह seclusion की climate पृथकतावादी मानसिकता की manufacturing का पहला चरण है।

एक बार जब seclusion की climate तैयार हो जाती है, तो पृथकतावादी मानसिकता की manufacturing आरम्भ होती है। यह एक मनोवैज्ञानिक और वैचारिक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति या समूह को यह विश्वास दिलाया जाता है कि वह अपने मूल समाज, मूल राष्ट्र और मूल संस्कृति से स्वाभाविक रूप से "अलग" है।

इस manufacture के उपकरण अनेक हैं।
इतिहास का पुनर्लेखन : प्रत्येक समुदाय के लिए एक अलग "इतिहास" गढ़ा जाता है जिसमें यह सिद्ध किया जाए कि वे मूल रूप से हिन्दू नहीं थे। यादवों को बताया जाता है कि वे "अहीर जाति" हैं जिनका हिन्दू वर्ण व्यवस्था से कोई सम्बन्ध नहीं। जाटों को बताया जाता है कि वे "Central Asia से आए योद्धा" हैं जिनकी अपनी पृथक सांस्कृतिक पहचान है। गुर्जरों को कोई और कहानी। कुर्मियों को कोई और।

यह इतिहास प्रायः अर्ध-सत्य पर आधारित होता है। जातियों की उत्पत्ति सम्बन्धी अनेक विवाद वास्तविक भी हैं। किन्तु इन विवादों को जिस राजनीतिक उद्देश्य से उठाया जाता है वह पूर्णतः निर्धारित है — हिन्दू samaj की एकता को खण्डित करना।

भाषा और नामकरण का राजनीतिकरण : "आदिवासी" शब्द को "वनवासी" के विरुद्ध खड़ा करना एक सुचिन्तित भाषाई राजनीति है। "आदिवासी" का तात्पर्य है — वे जो सबसे पहले यहाँ थे, अर्थात् जिनकी भूमि बाकी हिन्दुओं ने "छीनी"। यह शब्द स्वयं में एक conflict narrative का बीज है। इसी प्रकार विभिन्न OBC जातियों के लिए उनके non-Hindu मूल को प्रमाणित करने वाले नामों और प्रतीकों को popularize किया जाता है।

आरक्षण की राजनीति का दुरुपयोग : SC, ST और OBC के बीच reservation के अधिकारों को लेकर एक सुनियोजित तनाव खड़ा किया जाता है। इससे एक ओर OBC और SC में आपसी शत्रुता बढ़ती है, दूसरी ओर दोनों वर्गों में यह धारणा बलवती होती है कि हिन्दू सवर्ण समाज उनका शत्रु है।

popular culture में घुसपैठ : films, OTT series, songs, social media influencers — इन सब के माध्यम से एक ऐसा cultural product तैयार किया जाता है जिसमें हिन्दू परम्पराओं, त्योहारों और प्रतीकों को नकारात्मक रूप से, और पृथकतावादी पहचान को सकारात्मक रूप से प्रस्तुत किया जाता है।

इसे पृथक्करण के स्ट्रक्चर्स वैधानिकता देते हैं।बाल्कनाइज़ेशन की यह परियोजना केवल ideas के स्तर पर नहीं चलती। इसके ठोस structural foundations हैं जो वर्षों के प्रयासों से निर्मित हुए हैं। ये विधिक structures भी हैं। Minorities Commission, SC/ST Commissions, OBC Commission के माध्यम से एक ऐसी precedent-setting की जाती है जिसमें प्रत्येक समूह का राज्य से सम्बन्ध उसकी group identity के आधार पर निर्धारित होता है। समान नागरिक संहिता का विरोध इसी का विस्तार है — क्योंकि यदि एक common citizenship law आए तो religious group के आधार पर विशेष अधिकारों का ढाँचा टूट जाए।न अमेरिका के पास राष्ट्रीय और राज्य अल्पसंख्यक आयोग हैं और न दुनिया के किसी अन्य देश ने उसकी ऐसी विस्तृत संरचनाएँ निर्मित की हैं। सिर्फ पाकिस्तान और बांग्लादेश में toothless किस्म के अल्पसंख्यक आयोग हैं। दक्षिण अफ्रीका में है पर अपने स्ट्रक्चर, फोकस और पावर्स में भारत के दूर दूर तक नज़दीक नहीं।

NGO structures : India में foreign-funded NGOs का एक vast network है जो इन समुदायों के बीच काम करता है। इनमें से अनेक genuinely सेवाभावी हैं। किन्तु कुछ एक ऐसे agenda से संचालित हैं जो सेवा की आड़ में seclusion और conversion का काम करते हैं। FCRA के अन्तर्गत इनकी funding patterns का analysis करें तो pattern स्पष्ट होता है।

Academic structures : Ambedkar Studies Centres, Tribal Studies Departments, Minority Studies Programmes — इन academic institutions में एक विशेष ideological orientation को promote किया जाता है जिसमें हिंदू को oppressor और इन समुदायों को perpetual victim के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इस नैरेटिव का प्रभाव युवा शिक्षित OBC और SC पर गहरा पड़ता है।

Media structures : कुछ खास media outlets और सोशल मीडिया networks का उपयोग इन समुदायों के बीच specifically designed content deliver करने के लिए किया जाता है।Algorithm-driven सोशल मीडिया पर यह और भी targeted हो गया है।

पहले भारतीय राज्य के बाल्कनाइजेशन की कोशिश की जा रही थी और एक क्षेत्रवादी एप्रोच थी। 

पर फिर पहचाना गया कि यह भारतीय राज्य अपने भारतीय समाज के साथ एक विशिष्ट किस्म का सम्बन्ध रखता है। 

तब भारतीय समाज को निशाने पर ले लिया गया है। पहले राज्य से ही पृथक्करण की संरचनाएँ तैयार करवा के उनकी पृथकता की विधिक और व्यावहारिक श्रेणियाँ निर्मित करवा ली गईं हैं। 

और जाति की संरचना भारतीय समाज से बाल्कनाइजेशन के लिए एक रेडीमेड मैटीरियल है। 

प्रारम्भ में यह परियोजना भारतीय राज्य के बाल्कनाइज़ेशन पर केन्द्रित थी। लक्ष्य था — भौगोलिक खण्डीकरण। पूर्वोत्तर अलग हो, पंजाब अलग हो, कश्मीर अलग हो। यह एक क्षेत्रवादी approach था जिसमें राज्य की सीमाओं को तोड़ना प्रमुख उद्देश्य था। इस दिशा में कुछ आंशिक सफलताएँ भी मिलीं — पूर्वोत्तर में ई सा ई बहुल राज्यों का निर्माण, कश्मीर में हिन्दू उपस्थिति का सफाया।

किन्तु भारतीय राज्य की एक विशेषता है जो इसे अन्य colonial states से भिन्न बनाती है। भारतीय राज्य और भारतीय समाज के बीच एक गहरा, जैविक सम्बन्ध है। भारतीय समाज की विविधता, उसकी जाति-संरचनाएँ, उसकी आंचलिक पहचानें — ये सब राज्य की governance में परिलक्षित होते हैं।भारत में कोई भी राजनीतिक आन्दोलन समाज की जड़ों से काटकर सफल नहीं हो सकता।यह पहचाना गया। तब रणनीति बदली।अब सीधे भारतीय समाज को निशाना बनाया जाने लगा। राज्य को तोड़ने की कोशिश के बजाय समाज की आन्तरिक एकता को तोड़ने पर ध्यान केन्द्रित हुआ। और इसके लिए एक बहुत चतुर approach अपनाई गई — पहले राज्य से ही पृथक्करण की संरचनाएँ तैयार करवाना।

इसका अर्थ है — SC के लिए पृथक आरक्षण, ST के लिए पृथक वन अधिकार, अल्पसंख्यकों के लिए पृथक पर्सनल लॉ, विभिन्न जातियों के लिए पृथक आयोग— इन सबको एक ऐसे फ्रेमवर्क में प्रस्तुत करना जिसमें प्रत्येक समूह राज्य से केवल अपनी पृथक पहचान के आधार पर सम्बन्ध रखे, न कि एक common Indian citizen की पहचान से।

इस प्रकार राज्य स्वयं — भले ही अनजाने में — पृथकता की विधिक और व्यावहारिक श्रेणियाँ निर्मित करता रहा। और जब ये श्रेणियाँ एक बार legal reality बन गईं, तो उनका उपयोग समाज को तोड़ने के लिए होने लगा।

भारतीय समाज को बाल्कनाइज़ करने के लिए सबसे उपयुक्त raw material क्या है? जाति।

जाति की संरचना में वे सभी तत्त्व विद्यमान हैं जो किसी भी बाल्कनाइज़ेशन project के लिए आवश्यक हैं —

अन्तर्विवाही इकाइयाँ : प्रत्येक जाति एक endogamous unit है। इसका तात्पर्य है कि उसकी सामाजिक सीमाएँ पहले से निर्धारित हैं। इन सीमाओं को केवल थोड़ा और कठोर, थोड़ा और राजनीतिक बनाने की आवश्यकता है।

ऐतिहासिक शिकायतें : प्रायः प्रत्येक जाति के पास एक ऐसा इतिहास है जिसमें किसी न किसी रूप में उसके साथ अन्याय हुआ है। इन शिकायतों को selective रूप से उठाकर एक grievance politics तैयार की जाती है।

पृथक सांस्कृतिक प्रतीक : प्रत्येक जाति के अपने देवता, अपनी परम्पराएँ, अपने त्योहार हैं। इन्हें हिन्दू mainstream से "अलग" प्रस्तुत करके एक पृथक cultural identity का निर्माण किया जा सकता है।

संख्याबल : भारत में OBC जातियाँ संख्या में इतनी बड़ी हैं कि यदि वे अपनी-अपनी पृथक पहचान पर केन्द्रित हो जाएँ तो हिन्दू समाज की collective political power नगण्य हो जाए।

यही कारण है कि बाल्कनाइज़ेशन की इस परियोजना में जाति एक ready-made material की भूमिका निभाती है। उसे नए सिरे से बनाने की आवश्यकता नहीं — केवल उसकी मौजूदा दरारों को चौड़ा करना है।

भारतीय समाज की शक्ति उसकी विविधता में है। यादव हैं, जाट हैं, वनवासी हैं, दलित हैं, ब्राह्मण हैं, क्षत्रिय हैं, वैश्य हैं — यह सब भारत की सम्पदा है। किन्तु इस विविधता का अर्थ विघटन नहीं है। गङ्गा में अनेक धाराएँ आकर मिलती हैं — वे अपनी विशेषता नहीं खोतीं, किन्तु एक महानदी का हिस्सा बन जाती हैं।

बाल्कनाइज़ेशन की यह परियोजना उन धाराओं को गङ्गा से काटकर उन्हें अलग-अलग तालाबों में बन्द कर देना चाहती है — जहाँ वे न तो स्वतन्त्र बहें, न किसी बड़े प्रवाह का हिस्सा बनें।

भारतीय समाज की आत्मरक्षा के लिए आवश्यक है कि वह इस pattern को पहचाने। सतर्कता बिना भय के। प्रतिरोध बिना घृणा के। और एकता — एक ऐसी एकता जो विविधता को नहीं, विघटन को अस्वीकार करे।
यही भारत की सनातन शक्ति है, और यही उसके भविष्य की नींव है।

नैरेटिव का मुकाबला नैरेटिव से करना सबसे आवश्यक है। OBC, SC, ST समाजों के भीतर उनकी हिन्दू civilizational पहचान को समृद्ध, गौरवशाली और inclusive रूप में प्रस्तुत करना होगा। यादव अपनी कृष्ण-परम्परा में हैं। जाट अपनी शिव-भक्ति परम्परा में हैं। वनवासी अपनी प्रकृति-पूजा की परम्परा में हैं। ये सब हिन्दू civilizational umbrella के organic अंग हैं — इस बात को scholarly, cultural और popular सभी स्तरों पर प्रमाणित और प्रचारित करना होगा।

legal framework को मजबूत करना बहुत जरूरी हो गया है। Anti-conversion laws, FCRA का कड़ा क्रियान्वयन, foreign funding की transparency — ये सब आवश्यक है। किन्तु केवल कानून पर्याप्त नहीं है। कानून की पहुँच वहाँ तक नहीं जाती जहाँ seclusion का वातावरण है।

एक intellectual counterforce चाहिए। OBC और SC समाजों के भीतर से ऐसे intellectuals और leaders को प्रोत्साहित करना जो इस परियोजना को पहचानें और अपने समाज को समझाएँ। बाहर से आई awakening स्थायी नहीं होती — भीतर से उठी चेतना ही टिकाऊ होती है।


मनोज श्रीवास्तव

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