सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि और आत्ममंथन का अवसर





आज भारत के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि कौन सत्ता में है और कौन विपक्ष में। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जिस समाज ने रामराज्य का स्वप्न देखा, जिसने धर्म, कर्तव्य, मर्यादा और त्याग को जीवन का आधार बनाया, वही समाज आज सुविधा, संग्रह और स्वार्थ को सफलता का पर्याय क्यों मानने लगा है। भ्रष्टाचार केवल शासन की समस्या नहीं है। यह समाज के चरित्र का दर्पण है। नेता उसी समाज से निकलते हैं, अधिकारी उसी समाज से आते हैं, न्यायाधीश, शिक्षक, व्यापारी और पत्रकार भी उसी समाज की उपज हैं। समाज जैसा होगा, वैसा ही राष्ट्र बनेगा।

23 जून का दिन इसी कारण केवल एक पुण्यतिथि नहीं, आत्मपरीक्षण का दिन है। इसी दिन डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। वे पंडित जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री थे, पर जब उन्हें लगा कि राष्ट्रहित से बड़ा कोई पद नहीं हो सकता, तब उन्होंने बिना किसी संकोच के मंत्री पद छोड़ दिया। कश्मीर के प्रश्न पर उन्होंने सत्ता से समझौता नहीं किया। "एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे" यह उनके लिए केवल उद्घोष नहीं था, जीवन का संकल्प था। उसी संकल्प की रक्षा करते हुए उन्होंने अपने प्राण राष्ट्र को समर्पित कर दिए। आज भी भारतीय राजनीति में ऐसे उदाहरण दुर्लभ हैं जहाँ किसी व्यक्ति ने पद छोड़कर सिद्धांत को चुना हो।

डॉ. हेडगेवार से लेकर परम पूजनीय गुरुजी, बालासाहेब देवरस, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, नानाजी देशमुख और आज डॉ. मोहन भागवत तक एक निरंतर परंपरा दिखाई देती है। यह परंपरा सत्ता की नहीं, समाज की है। यह संग्रह की नहीं, समर्पण की है। लाखों कार्यकर्ताओं और हजारों प्रचारकों ने अपना पूरा जीवन हिंदू समाज के संगठन और राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पित कर दिया। किसी ने अपने परिवार को आगे बढ़ाने के लिए सार्वजनिक जीवन का उपयोग नहीं किया। किसी ने संपत्ति को सफलता का मापदंड नहीं बनाया। यही उस विचार की सबसे बड़ी शक्ति रही है।

इसी कारण भारतीय जनता पार्टी की तुलना कांग्रेस से करना उसके मूल स्वरूप को समझे बिना की गई चर्चा है। हमारे आदर्श कांग्रेस नहीं हो सकती। हमारे आदर्श त्याग की वह परंपरा है जिसने पद से अधिक सिद्धांत को महत्व दिया। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय और नानाजी देशमुख ने अपने जीवन से यही संदेश दिया कि विचार केवल भाषणों से नहीं, आचरण से जीवित रहता है।

इसीलिए 23 जून को जब इंडियन एक्सप्रेस में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और उनके परिवार से संबंधित भूमि क्रय पर विस्तृत समाचार प्रकाशित हुआ तो प्रश्न केवल एक मुख्यमंत्री का नहीं था। प्रश्न यह था कि जिस विचार की नींव त्याग पर रखी गई, उसके प्रतिनिधियों का आचरण भी उसी ऊँचाई का होना चाहिए या नहीं। आरोपों की सत्यता का निर्णय जाँच और प्रमाण करेंगे, पर सार्वजनिक जीवन में नैतिकता का निर्णय समाज करता है। विचार की सबसे बड़ी परीक्षा विपक्ष में नहीं, सत्ता में होती है।

नरेंद्र मोदी की स्वीकार्यता का कारण केवल चुनावी विजय नहीं है। दो दशकों से अधिक सार्वजनिक जीवन में उन्होंने निजी परिवार को सत्ता का माध्यम नहीं बनने दिया। योगी आदित्यनाथ का जीवन भी व्यक्तिगत संग्रह से अधिक अनुशासन और संयम का प्रतीक माना जाता है। इसलिए समाज उनसे सामान्य राजनीति से अधिक नैतिक अपेक्षा रखता है। जहाँ आदर्श ऊँचे होते हैं, वहाँ उत्तरदायित्व भी ऊँचा होता है।

किन्तु यदि हम केवल नेताओं की चर्चा करें तो हम अपने अपराध से बच नहीं सकते। कटु सत्य यह है कि आज समाज नेताओं से अधिक नैतिक रूप से दुर्बल हो चुका है। भ्रष्टाचार केवल शासन में नहीं है, वह लोगों की नसों में रक्त की तरह प्रवाहित हो रहा है। सड़क पर किसी का गिरा हुआ नोट दिखाई दे तो उसे लौटाने वालों से अधिक उसे जेब में रखने वाले मिल जाएँगे। किसी कार्यालय में बिना धन दिए कार्य हो जाए तो लोग आश्चर्य करते हैं। सरकारी कार्यालयों में सुविधा शुल्क सामान्य व्यवहार बन चुका है। जन्म प्रमाण पत्र से लेकर भूमि अभिलेख तक, भवन अनुज्ञा से लेकर ठेके तक, प्रत्येक स्तर पर अनुचित लेन-देन की चर्चा सामान्य बात है। जो रिश्वत लेता है, वह भी इसी समाज का व्यक्ति है और जो रिश्वत देकर अपना कार्य कराता है, वह भी इसी समाज का ही सदस्य है।

आज प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी करने वाले अनेक युवाओं की चर्चाएँ सुनिए। पहले देश सेवा, समाज सेवा और परिवर्तन की बात होती थी। अब अनेक स्थानों पर चर्चा इस बात की होती है कि कौन-सा विभाग अधिक लाभ देगा, कहाँ अधिक प्रभाव मिलेगा और कहाँ अतिरिक्त आय की संभावना है। जब सेवा का लक्ष्य सुविधा बन जाए तो व्यवस्था में शुचिता कहाँ से आएगी?

हम रामराज्य की सबसे अधिक चर्चा करते हैं, पर व्यवहार में रावणराज को सबसे अधिक सम्मान देते हैं। जिस व्यक्ति पर गंभीर आपराधिक प्रकरण हों, वह भी चुनाव जीत जाता है। जिस पर भ्रष्टाचार के प्रश्न हों, उसके स्वागत में पुष्पवर्षा होती है। धन चाहे जैसे अर्जित किया गया हो, यदि वैभव है तो समाज सम्मान देता है। दूसरी ओर धर्मनिष्ठ, सत्यनिष्ठ और सादगीपूर्ण जीवन जीने वाले व्यक्ति को लोग अव्यावहारिक, पिछड़ा या मूर्ख कहकर उपहास का विषय बना देते हैं। यह राजनीति का नहीं, समाज के मूल्यबोध का संकट है।

अंग्रेजों के आने से पहले भारतीय समाज की सबसे बड़ी शक्ति राज्य नहीं था, समाज स्वयं था। गाँव की सभा, परिवार की मर्यादा और सामाजिक प्रतिष्ठा इतनी प्रभावी थी कि चोरी करने वाला, विश्वासघात करने वाला या अधर्म करने वाला व्यक्ति समाज में सम्मान खो देता था। सामाजिक बहिष्कार किसी भी राजदंड से अधिक कठोर माना जाता था। व्यक्ति न्यायालय से कम और समाज की दृष्टि से अधिक भयभीत रहता था। इसलिए समाज स्वयं अपने चरित्र की रक्षा करता था।

स्वतंत्रता के बाद राज्य-केंद्रित समाजवाद ने धीरे-धीरे समाज की इस शक्ति को दुर्बल किया। प्रत्येक विषय में शासन पर निर्भरता बढ़ी। साथ ही औपनिवेशिक शिक्षा पद्धति ने चरित्र निर्माण के स्थान पर केवल रोजगार को शिक्षा का उद्देश्य बना दिया। बच्चों को कर्तव्य से अधिक अधिकार सिखाए गए, सेवा से अधिक प्रतियोगिता सिखाई गई, लोकधर्म से अधिक व्यक्तिगत सफलता का महत्व बताया गया। परिणाम यह हुआ कि शिक्षित लोग बढ़ते गए, पर समाज का नैतिक आधार दुर्बल होता गया।

रामराज्य केवल भव्य मंदिरों से स्थापित नहीं होता। अयोध्या में भव्य राम मंदिर करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतीक है, पर यदि उसी समाज में चढ़ावे, सार्वजनिक धन और लोकसंपत्ति पर अनुचित दृष्टि बनी रहे तो यह संकेत है कि मंदिर बन गया, पर मर्यादा अभी जीवन में नहीं उतरी।

भ्रष्टाचार का वास्तविक समाधान केवल नए कानूनों, नई संस्थाओं या नई घोषणाओं में नहीं है। समाधान तब प्रारंभ होगा जब समाज फिर से चरित्र को धन से बड़ा मानेगा, जब सार्वजनिक जीवन में पद से अधिक मर्यादा का सम्मान होगा, जब माता-पिता अपने बच्चों से यह नहीं पूछेंगे कि कितना कमाया, बल्कि यह पूछेंगे कि कैसे कमाया, जब शिक्षक केवल रोजगार नहीं, उत्तरदायित्व का संस्कार देंगे, जब मतदाता जाति और धन नहीं, चरित्र को मत देगा।

राष्ट्र संसद से पहले समाज में बनता है। यदि समाज बदल जाएगा तो राजनीति भी बदलेगी, प्रशासन भी बदलेगा और शासन भी बदलेगा। लेकिन यदि समाज स्वयं भ्रष्टाचार को सफलता का दूसरा नाम मानता रहेगा, अपराधियों को सम्मान देता रहेगा और धर्मनिष्ठ व्यक्ति का उपहास करता रहेगा, तो कोई संविधान, कोई कानून और कोई सरकार रामराज्य स्थापित नहीं कर सकती। रामराज्य का मार्ग अयोध्या से होकर अवश्य जाता है, पर उसकी अंतिम मंज़िल मनुष्य का चरित्र ही है। जब तक चरित्र नहीं बदलेगा, तब तक सत्ता बदलती रहेगी, चेहरे बदलते रहेंगे, नारे बदलते रहेंगे, पर व्यवस्था का स्वरूप नहीं बदलेगा। यही आज के भारत का सबसे बड़ा सत्य है।

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