सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

महाराणा के हाथी रामप्रसाद ने किया,अकबर का घमंड चूर - चूर "

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(18 जून सन् 1576 हल्दीघाटी के युद्ध की 450 वीं वर्षगाँठ पर एक अविस्मरणीय नायक - विश्व के सर्वश्रेष्ठ हाथी रामप्रसाद की वीर गाथा और बलिदान की अनूठी दास्तान - हल्दीघाटी के महान् युद्ध और हिन्दुत्व की विजय स्मृति पर सादर समर्पित है ) 
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हल्दीघाटी का महान् युद्ध हिंदुओं की आन -बान-शान का विजय स्तम्भ है,जिसमें महाराणा प्रताप ने धूर्त अकबर के इस्लामिक राज्य का सपना ध्वस्त कर दिया था। हल्दीघाटी के युद्ध के विजय की 450 वीं वर्षगांठ पर एक अविस्मरणीय नायक हाथी रामप्रसाद के योगदान और बलिदान की अनूठी गाथा के उल्लेख के बिना,युद्ध में कुछ अधूरापन सा रह जाता है। विश्व में आपने हाथियों के युद्ध कम ही सुने होंगे,परंतु हल्दीघाटी में जो हाथियों का युद्ध हुआ,वह इतिहास में सदैव अविस्मरणीय रहेगा। महाराणा प्रताप के हाथी रामप्रसाद ने हल्दीघाटी में पराक्रम दिखाने के उपरांत अकबर को स्वामी भक्ति और स्वाभिमान का पाठ पढ़ाया,वह अकल्पनीय है, इसलिए रामप्रसाद को विश्व का श्रेष्ठ हाथी मानने में कोई अतिशयोक्ति न होगी।

 भारतवर्ष की सनातन दृष्टि 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' के आलोक में सभी जीवों और तत्वों में देवत्व देखती है, इसलिए भारतीय इतिहास में नर से नारायण बनने के साक्ष्य मिलते हैं तो वहीं अन्य प्राणियों ने भी देवत्व प्राप्त किया है। दृष्टांत के लिए समुद्र मंथन के 14 रत्नों में से ऐरावत हाथी का प्राकट्य होता है, और महालक्ष्मी के व्रत में ऐरावत का इतना माहात्म्य है कि इस व्रत को गजलक्ष्मी भी कहा गया है। अतः हिन्दुओं का विश्वास है कि हाथी के दर्शन से ज्ञान, सुख - समृद्धि, मान - सम्मान की प्राप्ति होती है, इसलिए हाथी सदैव पूजनीय है।

 वैज्ञानिक तथ्य भी है कि 
हाथियों की सूंघने की शक्ति बहुत ही तीव्र होती है। कहते हैं कि एक हाथी पानी की गंध को लगभग 4 से 5 किलोमीटर दूर से ही सूंघ लेता है। जानवरों में हाथियों का दिमाग बहुत तेज होता है। हाथी की स्मृति बहुत ही तेज होती है यह अपने हर साथी की पहचान कर उसके साथ बिताए हर दिन को याद रखते हैं।यही कारण है कि युद्धों में हाथियों की उपयोगिता महत्वपूर्ण रही है। 

 इतिहास में प्रचलित पंचांग के अनुसार महाराणा प्रताप और कपटी मुगल शासक अकबर के मध्य 18 जून 1576 को हल्दीघाटी का महान् युद्ध हुआ था, जिसमें परास्त होकर मुगलों को पीठ दिखाकर भागना पड़ा था। इस युद्ध की विजय में, मुगलों के लिए यमराज और हिंदुत्व के सूर्य महाराणा प्रताप के एक महायोद्धा, विश्व के सर्वश्रेष्ठ हाथी, महारथी "रामप्रसाद" ने अविस्मरणीय योगदान और बलिदान दिया था।  

भारतवर्ष सदा से वीरों और वीरांगनाओं की पवित्र भूमि रही है जिसमें विभिन्न प्राणियों ने भी अपनी वीरता के जौहर दिखाए हैं। चतुष्पादों में राणा कर्ण सिंह का घोड़ा शुभ्रक,राणा सांगा का घोड़ा लाल लश्कर,वीरांगना रानी दुर्गावती का हाथी सरमन,अंतिम हिन्दू सम्राट महारथी हेमू का हाथी हवाई, महाराणा प्रताप का हाथी रामप्रसाद और घोड़ा चेतक, छत्रपति शिवाजी महाराज के 7 घोड़ों में कृष्णा और वाघ्या कुत्ता, सम्भाजी का घोड़ा पवन, गुरु गोविन्द सिंह जी का घोड़ा नीला और झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का घोड़ा बादल प्रसिद्ध हैं। यूँ तो रामप्रसाद ने महाराणा प्रताप के साथ अनेक युद्ध लड़े थे,परंतु हल्दीघाटी का युद्ध रामप्रसाद वीरता का चरमोत्कर्ष था, जो चिरकाल तक अविस्मरणीय रहेगा।
 
18 जून, सन् 1576 को प्रातः हल्दीघाटी में भयंकर मोर्चा खुल गया महाराणा प्रताप के अग्रिम दस्ते ने मुगलों को खमनौर तक खदेड़ा मुगलों में अफरा-तफरी मच गई। पुन:शहजादा सलीम, मान सिंह, सैय्यद बारहा और आसफ खान ने मोर्चा संभाला। शहजादा सलीम और मान सिंह की रक्षार्थ 20 हाथियों ने घेराबंदी कर रखी थी। 

घेराबंदी तोड़ने के लिए राणा प्रताप ने रामप्रसाद को आगे बढ़ाया अपरान्ह लगभग 12.30 बजे हाथियों का घमासान युद्ध हुआ। शस्त्रों से सुसज्जित रामप्रसाद ने भयंकर रौद्र रुप धारण किया अकबर के 13 हाथियों को अकेले रामप्रसाद ने मार डाला और 7 हाथियों को मोर्चे से हटा दिया गया। इस तरह राणा प्रताप के लिए रामप्रसाद ने शहजादा सलीम और मानसिंह तक पहुंचने का मार्ग खोल दिया।

 महाराणा प्रताप ने शहजादा सलीम पर भयंकर आक्रमण किया, महावत मारा गया और हौदे पर जबरदस्त भाले का प्रहार किया, शहजादा सलीम नीचे गिर गया जिसे बचाने मान सिंह आया परिणाम स्वरूप मान सिंह की भी वही दुर्गति हुई। शहजादा सलीम और मान सिंह युद्ध भूमि से पलायन कर गए। सैय्यद बारहा और आसफ खां पर राणा पूंजा (पूंजा भील) ने घात लगाकर हमला किया। मुगल सेना हल्दीघाटी से पलायन कर गई और महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी का युद्ध जीत लिया।

 परंतु दूसरी ओर रामप्रसाद ने शेष हाथियों का पीछा किया और आगे निकल गया परंतु थकान अधिक हो गई थी और महावत भी मारा गया तब 7 हाथियों और 14 महावतों की सहायता से पकड़ा गया। अकबर के इस युद्ध का एक कारण रामप्रसाद हाथी की प्राप्ति भी करना था, परंतु सब व्यर्थ गया अकबर ने इसका नाम पीरप्रसाद रखा और हर प्रकार के मनपसंद खाद्यान्न प्रस्तुत किए परंतु रामप्रसाद ने ग्रहण नहीं किया और इसी अवस्था में 18 दिन बाद रामप्रसाद ने प्राणोत्सर्ग किया।

 धूर्त अकबर ने स्वयं रामप्रसाद की मृत्यु पर कहा कि "जिसके हाथी को मैं नहीं झुका सका.. उसके स्वामी को क्या झुका सकूंगा"।अंत में यह सत्य ही है कि धन और संपत्ति आएगी भी - जाएगी भी - फिर आएगी, परंतु आत्म सम्मान जाने के बाद कभी लौट कर नहीं आता है। महाराणा प्रताप के स्व के लिए पूर्णाहुति देने वाले विश्व के सर्वश्रेष्ठ हाथी महारथी रामप्रसाद को शत् शत् नमन है। 

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डॉ. आनंद सिंह राणा,श्रीजानकीरमण महाविद्यालय एवं इतिहास संकलन समिति महाकोशल प्रांत 🙏🙏

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